B.A. II SEMESTER – IV
Minor Paper No. IV (मायनर पेपर नं- IV)
व्यावहारिक हिंदी और कहानियां
नया पाठ्यक्रम : सत्र, श्रेणी तथा एन.ई.पी. 2020 प्रणाली
पाठ्यक्रम:-
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Modul No. |
Unit No |
Name of the
Topic |
Hours |
|
1.0 |
|
वाणिज्य पत्राचार |
(Hours- 15, Credit- 1) |
|
1.1 |
पूछताछ के पत्र |
||
|
1.2 |
क्रयादेश पत्र |
||
|
1.3 |
शिकायती पत्र |
||
|
2.0 |
|
इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों का सामान्य परिचय |
(Hours- 15, Credit- 1) |
|
2.1 |
रेडियो |
||
|
2.2 |
दूरदर्शन |
||
|
2.3 |
डाक्यूमेंटरी |
||
|
3.0 |
|
कहानियां |
(Hours- 15, Credit- 1) |
|
3.1 |
पूस की रात – प्रेमचंद |
||
|
3.2 |
पाजेब - जैनेन्द्र |
||
|
3.3 |
ठंडक – महीप सिंह |
||
|
4.0 |
|
कहानियां |
(Hours- 15, Credit- 1) |
|
4.1 |
एकलव्य ने गुरु को अंगूठा दिखाया – हरिशंकर परसाई |
||
|
4.2 |
सिलिया – सुशीला टाकभौरे |
||
|
4.3 |
बेटी - मैत्रेयी पुष्पा |
. 2020 प्रणाली
प्रश्नपत्र का स्वरूप एवं अंक विभाजन
|
प्रश्न नं |
प्रश्न का स्वरूप |
अंक |
|
1 |
समग्र पाठ्यक्रम पर दस बहुविकल्पी प्रश्न अ) नीचे दिए गए छ: प्रश्नों के विक्लपों में से सही विकल्प चुनिए| 12 अंक आ) नीचे दिए चार प्रश्नों के विक्लपों में से सही विकल्प चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए | 08 एक |
20 |
|
2 |
इकाई I और II पर लघुत्तरी प्रश्न ( चार में से दो) (उत्तर सीमा 300-400 शब्द ) |
20 |
|
3 |
समग्र पाठ्यक्रम पर दीर्घोत्तरी प्रश्न ( अंतर्गत विकल्प के साथ) (उत्तर सीमा 600-800 शब्द ) |
20 |
|
4 |
इकाई III और IV पर टिप्पणियां ( छ: में से चार) (उत्तर सीमा 150-200 शब्द ) |
20 |
|
|
अंतर्गत मूल्यमापन - (ग्रुप चर्चा / मौखिकी ) |
20 |
|
|
कुल |
100 |
अनुक्रमणिका
|
अ.नं |
घटक |
पन्ना नं |
|
1. |
पूछताछ के पत्र |
4-9 |
|
2. |
क्रयादेश पत्र |
10-12 |
|
3. |
शिकायती पत्र |
13-18 |
|
4. |
बहुविकल्पी प्रश्न |
19-20 |
|
5. |
रेडियो |
21-26 |
|
6. |
बहुविकल्पी प्रश्न |
26-27 |
|
7. |
दूरदर्शन |
28-35 |
|
8. |
बहुविकल्पी प्रश्न |
35-36 |
|
9. |
डाक्यूमेंटरी |
37-47 |
|
10. |
बहुविकल्पी प्रश्न |
48-49 |
|
11. |
पूस
कि रात – प्रेमचंद |
50 -60 |
|
12. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
60-61 |
|
13. |
पाजेब
– जैनेन्द्र कुमार |
62-83 |
|
14. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
83-84 |
|
15. |
ठंडक
– महीप सिंह |
85-96 |
|
16. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
96-97 |
|
17. |
एकलव्य
ने गुरु को अंगुठा दिखाया – हरिशंकर परसाई |
98-103 |
|
18. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
103-104 |
|
19. |
सिलिया-सुशीला
टाकभौरे |
105-115 |
|
20. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
115 |
|
21. |
बेटी-
मैत्रेयी पुष्पा |
116-126 |
|
22. |
बहुविकल्पी
प्रश्न |
127 |
|
23. |
संदर्भ
सूची |
128 |
Modul 1.0
वाणिज्य पत्राचार
युनिट नं 1.1
पूछताछ के पत्र
वर्तमान में व्यावसायिक एवं औद्योगिक युग में वाणिज्य पत्राचार का महत्व अधिक बढ गया है| आज किसी व्यक्ति द्वारा व्यावसायिक संस्थान को या संस्थान द्वारा व्यक्ति को या सह व्यावसायिक प्रतिष्ठान को व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पत्र लेखन का महत्व बढ गया है|
वाणिज्य पत्राचार के भेद:-
व्यावसायिक पत्र सामान्य एवं कार्यालय के पत्रों से भिन्न प्रकार के और विविध ढंग के होते हैं| उनका वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है -
1) पूछताछ पत्र
2) निर्ख पत्र (कोटेशन पत्र)
3) आदेश (क्रयादेश) पत्र
4) मालप्रेषण पत्र (सूचनादायी पत्र)
5) शिकायत पत्र
6) समायोजन पत्र
7) तगादा पत्र
8) गश्ती पत्र
9) सिफारिश पत्र
10) साख पत्र
11) अनुगमन पत्र
12) एजेन्सी संबंधी पत्र
13) दावापूर्ति पत्र
14) बैंक संबंधी पत्र
15) बिमा संबंधी पत्र
इनमें से तीन पत्र अध्ययन के लिए रखे गए है –
1) पूछताछ पत्र
2) क्रयादेश पत्र
3) शिकायत पत्र
इसका प्रारूप आगे देखेंगे| उसके पूर्व वाणिज्य पत्र के सामन्य प्रारूप पर यहां प्रकाश डालेंगे|
वाणिज्य पत्राचार के अंग:-
इन व्यावसायिक पत्र लेखन की विशिष्ट पद्धति होती है| अत: यह लेखन तीन भागों में होता है| वह इस प्रकार -
1) शिरोभाग :-
व्यावसायिक पत्र का शिरोभाग वह है जिसमें व्यावसायिक संस्थान का नाम पता, तार एवं दूरभाष(फोन) आदि का संकेताक्षर और नंबर (यदि कोई है), पत्रांक, एवं दिनांक लिखा रहता है| इसी भाग में पत्र पानेवाले का नाम तथा पता भी निहित रहता है| इसके साथ ही संबोधन एवं अभिवादन का उल्लेख भी रहता है |
2) मध्य भाग:-
व्यवसायिक पत्र का मध्य भाग अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसमें विषय या संदर्भ का संकेत करते हुए मूल विषय- सामग्री का उल्लेख किया जाता है| इसके उपभाग में 'प्रारंभिक भाग ' परिचयात्मक होता है| जो अत्यंत नम्रतापूर्ण, प्रभावशाली एवं सुरुचि पूर्ण होना चाहिए| 'मुख्य विषय' में वास्तविक विषय सामग्री का प्रतिपादन होता है और अंत में सारांश होता है जो प्रारंभिक की भान्ति ही नम्रतापूर्वक, प्रभावोत्पाद्क और विश्वसनीय होता है|
3) अंत्य भाग:-
व्यावसायिक पत्र का अंत भाग भी महत्वपूर्ण होता है| क्योंकि उसमें प्रेषक के स्वनिर्देश के साथ हस्ताक्षर, पदनाम तथा संलग्नक (यदि कोई है) और पुनश्च (किसी अन्य बात का स्मरण आने पर उल्लेख) के अतिरिक्त टंकक या लिपिक के संकेताक्षर या हस्ताक्षर निहित रहता है|
महत्वपूर्ण सूचना:-
वैधानिक अधिकार मिलने पर व्यापार गृह के नाम के बाद से अधिकृत शब्द जोड किया जाता है| जैसे- चाटुर्ज्या एंड कंपनी से अधिकृत| यदि कानून द्वारा यह अधिकार प्राप्त न हो तो हस्ताक्षर कर्ता को व्यापार गृह के पहले 'कृते या बास्ते' लगा देना चाहिए| जैसे- कृते चाटुर्ज्या एंड कंपनी| इस जानकारी पर आधारित वाणिज्य पत्र का प्रारूप रूप निम्न रूप में दे सकते है|
वाणिज्य पत्राचार का प्रारूप
व्यावसायिक संस्थान का नाम
मेल:-
दूरप्रेष्य:
पता :
दूरभाष:
दिनांक:
पत्रांक :
प्राप्तकर्ता का नाम
श्री/सर्वश्री:
पता :
विषय :-
संबोधन (महोदय/आदरणीय महोदय/प्रिय महोदय)
अभिवादन: सादर नमस्कार
पत्र का प्रमुख भाग
स्वनिर्देश(भवदीय/ भवन्निष्ठ/ आपका /आपके विश्वासभाजन/ आपका हितैषी
हस्ताक्षर
पद
संलग्न :टंकक का नाम और हस्ताक्षर
पूछताछ पत्र का प्रारूप
वाणिज्य पत्रों में पूछताछ पत्र का अपना महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इस प्रकार के पत्र के माध्यम से विक्रेता अपने माल की किस्म, उपयोगिता, मूल्य तथा माल संबंधी अन्य जानकारी क्रेता को भेजता है या स्वयं अधिकृत व्यक्ति द्वारा देता है| क्रेता का अधिकृत व्यावसायिक पता अंकित रहने पर विक्रेता या उत्पादक अपने नये उत्पाद या माल के तैयार होने की सूचना, क्रेता के न चाहने पर भी अपने ओर से देता है|
इन पत्रों में विक्रेता या उत्पादक अपने उत्पाद की किस्म, नमूना, भाव, मूल्य, पैकिंग का ढंग तथा व्यापारिक शर्ते अपने क्रेता को भेजता है| कभी-कभी क्रेता के चाहने पर भी विक्रेता यह सब सूचनाएं क्रेता को भेजता है| इसके साथ ही विक्रय की शर्ते तथा भुगतान की विधि का स्पष्ट उल्लेख किया जाता है|
पूछताछ पत्र के कुछ प्रारूप
उदाहरण 1
चाटुर्ज्या एंड कंपनी किताबघर प्रकाशन से किताबें खरीदना चाहते है, पूछताछ पत्र लिखे|
चाटुर्ज्या एंड कंपनी
पुस्तक प्रकाशक एवं विक्रेता
पता : महात्मागांधी रोड, कलकत्ता- 7
दूरभाष : 2436
दिनांक: 10/03/2026
पत्रांक :26/108
सेवा में,
सर्वश्री किताबघर,
हाई कोर्ट रोड,
ग्वालियर (म.प्र.)|
विषय - पूछताछ...
प्रिय महोदय,
सादर नमस्कार!
निवेदन है कि हम निम्नलिखित पुस्तकें यहां के विद्यार्थियों के लिए मंगाना चाहते हैं| कृपया इन पुस्तकों का मूल्य और देय कमीशन आदि हमें सूचित करें :-
1) हिंदी साहित्य का इतिहास - मोहन अवस्थी 50 प्रतियां
2) हिंदी रासों काव्यधारा - डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ - 50 प्रतियां
3) कांचनमणि - डॉ. सतेन्द्र - 50 प्रतियां
4) सूर सौरभ - डॉ. जगन्नाथ तिवारी - 50 प्रतियां
5) उपलब्धि - डॉ. गोविंद रजनीश - 30 प्रतियां
ये पुस्तकें पाठ्यक्रम में निर्धारित हैं| अत: पर्याप्त संख्या में इनकी मांग भेजी जायेगी|
आशा है कि आप शीघ्र उत्तर देकर अनुगृहीत करेंगे
भवदीय
कृते चाटुर्ज्या एंड कंपनी
महेश वर्मा
संचालक
उदाहरण 2
मनोहर लाल मदनलाल कपडे के थोक व्यापारी कपडों का मूल्य जानने के लिए पूछताछ पत्र लिखते है| पत्र का प्रारूप तैयार करें |
मनोहर लाल मदनलाल
कपडे के थोक व्यापारी
पता : 23 महात्मागांधी मार्ग , कानपुर - 7
दूरभाष : 2436
दिनांक: 02 12/2025
पत्रांक :26/55
सेवा में
सर्वश्री भोलानाथ रामनाथ,
पटेल चौक,
अहमदाबाद - 5
विषय – कपडों की पूछताछ...
प्रिय महोदय,
सादर नमस्कार!
निवेदन है कि हमें विभिन्न प्रकार के कपडे चाहिए| उसकी सूची हमने साथ में जोड दी है| इसके अतिरिक्त और भी अगर कपडे है तो उनकी सूची भी हमें भेज दे| इसके साथ उसकी मूल्य सूची भी साथ में हों| हमें की आदेशों की पूर्ति करने के लिए हमें आपके यहां बने हुये माल की आवश्यकता है | यदि आपके मूल्य हमें उचित जान पडे तो हम शीघ्र बडी मात्रा में आदेश भेज सकेंगे|
इस कष्ट के लिए हम आपके बडे आभारी रहेंगे| आशा है कि आप शीघ्र उत्तर देकर अनुगृहीत करेंगे
भवदीय
कृते मनोहरलाल मदनलाल
मनीषकुमार
व्यवस्थापक
संलग्न - कपडों की सूची
Modul 1.0
वाणिज्य पत्राचार
युनिट नं 1.2
क्रयादेश पत्र
प्रकार दूसरा :- क्रयादेश या आदेश पत्र
किसी भी संस्था द्वारा अपना मूल्य सूची पत्र भेजे जाने पर क्रेता द्वारा माल या उत्पाद मंगाने जाने के लिए लिखा जानेवाला पर 'आदेश या क्रया देश पत्र' कहलाता हैं|
ऐसे आदेश पत्र लिखते समय वस्तु का नाम, किस्म, मात्रा, मूल्य तथा भुगतान संबंधी शर्ते स्पष्ट रूप से लिखी जाती है| यही नहीं, पैकिंग के ढंग तथा उत्पाद प्राप्ति के माध्यम या साधन पोस्ट पार्सल, रेल्वे पार्सल या यातायात पार्सल से मंगाने के संबंध में आवश्यक निर्देश किया जाता है और विक्रेता को उत्पाद के साथ में बीजक(बिल) भेजने का उल्लेख भी किया जाता है|
आदेश पत्र का प्रारूप
उदाहरण 1
आर्य विनोद प्रकाशन मंदिर द्वारा कमल प्रकाशन को पुस्तक भेजने का आदेश पत्र लिखिए|
आर्य विनोद प्रकाशन मंदिर
पता : राजमंडी, आगरा 282502
दूरभाष : 2436
दिनांक: 02/12/2025
पत्रांक :55/26
सेवा में
सर्वश्री कमल प्रकाशन ,
हिंदी पीढी,
रांची(म.प.)
विषय – पुस्तकें भेजने हेतु...
प्रिय महोदय,
सादर नमस्कार!
सविनय निवेदन है की कृपया हमारे पत्र दि. 15 मई 1983 का अवलोकन करें| हमारे आदेश में जो तीन पुस्तकें मंगाई गयी थी, उनमें से तीन बंडल में नहीं आई हैं लेकिन उसके स्थान पर बिना आदेश की डॉ पुस्तके प्राप्त हुई हैं| कृपया हमारे आदेश की निम्न पुस्तकें शीघ्र भिजवाएं तथा बिना आदेश की पुस्तकों के बीजक के स्थान पर नया बीजक भेजें|
1) जैनेंद्र का जयवर्धन : वस्तु और विचार
2) हिंदी नाटक समीक्षा
3) रासों काव्य धारा
भवदीय
राजनसिंह चौरा
कृते आर्य विनोद प्रकाशन मंदिर
व्यवस्थापक
उदाहरण 2
परीक्षित बुक स्टॉल पुस्तकें मंगवाने हेतु किताबघर को आदेश पत्र लिखते है, पत्र का प्रारूप तैयार करें|
परीक्षित बुक स्टोल
झेंडा चौक,
पुणे महाराष्ट्र-5
दूरभाष :-2325
दिनांक : 25/12/2025
पत्रांक : 1/26
सेवा में,
किताबघर प्रकाशन,
नई दिल्ली - 47
विषय - पुस्तकें मंगवाने हेतु ....
प्रिय महोदय, सादर प्रणाम !
