सेनापति का परिचय

 सेनापति  का परिचय 

    कविवर सेनापति रीतिकालीन कवि है| इनके जीवन संबंधी अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है| उनकी रचना 'कवित्त  रत्नाकर' में कवि का परिचय दिया गया है| उस जानकारी पर आधारित कवि सेनापति का परिचय निम्न रूप में देख सकते है| 

 1) जीवनवृत्त:- 

    कविवर सेनापति ने अपना वंश परिचय 'कवित्त रत्नाकर' के प्रारम्भ में दे दिया है। जिसके संबंध में निम्नलिखित पंक्तियां मिलती है-

दीक्षित परसराम, दादी है बिदित्त नाम,

जिन कीने यज्ञ, जाकी जग मैं बड़ाई है।

गंगाधर पिता गङ्गाधर की समान जाक, 

गङ्गा तीर बसति अनूप जिन पाई है ।।

महा जानि मनि, बिद्यादान हू कौं चिंतामनि,

 हीरामनि दीक्षित तैं  पाई पंडिताई है।

सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी, 

सब कबि कान दै सुनत कबिताई है ।

        उन्होंने दीक्षित कुल में जन्म लिया था ।सेनापति की जन्म तिथि तथा मृत्यु तिथि के विषय में कोई बात निश्चितरूप से नहीं कही जा सकती। 'कवित्त रत्नाकर' सं० १७०६ (अर्थात् १६४६ ई०) में लिखा गया था। उसके विचारों तथा भावों से इतना तो निश्चित सा है कि कवि उसके लिखने के समय तक वृद्ध हो चुका था, यद्यपि उसके कुछ छंद  ऐसे हैं जो सं० १७०६ से पहले के लिखे हुए जान पड़ते है। सभवतः विक्रम की १७वीं शताब्दी के द्वितीय चरण के अंत के लगभग इनका जन्म हुआ होगा। इनकी मृत्यु १८वीं शताब्दी के प्रथम चरण में मानी जा सकती है।

उनके पिता का नाम गंगाधर तथा पितामह का नाम परशुराम दीक्षित था । गंगा के किनारे अनुप बस्ती में रहते थे| जो उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर में स्थित हैं| उनके गुरु हिरामण दीक्षित थे| सेनापति के वास्तविक नाम से हम अनभिज्ञ हैं । 'सेनापति' तो स्पष्ट ही उनका उपनाम था, जिसका प्रयोग उन्होंने अपनी कविता में किया है। कुछ विद्वान सेनापति को संस्कृत कवि भट्ट नागेश दीक्षित से सम्बन्धित मानते है| उनका भी यही कथन है कि भट्ट नागेश उसी समय के कवि थे| वे भी गंगा तट के निवासी थे| यह सत्य है सेनापति अपनी रचनाओं के आधार पर संस्कृत के प्रकांड विद्वान सिद्ध होते है| परंतु वे भट्ट नागेश दीक्षित ही है यह कहना कठीन है| कारण भट्ट नागेश के पिता का नाम शिव भट्ट था| इस प्रकार भट्ट नागेश के सेनापति उपनाम की भी कहीं जानकारी प्राप्त नहीं है| नागेश भट्ट के गुरु हरि दीक्षित है| हरि और हिरा में ध्वन्यात्मक साम्य है| इस प्रकार अनुमान के लिए थोडा आधार इन बातों से मिल जाता है, परंतु निश्चित रूप से यह कहना कि सेनापति और नागेश भट्ट एक ही है कठीन है| 

कुछ विद्वानो का अनुमान है कि सेनापति का संबंध मुसलमानी दरबार से था । 'रामरसायन' के एक छंद से इस कथन की पुष्टि भी होती है। सेनापति कहते है-

