प्रोक्ति विज्ञान
प्रोक्ति विज्ञान भोलानाथ तिवारी द्वारा प्रतिपादित भाषा विज्ञान का प्रधान अंग है| जिसमें प्रोक्ति का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है| इसीलिए पहले प्रोक्ति क्या है, यह समझना आवश्यक होता है|
प्रोक्ति की संकल्पना :-
प्रोक्ति की मूल संकल्पना अंग्रेजी से आई है| प्रोक्ति के लिए मूल शब्द अंग्रेजी 'डिस्कोर्स' है| भाषाविज्ञान का पारिभाषिक शब्द है। पिछले वर्षों में नौवें दशक तक भाषाविज्ञान में भाषा की सर्वोपरि इकाई वाक्य ही माना जाता था। पर आधुनिक भाषाविदों ने भाषा की सबसे बड़ी इकाई को वाक्य से आगे तक विस्तारित किया, जिसे 'वाक्यातीत' (Beyond Sentence) कहा जाता है। 'प्रोक्ति' इसी स्तर की संकल्पना है।
इस दृष्टि से प्रोक्ति को निम्नलिखित रूप में परिभाषित कर सकते है|
अ) अंग्रेजी परिभाषाएं
अंग्रेजी में ट्रिम, सपोर्ट, कार्टर, लीच, फाउसर, मीथन, एडवर्डज की परिभाषाओं के हिन्दी रूपान्तर नीचे द्रष्टव्य हैं:
1) 'वाक्यों का कोई भी ठोस अनुक्रम एक अद्वितीय प्रोक्ति को संघटित करता है।
2) 'वाक्यों के बीच के व्यवस्थित सम्बन्धों पर किसी भी नैरन्तर्य मूलक प्रोक्ति-पाठ में विचार किया जा सकता है।'
3) 'प्रोक्ति एक ऐसा छत्रपद है जो भाषा-संघटना के बहुतेरे पहलुओं को आच्छादित करता है। वाक्य के स्तर से ऊपर के स्तर के संबद्ध पाठ को निर्दिष्ट करने के लिए मह व्यवहृत होता है। यह एक विशिष्ट शैली या विद्या का अर्थ भी दे सकता है।
4) 'प्रोक्ति वक्ता और श्रोता के बीच के कार्य-सम्पादन के रूप में प्रयुक्त भाषिक सम्प्रेषण है। यह एक अन्तर-वैयक्तिक क्रियाशीलता है जिसका रूप इसके सामाजिक उद्देश्य के द्वारा निर्धारित होता है।"
5) 'प्रोक्ति भापा का यह गुण है जो अन्तर वैयक्तित शब्दों की मध्यस्थता करता है, जिसे सम्प्रेषण की किसी कला के द्वारा संवहित होना चाहिए।
6) 'प्रोक्ति-विश्लेषण एक पद्धति है, जो किसी भी पृथक् पृथक् पंक्तिबद्ध सामग्री को संयुक्त करने का प्रयास करती है। वह भाषा और भापा-सदूश होती है जो एक से अधिक प्राथमिक वाक्यों को संयुक्त करती है तथा कुछ स्थानिक संरचना को एक पूर्ण प्रोक्ति के रूप में निरूपित करती है।"
7) जिस पद्धति में भाषिक तत्त्व समप्रेषणशील प्रभाव के प्रति प्रकार्य करते हैं उसे प्रोक्ति कहते हैं।
8) प्रोक्ति एक ऐसी भापिक निष्पत्ति है, जो अपने-आप में बिना लम्बाई की सीमा का ध्यान रखे एक पूर्ण इकाई के बतौर प्रस्तुत होती है।
9. 'एक प्रोक्ति प्रायः बहुतेरे वाक्यों से बनी एक पूर्ण और आत्म- अंतर्विष्ट पाठ है।"
10 प्रोक्ति के रूप में किसी भी कथन-शृंखला को पहचानने की योग्यता परस्पर ग्रथित रूप में अंशतः भाषिकीय ज्ञान पर और अंशतः उस सम्पूर्ण संदर्भ के अभिज्ञान पर सामने आती है, जिसमें शब्द इसके अन्तर्गत बहुतेरे प्रसंगों के भाग और उसके परिसीमन शब्द इसके अन्तर्गत बहुतेरे प्रसंगों के भाग और उसके परिसीमन की रचना करते हैं।"
11 संक्षेप में प्रोक्ति को स्वाभाविक भाषा के ऐसे अभिव्यक्ति प्रकार के बतौर परिभाषित किया जा सकता है जो वाक्यों के वैसे अनुक्रम को साकार करता है, जिसमे गुणों को परितुष्ट करने की क्षमता होती है। वाक्यात्मक स्तर पर वाक्यों की अनुपाती व्याकरणा-त्मकता की अपेक्षा प्रोक्ति द्वारा अभिव्यंजित वाक्यो के अनुक्रम के पाठात्मक स्वरूप को परिभाषित करने वाली सर्वाधिक सुस्पष्ट विशेपता समंजसता की अर्थीय गुणात्मकता है।