हमें आपका दि. 3 दिसंबर, 2025 का पत्र तथा मूल्य सूची मिली, जिसके आपको धन्यवाद| निम्न लिखित किताबें अगर हमें जल्दी मिल जाती है, हम आपके बहुत आभारी रहेंगे|
1) हिंदी भाषा और लिपि - डॉ. भोलानाथ तिवारी - 50 प्रतियां
2) मेरी कहानी - महादेवी वर्मा- 20 प्रतियां
3) मेरे सत्य के प्रयोग - महात्मा गांधी - 50 प्रतियां
किताबें मार्ग में सुरक्षित रहें इसीलिए उनका उचित पैकिंग करें| इस क्रयादेश से सम्बन्धित बीजक की धनराशि पहले 50 प्रतिशद भर देंगे बाकी किताबें मिलते ही आपके बैंक खाते में जमा कर देंगे| हमें आशा है कि आप हमारे क्रयादेश की पूर्ति करने की शीघ्र कृपा करेंगे|
भवदीय,
कृते, परीक्षित बुक स्टोल,
पी. एन. नागप्पा,
व्यवस्थापक
Modul 1.0
वाणिज्य पत्राचार
युनिट नं 1.3
शिकायती पत्र
पत्र का प्रकार 3) शिकायती पत्र
शिकायती पत्र एक व्यवसायी दूसरे व्यवसायी को तभी शिकायत करता है जब उसके द्वारा दिये गये आदेश के अनुसार माल नहीं आकर कम या अधिक या नमूनों के अनुसार नहीं होता है अथवा उसमें कोई टूट-फूट हो जाती है या शों में सूचित दर से अधिक दर बीजक में लगी होती है। कभी-कभी माल में हानि या त्रुटि रेलवे या ट्रांसपोर्ट एजेन्सी के कारण हो जाती है तो उसकी शिकायत भी विक्रेता से की जाती है, पर उसके लिए ट्रैफिक मैनेजर / इन्चार्ज रेलवे से प्राप्त प्रमाण सहित हर्जाने की माँग भी उसमें की जाती है।
व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में शिकायती पत्रों के विविध आधार होते हैं, उनका वर्गीकरण सामान्य रूप में निम्न प्रकार है-
1. विलम्ब से माल मिलने की दशा में
2. माल या बिल्टी न छुड़ाने की दशा में
3. गलत माल मिलने की दशा में-
(क) नमूने के विरुद्ध
(ख) आदेश के विरुद्ध
4. खराब माल मिलने की दशा में
5. गलत मात्रा में माल मिलने की दशा में
(क) मात्रा से कम
(ख) मात्रा से अधिक
6. बीजक में गलत प्रविष्टि की दशा में
7. डाक, रेलवे तथा ट्रांसपोर्ट में हुई क्षति की दशा में
8. बैंक द्वारा बैंक भुगतान न किये जाने की दशा में
9. त्रुटिपूर्ण पैकिंग की दशा में
10. माल रास्ते में नष्ट होने की दशा में
11. खाली पैकिट्स प्राप्त होने की दशा में
उदाहरण - 1
विलम्ब से माल प्राप्ति पर शिकायती पत्र
व्यंजना प्रकाशन
सार्वजनिक पुस्तकालय के सामने
तार : व्यंजना नवलगढ़-३३३०४२
दूरभाष : 243672 दिनांक: 20/3/2026
सेवा में,
श्री प्रबन्धक,
राजहंस प्रकाशन मंदिर,
कैण्ट रोड, मेरठ (उ० प्र०)|
विषय:- विलम्ब से माल प्राप्ति पर शिकायती पत्र
आदरणीय महोदय, सादर प्रणाम!
हमारे आदेश पत्र की स्पष्ट शर्तों के बाद भी आपका माल बीस दिन विलम्ब से प्राप्त हुआ है और पैकिंग सही न होने के कारण इस वर्षा के मौसम में कई पुस्तकों के आवरण गलकर फट गए हैं इसलिए ग्राहक लेने में एतराज करते हैं। ऐसी दशा में आपका माल वापस ही करना पड़ेगा, क्योंकि अब न माँग शेष रही है और न माल विक्रय योग्य है। यदि आप इस माल के स्थान पर संलग्न आदेश के अनुसार दूसरा माल हमें पन्द्रह दिन की अवधि में भेज सकें तो भुगतान
का समायोजन कर लें अन्यथा आपके व्यय पर माल वापस भेज देना ही पड़ेगा ।
भवदीय
कृते व्यंजना प्रकाशन प्रबन्धक
उदाहरण – 2
माल न छुड़ाने पर शिकायती पत्र
जैन पुस्तक भंडार प्रकाशक एवं विक्रेता
2/24 नाला भैरों बेलनगंज, 04,आगरा-282004
दूरभाष:2372 दिनांक : 30/3/2026
पत्रांक:-12/2026
सेवा में,
प्रबन्धक,
व्यंजना प्रकाशन,
सार्वजनिक पुस्तकालय के सामने,
नवलगढ़-333042
विषय:- माल न छुड़ाने पर शिकायती पत्र
प्रिय महोदय, सादर प्रणाम!
आपके आदेश पत्र संख्या 25/2026 दिनांक 12/2/2026 के अनुसार आपको 2560/-रुपये की पुस्तकें भेजी गयी थीं और आपकी इच्छानुसार बिल्टी बैंक आफ बड़ौदा, बाला किला, नवलगढ़ पर भेजी गयी थी; परन्तु सखेद लिखना पड़ रहा है कि आपने उक्त बिल्टी को समय पर नहीं छुड़ाया है अतः बैंक ने बिल्टी हमें वापस लौटा दी है।
हमने आपके विगत सम्बन्धों एवं विश्वास पर ही माल भेजा था, फिर भी हमें यह हानि उठानी पड़ी है। यदि आपको माल लेना है तो शीघ्र ही आप 2560/-रुपये डिमाण्ड ड्राफ्ट से भेजें। यदि आपने उक्त धनराशि का डिमाण्ड ड्राफ्ट नहीं भेजा तो आदेश देकर माल न छुड़ाने की दशा में माल वापस कराने और डेमरेज आदि की क्षतिपूर्ति आपको देय होगी।
भवदीय
कृते जैन पुस्तक भण्डार (ह०)
प्रबन्धक
संलग्न: आपके आदेश की प्रतिलिपि
उदाहरण- 3
गलत माल मिलने पर शिकायत
जैन पुस्तक भंडार प्रकाशक एवं विक्रेता
2/24 नाला भैरों बेलनगंज, 04,आगरा-282004
दूरभाष:2372 दिनांक : 30/3/2026
पत्रांक:-12/2026
सेवा में,
प्रबन्धक,
व्यंजना प्रकाशन,
सार्वजनिक पुस्तकालय के सामने,
नवलगढ़-333042
विषय - गलत माल मिलने पर
प्रिय महोदय, सादर प्रणाम!
कृपया हमारे आदेश संख्या 25/2026 दिनांक 12/2/2026 'देखने का कष्ट करें । आप द्वारा भेजा गया माल हमारे आदेश के अनुसार प्राप्त नहीं हुआ है। आपके यहाँ पैकिंग के समय किसी भूलवश हमारे पास किसी दूसरे का माल भेज दिया गया है। हमारे यहाँ इस माल का बाजार भी नहीं है। अतः माल आप अपने व्यय पर वापस मंगवाकर हमारे आदेश का माल शीघ्र भिजवायें ।
भवदीय
कृते मिनल वर्मा
व्यवस्थापक
उदाहरण-4
खराब माल मिलने की दशा में शिकायती पत्र
जैन पुस्तक भंडार प्रकाशक एवं विक्रेता
2/24 नाला भैरों बेलनगंज, 04,आगरा-282004
दूरभाष:2372 दिनांक : 30/3/2026
पत्रांक:-12/2026
सेवा में,
प्रबन्धक,
व्यंजना प्रकाशन,
सार्वजनिक पुस्तकालय के सामने,
नवलगढ़-333042
विषय :- खराब माल मिलने की दशा में शिकायती पत्र
प्रिय महोदय,
सादर प्रणाम !
आपके पत्र संख्या12/2026 दिनांक 3/3/2026 के साथ बिल्टी संख्या 403 एवं बीजक संख्या 444 दिनांक 1/3/2026
प्राप्त हुआ, पर बिल्टी खोलने के बाद पता चला कि माल अत्यन्त खराब दशा में है और कटा-फटा है। उसे किसी ग्राहक को बेचा जाना भी सम्भव नहीं है। अतः यह माल आप अपने व्यय पर वापस मंगा लें तथा हमारे खाते में हमारे इस भुगतान को जमा करके क्रेडिट नोट भिजवाने का कष्ट करें ।
कष्ट के लिए क्षमा चाहेंगे।
भवदीय
कृते मिनल वर्मा
प्रबन्धक
उदाहरण – 5
गलत मात्रा में माल मिलने की शिकायत
जैन पुस्तक भंडार प्रकाशक एवं विक्रेता
2/24 नाला भैरों बेलनगंज, 04,आगरा-282004
दूरभाष:2372 दिनांक : 30/3/2026
पत्रांक:-12/2026
सेवा में,
प्रबन्धक,
व्यंजना प्रकाशन,
सार्वजनिक पुस्तकालय के सामने,
नवलगढ़-333042
विषय :- गलत मात्रा में माल मिलने की शिकायत
प्रिय महोदय,
सादर प्रणाम!
हमारे आदेश सं०21/2026 दिनांक 15/2/2026
का अवलोकन करें। आपके द्वारा भेजा गया माल उस आदेश में वांछित मात्रा से कम/अधिक है, तथा बीजक में भी माल की दर जो हमें दी गई थी, वह भी अधिक है। ऐसी दशा में बीजक का मिलान आदेश पत्र से करें तथा पिछले पत्र सं० 13/2026 दिनांक 1/2/2026 द्वारा सूचित दरों पर ही बीजक बनायें तथा हमारे खाते में उतनी राशि का क्रेडिट जमा करके क्रेडिट नोट भिजवाने का कष्ट करें।
भवदीय
कृते मिनल वर्मा
भागादीर
बहुविकल्पी प्रश्न
1) व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये
लिखा गया पत्र व्यावसयिक पत्र होता हैं|
2) वाणिज्य पत्रचार के भेद पंद्रह होते हैं|
3) पत्रलेखन के तीन भाग
होते हैं|
4)व्यापारिक पत्र का मुख्य लाभ व्यापारिक
संबंधों का विस्तार हैं|
5)व्यापारिक पत्र का सबसे बडा गुण प्रभावशीलता
हैं|
6) व्यापारी पत्र में शीर्षक
भाग मुद्रित होता हैं|
7) व्यापारिक पत्र के शीर्षक भाग में प्रेषक का नाम होता हैं|
8) व्यापारी पत्र में पत्रांक बायी
ओर लिखा जाता है|
9) व्यापारिक पत्र के मध्य भाग में मूल विषय सामग्री का उल्लेख होता है|
10) वैधानिक अधिकार मिलने पर व्यापार गृह के नाम के बाद से अधिकृत शब्द जोड किया जाता है|
11) यदि कानून द्वारा यह अधिकार प्राप्त न हो तो हस्ताक्षर कर्ता को व्यापार गृह के पहले 'कृते या बास्ते' लगा देना चाहिए|
12)
पत्र के अंत में लिखा जानेवाला भवदीय शब्द स्वनिर्देश
कहलाता हैं|
14)
पानेवाला का पता सेवा में लिखकर लिखा जाता हैं| एक अच्छे व्यापारिक पत्र की भाषा सरल
और स्पष्ट होनी चाहिये|
15)
जटिलता
व्यापारिक पत्र का गुण नहीं है|
16)पानेवाले
का पता बाई ओर लिखा जाता है|
17)
संलग्न का
उल्लेख पत्र में बाई ओर नीचे होता है|
18)
व्यापारी पत्र में संबोधन प्रिय महोदय होता
है|
19)
पूछताछ पत्र के माध्यम से विक्रेता अपने माल की किस्म, उपयोगिता, मूल्य तथा माल संबंधी अन्य जानकारी क्रेता को भेजता है|
20)
संबोधन के बाद वाणिज्य पत्राचार में अभिवादन
किया जाता है|
21)
क्रयादेश पत्र को ही आदेश पत्र कहा
जाता है|
22) किसी भी संस्था द्वारा अपना मूल्य सूची पत्र भेजे जाने पर क्रेता द्वारा माल या उत्पाद मंगाने जाने के लिए लिखा जानेवाला पर 'आदेश या क्रया देश पत्र' कहलाता हैं|
23) क्रयादेश पत्र में विक्रेता को उत्पाद के साथ में बीजक(बिल) भेजने का उल्लेख भी किया जाता है|
24) शिकायती पत्र एक व्यवसायी दूसरे व्यवसायी को तभी शिकायत करता है जब उसके द्वारा दिये गये आदेश के अनुसार माल नहीं आकर कम या अधिक या नमूनों के अनुसार नहीं होता है|
25) विलम्ब से माल मिलने की दशा में शिकायत पत्र लिखा
जाता है|
26) माल या बिल्टी न छुड़ाने की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
27) गलत माल मिलने की दशा में शिकायत पत्र लिखा
जाता है|
28) खराब माल मिलने की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
29) बीजक में गलत प्रविष्टि की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
30 डाक, रेलवे तथा ट्रांसपोर्ट में हुई क्षति की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
31) बैंक द्वारा बैंक भुगतान न किये जाने की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
32) त्रुटिपूर्ण पैकिंग की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
33) माल रास्ते में नष्ट होने की दशा में
शिकायत पत्र लिखा जाता है|
34) खाली पैकिट्स प्राप्त होने की दशा में शिकायत पत्र लिखा
जाता है|
35) व्यापारिक पत्र में सत्य तत्वों को यथार्थता
कहा
जाता है|
Modul 2.0
इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों का परिचय
युनिट नं 2.1
रेडियो
इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम आधुनिक युग में सूचना के आदानप्रदान का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं। विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ संचार के पारंपरिक साधनों की जगह अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने ले ली है। इन माध्यमों के द्वारा संदेश, समाचार, विचार, चित्र तथा ध्वनि को बहुत कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जा सकता है।अत: सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम का अर्थ समझ लेना आवश्यक है| इसमें दो शब्द है-1) इलेक्ट्रॉनिक और 2) संचार माध्यम| यहां इलेक्ट्रॉनिक का अर्थ है ‘विद्युत और इलेक्ट्रॉन के माध्यम से चलने वाली तकनीक या उपकरण|’ और ‘संचार’ शब्द का अर्थ है 'किसी भाव, विचार, घटना या समाचार के प्रसारण से है|’ कारण 'संचार' शब्द 'चर' धातु तथा 'सं' उपसर्ग से मिलकर बना है| 'चर का अर्थ है चलना या आगे बढना| ‘अत: सम्यक रूप से चलना या बढना संचार कहलाता है|’ इस तरह इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम का अर्थ "इलेक्ट्रॉनिक या विद्युत माध्यमों से भावों का संप्रेषण करना|"
आज इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का महत्व बढ गया है, कारण इसके माध्यम से कम समय में अधिक अधिक लोगों तक पहुंचना आसान हो गया है| इसमें भी आज विभिन्न माध्यमों का विकास हो गया है| जैसे- रेडियो, दूरदर्शन, डॉक्युमेंटरी, इंटरनेट, युट्युब आदि| इसमें से अध्ययन के लिए रखे साधनों का परिचय यहां प्रस्तुत है|
1) रेडियो :-
रेडियो के आविष्कार ने विश्व में जन-संचार को एक नया स्वरूप प्रदान किया था| आज भी दूर बसे ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो का परिमार्जित रूप 'ट्रांजिस्टर' आज भी लोकप्रिय है| रेडियो न केवळ मनोरंजन अपितु ज्ञान-वर्धन के क्षेत्र में अटूट सहयोग दिया है|
रेडियो का इतिहास :-
संचार के रूप में रेडियो तकनीकि का जन्म 1896 में मारकस मुगलिमों मारकोनी द्वारा वायरलेस-टेलीग्राफी के आविष्कार के साथ हुआ| वर्ष 1922 में ब्रिटन में ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी (बी.बी.सी.) की स्थापना के पश्चात व्हार्त में सबसे पहले रेडियो स्टेशन कलकत्ता में 1923 में स्थापित हुआ| इसके दो वर्षों बाद दो अन्य वर्षों बाद दो अन्य प्रसारण केंद्र वर्ष 1924 में मद्रास और बंबई में शुरू हुए| व्यावसायिक स्तर पर रेडियो स्टेशन की स्थापना देश में 1927 से प्रारंभ हुई|