केती करो कोई, यै करम लिख्योई, 

तातें दूसरी न होई, उर सोई ठहराइयै ।

आधी तँ सरस गई बीति के बरस, 

अब दुज्जन दरस बीच न रस बढ़ाइयै ।

इससे स्पष्ट है कि कवि को मुसलमानों की दासता से विरक्ति हो गई थी । धन-लिप्सा तथा अन्यान्य प्रलोभनो से वे बचना चाहते थे। किंतु किस मुसलमान शासक के यहाँ वे नौकर थे, इसका कुछ पता नही चलता

व्यक्तित्व :-

सेनापति स्वाभिमानी प्रकृति के कवि थे। इसी से दूसरों की कही हुई बातों के दोहराने को वे हेय दृष्टि से देखते थे। पाँचवीं तरंग के कई कवित्तों से उनकी स्वाभिमानी प्रकृति का परिचय मिलता है। वे आत्मसम्मान को ही संपत्ति समझते थे । सासारिक सुखों की चिंता में मन रहना, उनको देखकर ललचाना आदि उन्हे पसन्द न था। कष्ट पडने पर भी तुच्छ व्यक्तियों से कुछ याचना करना उनकी प्रकृति के विरुद्ध था। समाज में समाहत होना ही उनके लिए सब कुछ थासेनापति प्रधानतया राम के भक्त थे, यद्यपि उनकी रचनाओं मे कृष्ण तथा शिव संबंधी छंद भी हैं।

सेनापति चाहत है सकल जनम भरि, 

वृन्दावन सीमा तै न बाहिर निकसिबौ । 

राधा-मन-रंजन की सोभा नैन कंजन की,

 माल गरे गुंजन की, कुंजन कौं बसियौ

काव्य परिचय 

        सेनापति के लिखे हुए दो ग्रंथ बतलाए जाते हैं- १ 'काव्य कल्पद्रुम २ 'कवित्त रत्नाकर' । 

'काव्य कल्पद्रुम' हमारे देखने में नहीं आया, अतएव उसके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। दूसरा ग्रंथ 'कवित्त रत्नाकर' है। यह एक संग्रह ग्रन्थ है। इसमें पाँच तरंगे हैं। पहली तरंग में ६७ कवित्त हैं कुछ प्रारंभिक कवित्तो को छोड़ कर इसके समस्त कवित्त श्लिष्ट हैं। दूसरी तरंग में शृंगार  संबंधी ७४ छंद हैं जिनमें से केवल एक छप्पय है तथा अवशिष्ट कवित्त । तीसरी तरंग में ऋतु वर्णन संबंधी ६२ छंद हैं; ८ कुंडलियाँ हैं तथा शेष कवित्त । चौथी तरंग के ७६ छंदों में राम-कथा संबंधी रचना है। इसमें ६ छप्पय तथा अवशिष्ट कवित्त है। पाँचवीं तरंग में भक्ति संबंधी ८८ छंद हैं जिनमें से १२ छंद चित्रकाव्य के हैं। कुछ छंद ऐसे भी हैं जो कई तरंगों में समान रूप से पाए जाते हैं। पुनरावृत्ति वाले छंदों को छोड देने पर 'कवित्त रत्नाकर' में कुल मिलाकर ३८४ छंद हैं। वैसे छंदों की पूर्ण संख्या ३६४ है।

            सेनापति की रचनाओं से स्षष्ट  है कि उन्होने संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया था। साहित्यिक परंपरा से वे भली-भाँति परिचित जान पडते हैं। यपि उन्होंने रीतिकालीन परिपाटी पर रचना नहीं की है फिर भी रीति युग की प्रवृत्तियों की छाप उनकी रचनाओं में प्रचुरता से पाई जाती है 'कवित्त रत्नाकर' में ऐसे बहुत से छन्द मिलेंगे जो विभिन्न साहित्यिक अंगो के उदाहरण से जान पडते हैं। पहली तथा दूसरी तरंग पड़ने से इस कथन की विशेष रूप से पुष्टि हो जाती है । - सेनापति को अपनी कविता सुरक्षित रखने की विशेष इच्छा थी । वे कहते हैं कि लोग भावापहरण ही नहीं करते वरन् समूचा कवित्त उड़ा देते हैं ऐसा जान पड़ता है कि 'कवित्त रत्नाकर' को उन्होंने किसी राजा को समर्पित किया था और उससे इस बात की प्रार्थना की थी कि वह उनकी कविता को सुरक्षित रखे -

