सिलिया – सुशीला टाकभौरे

 

सिलिया कहानी का कथ्य 

 सुशीला टाकभौरे

 सिलिया सुशीला टाक भौरे लिखित कहानी है|इसमें 1960 के दशक की दलित समाज के लडकी के परिवर्तीत विचार की कहानी है| समाज में दलितों के प्रति जो छुआछूत की भावना है देख उसका मन दुखी होता है| अत: वह सोचती है कि  वह इतना पढेगी कि समाज उसे खुद बखुद सम्मान देगा| अत: दलित समाज के लिए प्रेरणा बनी सिलिया की कहानी यहां प्रस्तुत है|

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के इस छोटे गाँव के लडकी यह कहानी है, जो अछूत परिवार है| जिसका नाम सिलिया है| नानी उसे प्यार से सिलिया कहती, तो पढे-लिखे भाई ने शैलजा नाम रखा था और माता-पिता के लिए वह सिल्ली रानी| ग्यारहवीं कक्षा में पढा रही साँवली-सलोनीमासूम-भोलीसरल और गम्भीर स्वाभाववाली सिलिया स्वस्थ देह के कारण अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही लगती थी। 

        सन 1960 की घटना जिसने हलचल मचा दी थी| हिंदी अखबार ‘नई दुनिया’ में एक विज्ञापन छपकर आया था कि 'शूद्र वर्ण की वधू चाहिए'। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जाने माने युवा नेता सेठी जी अछूत कन्या के साथ विवाह करके समाज के सामने एक आदर्श रखना चाहते थे। उसकी केवल एक ही शर्त थी कि लड़की कम-से-कम मैट्रिक हो। गाँव के पढ़े-लिखे लोगों नेब्राह्मण-बनियों ने सिलिया की माँ को सलाह दी, "तुम्हारी बेटी तो मैट्रिक पढ़ रही हैबहुत होशियार और समझदार भी हैतुम उसके फोटोनामपता ओर परिचय लिखकर भेज दो। तुम्हारी बेटी के तो भाग्य खुल जाएँगेराज करेगी। सेठी जी बहुत बड़े आदमी हैंतुम्हारी बेटी की किस्मत अच्छी है...."

परंतु इस समय उसके मां ने बहुत समझदारी बात की थी| "नहीं भैया यह सब  बडे  लोगों के चोंचले हैं। आज  सबको दिखाने के लिए हमारी बेटी के साथ शादी कर लेंगे और कल छोड़ दिया तो हम गरीब लोग उनका क्या कर लेंगेअपनी इज्जत अपने समाज में रहकर ही हो सकती है। उनकी दिखावे की चार दिन की इज्जत हमें नहीं चाहिए। हमारी बेटी उनके परिवार और समाज में वैसा मान-सम्मान नहीं पा सकेगीन ही फिर हमारे घर की ही रह जाएगीन इधर की न उधर कीहमसे भी दूर कर दी जाएगी। हम तो नहीं देवें अपनी बेटी को। हम उसको खूब पढ़ाएँगे-लिखाएँगे। उसकी किस्मत में होगा तो इससे ज्यादा मान-सम्मान वह खुद पा लेगी।"

इसपर आज सिलिया स्वयं चिंतन कर रही है| माँ के यथार्थ के आधार पर कहे गए अनुभव कथन पर उसका आस्थापूर्ण विश्वास था। मध्यप्रदेश की जमीन में सन् 60 तक ऐसी फस्ल नहीं उगी थीजो एक छोटे गाँव की अछूत मानी जानेवाली भोली-भाली लड़की के मन में अपना विश्वास जगा सके। परंतु सिलिया के मन  में यह विश्वास निर्माण हो रहा था| कारण उसने अपने जीवन में ऐसी छुआछूत की बात अनुभूत की थी|

उसकी मामा-मामी तहसील के गाडरी मुहल्ले में रहते है| उनकी बेटी मालती सिलिया की हमउम्र है| बस साल-छह महीना छोटी होगीमगर हौसला और निडरता उसमें बहुत ज्यादा थे। जिस काम को न करने की नसीहत उसे दी जाएउसी काम को करके वह खतरे का सामना करना चाहती थी। एक दिन मालती  ने गाडरी मुहल्ले के कुएं से पानी पिया था| वहां से बीस-पच्चीस कदम पर ही मामा-मामी का घर थाजिसकी रस्सी-बाल्टी और कुएँ को छूकर मालती ने अपवित्र कर दिया था। इसीलिए बकरीवाली चिल्ला रही थी "ओरी बाईदौड़ो रीजा मोड़ी को समझाओ... देखो तोमना करने के बाद भी कुएँ से पानी भर रही है। हमारी रस्सी बाल्टी खराब कर दई जाने...।" और मामी को उसने कितनी बातें सुनाई थीं, "क्यों बाईजई सिखाओं हो तुम अपने बच्चों कोएक दिन हमारे मुँड़ पर मूतने को कह देना। तुम्हारे नज़दीक रहते हैं तो का हमारा कोई धरम-करम नहीं हैका मरजी है तुम्हारी साफ़-साफ़ कह दो।" मामी गिड़‌गिड़ा रही थी, "बाई जीमाफ कर दो। इतनी बड़ी हो गईमगर अकल नहीं आई इसको। कितना तो मारूं हूँफिर भी नहीं समझे।" इसीलिये मामी उसे वहां से उसे मारती हुई लेकर आई थी| तब मालती रो भी रही और कहती जा रही थी, "ओ बाईमाफ कर दोअब ऐसा कभी नहीं करूंगी"। इस समय सिलिया बारह साल की थी डरी, सहमी कोने में खडी रहती| उस वक्त उसे मालती की गलती लगती है| उसे लगता है "जब हमें पता है कि हम अछूत दूसरों के कुएँ से पानी नहीं ले सकते तो फिर वहाँ जाना ही क्यों?"  पर वह आज सोचती है "आखिर मालती ने कौन-सा जुर्म किया था- प्यास लगीपानी निकालकर पी लिया।"