'आकाशवाणी' के नाम से पहला रेडियो स्टेशन मैसूर की देशी रियासत में मनोविज्ञान के एक प्रोफेसर डॉ. गोपाल स्वामी ने 1935 में आरंभ किया| इसी वर्ष इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस के भारतीय कंट्रोलर लियोनेल फील्डेन नियुक्त हुए| उन्होंने 1 जनवरी, 1937 को पहला रेडियो प्रसारण केंद्र दिल्ली में स्थापित किया| इसकी क्षमता 20 किलोवाट थी| फील्डेन की पहल पर 8 जून, 1936 को इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर आल इंडिया रेडियो कर दिया दिया गया और वर्ष भारतीयों का पहला दल ट्रेनिंग के लिए लंदन गया|
1938 में लखनऊ रेडियो केंद्र की स्थापना हुई, वही धन के अभाव में देहरादून रेडियो केंद्र को बंद करना पडा| इसी वर्ष दिल्ली, बंबई और मद्रास में रेडियो केंद्र स्थापित किए गए| 1947 में देश के बटवारे के साथ रेडियो केंद्रों का बटवारा हो गया| भारत के हिस्से में दिल्ली, लखनऊ, बंबई, मद्रास और तिरुचि आदि पांच केंद्र आए| जबकि लाहौर, पेशावर और ढाका रेडियो केंद्र पाकिस्तान के पास चले गए|
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में रेडियो का अद्भूतपूर्व विकास हुआ| अपनी पुस्तक 'जनसंचार विविधा' आयाम में बृजमोहन गुप्त लिखते है, कि 'सन 1950 में 25 रेडियो केंद्रों से साठ हजार घंटे से ज्यादा प्रसारण हो रहा था| देश के 21 प्रतिशत लोग और 12 प्रतिशत क्षेत्र में मीडियम वेब सेवा उपलब्ध थी| इसके अलावा 11 विदेशी भाषाओं में 116 घंटे प्रति सप्ताह विदेशी श्रोताओं के लिए प्रसारण हो रहा था|" विदेशी सेवा के लिए आकाशवाणी का एक अलग विभाग है, जिसके माध्यम से लगभग 16 भाषाओं में प्रतिदिन कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं|
आरम्भ में भारतीय डाकतार विभाग रेडियो- सेट धारकों से वार्षिक लाइसेंस फीस लेता था, किंतु 1980 में भारत सरकार ने रेडियो सेट पर लगने वाली फीस को समाप्त कर दिया। इसके पीछे मूल भावना नागरिकों को शिक्षित करना, उनका मनोरंजन करना और उनको देश की प्रगति एवं विकास के सम्बन्ध में सही जानकारी देना था। वर्तमान में इसके लगभग 125 केन्द्र हैं, जिनसे देश की नब्बे प्रतिशत जनता लाभान्वित हो रही है। आकाशवाणी की सेवाएँ देश के उन भागों में भी उपलब्ध हैं जहाँ बिजली आपूर्ति नियमित नहीं है। आकाशवाणी अबाध रूप से लगभग चौबीस भाषाओं और 146 बोलियों में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करती है।
आकाशवाणी का गठन
'आकाशवाणी' केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आधीन है। इसका प्रमुख अधिकारी महानिदेशक होता है। देश भर में स्थापित समस्त रेडियो स्टेशन तथा ट्रांसमीटर आदि का नियन्त्रण इसके अधिकार क्षेत्र में आता है। महानिदेशक का कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
कार्यक्रम
'आकाशवाणी' पर श्रोताओं के लिए समय-समय पर विभिन्न लोकप्रिय कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। समाचार, घटनाओं का सामयिक समीक्षा, गीत-संगीत एवं ऐसे ही अन्य अनेक कार्यक्रम निरन्तर प्रस्तुत किए जाते हैं। आज आकाशवाणी लोगों का सर्वाधिक लोकप्रिय संचार माध्यम है।
प्रसारण के मूल तत्व
रेडियो पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों की प्रस्तुति में निम्न सावधानियों की आवश्यकता होती है -
1. सामान्य बोलचाल की भाषा व शब्दों का प्रयोग किया जाए।
2. वाक्य छोटे व रोचक हों।
3. लेख व कार्यक्रम श्रोताओं के स्तर के हों।
4. कार्यक्रमों में समय-सीमा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
5. समाचार का आमुख सशक्त होना चाहिए।
6. संचारक की भाषा शैली सुगम व प्रभावपूर्ण हो।
7. विचारों की अभिव्यक्ति प्रभावी होनी चाहिए ।
8. व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियों से बचा जाए।
9. वक्ता का शब्द-उच्चारण स्पष्ट व शुद्ध होना चाहिए।
10. सामाजिक विषयों पर वार्ता-संगोष्ठी अथवा अन्य कार्यक्रमों की प्रस्तुति अधिक लोकप्रिय होती है।
भाषा व शैली
सामान्यतः समझा जाता है कि समाचार पत्र तथा रेडियो में प्रयुक्त हिन्दी भाषा व शैली में विशेष अन्तर नहीं होता है। किन्तु समाचार-पत्र की भाषा व शैली रेडियो भाषा व शैली से निम्न कारणों से सर्वथा भिन्न होती है|
1. समाचार पत्र दृश्य माध्यम है। इस माध्यम का उपयोग वह व्यक्ति कर सकते है जो शिक्षित हो। जबकि रेडियो श्रवण माध्यम है और इसके लिए व्यक्ति का शिक्षित होना आवश्यक नहीं।
2. समाचार पत्र में कठिन शब्दों व दूरुह शैली का प्रयोग पाठकों के लिए असुविधा का कारण अवश्य होता है, किन्तु पाठकों के पास पर्याप्त समय होने के कारण वह दूरुह शब्दों अथवा शैली को किसी की सहायता से समझा सकता है। जबकि रेडियो में प्रयुक्त दूरुह शब्दों को समझ पाने के लिए श्रोताओं के पास समय नहीं होता। यदि वे किसी शब्द का अर्थ नहीं समझ सके तो उसका ज्ञान अधूरा रह जाता है।
3. समाचार पत्र पर पत्रकारों को अपनी बात कहने व समझाने के लिए पर्याप्त स्थान मिल सकता है। रेडियो कलाकार के पास यह सुविधा नहीं होती। इसलिए उसे अत्यन्त सरल शब्दों के माध्यम से अपनी बात श्रोताओं तक पहुँचानी होती है।
4. समाचार-पत्र में भाषा को मुहावरों और कहावतों के द्वारा सौन्दर्य और सौष्ठव प्रदान किया जा सकता है किन्तु रेडियो कलाकार अथवा पत्रकार के लिए मुहावरों और कहावतों का प्रयोग वर्जित होता है।
विद्वान पत्रकारों के अनुसार रेडियो में प्रयुक्त होने वाली भाषा व शैली में निम्नलिखित तत्वों का समावेश होना चाहिए -
1. वाक्य विन्यास संक्षिप्त हो। वाक्य जितने छोटे होंगे उतने ही प्रभावी होंगे।
2. एक सांस में बोले जा सकने वाले शब्दों का समावेश एक वाक्य में हो।
3. दूरूह वाक्यों, कठिन व अपरिचित शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
4. एक वाक्य में एक से अधिक विचारों का समावेश नहीं होना चाहिए।
5. सामान्य बोलचाल के शब्दों का प्रयोग श्रोताओं के लिए सुविधाजनक होता है।
6. प्रासांगिक शब्दों का प्रयोग करना श्रेयस्यकर होता है। अनावश्यक शब्दों का प्रयोग श्रोताओं के लिए उबाऊ सिंद्ध होता है।
7. व्यक्ति, स्थान आदि पूरे नामों का उल्लेख करना चाहिए। संक्षिप्त नामों का उल्लेख उचित नहीं होता ।
8. सूचनाओं का सम्प्रेषण अत्यन्त सहज भाषा व शैली में होना चाहिए।
9. शब्दों के सही उच्चारण पर बल दिया जाना चाहिए।
10. रेडियो पर समस्त वाचन प्रत्यक्ष एवं सुबोध शैली में ही होना चाहिए।
मूल्यांकन
सामान्यतः टेलीविजन तथा फिल्म की तुलना में रेडियो पर प्रकाशित कार्यक्रम 'ऑडियन्स' विमोहित नहीं होता तथा इसको कभी भी बन्द या खोला जा सकता है। प्रेस की तुलना में इसका संदेश क्षणिक होता है। यानि सुनने वाला प्रोग्राम को दुबारा नहीं सुन सकता। इसके लिए उसे कार्यक्रम को रिकार्ड करना होता है। लेकिन प्रेस के मुकाबले रेडियो के दो प्रमुख लाभ हैं। एक तो यह बहुत बड़ी संख्या में लोगों को एक ही साथ सम्बोधित कर सकता है। दूसरे यह घटना के तुरन्त बाद खबर दे सकता है।लेकिन आज रेडियो को सबसे बड़ा खतरा है टी०वी० से जिसमें ध्वनि तथा तेजी से चलते हए चित्रों का देखने व सुनने वाले पर अधिक प्रभाव पडता है। रेडियो पर कार्यक्रम प्रसारण की अपनी सीमाएँ हैं। इससे एक समय में एक ही स्टेशन लगाया जा सकता है। इसके कार्यक्रम अस्थाई होते हैं. कार्यक्रमों को रोककर दुबारा नहीं सुना जा सकता तथा अन्य जनसंचार माध्यमों की तरह वह भी एकतरफा संचार है। प्रेस की तरह रेडियो भी लोगों को देश-विदेश की नीति व सामाजिक घटनाओं की खबरें देता है, उनकी समीक्षा करता है तथा सूचना व मनोरंजन करता है। यह कला तथा संस्कृति का महत्वपूर्ण साधन है। यही नहीं, लोगों को शिक्षा देता है तथा उनको जन-जीवन में महत्वपर्ण प्रवत्तियों तथा विकास के बारे में बताता है। इस तरह रेडियो देश के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बहुविकल्पी प्रश्न
1) आज इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का महत्व बढ गया है|
2) ‘विद्युत और इलेक्ट्रॉन के माध्यम से चलने वाली तकनीक या उपकरण को इलेक्ट्रॉनिक कहा
जाता है|
3) 'संचार' शब्द 'चर' धातु
से बना है|
4) 'चर’ का अर्थ है चलना या आगे बढना|
5) ‘संचार’ शब्द का अर्थ है 'किसी भाव, विचार, घटना या समाचार के प्रसारण से है|’
6) इलेक्ट्रॉनिक या विद्युत माध्यमों से भावों का संप्रेषण करना इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का
कार्य होता है|
7) ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो इस जन संचार माध्यम का अधिक
महत्व है|
8) रेडियो श्राव्य
प्रकार का माध्यम है|
9)संचार के रूप में रेडियो तकनीकि का जन्म 1896 में मारकस मुगलिमों मारकोनी द्वारा वायरलेस-टेलीग्राफी के आविष्कार के साथ हुआ|
10) रेडियो का प्रारंभ बी.बी.सी
की स्थापना से हुआ है|
11) ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी बी.बी.सी का विस्तारित रूप है|
12) सबसे पहले रेडियो स्टेशन कलकत्ता में 1923
में स्थापित हुआ|
13) व्यावसायिक स्तर पर रेडियो स्टेशन की स्थापना देश में 1927
से प्रारंभ हुई|
14) पहला रेडियो स्टेशन 'आकाशवाणी' के नाम से शुरू हुआ|
15) 'आकाशवाणी' नाम से
रेडियो स्टेशन का प्रारंभ प्रोफेसर डॉ. गोपाल स्वामी ने 1935 में किया|
16) 8 जून, 1936 को इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर आल इंडिया रेडियो कर दिया दिया गया|
17) 1938 में लखनऊ रेडियो केंद्र की स्थापना हुई|
18) 'आकाशवाणी' केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आधीन है।
19) महानिदेशक का कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
20) रेडियो को सरल शब्दों के माध्यम से अपनी बात श्रोताओं तक पहुँचानी होती है।
Modul 2.0
इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों का परिचय
युनिट नं 2.2
दूरदर्शन
वैश्वीकरण के वर्तमान परिदृश्य में इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सबसे सशक्त माध्यम टेलीविजन है| यह दृश्य – श्राव्य माध्यम है, इसीलिए रेडियो से भी अधिक बारीकी रूप से इसका आलेखन होता है| इसकी जिम्मेदारी समाचार पत्रों से अधिक है, कारण समस्त लोगों तक उसकी पहुंच हैं| अत: ऐसे महत्वपूर्ण माध्यम की प्राथमिक जानकारी होना आवश्यक बनाता है|
1) टेलीविजन शब्द की व्युत्पत्ति :-
इस शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘टेली’(दूरी) और लैटिन के ‘विजन’ (देखना) पर से हुई है| जिसका व्युत्पत्ति जनक अर्थ होता है दूर से देखना, अर्थात दूर का जो दर्शन करवाता है अर्थात दूरदर्शन| टेलीविजन इसका अंग्रेजी रूप है| इसका मूल उद्देश्य दूरवर्ती स्थानों पर घटनेवाली घटनाओं का घर बैठे साक्षात्कार कराना है|
2) टेलीविजन का संक्षिप्त इतिहास:-
उन्नीसवीं शताब्दी की इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सबसे बडी देन टेलीविजन है| सन 1884 के आसपास की सेलिनियम की खोज ने मनुष्य को सोचने पर मजबूर किया| इसी के फलस्वरूप संचार के माध्यमों में दूरदर्शन का प्रयोग सर्वप्रथम 1884 में हुआ था। सन 1884 में जर्मन वैज्ञानिक पोल निपको ने स्केनिंग और एक डिस्क की खोज की| तत्पश्चात सन 1923 मी रुस के एक इलेक्ट्रोनिक इंजीनियर डॉ. ब्लादिमिर बारीकिन ने अपने गहन चिंतन से कैथेड रे ट्यूब का अविष्कार किया| सन 1926 में इंग्लैंड के जान लेगी बेचर्ड ने टेलीविजन की आविष्कार में सफलता प्राप्त की और उन्होंने रॉयल इंस्टीटयूट के सद्स्यों के सामने ‘हाटफोन’ चित्र का सफल प्रसारण भी दिखाया| प्रयोग तौर पर अमरिका के जेकिंस नीज ने टेलीविजन प्रसारण आरंभ किया| उसका स्टेशन wzxk वाशिंगटन था| सन 1930 तक 25 से अधिक टेलीविजन केंद्रों को अमरीका ने लाईसेंस दिया| इसमें अमेरिका (1890), फ्रांस (1900) और रूस (1915) में दूरदर्शन को एक सीमित दायरे में प्रसारण के लिये प्रयोग रूप में प्रारम्भ किया गया। विश्व में सर्वप्रथम 1920 में बोलते चित्रों का सफल प्रयोग किया गया। वर्ष 1925 में अमेरिका में डॉ० बोरोकिन तथा जेकिन्सनीज ने एक यांत्रिक दूरदर्शन उपकरण का प्रदर्शन किया। और सबसे पहला दूरदर्शन कार्यक्रम 1927 में न्यूयार्क और वाशिंगटन के मध्य बेल टेलीफोन लेबोरेट्रीज द्वारा प्रस्तुत किया गया था। 1926 तक दूरदर्शन इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक सशक्त माध्यम बन गया ।इसके पश्चात् लगभग दस वर्षों के अन्तराल में दूरदर्शन तकनीकि ने अपने विकास की लम्बी यात्रा पूर्ण की, जिसके फलस्वरूप दूरदर्शन पर आधारित नियमित कार्यक्रम 1936 में प्रारम्भ हो सके। इन कार्यक्रमों का सफल प्रसारण बी०बी०सी० से प्रारम्भ किया।|आरंभ में black and white (श्वेत- श्याम) टेलीविजन प्रसारण का आरंभ शुरू हुआ और बाद में रंगीन टी.वी. सामने आया| वर्ष 1939 में न्यूयार्क के विश्व मेलों में दर्शकों ने दूरदर्शन पर कार्यक्रम देखे और अचम्मित रह गएँ ।