लीजियौ बचाइ ज्यों चुरावै नाहिँ कोई सौंपी बित्त की सी थाती मैं कबित्तन की राज कौ । 

सेनापति का रचना काल रीतिकाल के प्रारंभ में पड़ता है। उन्होंने सं० १७०६ में अपनी फुटकर रचनाओं को 'कवित्त रत्नाकर' में संगृहीत किया । 'कवित्त रत्नाकर' संग्रह ग्रंथ है, अतः उसकी कुछ रचनाएँ १७०६ से पहले की भी होगी। उसमें रीतिकाल का प्रभाव प्रचुरता से पाया जाता है, यद्यपि उसमें रीतिकालीन परिपाटी का अनुसरण नहीं किया गया है अर्थात् भाव, विभाव, अनुभाव आदि के लक्षण तथा उदाहरणो का क्रम से वर्णन नहीं किया गया है। संभव है सेनापति की दूसरी प्रसिद्ध कृति 'काव्य-कल्पद्रुम में इस पारिपाटी का अनुसरण किया गया हो ।


काव्य सौंदर्य :

    सेनापति रीतिकाल के कवि है| रीतिकाल का प्रारंभिक काल ही उनकी रचनाओं का प्रारंभिक काल है| अत: उनकी रचनाओं में रीतिकालीन परिपाटी का इतना अनुसरण नहीं मिलता फिर भी रीतिकाल के काव्य सौंदर्य की विशेषताएं उनके काव्य में देखने को मिलती है| वह इसप्रकार -

1) अलंकार प्रिय कवि :-

    सेनापति पर अलंकारों का प्रभाव अधिक है।उनके लिए अलंकार वर्णन शैलियाँ नहीं, वरन् वर्ण्य वस्तु  हैं। स्वय कवि ने 'कवित्तरत्नाकर' की पहली तरङ्ग में अपनी श्लिष्ट रचनाओं को संगृहीत किया है और उसका नाम 'श्लेष वर्णन' रक्खा है| हिन्दी साहित्य में श्लेष प्रधानतया शब्दालंकार के रूप में ही पाया जाता है। सेनापति ने भी शब्द-श्लेष की ओर ही विशेष ध्यान दिया है। अर्थ श्लेष का एक भी उदाहरण 'कवित्त रत्नाकर' में नहीं पाया जाता है। सेना- पति को शब्द-श्लेष इतना प्रिय था कि उन्होने 'कवित्त रत्नाकर' की पहली तरंग में ही अपनी श्लिष्ट रचनाओं को रक्खा है।सेनापति के उन श्लेषों में कुछ अधिक सरसता है जिनमें ऐसे समता- सूचक अलंकारो का मिश्रण हुआ है जिनके उपमेयो तथा उपमानो में किसी न किसी प्रकार का सादृश्य है। बात यह है कि उपमा, उत्पेक्षा, रूपक आदि अलंकारी की रमणीयता सादृश्य पर ही निर्भर है।अर्थालंकारी मे स्वभावतः सादृश्य मूलक अलकारी की ही अधिकता भाई जाती है। इनमें से भी उमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, व्यतिरेक तथा प्रतीपआदि का बाहुल्य है । नख शिख वर्णन में प्रतीप का प्रयोग उपमा से भी अधिक हुआ है।सेनापति का ध्यान शब्दालंकारों की ओर ही अधिक था, इसी से “कवित्त रत्नाकर' में उनकी भरमार है। अर्थालंकारों में जो अधिक प्रचलित से है उन्हीं का बाहुल्य है, अन्य अलंकार बहुतायत से नहीं मिलते हैं।