अ) हिंदी परिभाषाएं:-
हिंदी में गोस्वामी, भाटिया, श्रीवास्तव सितांशु, एवं ओम प्रकाश की परिभाषाएं द्रष्टव्य है-
1) प्रोक्ति वाक्यों परि स्तर की ऐसी इकाई है, जिसके कथ्य में आंतरिक संसक्ति या संयोजन तथा वाक्यों में संदर्भ परक और तर्कपूर्ण अनुमान रहता है|
2) अनेक वाक्य मिलकर जब सर्वांग रूप से जब इकाई रूप बन जाते है| तब यह इकाई ही वाक्य बांध या प्रोक्ति कहलाती है|
3) 'प्रोक्ति या पाठ वाक्यों का मात्र जमघट न होकर उनकी संरचना त्मक या दूसरे अर्थ में कहें तो सर्जनात्मक रूपान्तरण होता है।
4) 'एक प्रोक्ति उस अर्थयत्ता और साभिप्रायता को उजागर करती है, को बिखरे हुए वाक्यों में उजागर नहीं हो सकती, शब्दों का एक अनुक्रम, जो एक अस्वीकार्य वाक्य का प्रकटन होता है, एक सम्पूर्ण संरचना में ही स्वीकार्य हो सकता है।"
5) 'भाषा का मूल प्रकार्य सम्प्रेषणीयता है, पर उसका सम्पादन प्रायः वाक्य द्वारा संभव नहीं है। अतः वाक्य को भाषा की इकाई निश्चित करने या स्वीकार करने में सहज कठिनाई आती है। सम्प्रेषणीयता की इस दृष्टि से वस्तुतः जो. भापिक व्यापार सम्पादित होता है, उसका स्तर वाक्यातीत हुआ करता है और प्रोक्ति इसी वाक्यातीत स्तर की सार्थक इकाई का नाम है|'
6) 'प्रोक्ति वह वाक्योपरि संरचना है, जिसमें वाक्य से आगे फैली तार्किक इकाई समाहित होती है।"
प्रोक्ति की स्वरुगत विशेषताएं:-
प्रोक्ति-विषयक उपर्युक्त परिभाषाओं को देखने से प्रोक्ति की निम्नलिखित स्वरूपगत विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-
1) प्रोक्ति की पहली स्वरूपगत विशेषता उसके एकाधिक या अनेक वाक्यों का समुच्चय होने की है, यद्यपि कभी-कभी एक पूर्ण वाक्य स्वरूपतः प्रोक्ति नही होकर भी प्रकार्यतः प्रोक्ति के बद्धौर अपनी भूमिका निभा सकता है। जिस तरह कभी-कभी एक शब्द स्वरूपतः वाक्य न होकर भी वाक्य का काम करता है, उसी तरह कभी-कभी एक वाक्य स्वरूपतः प्रोक्ति न होकर भी प्रोक्ति की भूमिका में उपस्थित होता है।
2) प्रोक्ति में वाक्यों का ठोस अनुक्रम होता है। इसे वाक्यों के बीच का व्यवस्थित सम्बन्ध भी कहा जा सकता है। प्रोक्ति केवल वाक्यों का समुच्चय नहीं होती है, बल्कि ऐसे वाक्यों का समुच्चय होती है, जो वाक्य परस्पर अन्तरग्रंथित और अन्तस्सम्बद्ध होते हैं। असम्बद्ध वाक्यों की श्रृखला को प्रोक्ति नही कहा जा सकता है। यहाँ जिस पारस्परिक स्वीकार्यता की बात की जाती है, उसके मूल में तार्किक संसक्ति क्रियाशील होती है। इसी के द्वारा प्रोक्ति की आन्तरिक संरचना तैयार होती है।
3) प्रोक्ति वाक्यों का ऐसा अनुक्रम होती है, जिसके पाठात्मक स्वरूप में 'संसक्ति के अतिरिक्त 'समंजसता' की अर्थीय गुणात्मकता विद्यमान होती है।
4) प्रोक्ति की चौथी स्वरूपगत विशेषता वाक्यांश और वाक्य तथा वाक्य और वाक्य को सम्बद्ध करने वाले भाषिक तत्त्वों के रूप में उपस्थित होती है। इसी दृष्टि से प्रोक्ति आवर्तन, सर्वनाम तथा योगात्मक, विकल्पात्मक विरोधात्मक, कारणात्मक, व्याख्यात्मक निष्कर्षात्मक जैसे विभिन्न निपातों से स्वरूपित होती है। प्रोक्ति मे इससे ही अन्विति बनती है तथा तारतम्य बाता है।
