नई संस्कृति की ओर - रामवृक्ष बेनीपुरी
'नई संस्कृति की ओर' रामवृक्ष बेनीपुरी लिखित एक वैचारिक निबंध है| इसमें लेखक ने यह बताया है कि समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्वासों और संकीर्णताओं को छोड़कर नई, प्रगतिशील तथा मानवतावादी संस्कृति अपनानी चाहिए। लेखक का विश्वास है कि संस्कृति कभी स्थिर नहीं रहती; वह समय के साथ बदलती और विकसित होती रहती है। परंतु इस संस्कृति की मानवता जो असली नींव है उसे ही हमें आगे लेकर जाना है यह संदेश देते हुए प्रस्तुत निबंध लिखा है, जिसका आशय इस प्रकार -
अर्थनीति और राजनीति से भी बढकर संस्कृति:-
लेखक ने निबंध का प्रारंभ आजादी से किया है| लेखक लिखते है कि अब हिंदोस्तान आजाद हो गया है| इसीलिए उसका ध्यान नए समाज के निर्माण की ओर केंद्रित हो रहा देश का हर देशभक्त यह विचार कर रहा है कि यह नया समाज कैसा होगा? उसका मूल आधार कैसा हो? उसका विकास किस प्रकार किया जाये? इसक उत्तर देते वक्त लेखक इस निबंध में लिखते है कि समाज को एक वृक्ष की तरह मान लेना चाहिए, जिसकी जड अर्थनीति, राजनीति तना अर्थात शरीर; विज्ञान आदि उसकी डालियां हैं और संस्कृति उसके फूल है| परंतु हमें समाज की अर्थनीति और राजनीति पर हमें ध्यान नहीं देना है ब्लकि हमें उसकी संस्कृति की ओर सबसे अधिक ध्यान देना है| कारण मूल और तने की सार्थकता तो उसके फूल में है अर्थात उसके संस्कृति में है | परंतु गत पचास वर्षों के राजनीतिक -आर्थिक संघर्षों नें हमारे दिमाक इतना कुंठित बना दिया है कि संस्कृति की अच्छी बातें हमारे सामने आकर भी नहीं आती| कारण मूल,तन और फूल का जितना गहरा संबंध है उतना ही गहरा संबंध अर्थनीति, राजनीति और संस्कृति का है| हम इन्हें अलग नहीं कर सकते| इसी कारण हमारी आंखों के सामने अर्थनीति और राजनीति के साथ नई संकृति निर्माण हो रही उसे हम देख नहीं पा रहे| गेहूं हमारी आंखों में इस कदर छाया हुआ है कि गुलाब को हम देखकर भी नहीं देख पाते| अर्थात हमारे जीवन में रोटी इस कदर छाई हुई है कि हमें संस्कृति,सुंदरता और संवेदना दिखाई ही नहीं देती|
हमें रोटी के प्रश्न को हल करना है, जरूर पर किस लिए इस पर भी विचार करना जरुरी है कारण आप केवल चारा-दाना खानेवाले प्राणी नहीं है| आप में संवेदना है, यह संवेदना ही आपकी संकृति है| कारण समाज में किसी भी कार्य की सफलता आपकी संस्कृति पर ही निर्भर है| इस वक्त आपने पास कितनी धन-दौलत है, कितना अनाज है यह मायने नहीं रखता| समाज में रहते वक्त संस्कृति ही दिखाई देती जो आपके व्यक्तिमत्व को व्यक्त करती है| आपका बर्ताव ही समाज को प्रभावित करता है| यह बर्ताव यांनी संस्कृति इसीलिए समाज में अपना स्थान निर्माण करना है तो भले ही आप आपके जड को खाद-पानी डाले, तनों की डालियों की रक्षा करे किंतु नजर फूल पर रखे अर्थात संस्कृति पर रखे| कारण वही आपको बनाती है| इसीलिए आपकी नजर फूल पर, गुलाब पर और संस्कृति पर ही होनी चाहिए|
कारण संस्कृति के बिना नये समाज की हर योजना अधूरी है| जैसे रविंद्रनाथ ठाकुर कुछ कडियों में संस्कृति का महत्व बताया है| सूरज डूबने जा रहा थे, उसने प्रश्न पूछा कौन मेरे पीछे इस संसार को आलोक देगा? चांद, सितारे चुप रहे| पर छोटे- से मिट्टी के दीए ने बढकर कहा, देवता, यह भारी बोझ मेरे दुर्बल कंधों पर|" इस छोटे से दीए की बात यह हमारी संस्कृति है| इस गुलाब की खेती के मालिक हम है| इस संस्कृति से भरा फूलों का जो संसार है उसके हम भौरे है| यह गुलाब की दुनिया, फूलों की दुनिया, रंगों की दुनिया, सुगंधों की दुनिया, इतनी सुकुमार, इतनी नाजुक है कि की अर्थशास्त्रियों के हथौदे और राजनीतिज्ञो कुल्हाडे इसका सर्वनाश न कर दे| इसके इसका ध्यान हमें ही रखना है| कारण प्रेमचंद जी के शब्दों में रक्षा में ही हत्या होती है| इसीलिए ऐसे रक्षकों से हमें अपनी संस्कृति बचानी है|
पुराने संस्कृति पर आधारित ही नई संस्कृति का अस्तित्व