नाहीं नाहीं करें थोरी माँगे सब दैन कहै

 मंगन कौं देखि पट देत बार बार हैं। 

जिनक मिलत भली प्रापति की घटी होति 

सदा सब जन मन भाए निरधार हैं 

भोगी है रहत बिलसत अवनी के मध्य

कन कन जोरै दान पाठ परिवार हैं। 

सेनापति बचन की रचना बिचारौ 

जामैं दाता अरु सूम दोऊ कीने इकसार हैं। ॥ 

निस्संदेह ऐसा 'साफ' श्लेष हिंदी साहित्य में खोजने पर भी न मिलेगा । इस कवित्त के दोनों पक्षों के अर्थ लगाने में विशेष श्रम की आवश्यकता नहीं । शब्दों में थोडा हेर फेर कर दीजिए और दोनों पक्षो का अर्थ निकलता चला जायगा- 'नाहीं नाहीं करें'- 'नाहीं नाहीं करें, 'सब जन मन भाए'- 'सब जनम न भाए', 'कनक न जोरै -'कन कन जोर्रे', 'दान पाठ परिवार हैं- 'दान पाठ परिवा रहें। जैसा कि पहले कहा जा चुका है सभंग-श्लेष लिखने में सेनापति को अद्वितीय सफलता मिली है। 

2) शृंगार रस प्रिय कवि :- 

  'कवित्त रत्नाकर' के प्रारम्भ में सेनापति कहते हैं कि हमारे काव्य में अनुपम रस ध्वनि  वर्तमान है- जैसे- "सरस अनूप रस रूप यामैं धुनि है।" सेनापति रस-संप्रदाय से भी प्रभावित हुए हैं, किंतु बहुत नहीं| अलंकारों की प्रधानता के कारण उनका ध्यान रसोत्कर्ष पर अधिक देर तक नहीं ठहरता है।'कवित्त रत्नाकर' में शृगार, वीर,रौद्र, भयानक तथा शात रस संबंधी रचनाएँ पाई जाती हैं। स्वभावतः अन्य रसों की अपेक्षा शृंगार रस का अधिक विस्तार है।रीतिकाल के अन्य कवियों की भाँति सेनापति ने भी 'परकीया' का ही विशेष चित्रण किया है, किन्तु वे 'स्वकीया' की महत्ता को भी स्वीकार करते थे।सेनापति का ध्यान संयोग श्रृंगार की अपेक्षा वियोग श्रृंगार की ओर अधिक है। उनका विरह वर्णन प्रधानतया प्रवास हेतुक तथा विरह हेतुक वियोग का वर्णन भी पाया जाता है। सेनापति के विरह-वर्णन में विरही की विकलता का अत्युक्ति पूर्ण चित्रण अधिक नहीं किया गया है। फिर जो चित्रण मिलता है वह उच्च कोटी का है| विरह का उदाहरण -

जीतें प्रानप्यारे परदेस कौं पधारे तोतें, 

बिरह मैं भई ऐसी ता तिय की गति है।

 करि कर ऊपर कपोलहिं कमल नैनी, 

सेनापति अनमनी बैठियै रहति है ।

कवि कहता है कि जब उस स्त्री के प्राणों से भी प्यारे प्रियतम विदेश चले गए, तब विरह (वियोग) में उसकी ऐसी दयनीय अवस्था हो गई। वह कमल-नयनी नायिका अपने हाथों को गालों पर रखे हुए उदास और चिंतामग्न बैठी रहती है। उसका मन कहीं नहीं लगता और वह हर समय अपने प्रिय की याद में खोई रहती है।यहाँ कवि ने विरहिणी स्त्री की मानसिक पीड़ा और उदासी का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है।

सेनापति के  काव्य में  लंबी उडान वाले कवित्त थोड़े ही है।वीर रस के चित्रण मे बहुधा कवियों ने युद्धो के विशद वर्णनों से काम चलाया है।