भारत ने सन् 1936 में UNESCO की एक बैठक के दौरान देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यक्रमों के प्रसारण के लिये दूरदर्शन की उपयोगिता पर बल दिया गया और एक योजना के अन्तर्गत UNESCO ने भारत को टेक्निकल और आर्थिक सहायता देना स्वीकार कर लिया। वर्ष 1959 में UNESCO ने भारत को 20,000 डालर की आर्थिक सहायता दी जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा के विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा सके।15 सितम्बर, 1959 में दिल्ली में आरंभ किया इस प्रसारण माध्यम का नाम दूरदर्शन रखा गया| फिलिप्स कंपनी ने पहली बार भारत में टी.वी. को प्रदर्शित किया| 1959 के पश्चात 1972 में 13 वर्ष बाद दूसरा दूर दर्शन केंद्र मुंबई में खुला| इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था और सन 1960 के स्वतंत्रता दिवस का जीवंत प्रसारण भी प्रसारित किया गया| दूरदर्शन के पहले निदेशक शैलेन्द्र शंकर और उद्घोषिका प्रतिभा पुरी थी| दूरदर्शन के आरंभ में निर्मित किये कार्यक्रम नितांत प्रयोगात्मक रहे और बाद में शिक्षामूलक तथा विकासमूलक कार्यक्रम प्रसारित किय गये|
1961 में भारत के लगभग 250 स्कूलों में टी०वी० सेटस उपलब्ध कराये गय| जिनके माध्यम को बच्चों से शिक्षा प्रदान करने की योजना बनाई गयी। 1965 में एक घण्टे का नियमित दरदर्शन प्रसारण शुरू हुआ। इस वर्ष देश में कुल 650 लोगों ने टी०वीं पर कार्यक्रम का आनन्द लिया। 1966 में 4170 तथा 1971 में 44000 लोगों के पास टी०वी० सेट मौजद थे। सन 1975 में भारत ने दरदर्शन को Satellite Instructional Television Experiment
(SITE) से जोड़ दिया था, फलस्वरूप एशियाड खेलों का सही व रंगीन प्रसारण भारत में सम्भव हो सका ।
सन् 1976 में पहली बार दूरदर्शन को एक स्वतन्त्र संगठन के रूप में स्थापित किया गया और इसके प्रसारण केन्द्रों की स्थापना की गई। सन् 1976 के पहले बम्बई में (1972), पुणे व अमृतसर में, 1973 में लखनऊ, कलकत्ता व मद्रास में (1975) दूरदर्शन केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी थी। 1975 में अमेरिका के अनुसंधान प्रशासन ने अपना उपग्रह एक वर्ष के लिए भारत को उधार दिया, जिससे दूरदर्शन के विकास में अभूतपूर्व सहयोग मिला। इसके अतिरिक्त देश के छः पिछड़े राज्यों उड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश व कर्नाटक के 400 गाँव चुने गए जहाँ शिक्षा के उद्देश्य से टी०वी० सेट लगाए गए हैं। सन् 1977 में जयपुर, 1978 में मुजफ्फरपुर तथा 1979 में कानपुर में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित किये गये। वर्ष 1980 में सम्पूर्ण देश में दूरदर्शन केन्द्रों का प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा। जहां 1981 में रंगीन टी०वी० प्रसारण प्रारम्भ हुआ वहीं वर्ष 1984 के आते-आते देश भर में लगभग 126 प्रसारण केन्द्र स्थापित हो गये। वर्तमान में लगभग 526 दूरदर्शन प्रसारण केन्द्र देश भर में स्थापित हो चुके हैं और लगभग 80% जनता इन प्रसारणों के सीमा क्षेत्र के अन्तर्गत आती है।
3) रंगीन टी०वी०
भारत में रंगीन टी०वी० का प्रादुर्भाव वर्ष 1982 को नवें एशियाई खेलों के दौरान हुआ। खेलों के सीधे व रंगीन प्रसारण के लिए 100 वाट के 20 ट्रांसमीटर विदेशों से आयात किए गए थे। अप्रैल 1982 में स्वदेश उपग्रह इनसेट-1 ए छोड़े जाने से सम्पूर्ण देश दूरदर्शन प्रसारण तकनीकि से जुड़ गया और प्रारम्भ में दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में दूरदर्शन पर राष्ट्रीय कार्यक्रमों का रंगीन प्रसारण एक साथ सम्भव हो सका । अक्टूबर 1983 में दूसरा भारतीय उपग्रह 1 बी के छोड़े जाने से दूरदर्शन प्रसारण और अधिक समृद्ध हुआ ।
4) दूरदर्शन प्रशासन
दूरदर्शन भी आकाशवाणी की भाँति सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आधीन है तथा इसका मुख्य कार्यालय दिल्ली में स्थित है। इसका प्रमुख अधिकारी महानिदेशक होता है। दूरदर्शन के समस्त प्रसारण केन्द्र तथा कार्यक्रम महानिदेशक के आधीन होते हैं।
5) दूरदर्शन से प्रसारित होनेवाले कार्यक्रम:-
टी.वी. प्रारंभ से ही ग्रामीण व विकासात्मक कार्यक्रमों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखलाता रहा है| इनका उद्देश्य शिक्षा, सामाजिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा, कृषि संबंधी जानकारी, पंचायत राज व्यवस्था, सहकारिता, विकास कार्यों की जानकारी आम दर्शकों तक पहुंचाता हैं| टी.वी. में प्रमुखत: तीन तरह के कार्यक्रमों का प्रसारण होता है –
1)
सूचना प्रदायक – समाचार, समाचार डायरी, कृषि समाचार आदि|
2)
शिक्षा प्रदायक - बच्चों, युवाओं, महिलाओं, कामगारों, उद्योग-धंधों से संबंध उद्यमियों के लिए कार्यक्रम, स्वास्थ्य विज्ञान संबंधी, स्कूल – महाविद्यालय विश्व विद्यालय के कार्यक्रम आदि|
3)
मनोरंजन संबंधी कार्यक्रम – फीचर फिल्मेआ, धारावाहिक, संगीत, नृत्य, नाटक, हास्य आदि|
6) कार्यक्रम प्रस्तुति के तत्व
प्रत्येक संचार माध्यम की अपनी एक भाषा और उस भाषा का व्याकरण होता है। दूरदर्शन समाचारों का लेखन एक चुनौती भरा कार्य है। यह साधारण समाचार लेखन कला से अलग है। प्रभु झींगरन के अनुसार 'यह लेखन रेडियो वाले उच्चारित शब्दों से अलग है। वृत्तान्तपरक है और दृश्यों और बिम्बों के साथ लेकर चलता है। टेलीविजन की भाषा में सिर्फ शब्द ही नहीं होते, बल्कि दृश्य, रंग, चेहरे और मौन तथा संगीत भी साथ-साथ होते हैं। अतः इन सारी चीजों के बीच एक तारतम्यता होना आवश्यक है। वस्तुतः टेलीविजन की भाषा में एक तरफ तो कैमरे की गति है और दूसरी ओर आकाशवाणी की तत्कालीनता। टेलीविजन की भाषा में आवश्यक नहीं कि सारी बातें कही जाएँ क्योंकि दृश्य भी बहुत कुछ कहते हैं।' (टेलीविजन की दुनिया पृष्ठ 217) वस्तुतः दृश्यात्मकता दूरदर्शन समाचारों का मेरुदण्ड है। अतः इस पर प्रसारित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने हेतु निम्न सावधानियाँ रखनी चाहिए ।
1. संवाद स्पष्ट और दृश्यानुकूल लिखे जाते है| समाचार अथवा समाचार आधारित कार्यक्रमों में शब्दों का प्रयोग चित्रों की अपेक्षा कम किया जाना चाहिए।
2. वाक्य छोटे, सरल और आकर्षक शैली में हों।
3. समाचार वाचन प्रभावी हो।
4. समाचार वाचक का उच्चारण स्पष्ट व त्रुटिहीन हो।
5. तथ्यों में क्रमबद्धता हो ।
6. समाचारों पर आधारित कार्यक्रमों में सम्बन्धित चित्र अवश्य दिखाए जाएँ।
7. समाचार प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति का चेहरा कम से कम दिखाई दे।
8. वाक्यों में क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग न किया जाए।
9. जन सामान्य में प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया जाए।
10. ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाए जो दृश्यों के बोलने के साथ उनके सहगामी बन सकें।
11 एक कुशल दूरदर्शन लेखक को यह ध्यान रखना होता है कि उसे कितने स्रोतों को साथ लेकर चलना है। यह स्रोता वीडीओ कैमरा, वीडीओ टेपरिकार्डिंग, फिल्म, स्थिर चित्र, रेखाचित्र, माइक्रोफोन, फोनोग्राफ तथा मीडिया टेपरिकार्डिंग होते हैं।कारण दूरदर्शन लेखन साहित्यिक लेखन की अपेक्षा अधिक तकनीकी है|
12) टी.वी. लेखक की स्क्रिप्ट तभी स्वीकृत होती है , जब उसमें दृश्यात्मकता के साथ – साथ लचीलापन हो|
7) भाषा व शैली
दूरदर्शन ने सर्वथा एक नई हिन्दी भाषा को जन्म दिया है। यह भाषा परम्परागत व्याकरण नियमों से मुक्त है। इसके अपने नियम और अपना व्याकरण है, जिसका स्वरूप क्षेत्रीय प्रसारण केन्द्रों के साथ-साथ बदलता रहता है। कुछ विद्वान इस भाषा को 'दूरदर्शनी- हिन्दी भाषा' या फिर 'वहिंगलिश' कहकर सम्बोधित करते हैं।
सामान्यतः दूरदर्शन की हिन्दी में अंग्रेजी व आंचलिक शब्दों का प्रयोग मिलता है। डॉ० कृष्ण कुमार रत्तू के अनुसार टेलीविजन ने हिन्दी की उस भाषा को जन्म दिया है जिसे आप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मिले जुले शब्दों वाली भाषा का नाम दे सकते हैं। यह उसी भाषा का सत्य है जो हम अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में अक्सर बातचीत में दोहराते हैं। " (दूरदर्शन हिन्दी के प्रयोजनमूलक विविध प्रयोग, पृष्ठ-320)डॉ० रत्तू का मानना है कि आम बोलचाल और कागजात की भाषा ही हिन्दी भाषा है. जो इन दिनों टेलीविजन स्क्रीन से प्रेषित हो रही है अथवा जिसका टेलीविजन द्वारा सम्प्रेषण हो रहा है। (वही पृष्ठ- 321)
हिन्दी के विद्वान डॉ० हरिमोहन, डॉ० कृष्ण कुमार इन स्वीकृतियों से पूरी तरह से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि "ये कटु सत्य है कि कुछ चैनलों घर (विशेष रूप से जी०टी०वी० पर) ऐसी आधूनिक खिचडी (जिसे हम 'हिंगलिश' या हिन्दी कह लें) परोसी जा रही है। एक विशेष नाटकीयता के साथ, जानबूझकर अंग्रेजी शब्द घुसेड़ कर बोली जा रही है। लेकिन कुछ चैनल बहुत अच्छी, जानी-पहचानी, लोक-स्वीकृत हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं और उनके कार्यक्रम उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने जी०टी०वी० के।" (रेडियो और दूरदर्शन पत्रकारिता पृष्ठ- 68)
अमेरिकी समाजशास्त्री 'रुथ' का कथन विचारणीय है, "हमें भाषा के प्रयोगों को छोडकर टेलीविजन पर उसी भाषा के कार्यक्रम देने चाहिए, जो जहाँ पर कार्यक्रम दिखाई दे रहे हैं, उस स्थान विशेष की भाषा हो, न कि वहाँ की मानक भाषा, क्योंकि मानक भाषा से देखने वाले को कुछ नहीं लेना-देना होता है। रेडियो ने शुरू से लेकर आज तक ऐसी भाषा ही अपनाई है। आज की सामाजिक प्रतिबद्धता में कथा चित्र का महत्व तभी आएगा, जब उसमें आदमी के आम बोल-चाल की भाषा का प्रवर्तनीय बिम्ब-विधान प्रयोजनमूलक प्रयोग स्थायी रूप से रहेगा।" (I Ruth, An objective Approach to The Relation between Fiction and Society -
American Sociologycal Review) प्रफु झींगरन के अनुसार "दरअसल दूरदर्शन की भाषा क्या हो इस बात को तय करने के पहले हमें ये देखना होगा कि दूरदर्शन दृश्य-प्रधान, चाक्षुष माध्यम है और इस माध्यम की कुछ अपनी जरूरतें हैं और दूरदर्शन में केवल समाचार ही नहीं दिये जाते बल्कि और भी अनेकों तरह के कार्यक्रम पेश किये जाते हैं। ऐसे में अगर कहीं समझौते करने भी पड़ें तो कोई हर्ज नहीं है। भाषा के प्रति बेहद सतर्क रहने का प्रभाव कार्यक्रम के कलेवर पर पड़ता है, ऐसा देखा गया है। बोल-चाल की भाषा में दूसरी भाषा के शब्द ले लेने में कोई हर्ज नहीं है। हाँ किसी भी भाषा के शब्द को प्रयत्नपूर्वक नहीं लिया जाना चाहिए। दूरदर्शन की भाषा को यों भी क्लिष्ट बनाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही अप्रचलित शब्दों को जबरदस्ती पिरोये जाने की।"
8) मूल्यांकन
दूरदर्शन का विस्तार भी तेजी से हुआ। कारण टी.वी. द्वारा हम घटनास्थल तक पहुंचते हैं तथा ‘आंखों पढी’ की जगह ‘आंखों देखी’ की बात अधिक विश्वास करते है| निरक्षरता के रोग से अभिशप्त भारत के लिए इस संचार माध्यम का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। कारण, वर्णमाला की अनभिज्ञता को दृश्य-श्रव्य का यह अभूतपूर्व संसाधन जनता की आँख और कान बन पृष्ठभूमि में डाल देता है। जो सेवाएँ भारतीय टेलीविजन प्रदान करता है उसमें दो बातें स्पष्ट हैं। पहला मनोरंजन तथा सूचना देने में निजी मालिकों को बढ़ावा देना तथा दूसरा स्कूल, कालेज, किसान तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना ।
आज रोशनी, रंग, ध्वनि, संगीत, चित्र, फोटोग्राफ तथा दूसरे लेखा-चित्र टेलीविजन के मुख्य अंग हैं, जिनके कारण टी०वी० एक उत्तेजक माध्यम बन गया है। इसका सबसे मुख्य आकर्षण है घटनाओं का सजीव आँखों देखा विवरण तथा त्वरित खबरों का प्रसारण। इन दो गुणों के कारण इसके दर्शकों की रुचि दूरदर्शन में बढ़ती जा रही है। अब तो टी०वी० सूचना, शिक्षा तथा मनोरंजन प्रदान करने का एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में स्थापित हो चुका है। इस संदर्भ में श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने कहा था, “हम दूरदर्शन का विस्तार न केवळ मनोरंजन के साधन के रूप में वरन विकास के लिए शिक्षा के साधन के रूप में करना चाहते हैं|...इसमें कोई संदेह नहीं यह पद्धति लोकतंत्र के लिए बहुत सहायक होगी| ग्रामों के आधुनिकीकरण में उसका योग निर्णायक हो सकता है| कृषकों के लिए देखना ही विश्वास करना है|”(जनसंचार और हिंदी पत्रकारिता – डॉ. अर्जुन तिवारी, पृ. 97)