5) प्रोक्ति अपने स्वरूप में एक पूर्ण कथन या बयान होती है, जो सदर्भ के अनुरूप आत्मालापी, संलापी या सूचनात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है। इसे केवल संवादात्मकता की सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रोक्ति में सूचनात्मक संदेश होता है।
6) प्रोक्ति सम्प्रेपणीयता की दृष्टि से भापा की ऐसी सार्थक इकाई है, जिसमे तार्किक संसक्ति विद्यमान होती है। यह एक अन्तर-वैयक्तिक भाषिक सम्प्रेपण भी है, जहां भाविक तत्त्वों का प्रकार्य सम्प्रेपणशील प्रभाव तक सक्रिय होता है।
7. प्रोक्ति भाषा की ऐसी पूर्ण इकाई है जिसकी लम्बाई की सीमा मुक्त होती है। इसकी प्रकृति बहुत लचीली होती है। आकार की दृष्टि से यह दो वाक्यों का भी समुच्चय हो सकती है और एक अनुच्छेद में भी स्वरूपित हो सकती है। यही नहीं, पूरी-की-पूरी रचना भी प्रोक्ति के रूप में स्वरूपित होती है, जिसके अन्तर्गत कई छोटी-छोटी प्रोक्तियों का समाहार होता है ।
8) प्रोक्ति का स्वरूप प्रकार्यमूलक (Functional) होता है। इसके आधार पर ही प्रोक्ति के प्रकार्यों की पहचान सम्भव होती है। मुख्यतः प्रोक्ति या तो किसी विचार या संकल्पना को व्यक्त करती है या अन्तः वैयक्तिक सम्बंधों को निरूपित करती है, अथवा किसी पाठ की विषयवस्तु का शापन करती है।
इस प्रकार 'किसी बात को कहने के लिए प्रयुक्त वाक्य समुच्चय को 'प्रोक्ति' कहते है| जिसमें एकाधिक वाक्य आपसे में सुसंबंध होकर अर्थ और संरचना की दृष्टि से इकाई बन गयी है| अंग्रेजी 'डिस्कोर्स' के हिंदी में प्रतिशब्द के रूप में 'प्रोक्ति' का प्रयोग हो रहा है| इसीलिए भोलानाथ तिवारी ने प्रोक्ति विज्ञान को 'डिस्कोर्सालॉजी नाम दिया| भारतीय काव्य शास्त्रज्ञ प्रोक्ति के लिए 'महावाक्य' का प्रयोग प्राचीन काल में करते थे| आधुनिक युग में समजा भाषा विज्ञान के विकास के कारण प्रोक्ति की ओर इन लोगों का ध्यान गया है| क्यों कि समाज में विचार विनिमय के लिए प्रोक्ति का प्रयोग किया जाता है| अर्थ और संरचना आदि सभी दृष्टियों से विचार कर ने प्रोक्ति ही भाषा की मुलभूत सहज इकाई ठहरती है| यह भोलानाथ तिवारी का मत है|
प्रोक्ति का विश्लेषण करने पर मिलनेवाला वाक्य इसप्रकार मिलता है| "लंका का अत्याचारी रावण अयोध्या के राजकुमार राम की पत्नी सिता को उठाकर अपने रथ पर बिठाकर ले गया| पता चलने पर राम और उसकी सेना ने उस पर चढाई की| युध्द में रावण के पक्ष के लोग मारे गए| अंत में वही हुआ, जो होना था| राम ने रावण को बाण से मारा और रावण वीर गती को प्राप्त हुआ| यह एक प्रोक्ति है जिसमें कई है, जो आपस में सुसंबंध है|
प्रोक्ति के प्रकार:-
प्रोक्ति में संवाद अनिवार्य है क्योंकि इसका सम्बन्ध भाषा व्यवहार से है। अत: भाषा के व्भायवहार पर आधारित प्रोक्ति के दो प्रकार बनते है -
1) संलाप
2) एकलाप
1) संलाप :
सभी तरह के भाषा व्यवहार संलाप के अन्तर्गत आते हैं। इसके लिए कम से कम दो व्यक्तियों का होना आवश्यक है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'संलाप भाषा व्यवहार की वह इकाई है जिसमें कम-से-कम दो पात्रों (वक्ता और श्रोता) के बीच विचारों का परस्पर आदान प्रदान होता है।' संलाप में वक्ता तथा श्रोता वो अनुभवों में साग्य होना जरूरी है। नहीं तो सम्प्रेषण में बाधा आएगी। इसे उदाहरणों द्वारा निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है-
माँ-बेटी क्या कर रही हो?