3) भक्ति भावना:-

        सिद्धांत की दृष्टि से सेनापति भी गोस्वामी जी की परंपरा में आते हैं। वे राम के उत्कट भक्त थे, पर कृष्ण तथा शिव से भी उन्हें विशेष स्नेह था और तदनुसार उन्होंने उनका भी गुणगान किया है। वैष्णव भक्त कवियो की भाँति सेनापति भी तीर्थ सेवन, गंगा स्नान आदि विषयो पर आस्था रखते थे, यद्यपि भक्ति के क्षेत्र में वे इन बातों की कोई विशेष आवश्यकता नहीं समझते थे । किंतु इन साम्यो को देखकर यह न समझना चाहिये कि सेनापति की रचना पर 'रामचरितमानस' का कोई विशेष प्रभाव पाया जाता है। एक तो सेनापति के 'रामायण वर्णन' में कथा का कोई विशेष विस्तार मिलता ही नहीं है, दूसरे जहाँ कहीं कुछ घटनाओं का वर्णन पाया भी जाता है वहाँ वे 'मानस' के आधार पर न होकर वाल्मीकि रामायणं पर ही अवलंबित हैं। उदाहरणार्थ परशुराम-आगमन का वर्णन स्वयंवर के समय न होकर, अयोध्या लौटते समय ही किया गया है।

 सेनापति की भक्ति भावना में हृदय की तल्लीनता और अनुभूतियो की सचाई है। अपनी भक्ति भावना के कारण वे जीवन की उस स्थिति तक पहुँच गए थे जहाँ सांसारिक यातनाएँ मनुष्य के लिए कोई महत्त्व नहीं रखतीं और हृदय शांत हो जाता है। इसी से वे कलिकाल से कहते है कि तू मेख क्या अपकार कर सकता है ? काल भी मुझे नष्ट नहीं कर सकता । भगवान के दरबार में मेरी पैठ हो गई है। स्वयं राम मुझे अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि मुझे उनकी सेवा करते हुए काफी समय हो चुका है; सीता रानी भी मुझे जानती हैं और लक्ष्मण का मुझ पर अनुराग है; अब विभीषण तथा हनुमान आदि वीर मेरे सामने गर्व नहीं करते, प्रत्युत् मुझे 'बड़ी सरकार' का नौकर समझ कर मेरा आदर करते है। जब मै ऐसे उच्च पद पर पहुँच गया हूँ तो तेरी चिंता मुझे क्यो हो? सेनापति ने निम्नलिखित पंक्तियों में राम का महत्व विशद किया है| 

कोई परलोक सोक भीत अति बीतराग 

तीरथ के तीर बसि पी रहत नीर ही ।

 कोई तपकाल बाल ही हैं तजि गेह नेह, 

आगि करि आस-पास जारत सरीर ही ॥ 

कोई छाड़ि भोग, जोग धारना सौं मन जीति, 

प्रीति सुख-दुख हू मैं साधत समीर ही । 

सोवै सुख सेनापति सीतापति के प्रताप,

 जाकी सब लागे पीर ताही रघुबीरही ।।

अर्थात    कोई मनुष्य परलोक के दुःख और भय से अत्यन्त वैराग्य धारण करके तीर्थों के किनारे निवास करता है और केवल जल पीकर जीवन बिताता है।

कोई व्यक्ति बचपन से ही घर और परिवार का मोह त्यागकर अपने चारों ओर अग्नि जलाकर कठोर तपस्या करता है।

कोई भोग-विलास छोड़कर योग और साधना के द्वारा अपने मन को जीतने का प्रयास करता है तथा सुख-दुःख में समान रहने का अभ्यास करता है।

लेकिन कवि सेनापति कहते हैं कि सच्चा सुख तो वही व्यक्ति पाता है जो राम (सीतापति) की कृपा और भक्ति में लीन रहता है। जिस पर रघुबीर (राम) की कृपा हो जाती है, उसके सभी दुःख दूर हो जाते हैं।