भारतीय घरों में टेलीविजन का एक महत्वपूर्ण स्थान हो गया है। कुछ लोग इसे संचार का सबसे प्रभावी माध्यम समझते हैं जो प्रकृति के आश्चर्य को घरों तक पहुँचाता है। कुछ के लिए यह मात्र मनोरंजन का साधन है। योजना आयोग इसे सामाजिक चेतना तथा परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण हथियार मानते हैं तो कुछ अन्य समाज पर टी०वी० के कुप्रभाव से आशांकित है। टेलीविजन की दो बड़ी कमियाँ हैं। यह बहुत महँगा माध्यम है, दूसरे इसका पर्दा छोटा होने से दृश्य का विस्तृत विवरण उभर कर सामने नहीं आ पाता ।
बहुविकल्पी प्रश्न
1) दूरदर्शन दृकश्राव्य माध्यम है|
2) टेलीविजन शब्द की व्युत्पत्ति
की व्युत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘टेली’(दूरी)
और लैटिन के ‘विजन’
(देखना) पर से हुई है|
3) उन्नीसवीं शताब्दी की इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सबसे बडी देन टेलीविजन है|
4) दूरदर्शन का प्रयोग सर्वप्रथम 1884 में हुआ था।
5) सन 1926 में इंग्लैंड के जान लेगी बेचर्ड ने टेलीविजन की आविष्कार में सफलता प्राप्त की
है|
6) अमरिका के जेकिंस नीज ने टेलीविजन प्रसारण आरंभ किया| उसका स्टेशन wzxk वाशिंगटन था|
7) सबसे पहला दूरदर्शन कार्यक्रम 1927 में न्यूयार्क और वाशिंगटन के मध्य बेल टेलीफोन लेबोरेट्रीज द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
8) भारत ने सन् 1936 में UNESCO
ने कार्यक्रमों के प्रसारण के लिये दूरदर्शन की उपयोगिता पर बल दिया गया|
9) सन् 1976 में पहली बार दूरदर्शन को एक स्वतन्त्र संगठन के रूप में स्थापित किया गया
10)
1981 में रंगीन टी०वी० प्रसारण प्रारम्भ हुआ|
11)
भारत में रंगीन टी०वी० का प्रादुर्भाव वर्ष 1982 को नवें एशियाई खेलों के दौरान हुआ।
12)
दूरदर्शन का मुख्य कार्यालय दिल्ली में स्थित है|
13)
दूरदर्शन ने 'वहिंगलिश’
इस नई हिन्दी भाषा को जन्म दिया है।
14) ‘आंखों पढी’ की जगह ‘आंखों देखी’ की बात
दूरदर्शन
करता है|
Modul 2.0
इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों का परिचय
युनिट नं 2.3
डाक्यूमेंटरी
डाक्यूमेंटरी एक ऐसा रेकोर्ड या फिल्म होती है जो टी.वी. जैसे इलेक्ट्रोनिक माध्यम से प्रसारित की जाती है| अर्थात यह इलेक्ट्रोनिक माध्यम से प्रसारित होनेवाला एक कार्यक्रम है | परंतु यह एक ऐसा कार्यक्रम है, जो ज्ञानवर्धन के लिए बनाया जाता है| जिसे हिंदी में 'वृत्तचित्र' कहा जाता है| अत: इसकी जानकारी निम्न रूप में देख सकते है|
1) डाक्यूमेंटरी अर्थ :
‘डाक्यूमेंटरी’ शब्द की व्यत्पत्ति लैटीन शब्द 'डाक्यूमेंटम' से हुई है| जिसका अर्थ है 'दस्तावेज', या 'प्रमाणपत्र' या 'सबूत' और फ्रांस में इसे प्रारंभ में 'डाक्यूमेंटेयर' कहा जाता था, जिसका अर्थ यात्रा के रेकॉर्ड होता था| इसके विपरीत, ब्रिटेन में वृत्तचित्र साहित्य और वृत्तचित्र फिल्मों को व्यापक रूप से वृत्तचित्र रूप में संदर्भित किया जाता है, यह शब्द पहली वार वृत्तचित्र फिल्म निर्माता जॉन ग्रियर्सन द्वारा 1926 में प्रयोग किया गया था| यह सिध्दांत है कि 'डोसेरे' का 'दिखाना', सिखाना' हैं| और यही अंग्रेजी शब्द डाक्यूमेंटरी की व्युत्पत्ति बन गया है| रॉबर्ट फ्लेहर्टी (1884-1951), जिन्हें वृत्त पत्र का जनक माना जाता है, ने इसे 'वास्तविक दुनिया की खोज' और 'प्रकटीकरण' के लिए बनाई गई फिल्म' के रूप में परिभाषित किया| हालांकि 'वृत्तचित्र' शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं, लेकिन वे सभी इसके सार पर सहमत है, "वास्तविक दुनिया को यथावत रूप में रेकॉर्ड करना और संप्रेषित करना (वृत्तपत्र का अर्थ, महत्व, एव उत्पत्ति एव व्युत्पत्ति - रनजॉय द्वारा - 13 मार्च 2024 )
2) डाक्यूमेंटरी की परिभाषाएं :-
‘डाक्यूमेंटरी’ इस शब्द के अर्थ पर इसे विभिन्न रूप से परिभाषित कर सकते है, वह इस प्रकार-
1) एक वृत्तचित्र से तात्पर्य 'एक विषय और कथानक वाला रिकार्ड' है जिसे पाठ, तस्वीरें या वीडियो का उपयोग करके बनाया जाता है|
2) वृत्तचित्र एक प्रकार की दृश्य कला है जो वीडियो या अभिलेखीय सामग्री के माध्यम से वास्तविक घटनाओं और व्यक्तियों को यथार्थवादी रूप से प्रस्तुत करती है| मुख्य रूप से फिल्म, रेडियो और टेलीविजन में पाई जानेवाली यह शैली, नाटकों या उपन्यासों के विपरित, तथ्यों को उनके घटित होने के क्रम में प्रस्तुत करती है, जिसमें लगभग कोई काल्पनिक तत्व नहीं होते|
3) वृत्तचित्र को एक ऐसा दृश्य माध्यम कहा जा सकता है जो वस्तुनिष्ठ तथ्यों को प्रस्तुत करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक ऐसी विधा है जो विभिन्न दृष्टिकोणों से वास्तविक घटनाओं या व्यक्तियों को उजागर करती है और यथार्थवाद पर बल देती है। वृत्तचित्र केवल अभिलेखीय फुटेज का पुनर्निर्माण मात्र नहीं हैं; इनमें कलात्मक और सामाजिक दोनों पहलू शामिल होते हैं, और ये आंतरिक सत्यों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत करके वास्तविकता का पुनर्निर्माण भी करते हैं।
4) वेबस्टर शब्दकोश इसे "किसी घटना या सांस्कृतिक घटनाक्रम की वास्तविक उपस्थिति और मूल्य को कलात्मक रुप में दर्ज करना या चित्रित करना" के रूप में परिभाषित करता है| वृत्तचित्र अंग्रेजी शब्द 'डॉक्युमेंट्री' का हिंदी अनुवाद है। 'डॉक्युमेट' का अर्थ दस्तावेज या अनुबंध है। किसी भी प्रकार के समझौतो, फैसलो तथा घटनाओं आदि को सुरक्षित रखने और समय पर उनका उपयोग करने के लिए उन्हें लिपिबद्ध किए जाने का रिवाज बहुत प्राचीन है। लिपिबद्ध करने का उद्देश्य सच्चाई और वास्तविकता को उसके मूल रूप में सुरक्षित रखना ही होता। वृत्तचित्र का आधार भी 'सत्य' होता है। यह 'सत्य' विवादास्पद हो सकता है लेकिन किसी न किसी रूप में आलेखित (Recorded) होता है। फीचर फिल्म जहाँ एक ओर 'कल्पना' पर आधारित होती है वहीं वृत्तचित्र का 'दस्तावेज' पर आधारित होना आवश्यक है। किसी दस्तावेज में दर्ज किसी समस्या, घटना और व्यक्ति के जीवन पर बनाई जाने वाली फिल्मों को वृत्तचित्र कहते हैं। वृत्तचित्र में तथ्य की प्रमाणिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
5) ए. आर.फुल्टन:-
“एक वृत्तचित्र, न केवल जीवन के यथार्थ से ऊपर है बल्कि वह उसकी शुद्ध व्याख्या भी करता है| एक वृत्तचित्र उस समय तक कथात्मक चित्र की भान्ति ही है, जब तक वह मानव जीवन की व्याख्या करता है| यह उस समय यात्रा –सूचकांक के सदृश्य है, जब वह किसी स्थान विशेष का चित्रण करता है| वास्तव में वृत्तचित्र किसी विषय का एक समन्वित स्वरूप है| (मिडिया लेखन – सुमित मोहन,
वाणी प्रकाशन, सं.2007, पृ.92)
इस प्रकार के वृत्तचित्र केवल तथ्यों को नाटकीय रूप देने तक ही सीमित नहीं रहते; वे वास्तविकता का चित्रण और वर्णन करते हुए छिपे हुए सत्यों को उजागर करते हैं। इसके अलावा, वे केवल तथ्यों को प्रकट करने के बजाय सौंदर्यपरक तत्वों से भी परिपूर्ण होते हैं। इस दृष्टि से वृत्तचित्र को एक जीवंत कला रूप माना जा सकता है। वृत्तचित्रों में जीवंत दृश्यों और कहानियों को कैमरे में कैद करना आवश्यक होता है, साथ ही फिल्म निर्माता के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण और रचनात्मक व्याख्या को भी प्रतिबिंबित करना होता है। इसलिए, तथ्यों पर आधारित होने के बावजूद, वृत्तचित्र एक कलात्मक विधा है जो विभिन्न दृष्टिकोणों से आकर्षक प्रारूप प्रस्तुत करती है। डॉक्यूमेंट्री से तात्पर्य है कि ऐसी विवरण जो यथार्थ और सत्य पर आधारित हो। हमारे जीवन में इधर-उधर ऐसे जाने कितने प्रसंग हैं जो सत्य और यथार्थ पर आधारित हैं पर भ्रमवश या पर्याप्त ध्यान न दिए जाने के कारण लोग उन्हें उस रूप में नहीं जानते जिस रूप में जानना आवश्यक है। वृत्तचित्र निर्देशक जीवन के ऐसे ही किसी प्रसंग को अपना आधार बनाता है। अत: डॉक्यूमेंट्री एक ऐसी फिल्म है जिसका उद्देश्य सूचना देना या प्रशिक्षित करना है| यह ऐसी विधा है जो किसी सत्य घटना, तथ्य, सूचना, व्यक्तित्व और परिस्थिति पर आधारित होती है तथा जिसका उद्देश्य मनोरंजन की अपेक्षा शिक्षा और सूचना देना अधिक होता है| जब यह कार्य दृश्यों द्वारा किया जाता है तो वह प्रक्रिया टेलीविजन वृत्तचित्र कहलाती है|
3) डाक्यूमेंटरी का इतिहास - सेल्युलायड से वीडियो कैसेट तक
डाक्यूमेंट्री फिल्में असली जीवन और सच्ची घटनाओं पर आधारित होती हैं। इनकी शुरुआत लगभग 1920 के आसपास मानी जाती है। सन् 1922 राबर्ट जोसेफ फ्लेहर्टी ने एस्किमो लोगों के जीवन पर 'नाकूक ऑफ द नौर्थ' नाम की फिल्म बनाई। इसे दुनिया की पहली प्रमुख डाक्यूमेंट्री माना जाता है। आगे इसे आधार बनाकर ब्रिटेन के फिल्मकार हर्बर्ट ब्रूस ने पहले विश्वयुद्ध को फिल्म में उतारा। ब्रिटेन में जॉन ग्रियर्सन को डाक्यूमेंट्री फिल्मों का जनक कहा जाता है। उन्होंने 1929 में ‘Drifters’'ड्रिफ्टर' नाम की फिल्म बनाई, जो उत्तरी सागर के मछुआरों के जीवन पर आधारित थी। इसके बाद ब्रिटेन में डाक्यूमेंट्री फिल्मों का एक आंदोलन शुरू हो गया। इसी काल में रूस में झिगा वेर्तोव और अमेरिका में राबर्ट फ्लेहर्टी ने वृत्तचित्र परंपरा का शुभारंभ किया। वेर्तोव ने 'द मैन विथ द मूवी कैमरा' (1929) नामक चर्चित वृत्तचित्र बनाया। इससे पहले रूस में 1917 की क्रांति पर भी फिल्म बनाई थी लेकिन उस आरंभिक दौर की फिल्मों को सही अर्थों में वृत्तचित्र कहना कठिन है।
1930 से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक का समय डाक्यूमेंट्री फिल्मों का स्वर्णकाल माना जाता है। इस दौरान ब्रिटेन और अमेरिका में कई अच्छी डाक्यूमेंट्री बनीं, जैसे:
- Night Mail नाइट मेल- 'साग्स ऑफ सीलान लिसन टू ब्रिटेन(ब्रिटन)
- The River 'द रिवर'(अमरिका) 'व्हाइ वी फाइट और बिक्टरी ऐड सी
जैसे अनेक अच्छे वृत्तचित्रों का निर्माण हुआ। इस समय के कुछ प्रसिद्र वृत्तचित्रकारों नै जहाँ ब्रिलेन के बेसिल राइट और जॉन ग्रियर्सन के नाम लिए जा सकते हैं वहीं अमेरिका में पारे लारेंटज, राबर्ट पलाहाटी और दिलाई वोन डीक न कई वृत्तचित्र बनाए| 1940 से 1960 के बीच टेलीविजन का विकास तेजी से हुआ। इसके बाद डाक्यूमेंट्री फिल्मों को टीवी के लिए भी बनाया जाने लगा। अमेरिका के बड़े चैनल जैसे CBS, NBC और ABC ने डाक्यूमेंट्री कार्यक्रम दिखाने शुरू किए। इसी विकास के चलते हमें 'द एजेंट ऑफ मैन', 'द माइंड ऑफ मैन' जैसे प्रसिद्ध वृत्तचित्र देखने का अवसर मिला।1960 के आसपास तकनीक में सुधार हुआ। कैमरे हल्के और बेहतर हो गए, जिससे डाक्यूमेंट्री बनाना आसान हो गया। पहले ये फिल्में सेल्युलॉइड (फिल्म रील) पर बनती थीं, लेकिन बाद में वीडियो कैसेट और नई तकनीकों के आने से इन्हें बनाना और दिखाना और भी सरल हो गया।
4) भारत में वृत्तचित्र का विकास
भारत में शुरूआत में वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री फिल्में) सेल्युलॉइड फिल्म पर बनाई जाती थीं और इन्हें सिनेमाघरों में मुख्य फिल्म से पहले दिखाया जाता था। उस समय दर्शक वही लोग होते थे जो फिल्म देखने आते थे। आजादी से पहले ही भारत में फिल्म उद्योग काफी विकसित हो चुका था। उस समय दो तरह के फिल्म निर्माता होते थे:
1.
फीचर फिल्म बनाने वाले
2.
वृत्तचित्र बनाने वाले
आजादी के बाद भारत सरकार ने लोगों तक जानकारी पहुँचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। सरकार ने तय किया कि सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले वृत्तचित्र दिखाए जाएंगे। इसके लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म प्रभाग की स्थापना की गई।
इन वृत्तचित्रों में कई महत्वपूर्ण विषय दिखाए जाते थे, जैसे:
- देश का विकास
- नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेशी यात्राओं
- विदेशी मेहमानों का भारत आना
- युद्ध (चीन और पाकिस्तान के साथ)
- सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक घटनाएँ
इन्हें लोग आज भी याद करते है | इस दौर में दूरदर्शन का भी विकास हुआ और वहाँ भी ये वृत्तचित्र दिखाए जाने लगे।
समय के साथ:
- सेल्युलॉइड की जगह वीडियो फॉर्मेट का उपयोग होने लगा|
- टी.वी. और बाद में इंटरनेट व मोबाइल ने वृत्तचित्रों को नई पहचान दी|
- अब ये सिर्फ सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहे|
कुछ प्रसिद्ध वृत्तचित्र हैं:
- कबीर हद अनहद
- राम के नाम
- मुज़फ्फरनगर बाकी है
ये फिल्में समाज के संवेदनशील मुद्दों को सामने लाती हैं और कई बार विवाद भी पैदा करती हैं। बाद में दूरदर्शन में ही नहीं बल्कि फिल्म प्रभाग में भी ऐसे वृत्तचित्रों का निर्माण सत्युलायड के बजाय वीडियो फार्मेट में होने दागा और आज टलीविजन वृत्तचित्रों के अनेक निर्माता इन्ही फार्मटा पर काम कर रहे है क्योंकि यह सेल्यूलायड कीवृत्तचित्र को बनाने की प्रक्रिया को लेकर काफी बहस मुबाहिसा होता रहा है।
5) वृत्तचित्र बनाने के तरीके:- वृत्तचित्र बनाने के दो मुख्य तरीके होते हैं:
1.
पहले लिखना (स्क्रिप्ट बनाना)
o
जैसे फिल्मों में होता है
o
पहले कहानी/योजना तैयार की जाती है, फिर शूटिंग होती है
2.