लेखक लिखते नए जमाने की नई संस्कृति आ रही है इसका मतलब यह नहीं हम पुराने संस्कृति के निंदक या शत्रु है पुराने संस्कृति के सर जमीन पर ही नई संस्कृति की अट्टालिका खडी है| कारण इस संस्कृति में मानव को सारी दासता-सारी विषमता से मुक्त कर विशुद्ध मानवता की स्थापना की है| कारण तभी मानव जीवन में सौंदर्य और अन्न प्राप्त कर सकता है| इस सौंदर्य और आनंद की ओर ही नई संस्कृति की चलना और बढना भी है| भले ही हमें लगता है की पुरानी संस्कृति सड गई है, उसे घुन लगा हुआ है| नई संकृति की रूपरेखा नई ही होगी, नए साधनों को हम अपनाने से नहीं हिचकेंगे, परंतु हमारा उद्देश्य जीवन के हर सांस्कृतिक पहपू को इस प्रकार विकसित करना है कि हमारा सामजिक जीवन स्वतंत्रता, समता और मानवता के आधार पर ही पुनर्गठित हो और वह सौदर्य और आनंद पूर्ण रूप से उपलब्ध कर सके| इस प्रकार स्वतंत्रता, समता और मानवता नई संकृति के यही आधार हो सकते है किंतु इसका अर्थ केवल राजनीतिक और आर्थिक अर्थो में नहीं लगाना तो तीसरा शब्द मानवता से ही हमारा उद्देश्य हृष्ट और पुष्ट होगा| अर्थात सारी दासताओं और विषमताओं से मानवों को मुक्त कर उनके जो परस्पर संबंध है उसे वे विशुद्ध मानवता पर प्रतिष्ठित करना चाहते | तभी मानव के जीवन में सौंदर्य और आनंद की उपलब्धि हो जायेगी|अत: सौंदर्य और आनंद की ओर ही नई संस्कृति को चलना और बढना है|
भिन्न-भिन्न साधनों द्वारा नई संस्कृति का देश में प्रसार:-
लेखक को लगता है आज के समाज में भी कितनी कुरूपता है| पीडाओं की विविधता है इसे हम सुंदर बनायेंगे और सुखी बनायेंगे| इसके लिए लेखक, कवि और पत्रकारों को इकठ्ठा करेंगे और उन्हें जनता के अभावों और अभियोंगों का शि चित्रण करने के लिए कहेंगे| साहित्य को उस पथ पर ले चलेंगे कि जनता स्वंतंत्र और पूर्ण जीवन का उपभोग कर सके| इसके साथ जो कलाकार नाटक, संगीत, नृत्य और चित्रकारी में लगे है, उन्हें भी एकत्रित करेंगे और प्रोत्साहित करेंगे कि अपनी कलाकृति में जनता की इच्छाओं और आकांक्षाओं को प्रस्तुत करें और सामजिक जीवन को सौंदर्यमय बनाकर उसे आनंद से परिपूरित करे| इस तरह सभी कलाकारों को आव्हान करेंगे कि जो अपनी लेखनी या कूची, वाणी या वाद्यों द्वारा समाज को 'सत्यं शिवं सुंदरम' की ओर ले जाने में लगे है, किंतु एक व्यापक संगठन न होने के कारण जिसकी साधनाएं इच्छित फल नहीं दे पा रही है| इसके लिए लेखक इनका संगठन कर शहरों और गावों में ऐसे सांस्कृतिक केंद्र खोलना चाहते है, जिनमें उनकी कला-कृतियों का प्रदर्शन हो सके और जहां से नई संस्कृति का संदेश देश के कोने-कोने में फैला सकें|
नई संस्कृति में जनता को स्थान:-
लेखक नई संस्कृति में जनता को स्थान देना चाहते है| वे कहते है की हमने देखा हैं और दुख के साथ अनुभव की किया है कि आज की नई संस्कृति कुछ अभिजात लोगों तक सीमित और परिमित है| परंतु नया समाज जनता का समाज होगा और संस्कृति को भी जनता की संस्कृति होना है| इसीलिए नई समाज और संस्कृति का भविष्य महान है| कारण अब तक की संस्कृति मानवता के एक सैकडे का भी सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाती थी जो अब सौ में से सौ प्रतिशत प्रतिनिधित्व करेगी| वह संस्कृति कितनी बडी चीज होगी इसकी आप कल्पना कर सकते है कि कितनी बडी चीज और कितनी रंग-बिरंगी चीज बन जायेगी| उनकी कलम या कूची, वाणी या वाद्य द्वारा सौ में से सौ की इच्छा-आकांक्षा, हर्ष-उल्लास, मिलन-विरह, शौर्य-बलिदान, दया-क्रोध, पीर-रुदन का चित्रण होगा| सदियों से अवरुद्ध निर्झरिणी जब एकाएक शैल श्रुंग से फूट पडेगी| विविध गुणों से युक्त पिंजरें में बांध मादा पक्षी जन वन-वृक्षों के चोटी पर बैठ कलरव कर उठेगी| अर्थात मानवता की इस नई संस्कृति में में प्रत्येक मानव आंनद और सौंदर्य में झूल उठेगा| इसकी कल्पना कीजिए और खुश होकर इस अच्छे कार्य में हाथ बंटाइए|
इस प्रकार प्रस्तुत निबंध में मानवता से भरी नई संस्कृति किस प्रकार आनंद और सौंदर्य से परिपूर्ण तब होगी जब इस अच्छे कार्य में हर कोई हाथ बंटायेगा|
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