4) प्रकृति चित्रण:-

सेनापति ने भी प्रकृति वर्णन उद्दीपन के रूप में ही किया है। उनके बारहमासे के अधिकाश कवित्त उद्दीपन विभाव की दृष्टि से लिखे गये हैं। किंतु उनकी मृतु सबन्धी रचना को भली प्रकार देखने से यह विदित होता है कि प्रकृति के प्रति उनके हृदय में पर्याप्त अनुराग था, यद्यपि परंपरा तथा साहित्यिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण वह बहुत संकुचित दिखलाई पड़ता है।सेनापति कृत बारहमासे में सभी जगह उद्दीपन कापुट पाया जाता हो ऐसी बात नहीं है। ऐसे भी छद हैं जिनमें कवि प्रकृति का स्वतंत्र निरीक्षण करने में संलग्न है। सेनापति ग्रीष्मऋतु से अधिक प्रभावित जान पड़ते हैं।सेनापति का ऋतु वर्णन सामाजिक परि- स्थिति से बहुत प्रभावित है। सेनापति के ऋतु वर्णन में ऋतुओं के उत्कर्ष को वर्णित करने की चेष्टा विशेष रूप से देखी जाती है। ऐसे वर्णन अलंकार प्रधान हो गये हैं। अतएव अलंकारों पर विचार करते समय ही उन पर भी थोड़ा विचार किया जा सकेगा । ग्रीष्म ऋतु का उदाहरण यहां द्रष्टव्य है- 

बृष कौं तरनि तेज सहसी किरन करि, 

ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है।

तचति धरनि, जग जरत झरनि,

 सीरी छाँह कौं पकरि पंथी पंछी बिरमत है । 

सेनापति नैंक दुपहरी के ढरत, 

होते धमका विषम, ज्यों न पात खरकत है । 

मेरे जान पौन सीरी ठौर को पकरि कौनौँ, 

घरी एक बैठि कहूँ घामै बितवत है ।

सेनापति द्वारा रचित इस पद में  ग्रीष्म ऋतु का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है।कवि कहता है कि सूर्य अपने प्रचंड तेज और हजारों किरणों के साथ ऐसी भयंकर गर्मी बरसा रहा है मानो आग के जाल बरस रहे हों।धरती तप रही है, संसार जल रहा है, झरने भी सूखते प्रतीत हो रहे हैं। यात्री और पक्षी ठंडी छाया पकड़कर वहीं विश्राम कर रहे हैं।दोपहर इतनी भयानक है कि ऐसा लगता है मानो हवा भी डरकर कहीं ठंडी जगह में छिप गई हो। पत्ता तक नहीं हिल रहा है। कवि को ऐसा लगता है कि हवा भी कहीं छाया में बैठकर एक घड़ी आराम करके धूप बीतने का इंतजार कर रही है।

5) रीति का प्राधान्य :- 

    सेनापति की रचनाओं से स्षष्ट  है कि उन्होने संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया था। साहित्यिक परंपरा से वे भली-भाँति परिचित जान पडते हैं। यपि उन्होंने रीतिकालीन परिपाटी पर रचना नहीं की है फिर भी रीति युग की प्रवृत्तियों की छाप उनकी रचनाओं में प्रचुरता से पाई जाती है 'कवित्त रत्नाकर' में ऐसे बहुत से छन्द मिलेंगे जो विभिन्न साहित्यिक अंगो के उदाहरण से जान पडते हैं। पहली तथा दूसरी तरंग पड़ने से इस कथन की विशेष रूप से पुष्टि हो जाती है । - सेनापति को अपनी कविता सुरक्षित रखने की विशेष इच्छा थी । वे कहते हैं कि लोग भावापहरण ही नहीं करते वरन् समूचा कवित्त उड़ा देते हैं ऐसा जान पड़ता है कि 'कवित्त रत्नाकर' को उन्होंने किसी राजा को समर्पित किया था और उससे इस बात की प्रार्थना की थी कि वह उनकी कविता को सुरक्षित रखे -