ऐसी ही और एक घटना एक साल पूर्व हुई थी| वह अपने कक्षा-शिक्षक और सहपाठियों के साथ वह तहसील के स्कूल में गई थी। वहां पाँचवीं कक्षा के टूनमिण्ट हो हो रहे थे।वह लम्बी दौड़ और कुर्सी दौड़ स्पर्धाओं में प्रथम आई थी। वह अपनी खो-खो टीम की कैप्टन थी और खो-खो की स्पर्धा में उसी के कारण जीत मिली थी। खेल-कूद के शिक्षक गोकुल प्रसाद ठाकुर जी ने सबके सामने उसकी बहुत तारीफ की थी। साथ ही पूछा था, "शैलजायहाँ तहसील में तुम्हारे रिश्तेदार रहते होंगेतुम वहाँ जाना चाहती होहमें पता बताओहम पहुँचा देंगे।"

परंतू वह अपने मामा- मामी मुहल्ले का नाम नहीं बता सकी, तब वह दोस्त हेमलता ठाकुर के बहन के  घर चली जाती है| उसके बहन यह ससुराल है| वहां बहन की सास ने उसकी जाति पूछी तब पानी का ग्लास वापस लेकर गयी| वास्तव उसे बहुत प्यास लगी थी परंतु बिना पानी पिये वह वहां से अपने मामा मामी के घर चली गयी थी| आज वह सोचती है, "हेमलता की मौसी जी से वह पानी क्यों नहीं ले सकी थी? कारण वह हेमलता की बहन की ससुराल से मिली उमस को भूल नहीं पा रही थी। शाम के समय मामा ने उसे स्कूल पहुँचा दिया था। सिलिया का स्वभाव चिन्तनशील बनता जा रहा था। परम्परा से अलग नए-नए विचार उसके मन में आते। अब यह विज्ञापन-उच्च वर्ग का नवयुवकसामाजिक कार्यकर्ता जाति भेद मिटाने के लिए शूद्र वर्ण की अछूत कन्या से विवाह करेगा – यह सेठी महाशय कस ढोंग है| - आडंबर है या सचमुच वे समाज की, परंपरा को बदलनेवाले सामाजिक क्रांति लानेवाले महापुरुष है|

उसके मन में यह विचार भी आता कि अगर उसे अपने जीवन में ऐसे किसी महापुरुष का साथ मिला तो वह अपने समाज के लिए बहुत कुछ कर सकेगी। लेकिन क्या कभी ऐसा हो सकता हैयह प्रश्न उसके मन से हटता नहीं था। माँ के यथार्थ के आधार पर कहे गए अनुभव कथन पर उसका आस्थापूर्ण विश्वास था। मध्यप्रदेश की जमीन में सन् 60 तक ऐसी फस्ल नहीं उगी थीजो एक छोटे गाँव की अछूत मानी जानेवाली भोली-भाली लड़की के मन में अपना विश्वास जगा सके। और फिर दूसरों की दया पर सम्मानअपने निजत्व को खोकर दूसरों के शतरंज का मोहरा बनकर रह जानाबैसाखियों पर चलते हुए जीना नहीं कभी नहीं! सिलिया सोचती-"हम क्या इतने भी लाचार हैंआत्मसम्मान रहित हैहमारा अपना भी तो कुछ अहं भाव है। उन्हें हमारी जरूरत हैहमको उनकी जरूरत नहीं। हम उनके भरोसे क्यों रहें। पढ़ाई करूंगीपढ़ती रहूँगीशिक्षा के साथ अपने व्यक्तित्व को भी बड़ा बनाऊँगी। उन सभी परम्पराओं के कारणों का पता लगाऊँगीजिन्होंने उन्हें अछूत बना दिया है। विद्याबुद्धि और विवेक से अपने आपको ऊँचा सिद्ध करके रहूँगी। किसी के सामने झुकूँगी नहीं। न ही अपमान सहूंगी।" इन बातों का मन-ही-मन चिन्तन-मनन करती सिलियाएक दिन अपनी माँ और नानी के सामने कहने लगी, "मैं शादी कभी नहीं करूंगी।"

माँ और नानी अपनी भोली-भाली बेटी को ध्यान से देखती रह गईं। नानी खुश होकर बोली, "शादी तो एक-न-एक दिन करना ही है बेटीमगर इसके पहले तू खूब पढ़ाई कर लेइतनी बड़ी बन जा कि बड़ी जात के कहलानेवालों को अपने घर नौकर रख लेना।" माँ मन-ही-मन मुस्करा रही थी। सोच रही थी, "मेरी सिल्लो रानी को मैं खूब पढ़ाऊँगी। उसे सम्मान के लायक बनाऊँगी।"

    इस प्रकार सिलिया अपने समाज में परिवर्तन करने के बात सोचती है, जिसके लिए उसने पढाई का रास्ता अपनाया हैं  

 

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