बेटी घर का काम कर रही हूँ।
माँ - बहुत देर हो गई है।
बेटी बस, अभी आती हैं।
यही माँ-बेटी में अनुभव की समानता के कारण संलाप सहज रूप में हो रहा है। दूसरे उदाहरण मैं-
व्यक्ति-क्या खाने में नमक डाला है?
चाय वाला-क्या नमक कम है साहेब?
व्यक्ति नहीं भाई, मुझे बिना नमक का खाना चाहिए।
चाय वाला ओह, मैं समझा नमक और चाहिए।
चाय वाला ओह, मैं समझा नमक और चाहिए।
यहाँ व्यक्ति और खाने वाले के अनुभवों में समानता नहीं है। इसलिए सम्प्रेषण में कठिनाई हो रही है।
इस आधार पर कहा जा सकता है कि विचारों के आदान-प्रदान अथवा संलाप के लिए वक्ता और श्रोता के बीच मानसिक स्तर पर भी साम्य होना आवश्यक है।
वक्ता और श्रोता की भूमिका के आधार पर संलाप के दो उपभेद होते हैं-
i) गत्यात्मक संलाप :
इसमें वक्ता तथा श्रोता सक्रियता से आगे बढ़ते हैं। यदि सक्रियता न हो तो संलाप आगे बढ़ ही नहीं सकता साथ ही इसमें वक्ता और श्रोता की भूमिका बदलती रहती है। अर्थात् वक्ता जो कहता है, उसे सुनकर श्रोता जवाब देता है, तब श्रोता वक्ता की भूमिका में आ जाता है और उसकी बात सुनने के कारण वक्ता, श्रोता हो जाता है।
ii) स्थिर संलाप-
गत्यात्मक संलाप की तुलना में स्थिर संलाप में श्रोता की भूमिका सक्रिय सक्रिय रहता है, किन्तु श्रोता निष्क्रिय ही रहता है। वह अपने विचार उस रूप मे तासकता साथ ही इसमें वक्ता और श्रोता की भूमिका बदलती रहती है। अर्थात् वक्ता जो कहता है, उसे सुनकर श्रोता जवाब देता है, तब श्रोता वक्ता की भूमिका में आ जाता है और उसकी बात सुनने के कारण वक्ता, श्रोता हो जाता है।जिससे संलाप आगे बढ़ सके। साथ ही स्थिर संलाप में वक्ता व श्रोता की भूमिका भी नहीं बदलती। रेडियो व दूरदर्शन आदि में प्रसारित होने वाले समाचार जैसे कार्यक्रम स्थिर संलाप के उदाहरण है।
2) एकालाप :
ऐसे अवसरों पर जहाँ भावावेश में व्यक्ति स्वयं से कहता है और स्वयं ही उत्तर भी देता है, एकालाप की स्थिति होती है। इसमें भी वक्ता और श्रोता की स्थिति बनी रहती है। अन्तर केवल इतना ही है कि श्रोता वहाँ कोई दूसरा व्यक्ति नहीं होकर स्वयं वक्ता ही होता है। संलाप की तरह एकालाप के भी दो भेद होते हैं-
i) गत्यात्मक एकालाप :
इस प्रकार के एकालाप में वक्ता ही स्वयं से प्रश्न करता है और स्वयं ही उसका उत्तर देता है। इस प्रकार एक ही व्यक्ति वक्ता और श्रोता की भूमिका निभाता है। इस दृष्टि से प्रतीत होता है कि सम्भवतः दो व्यक्ति परस्पर बातें कर रहे हों।
ii) स्थिर एकालाप :
गत्यात्मक एकालाप की तुलना में स्थिर एकालाप में वक्ता स्वयं से प्रश्न नहीं करता बल्कि स्थिर विचार के रूप में एक के बाद एक अपने भाव प्रकट करता है। स्थिर एकालाप को प्रायः 'स्वगत कथन' भी कहा जाता है। सैद्धान्तिक रूप से इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है किन्तु सूक्ष्म अन्तर यह है कि स्वगत कथन किसी को सुनाने के लिए नहीं होता जबकि एकालाप में व्यक्ति अपने मनोभावों को प्रकट करने के लिए स्वयं से बातें करता हैं। अर्थात वह स्वयं वक्ता और श्रोता होता है। स्वगत कथन में व्यक्ति केवल वक्ता होता है, श्रोता नहीं।
निष्कर्षतः प्रोक्ति विज्ञान यह भाषा विज्ञान की महत्त्वपूर्ण शाखा है। इसमें प्रोक्ति का अध्ययन विश्लेषण किया जाता है। यह अध्ययन समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक, सैद्धांतिक रूपों में किया जाता है।
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