लीजियौ बचाइ ज्यों चुरावै नाहिँ कोई सौंपी बित्त की सी थाती मैं कबित्तन की राज कौ । 

सेनापति का रचना काल रीतिकाल के प्रारंभ में पड़ता है। उन्होंने सं० १७०६ में अपनी फुटकर रचनाओं को 'कवित्त रत्नाकर' में संगृहीत किया । 'कवित्त रत्नाकर' संग्रह ग्रंथ है, अतः उसकी कुछ रचनाएँ १७०६ से पहले की भी होगी। उसमें रीतिकाल का प्रभाव प्रचुरता से पाया जाता है, यद्यपि उसमें रीतिकालीन परिपाटी का अनुसरण नहीं किया गया है अर्थात् भाव, विभाव, अनुभाव आदि के लक्षण तथा उदाहरणो का क्रम से वर्णन नहीं किया गया है। संभव है सेनापति की दूसरी प्रसिद्ध कृति 'काव्य-कल्पद्रुम में इस पारिपाटी का अनुसरण किया गया हो ।

6) भाषा -

उनकी भाषा उनके हृदय से निकले हुए उद्‌गारो से ओत-प्रोत है यद्यपि उसमें अपना निजी सौंदर्य अधिक नहीं है। श्रृंगारी कवियो की रचनाओं में बाह्य उपकरणो द्वारा भाषा को आभूषित करने का आग्रह विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है। इसी कारण उनमें वह नैसर्गिक मर्मस्पर्शिता नहीं है जो भक्ति काल के कवियों के काव्य में मिलती है । 'कवित्त रत्नाकर' की भाषा को भी इसी प्रकार का समझना चाहिए । उसकी भाषा का सौदर्य भावों की तन्मयता के फलस्वरूप न होकर अलकारों की तड़क भड़क के कारण ही है। ब्रजभाषा लिखने में बहुत ही दक्ष थे। उनके श्लिष्ट कवित्तोंपर विचार करते समय हम देख चुके हैं कि भाषा के साधारण से साधारण शब्दों द्वारा उन्होंने कितनी सुन्दर रचना की है।

ब्रजभाषा  से इतना परिचित होने के कारण ही उन्हें श्लिष्ट काव्य लिखने में अपूर्व सफलता मिली है। उनकी भाषा में संस्कृत शब्दों के तत्सम रूपों का प्रयोग कम हुआ है। ऐसे छद कम मिलते हैं जिनका सौंदर्य संस्कृत की शब्दावली पर ही अवलंबित है।  विदेशी शब्दों में से कुछ शब्द फारसी भाषा के हैं। इनके भी तद्भव रूप ही मिलते हैं।प्रादेशिकता के विचार से 'कवित्त रत्नाकर' की भाषा में खड़ीबोली के कतिपय रूपों का प्रभाव लचित होता है।सेनापति की भाषा में प्रसाद तथा ओज गुण प्रधानता से पाए जाते हैं। ओज-पूर्ण भाषा लिखने में सेनापति बहुत निपुणे हैं।माधुर्य की ओर सेनापति का ध्यान अधिक न था । फिर भी कुछ कवित्तो में शब्द-सौदर्य का विधान किया गया ह'कवित्त रत्नाकर' की भाषा में अभिधेयार्थ ही प्रधान है।सेनापति की भाषा सुव्यवस्थित तथा परिमार्जित है, उसमें शब्दों के विकृत रूप अधिक नहीं मिलते हैं।

सारंग सुनावै धुनि रस बरसावै घन, मन हरषावै मोर अति अभिराम है।

    इस प्रकार कह सकते है कि सेनापति के काव्य में एक साथ अलंकार, शृंगार और भक्ति की भावना का सुंदर समन्वय हुआ है| जो उनके काव्य सौंदर्य के महत्व को अपने आप विशद करता है| 



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