पहले शूट करना, फिर लिखना
o
पहले वास्तविक घटनाएँ रिकॉर्ड की जाती हैं
o
बाद में उस पर टिप्पणी (कमेंट्री) लिखी जाती है
दोनों तरीकों का उपयोग आज भी किया जाता है।
6) वृत्तचित्र का स्वरूप
इस बात पर व्यवस्थित विचार करने से पहले यह जानना ठीक होगा कि वृत्तचित्र क्या किसी बंधी बंधाई फिल्म प्रविधिका नाम है या कि इसका रूप खासा निर्वाध और बहुत सारी संभावनाओं वाला है। अगर हम फीचर फिल्म या कथात्मक फिल्मों से वृत्तचित्र की तुलना करें तो यह बात स्पष्ट होने में देर नहीं लगेगी कि वृत्तचित्र में प्रयोगों और प्रविधियों की अपार संभावनाएँ हैं। वृत्तचित्र एक मिनट का भी हो सकता है और सौ मिनट का भी। उसे कोई अपनी निजी अभिव्यक्ति का माध्यम बना सकता है और इस तरह ऐसे फिल्म का निर्माता, निर्देशक और परिकल्पक एक ही व्यक्ति हो सकता है। हो सकता है कि जिसे कैमरा का उपयोग करना आता हो, वही एक दिन एक-दो लोगों के साथ एक वृत्तचित्र बनाने के लिए निकल पड़े। इसका मतलब यह होता है कि कई वृत्तचित्र कथात्मक फिल्मों के लम्बे-चौडे प्रबंधन, तामझाम, सेटअप की दरकार नहीं रखते। वृत्तचित्र में इस तरह फिल्मकार के निजत्व की गहरी छाप दिख सकती है। लेकिन यह हमेशा हो, ऐसा नहीं है। कई फिल्मों को बनवाने वाले कुछ निर्माता, प्रायोजक, औद्योगिक घराने और सरकारी मंत्रालय भी हो सकते हैं। इस तरह बने वृत्तचित्रों में निर्वैयक्तिकता का पुट स्वाभविक और जरूरी दोनों होता है। कहने का मतलब केवल यह है कि वृत्तचित्र के विविध आयाम हैं।
7) वृत्तचित्र लेखन
पर वृत्तचित्र लेखन में कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना पडता हैं| लेखक को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना पडता है-
1) विषय का निर्धारण:-
सर्वप्रथम वृत्त चित्र के विषय का निर्धारण आवश्यक हैं| इसके बाद वृत्तचित्र के उद्देश्य पर विचार किया जा सकता है| उद्देश्य का निर्धारण दर्शक वर्ग पर आधारित होता है| इसके बाद अवधि पर विचार किया जाता है| इसमें सभी निर्णय लेने के लिए लेखक स्वतंत्र नहीं होता| अपितु निर्माता की आर्थिक स्थिति तथा प्रस्तुत कर्ता विषय- विशेषज्ञ से मिलकर किया गया विचार-विमर्श में विषय प्रस्तुति का निर्धारण होता हैं कि प्रस्तुति वृत्तचित्रात्मक शैली में होगी या कमेंट्री शैली में या दृश्यात्मक शैली में| कभी-कभी विशेष विषय या स्थान को लक्ष्य बनाकर कैमेरा टीम भेज दी जाती है और जब दृश्य बधीकरण करके स्टूडियो आ जाता है तो उसे देखकर आवश्यकतानुसार लेखन किया जाता है और फिर एकत्रित दृश्यों को क्रमबद्ध कर प्रस्तुत करने योग्य बनाया जाता है|
2) वृत्त चित्र का अनिवार्य तत्व :-
वृत्तचित्र में सत्यता का तत्व अनिवार्य होता है| जब तथ्यों की सत्यता की पुष्टि हो जाती है, तब ही उन्हें आलेख के रूप में प्रस्तुत किया जाता है| वृत्तचित्र लेखक को दूरदर्शन प्रणाली का ज्ञान होना चाहिए| क्लोज-अप, बिग क्लोज- अप, मिड शॉट, क्लासरूम शॉट, अभिनेता के कार्यव्यापार, व्यवहार आदि का संकेत करना पडता हैं| ध्वनि व्यवस्थापक की भूमिका शूटिंग के समय और शूटिंग के दृश्यों का उल्लेख करना पडता हैं|
3) वृत्तचित्र की भाषा: –
वृत्तचित्र की भाषा ‘गागर में सागर’ भरनेवाली होती है| दूरदर्शन में दृश्य का अधिक महत्व है शब्द का कम| अत: शब्द दृश्य के सहवर्ती होने चाहिए| दृश्य और शब्द के बीच सामंजस्य आवश्यक हैं|
8) वृत्तचित्र बनाने की पद्धतियां या प्रविधियां :-वृत्तचित्र बनाने की दो पद्धतियां है-
1) एक वॉयस ओवर के माध्यम से बनाई जाती है |2) वॉयस ओवर बाईट |
पहली पद्धति में दृश्य दिखाते हुए पीछे से कमेंट्री सुनाई जाती है और दूसरी में कमेंट्री के साथ लोगों को बोलते हुए दिखाया जाता है| वॉयस ओवर के माध्यम से बनाए जानेवाले वृत्तचित्र विषयगत होते हैं| इसमें समस्या कथन से लेकर समस्या का हल भी किया जाता है| इस तकनीक में पहले शूटिंग की जाती है और फिर रूपरेखा बनाकर ‘डोप शीट’ (कागज) ;लेखक को अवधि के अनुसार लिखने को दे दी जाती है| दूसरी पद्धति में लेखक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| लेखक विषय के अनुसार पटकथा लेखन करता है| और फिर उसका दृश्यांकन किया जाता है| यहां लेखक की कल्पना के अनुसार निर्देशक भी कल्पनाशील होना चाहिये तभी सफल वृत्तचित्र का निर्माण हो सकेगा|
इसके अतिरिक्त वृत्तचित्र बनाने की अन्य भी प्रविधियां होती है वह इसप्रकार:- वृत्तचित्र बनाने के कई तरी होते है|
कमेंट्री (वर्णन) के जरिए दृश्य समझाए जाते थे, लेकिन अब इसमें कई नई तकनीकों का उपयोग होने लगा है।
1. कमेंट्री आधारित प्रविधि:-
- इसमें दृश्य के साथ आवाज़ (Narration) होती है|
- दर्शकों को समझाने के लिए जानकारी दी जाती है|
- पहले यही सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती थी|
2. इंटरव्यू (Interview)
- इसमें लोगों से बातचीत दिखाई जाती है|
- यह टॉक शो जैसी शैली होती है|
- इससे विषय की सच्चाई और अनुभव सामने आते हैं|
3. सूत्रधार / एंकर (Presenter)
- एक व्यक्ति पूरे वृत्तचित्र को जोड़कर आगे बढ़ाता है|
- पुराने नाटकों में इसे सूत्रधार कहा जाता था|
- आज इसे एंकर भी कहा जाता है|
4. गीत और संगीत का प्रयोग
भावनाओं को मजबूत बनाने के लिए म्यूजिक और गाने जोड़े जाते हैं|
- इससे प्रभाव बढ़ता है |
5. दस्तावेज़ और समाचार तत्व
- असली फोटो, वीडियो, रिकॉर्ड और दस्तावेज़ दिखाए जाते हैं|
- इसमें समाचार (News) जैसी सच्चाई और प्रमाणिकता होती है|
6. मिश्रित (Synthetic) शैली
- वृत्तचित्र एक मिश्रित कला (Synthetic Medium) है|
- इसमें ऊपर बताई गई कई तकनीकों का एक साथ उपयोग किया जा सकता है|
इसीकारण फिल्मकारों की अलग-अलग शैलियां होती हैं| कुछ उदाहरण इस प्रकार
1) आनंद पटवर्धन:-
- इंटरव्यू, वास्तविक घटनाएँ, फुटेज आदि का मिश्रण करते हैं|
- उनकी फिल्म राम के नाम इसका उदाहरण है|
- समाज और राजनीति के मुद्दों को दिखाते हैं|
2) मणि कौल
- कम शब्द, धीमी गति और गहरे दृश्य (Visuals) का उपयोग
- उनकी शैली शांत, स्थिर और कलात्मक होती है|
9) महत्वपूर्ण बात
- हर वृत्तचित्र की शैली उसके विषय और उद्देश्य पर निर्भर करती है|
- कुछ पहले स्क्रिप्ट लिखकर बनते हैं, कुछ शूट के बाद तैयार होते हैं|
- इसलिए लेखन पहले या बाद में होगा| यह वृत्तचित्र की प्रकृति पर निर्भर करता है|
10) टेलीविजन वृत्तचित्र के प्रकार:-
टेलीविजन वृत्तचित्र कई प्रकार के होते हैं| प्रकृति, इतिहास, संस्कृति, यात्रा वृत्तांत या पर्यटन, विज्ञान जैसे अनेक विषयों पर वृत्तचित्र बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा किसी विषय विशेष की सूचना देने के लिए, शैक्षिक उद्देश्य से, प्रशिक्षण के लिए, व्यापार बढाने के लिए, प्रचार के लिए भी वृत्तचित्रों का निर्माण किया जाता है। समाचार की दुनिया में मुख्यतः दो कारणों से समाचार वृत्तचित्र बनाए जाते हैं। पहला कारण तो यह है कि यदि समाज में टेलीविजन की पहुँच अधिक नहीं है तो समाचार वृत्तचित्र सामुदायिक केंद्रों या सिनेमाघरों में दिखलाए जा सकते हैं। दूसरा कारण यह है कि समाचार बुलेटिन अनेक प्रकार के समाचार लिए होता है और यदि आप किसी एक समाचार का विस्तृत विश्लेषण करना चाहते हैं तो ऐसा करने के लिए उसमे पर्याप्त जगह नहीं होती। इसीलिए कुछ ऐसी घटनाएँ होती है जिनके साथ न्याय करने के लिए समाचार फीचर भी नाकाफी दिखलाई पडते हैं और केवल वृत्तचित्र ही उपयुक्त लगता है। विषयवस्तु और उसके स्वरूप की भिन्नता के कारण वृत्तचित्र को कुछ कोटियों में बाँटा जा सकता है। विषयवस्तु के अनुसार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा अन्य विषय सापेक्ष वृत्तचित्रों के अनुसार प्रकारों का निर्धारण किया जा सकता है। प्रायः निम्न विषयों पर ही वृत्तचित्र अधिक बनाए जाते हैं।
·
1. सागाजिक समस्याएँ
·
2. मनोरंजन / खेलकूद
·
३. विज्ञान
·
4. प्रकृति
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5. इतिहास
11) निष्कर्ष:- वृत्तचित्र एक लचीला और रचनात्मक माध्यम है, जिसमें कई तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
इसीलिए हर फिल्मकार अपनी सोच और विषय के अनुसार अलग शैली अपनाता है।
बहुविकल्पी प्रश्न
1) डाक्यूमेंटरी एक ऐसा रेकोर्ड या फिल्म होती है जो टी.वी. जैसे इलेक्ट्रोनिक माध्यम से प्रसारित की जाती है|
2) ‘डाक्यूमेंटरी’ शब्द की व्यत्पत्ति लैटीन शब्द 'डाक्यूमेंटम' से हुई है| जिसका अर्थ है 'दस्तावेज', या 'प्रमाणपत्र' या 'सबूत'|
3) वृत्तचित्र एक प्रकार की दृश्य कला है जो वीडियो या अभिलेखीय सामग्री के माध्यम से वास्तविक घटनाओं और व्यक्तियों को यथार्थवादी रूप से प्रस्तुत करती है|
4) ‘डाक्यूमेंटरी’ सूचना और शिक्षा के
लिए उपयोगी होती है|
5) फ्रांस में इसे प्रारंभ में ‘डाक्यूमेंटरी’ को 'डाक्यूमेंटेयर' कहा जाता था|
6) 'डाक्यूमेंटेयर' का अर्थ यात्रा के रेकॉर्ड होता था|
7) हिंदी में ‘डाक्यूमेंटरी’ को 'वृत्तचित्र' कहा जाता है|
8) ‘डाक्यूमेंटरी’ इस शब्द का प्रयोग पहली वार वृत्तचित्र फिल्म निर्माता जॉन ग्रियर्सन द्वारा 1926 में किया गया था|
9) रॉबर्ट फ्लेहर्टी (1884-1951), जिन्हें वृत्त पत्र का जनक माना जाता है|
10) "वास्तविक दुनिया को यथावत रूप में रेकॉर्ड करना और संप्रेषित करना’ ‘डाक्यूमेंटरी’ कहलाता है|
11) वृत्तचित्र अंग्रेजी शब्द 'डॉक्युमेंट्री' का हिंदी अनुवाद है।
12) 'डॉक्युमेंट' का अर्थ दस्तावेज या अनुबंध है।
13) ‘डाक्यूमेंटरी’ का
उद्देश्य वास्तविक जीवन को
प्रस्तुत करना है|
14) डॉक्यूमेंट्री से तात्पर्य है कि ऐसी विवरण जो यथार्थ और सत्य पर आधारित हो।
15) ‘डाक्यूमेंटरी’ शुरुआत लगभग 1920 के आसपास मानी जाती है।
16) सन् 1922 राबर्ट जोसेफ फ्लेहर्टी ने एस्किमो लोगों के जीवन पर 'नाकूक ऑफ द नौर्थ' नाम की फिल्म बनाई।
17) 'नाकूक ऑफ द नौर्थ' दुनिया की पहली प्रमुख डाक्यूमेंट्री माना जाता है।
18) ब्रिटेन के फिल्मकार हर्बर्ट ब्रूस ने पहले विश्वयुद्ध को फिल्म में उतारा।
19) ब्रिटेन में जॉन ग्रियर्सन को डाक्यूमेंट्री फिल्मों का जनक कहा जाता है।
20) जॉन ग्रियर्सन ने 1929 में ‘Drifters’'ड्रिफ्टर' नाम की फिल्म बनाई, जो उत्तरी सागर के मछुआरों के जीवन पर आधारित थी।
21) वेर्तोव ने 'द मैन विथ द मूवी कैमरा' (1929) नामक चर्चित वृत्तचित्र बनाया।
22) भारत में शुरूआत में वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री फिल्में)
सेल्युलॉइड फिल्म पर बनाई जाती थीं|
23) वृत्तचित्र बनाने के दो मुख्य तरीके होते हैं|
24) वृत्तचित्र में सत्यता का तत्व अनिवार्य होता है|
25) वॉयस ओवर के माध्यम से बनाए जानेवाले वृत्तचित्र विषयगत होते हैं|
26) दृश्य दिखाते हुए पीछे से कमेंट्री सुनाई जाती है, उसे वॉयस ओवर पद्धति कहते है|
27) कमेंट्री के साथ लोगों को बोलते हुए दिखाया जाता है, वॉयस ओवर बाईट पद्धति कहते है|
28) वृत्तचित्र की शैली उसके
विषय और
उद्देश्य पर निर्भर करती है|
Modul 3.0
कहानियां
युनिट नं 3.1
पूस की रात - प्रेमचंद
(मूल कहानी )
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे।
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली—तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे। अभी नहीं।
हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा। बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप आ गया और ख़ुशामद करके बोला—ला दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूँगा।
मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आँखें तरेरती हुई बोली—कर चुके दूसरा उपाय! ज़रा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल? न जाने कितनी बाक़ी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूँ, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाक़ी दे दो, चलो छुट्टी हुई। बाक़ी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज आए। मैं रुपए न दूँगी, न दूँगी।
हल्कू उदास होकर बोला—तो क्या गाली खाऊँ?
मुन्नी ने तड़पकर कहा—गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?
मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गईं। हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भाँति उसे घूर रहा था।
उसने जाकर आले पर से रुपए निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली— तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस।
हल्कू ने रुपए लिए और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो। उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपए कम्मल के लिए जमा किए थे। वह आज निकले जा रहे थे। एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था।
2
पूस की अँधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी।
हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा—क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहाँ क्या लेने आए थे? अब खाओ ठंड, मैं क्या करूँ? जानते थे, मै यहाँ हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूँ, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आए। अब रोओ नानी के नाम को।
जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया। उसकी श्वान-बुद्धि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूँ-कूँ से नींद नहीं आ रही है।
हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा—कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे। यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बर्फ़ लिए आ रही है। उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका। यह खेती का मज़ा है! और एक-एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाए तो गर्मी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ़-कम्मल। मज़ाल है, जाड़े का गुज़र हो जाए। तकदीर की ख़ूबी! मजूरी हम करें, मज़ा दूसरे लूटें!
हल्कू उठा, गड्ढ़े में से ज़रा-सी आग निकालकर चिलम भरी। जबरा भी उठ बैठा।
हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा—पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, ज़रा मन बदल जाता है।
जबरा ने उसके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई आँखों से देखा।
हल्कू—आज और जाड़ा खा ले। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा। उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा।
जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी।
चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कंपन होने लगा। कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसकी छाती को दबाए हुए था।
जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद में चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था। जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता। वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुँचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था।
सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई। इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी। वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा। हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया। हार में चारों तरफ़ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता। कर्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था।
3
एक घंटा और गुज़र गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई। ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाक़ी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जायँगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात है।
हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग़ था। पतझड़ शुरु हो गई थी। बाग़ में पत्तियों को ढेर लगा हुआ था। हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियाँ बटोरूँ और उन्हें जलाकर ख़ूब तापूँ। रात को कोई मुझे पत्तियाँ बटोरते देख तो समझे कोई भूत है। कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता।
उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिए बग़ीचे की तरफ़ चला। जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा।
हल्कू ने कहा—अब तो नहीं रहा जाता जबरू। चलो बग़ीचे में पत्तियाँ बटोरकर तापें। टाँठे हो जायेंगे, तो फिर आकर सोएँगें। अभी तो बहुत रात है।
जबरा ने कूँ-कूँ करके सहमति प्रकट की और आगे-आगे बग़ीचे की ओर चला।
बग़ीचे में ख़ूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था। वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं।
एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया।
हल्कू ने कहा—कैसी अच्छी महक आई जबरू! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही है?
जबरा को कहीं ज़मीन पर एक हड्डी पड़ी मिल गई थी। उसे चिंचोड़ रहा था।
हल्कू ने आग ज़मीन पर रख दी और पत्तियाँ बटोरने लगा। ज़रा देर में पत्तियों का ढेर लग गया। हाथ ठिठुरे जाते थे। नंगे पाँव गले जाते थे। और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा।
थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी। उस अस्थिर प्रकाश में बग़ीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों अंधकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था।
हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पाँव फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आए सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था।
उसने जबरा से कहा—क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है?
जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा—अब क्या ठंड लगती ही रहेगी?
'पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खाते।'
जब्बर ने पूँछ हिलाई।
'अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें। देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूँगा।'
जब्बर ने उस अग्निराशि की ओर कातर नेत्रों से देखा!
मुन्नी से कल न कह देना, नहीं तो लड़ाई करेगी।
यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ़ निकल गया। पैरों में ज़रा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी। जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ।
हल्कू ने कहा—चलो-चलो इसकी सही नहीं! ऊपर से कूदकर आओ। वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया।
4
पत्तियाँ जल चुकी थीं। बग़ीचे में फिर अँधेरा छा गया था। राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाक़ी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर ज़रा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर आँखें बंद कर लेती थी!
हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा। उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था।
जबरा ज़ोर से भूँककर खेत की ओर भागा। हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुंड था। उनके कूदने-दौड़ने की आवाज़ें साफ़ कान में आ रही थी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं। उनके चबाने की आवाज़ चर-चर सुनाई देने लगी।
उसने दिल में कहा- नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहाँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!
उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई—जबरा, जबरा।
जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया।
फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।
उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई—लिहो-लिहो!लिहो!!
जबरा फिर भूँक उठा। जानवर खेत चर रहे थे। फसल तैयार है। कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते हैं।
हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन क़दम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा।
जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था। अकर्मण्यता ने रस्सियों की भाँति उसे चारों तरफ़ से जकड़ रखा था।
उसी राख के पास गर्म ज़मीन पर वह चादर ओढ़ कर सो गया।
सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ़ धूप फैल गई थी और मुन्नी कह रही थी—क्या आज सोते ही रहोगे? तुम यहाँ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया।
हल्कू ने उठकर कहा—क्या तू खेत से होकर आ रही है?
मुन्नी बोली—हाँ, सारे खेत का सत्यानाश हो गया। भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहाँ मड़ैया डालने से क्या हुआ?
हल्कू ने बहाना किया—मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी है। पेट में ऐसा दरद हुआ कि मैं ही जानता हूँ!
दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आए। देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों।
दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।
मुन्नी ने चिंतित होकर कहा—अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा—रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।
कहानी के प्रश्न :-
1) ‘पूस की रात’ कहानी की कथावस्तु लिखिए|
2) ‘पूस की रात’ कहानी पर आधारित ह्ल्कू का चरित्र चित्रण कीजिए|
3) पूस की रात कहानी पर आधारित किसान की समस्या को स्पष्ट कीजिए|
4) ‘पूस की रात’ कहानी पर आधारित मुन्नी का चरित्र चित्रण कीजिए|
उत्तर
कहानी के पात्र
(हल्कू (पति), मुन्नी (पत्नी),
सहना (साहुकार), जबरा(कुत्ता))
‘पूस की रात’ प्रेमचंद लिखित कहानी हैं| जो चार अंको में लिखी है| जिसमें लेखक ने किसान की दयनीय अवस्था को चित्रित किया है| मेहनत वह करता है, परंतु वह अपने फसल का मालिक बन नहीं पाता| कारण आजीवन वह साहुकार का कर्जा चुकाने के लिए संघर्ष करता है| वह समय पर कर्जा इसीलिये नहीं चुका पाता कारण उसे अनेक प्राकृतिक समस्याओं का सामना करना पडता है| वह हिम्मत नहीं हारता परंतु परिस्थिति के सामने कभी-कभी वह हार जाता है, ऐसे किसान की व्यथा इस कहानी में है| वह इसप्रकार-
पहले अंक का प्रारंभ सहना साहुकार से हुआ है| जो पैसे मांगने के लिए हल्कू के घर पहुंचा है| उस वक्त उसके पास केवल तीन रुपये है| जो उसने कंबल लेने के लिए रखे थे| परंतु साहुकार को वह रुपये देकर कुछ समय के लिए उससे पीछा छुडवाना चाहता है| इसीलिये वह पत्नी मुन्नी को तीन रुपये मांगता है| परंतु पत्नी को अपने पति की चिंता है| अभी पूस यानी पौष का महिना आया है| यह गहरी ठंडी का महिना होता है| वह कहती है, माघ-पूस की रात हार(खेत की मेड या चौकी) में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे। अभी नहीं।
परंतु हल्कू जाडों में मरने के लिए तैयार हैं, अपने सिर से सहना नामक पीडा वह छुडाना चाहता है| इसीलिये अपने पत्नी के पास आकर कहता है कंबल के लिए कोई दूसरा मार्ग देखेंगे| ला दे दे वह तीन रुपये| पत्नी कहती कौन-सा दूसरा मार्ग है बताओं? कंबल कोई खैरात में नहीं देगा| न जाने कितने रुपये बाकी है, चूक ही नहीं रहे| जैसे लग रहा है बाकी चुकाने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है| हल्कू मानता नहीं तब उसके हाथ में पैसे देते हुये वह कहती है तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस|” हल्कू को समझ रहा है परंतु वह सहना के गालियों से डरता है| इसीलिये यह पैसे देते वक्त उसे जैसे अपना हृद्य निकालकर दे रहा है ऐसा लग रहा था| जो पैसे उसने थोडे-थोडे करके कंबल लेने के लिए जमा किए थे|
दूसरे अंक हल्कू अपनी खेती की रक्षा के लिए खेत में गया है| पूस की अँधेरी रात है| आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी। हल्कू कुत्ते पर क्रोधित होता है क्या आया यहां ठंड में मरने के लिए| कुत्ते ने जैसे मालिक के मन की बात भांप ली और एक जांभई देकर सो गया है| वह जबरा को कहता है, कल मत आना| उसे तो नींद नहीं आ रही थी| ठंड को भगाने के लिए वह आठ चिलम पी चुका था| वह निश्चय करके सोने का प्रयास करता है, परंतु पर जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसकी छाती को दबाए हुए था। वह उसे भी गाली देता है| यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बर्फ़ लिए आ रही है। इतने जबरा को किसी प्राणी के आने की आहट होती है, वह भौंकने लगता है|
तीसरे अंक में ह्ल्कू की स्थिति और भी बुरी है| वह ठंड को भगाने का प्रयास करता है, परंतु ठंड जाने का नाम ही नहीं ले रही थी| उसे ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है। परंतु रात अभी बाकी है, कारण सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जायँगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात है। अब उसे ठंड सही नहीं जा रही थी| वह पास के आम के बाग में जाकर पत्ते इकट्टा करके लेकर आता है| तब जबरा भी उसके साथ होता है| थोड़ी देर में अलाव (आग का ढेर) जल उठा। हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पाँव फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आए सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था। वह सुकून महसूस कर रहा था| सोचा है पहले क्यों यह उपाय नहीं सूझा|
चौथे अंक में वे दोनों उस आग के पास ही बैठे थे| अब आग बुझ चुकी थी| पर उसे बदन में गर्मी आ गयी थी| जबरा ज़ोर से भूँककर खेत की ओर भागा। हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुंड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुंड था। उनके कूदने-दौड़ने की आवाज़ें साफ़ कान में आ रही थी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं। उनके चबाने की आवाज़ चर-चर सुनाई देने लगी। पर उसे विश्वास था जबरा के होते कुछ नहीं होगा| परंतु फिर से खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दंदाया हुआ था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला। कुत्ते की आवाज निकाली| वह कैसे जानवर होते है इतनी अच्छी खेती को नष्ट करते है| वह इरादा करके उठता है, परंतु दो –तीन कदम चलता ही है कि जोर से ठंडी हवा का झोका आता है, जिसकी चुभन वह सहन नहीं कर सका| वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा।जबर अपना कर्तव्य निभा रहा था| परंतु हल्कू उसी राख के पास गर्म ज़मीन पर वह चादर ओढ़ कर सो गया। नीलगायें खेत का सफाया कर गयी | सुबह उसकी नींद भी नहीं खुली| पत्नी ने उसे जगाया| तुम यहां सोते रहे वहां सारा खेत का सत्यानाश हो गया है| क्या फायदा तुम्हारे इस मैदैया? ह्ल्कू कहता है तुम्हे क्या रात में मेरे पेट में ऐसा दर्द उठा मैं ही जानता हूं| दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आए। देखा,सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों। दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।मुन्नी ने चिंतित होकर कहा—अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी। हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा—रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।
इस प्रकार इस कहानी में ह्ल्कू नाम के किसान की व्यथा को चित्रित किया है| ठंड में भी उसे बिना कंबल क खेती की रखवाली करनी पडती है कारण उसके पास कंबल तक नहीं| खरीदना चाहता है पर सावकार के कर्जे से मुक्ति ही नहीं मिल रही| इसीलिये जब निलगाये उसके खेत क नष्ट करती है तब उसे दुख नहीं होता कारण वह सोचता है कम से कम इस व्यस्था से तो मुक्ति मिल जायेगी|
बहुविकल्पी प्रश्न
1) ‘पूस की रात’ कहानी के लेखक प्रेमचंद
है|
2) ‘पूस की रात’ कहानी का नायक ह्ल्कू
है|
3) ह्ल्कू कि पत्नी का नाम मुन्नी
है|
4) ‘पूस की रात’ चार
अंकों में लिखी गयी कहानी है|
5) ‘पूस की रात’ कहानी में लेखक ने किसान की दयनीय अवस्था को चित्रित किया है|
6) ‘पूस की रात’ कहानी में ह्ल्कू ने सहना
साहुकार से कर्जा लिया है|
7) ह्ल्कू के पास तीन रुपये है, जिसे मुन्नी ने कम्बल लेने
के लिए संभालकर रखा था|
8) ह्ल्कू पूस की रात में खेत पर पहरा देने के लिए जाता है|
9)ह्ल्कू के उसका कुत्ता
खेत पर जाता है|
10) ह्ल्कू के कुत्ते का नाम जबरा
है|
11) रात अभी बाकी है, कारण सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े।
12)
ह्ल्कू के खेत का सफाया नीलगायें कर गयी |
13) खेत नष्ट होने के बाद भी ह्ल्कू प्रसन्न
महसूस कर रहा था|
14) ह्ल्कू की प्रसन्नता का कारण था कि अब पूस कि रात खेत में नहीं सोना पडेगा|
15) ह्ल्कू सहना साहुकार से छुटकारा पाना चाहता
था|
Modul 3.0
कहानियां
युनिट नं
3.1
पाज़ेब - जैनेंद्र कुमार
(मूल कहानी
)
बाज़ार में एक नई तरह की पाज़ेब चली है। पैरोंड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियाँ आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाज़ेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं। पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाज़ेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।
हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाज़ेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाज़ेब पहनेगी।
मैंने कहा,कैसी पाज़ेब?
बोली,वही जैसी रुकमन पहनती है,जैसी शीला पहनती है।
मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।
बोली, मैं तो आज ही मँगा लूँगी।
मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।
उस वक़्त तो ख़ैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी। बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाज़ेब अबके इतवार को ज़रूर लेती आऊँगी।
इतवार को बुआ आई और पाज़ेब ले आई। मुन्नी पहनकर ख़ुशी के मारे यहाँ-से-वहाँ ठुमकती फिरी। रुकमन के पास गई और कहा-देख रुकमन, मेरी पाज़ेब। शीला को भी अपनी पाज़ेब दिखाई। सबने पाज़ेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ़ की। सचमुच वह चाँदी कि सफेद दो-तीन लड़ियाँ-सी टखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची की ख़ुशी का ठिकाना न था। और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े ख़ुश हुए। वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी को पाज़ेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए। मुन्नी की पाज़ेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था। वह ख़ूब हँसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाज़ेब दी, सो हम भी बाईसाइकिल लेंगे। बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएँगे।
आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे।
बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं। और लड़कियाँ रोती हैं।’
कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?
आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल जरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज बुआ ने कहा कि हाँ, यह बात पक्की रही, जन्म दिन पर तुमको बाईसाइकिल मिलेगी। इस तरह वह इतवार का दिन हँसी-ख़ुशी पूरा हुआ। शाम होने पर बच्चों की बुआ चली गई। पाज़ेब का शौक घड़ीभर का था। वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई; जिससे कहीं खो न जाए। पाज़ेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे।
श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूँ?
मैंने कहा कि क्यों न बनवाओं! तुम कौन चार बरस की नहीं हो?
ख़ैर, यह हुआ। पर मैं रात को अपनी मेज़ पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाज़ेब तो नहीं देखी?
मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?
बोली कि देखो, यहाँ मेज़-वेज़ पर तो नहीं है? एक तो है पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है। जाने कहाँ गई?
मैंने कहा कि जाएगी कहाँ? यहीं-कहीं देख लो। मिल जाएगी।
उन्होंने मेरे मेज़ के काग़ज़ उठाने- धरने शुरू किए और आलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया।
मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहाँ वह कहाँ से आएगी?
जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहाँ है?
मैंने कहा तुम्हीं ने तो रखी थी। कहाँ रखी थी?
बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह सँभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है।
मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी। एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फ़र्श पर छूट गई होगी। देखो, मिल जाएगी। कहीं जा नहीं सकती।
इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो। ख़ुद लापरवाह हो,दोष उल्टे मुझे देते हो। कह तो रही हूँ कि मैंने दोनों सँभालकर रखी थीं।
मैंने कहा कि सँभालकर रखी थीं,तो फिर यहाँ-वहाँ क्यों देख रही थी? जहाँ रखी थीं वहीं से ले लो न। वहाँ नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।
श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख़्याल हो रहा है। हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो। मैंने रखी, तब वह वहाँ मौजूद था।
मैंने कहा, तो उससे पूछा?
बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है।
मैंने कहा, तो फिर?
श्रीमती जोर से बोली, तो फिर मैं क्या बताऊँ? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नही। डाँटकर कहते क्यों नहीं हो, उसे बंसी को बुलाकर? जरूर पाज़ेब उसी ने ली है।
मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूँ कि ला भाई पाज़ेब दे दे!
श्रीमती झल्ला कर बोलीं कि हो चुका सब कुछ तुमसे। तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है।
डाँट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा?
बोलीं कि कह तो रही हूँ कि किसी ने उसे बक्स से निकाला ही है। और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है। सुनते हो न, वही है।
मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था। उसने नहीं ली मालूम होती।
इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते। वे बड़े छंटे होते हैं। बंसी चोर जरूर है। नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते?
मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?
बोलीं, पूछा था। वह तो ख़ुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है। वह नहीं ले सकता।
मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है।
बोलीं कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं। उमर होती जा रही है। वह यों ही रह जाएगा। तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले।
मैंने कहा कि जो कहीं पाज़ेब ही पड़ी मिल गई हो तो?
बोलीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?
ख़ैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है।
श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाज़त दी। बस सारे दिन पतंग-पतंग। यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो। मैं सोचती हूँ कि एक दिन तोड़-ताड़ दूँ उसकी सब डोर और पतंग।
मैंने कहा कि ख़ैर; छोड़ो। कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे।
सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाज़ेब नहीं मिल रही है,तुमने तो नहीं देखी? वह गुम हो गया। जैसे नाराज़ हो। उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली। पर मुँह नहीं खोला।
मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए। उसका मुँह और भी फूल आया। और वह गुमसुम बैठा रहा।
मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए। मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए।
रोष का अधिकार नहीं है। प्रेम से ही अपराध-वृति को जीता जा सकता है। आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है। बालक का स्वभाव कोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करना चाहिए, इत्यादि।
मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं। सच कहने में घबराना नहीं चाहिए। ली हो तो खुल कर कह दो, बेटा!
हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं। बल्कि बोलने पर तो इनाम मिला करता है।
आशुतोष तब बैठा सुनता रहा। उसका मुँह सूजा था। वह सामने मेरी आँखों में नहीं देख रहा था। रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे।
“क्यों बेटे,तुमने ली तो नहीं?”
उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज़ में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिए। उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।
मैंने कहा, देखो बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ, ढूँढो; शायद कहीं पड़ी हुई वह पाज़ेब मिल जाए। मिल जाएगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे।
वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहाँ-वहाँ पाज़ेब की तलाश में लग गया।
श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख़्याल है?
मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है। नौकर का तो काम यह है नहीं!
श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्यों लेगा?
मैं कुछ बोला नहीं। मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था। मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए। बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए। मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी। मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है; बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्ज़ाम है। बच्चे में चोरी की आदत भयावह हो सकती है,लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है। यह हमारी आलोचना है। हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते।
मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो। देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाज़ेब तुमने छुन्नू को दी है न?”
वह कुछ देर कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर रंग आया और गया। मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था।
मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं। हाँ, हाँ, बोलो डरो नहीं। ठीक बताओ, बेटे! कैसा हमारा सच्चा बेटा है!
मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया।
मैंने बहुत ख़ुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को? उसने सिर हिला दिया।
अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुँह से बोलो। छुन्नू को दी है?
उसने कहा, “हाँ-आँ।”
मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के। आशू हमारा राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिए लिए मैं उसकी माँ की तरफ गया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है। पाज़ेब उसने छुन्नू को दी है। सुनकर माँ उसकी बहुत ख़ुश हो आईं। उन्होंने उसे चूमा। बहुत शाबाशी दी और उसकी बलैयाँ लेने लगी!
आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी।
उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाज़ेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?
आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ। उसने जवाब में मुँह नहीं खोला।
मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा। सुनकर वह चुप हो गया। मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाज़ेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहाँ से?
अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होगी। अच्छा, तुमने कहाँ से उठाई थी?
“पड़ी मिली थी।”
“और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई?”
“हाँ!”
“फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे!”
“हाँ!”
“कहाँ बेचने को कहा?”
“कहा मिठाई लाएँगे?”
“नहीं, पतंग लाएँगे?”
“हाँ!”
“सो पाज़ेब छुन्नू के पास रह गई?”
“हाँ!”
“तो उसी के पास होनी चाहिए न! या पतंग वाले के पास होगी! जाओ, बेटा, उससे ले आओ। कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे।
वह जाना नहीं चाहता था। उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा!
मुझे उसकी ज़िद बुरी मालूम हुई। मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?
वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला।
मैंने कहा, कुछ कहते क्यों नहीं?
वह गुमसुम रह गया। और नहीं बोला।
मैंने डपटकर कहा कि जाओ, जहाँ हो वहीं से पाज़ेब लेकर आओ।
जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया। कहा कि सुनते हो? जाओ, पाज़ेब लेकर आओ। नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है। उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया। निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुँह बनाकर खड़ा रह गया।
मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था। यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका। मैंने बाहर आकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?
पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे। समझे न जाओ, तुम कहो तो।
छुन्नू की माँ तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता। उसने पाज़ेब नहीं देखी।
जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है। क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न?
आशुतोष ने धीरे से कहा, हाँ, दी थी।
दूसरे ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी। क्यों रे, मुझे कब दी थी?
आशुतोष ने जिद बाँधकर कहा कि दी तो थी। कह दो, नहीं दी थी?
नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की माँ ने छुन्नू को ख़ूब पीटा और ख़ुद भी रोने लगी। कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गए। कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी?
बात दूर तक फैल चली। पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी। और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक-से हैं। मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसी कोई बात भला सुलझती है!
बोली कि हाँ, मैं तेज बोलती हूँ। अब जाओ ना, तुम्हीं उनके पास से पाज़ेब निकालकर लाते क्यों नहीं? तब जानूँ, जब पाज़ेब निकलवा दो।
मैंने कहा कि पाज़ेब से बढ़कर शांति है। और अशांति से तो पाज़ेब मिल नहीं जाएगी।
श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज़ होकर मेरे सामने से चली गईं।
थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई। श्रीमती उन्हें लाई थी। अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाज़ेब के लिए इनकार करता है। वह पाज़ेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूँ।
मैंने कहा, “यह आप क्या कहती है! बच्चे-बच्चे हैं। आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी!”
उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया। कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाज़ेब देखी हो?
छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया और बताया कि पाज़ेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है। मैंने ख़ूब देखी थी, वह चाँदी की थी।
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“हाँ, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल। पतंग लाएँगे।”
“पाज़ेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो।”
छुन्नू ने उसका आकार बताया, जो ठीक ही था।
मैंने उसकी माँ की तरफ देखकर कहा देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाज़ेब देखी तक नहीं। अब कहता है कि देखी है।
माँ ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया। कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है?
तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं।
मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया। वह शहीद की भाँति पिटता रहा था। रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देख रहा था।
ख़ैर, मैंने सबको छुट्टी दी। कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो। उसकी माँ को कहा, आप उसे मारिएगा नहीं। और पाज़ेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है।
छुन्नू चला गया। तब, उसकी माँ ने पूछा कि आप उसे कसूरवार समझतें हैं?
मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है। और वह मामले में शामिल है।
इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा, “चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूँ।”
“एक-एक चीज़ देख लो। होगी पाज़ेब तो जाएगी कहाँ?”
मैंने कहा, “छोड़िए भी। बेबात को बात बढ़ाने से क्या फायदा।” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया। नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी।
कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं।
ख़ैर, जिस-तिस भाँति बखेड़ा टाला। मैं इस झँझट में दफ़्तर भी समय पर नहीं जा सका। जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष को धमकाना मत। प्यार से सारी बातें पूछना। धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता। समझी न?
शाम को दफ़्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाज़ेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं।
इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है। कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है। दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।
मैं सुनकर ख़ुश हुआ। मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पाँच आने भेजकर पाज़ेब मँगवा लेंगे। लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीजें लेता है। उसे पुलिस में दे देना चाहिए। उचक्का कहीं का!
फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहाँ है?
उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा।
मैंने कहा कि बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ।
बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं।
“क्या कर रहा है?”
“छुन्नू के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहे हैं।”
थोड़ी देर में आशुतोष आया। तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया। आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ। उसकी माँ ने ख़ुश होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है।
आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था। मैंने कहा कि आओ चलो। अब क्या बात है। क्यों हज़रत, तुमको पाँच ही आने तो मिले हैं न? हम से पाँच आने माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे!
कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, “क्यों बेटा, पतंग वाले ने पाँच आने तुम्हें दिए न?”
“हाँ”!
“और वह छुन्नू के पास हैं न!”
“हाँ!”
“अभी तो उसके पास होंगे न!”
“नहीं।”
“ख़र्च कर दिए!”
“नहीं।”
“नहीं ख़र्च किए?”
“हाँ।”
“ख़र्च किए, कि नहीं ख़र्च किए?”
उस ओर से प्रश्न करने वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया।
“बताओं ख़र्च कर दिए कि अभी हैं?”
जवाब में उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बात नहीं कहा।
मैंने कहा, तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है?
“हाँ।”
“बेटा, मालूम है न?”
“हाँ।”
पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए हैं न?
“हाँ।”
“तुमने क्यों नहीं लिए?”
वह चुप।
“इकन्नियाँ कितनी थी, बोलो?”
“दो।”
“बाकी पैसे थे?”
“हाँ।”
“दुअन्नी थी!”
“हाँ।”
“मुझे क्रोध आने लगा। डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी? सच बताओ कितनी इकन्नियाँ थी और कितना क्या था।”
वह खड़ा रहा, नहीं बोला।
“बोलते क्यों नहीं?”
वह नहीं बोला।
“सुनते हो! बोला- नहीं तो—”
आशुतोष डर गया। और कुछ नहीं बोला।
“सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ?”
इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने कान पकड़कर उसके कान खींच लिए। वह बिना आँसू लाए गुम-सुम खड़ा रहा।
“अब भी नहीं बोलोगे?”
वह डर के मारे पीला हो आया। लेकिन बोल नहीं सका। मैंने जोर से बुलाया “बंसी यहाँ आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो।”
बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूंद दिया।
दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया। उसका मुँह सूजा हुआ था। बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे। कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं।
मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई?”
वह सुनता हुआ गुमसुम खड़ा रहा।
“अच्छा, पतंग वाला कौन सा? दाई तरफ़ का चौराहे वाला?”
उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया। जिसे मैं कुछ समझ न सका।
“वह चौराहे वाला? बोलो—”
“हाँ।”
“देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न?”
यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो,पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाज़ेब माँगेगा। अव्वल तो यह पाज़ेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डाँटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा। बच्चों से माल ठगता है? समझे? नरमी की जरूरत नहीं हैं।”
“और आशुतोष, अब जाओ। अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था। सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया।
“नहीं जाओगे!”
उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊँगा।
मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज़ है, दाम लगे हैं। भला पाँच आने में रुपयों का माल किसी के हाथ खो दोगे! जाओ, चाचा के संग जाओ। तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा। हाँ, पैसे दे देना और अपनी चीज वापस माँग लेना। दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे। तुम्हारा इससे कोई सरोकार नहीं। सच है न, बेटे! अब जाओ।”
पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा। मुझे लड़के की गुस्ताख़ी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ। बोला, “इसमें बात क्या है?”
“इसमें मुश्किल कहाँ है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं।” मैंने कहा कि, “क्यों रे नहीं जाएगा?”
उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊँगा।
मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया। कहा, “प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ।”
प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा। वह साथ जाना नहीं चाहता था। मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कि जाओ भाई! डरो नहीं। अपनी चीज़ घर में आएगी।
इतनी-सी बात समझते नहीं। प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जो चीज माँगे उसे बाज़ार में दिला देना। जाओ भाई आशुतोष!
पर उसका मुँह फूला हुआ था। जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला। ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो। आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमें समझ नहीं हैं। मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊँ! लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे सँभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया। ख़ैर, वह गया तो मैंने चैन की साँस ली।
लेकिन देखता क्या।
मैंने पूछा, “क्यों?”
बोला कि, आशुतोष भाग आया है।
मैंने कहा कि “अब वह कहाँ है?”
“वह रूठा खड़ा है, घर में नहीं आता।”
“जाओ, पकड़कर तो लाओ।”
वह पकड़ा हुआ आया। मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?”
वह नहीं बोला तो मैंने कस कर उसके दो चाँटे दिए। थप्पड़ लगते ही वह एक दम चीखा,पर फ़ौरन चुप हो गया। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा। कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है।
मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से। जाकर कोठरी में बंद कर दो।
दुष्ट! इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा। मुझे ख़याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखता था। मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ कई थी, और कुछ अभ्यास न था।
ख़ैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ। मालूम करना कि किसने पाज़ेब ली है। होशियारी से मालूम करना। मालूम होने पर रेख़्ता करना। मुरव्वत की ज़रूरत नहीं। समझे। प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाज़ेब नहीं है।
सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि “तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता। जरा सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाए? वह अपनी सफाई देने लगा। मैंने कहा, “बस, तुम जाओ।”
प्रकाश मेरा बहुत लिहाज़ मानता था। वह मुँह डालकर चला गया। कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फ़र्श पर सोता पाया। उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं थे। सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई। लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं! मैंने उसे जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा। मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”
थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं। फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया। झट उसके चेहरे पर वहीं ज़िद, अकड़ ओर प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे।
मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इस कोठरी में फिर बंद किए देते हैं। आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।
ख़ैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा। मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाज़ेब माँग लेना कोई घबराने की बात नहीं। तुम समझदार लड़के हो।”
उसने कहा कि जो पाज़ेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
“इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाज़ेब दी है। न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?” वह चुप हो गया। आख़िर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा।
उसका मुँह भारी देखकर डाँटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी। बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रख कर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ। आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।
आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा। बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”
मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे।”
पर आशुतोष मचलने पर आ गया था। मैंने डाँटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो?”
बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है?
मैंने पुकारा, “बंसी, तू भी साथ जा। बीच से लौटने न पाए।” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को ज़बरदस्ती उठाकर सामने से ले गए। बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”
मैंने कहा कि कुछ नहीं, ज़रा यों ही-फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रँग फैलाती है। इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह काग़ज़ है जो तुमने माँगें थे। और यहाँ—यह कह कर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाज़ेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या? बोली कि उस रोज़ भूल से यह एक पाज़ेब मेरे साथ चली गई थी।
प्रश्न
1) ‘पाजेब’ कहानी की कथावस्तु लिखिए|
2) ‘पाजेब’ कहानी पर आधारित आशितोष का चरित्र चित्रण कीजिए|
3) ‘पाजेब’ कहानी के पिताजी|
4) ‘पाजेब’ कहानी की मां |
5) ‘पाजेब’ की बुआ|
6) ‘पाजेब’ कहानी में चित्रित बाल मनोविज्ञान|
उत्तर
'पाजेब' जैनेद्र कुमार लिखित कहानी है| जिसमें बाल मनोविज्ञान को चित्रित किया है| इस कहानी के माध्यम से लेखन ने इस बात का एहसास दिलाया है कि अगर बडे बच्चों की मानसिकता को नहीं समझते तो बच्चे डर के मारे झूठ बोलने लगते है| वास्तव में बच्चों का बाल मन चोरी क्या होती है? यह समझता ही नहीं| चोरी का अर्थ ही अगर वह समझता नहीं, तो चोरी कैसे करेगा? इसका एहसास बडों को होना बहुत जरुरी है| परंतु बडे यही पर गलती करते है| उसने एक अपनी एक चाहत क्या दिखाई बडे उसे ही चोर समझने लगते है और डांट-डपटकर उसे न की हुई गलती को कबूल करने के लिए कहते है| जिसका बच्चों के मन पर गहरा असर हो सकता है, जिसके चलते वे बच्चे झूठ बोलते है या गलत काम करने लगते है| जैसे इस कहानी में आशुतोष और छुन्नू डर के मारे झूठ बोलते है| जिसकी कहानी इस प्रकार -
कहानी के पात्र
(मैं – पिता, आशुतोष - बेटा , मुन्नी – बेटी, मुन्नी की मां -श्रीमती ,
बन्सी- नौकर, छुन्नू- आशुतोष का दोस्त, छुन्नू की मां, प्रकाश - आशुतोष के चाचा, बुआ, पतंगवाला )
कहानी का प्रारंभ बाजार में आई पाजेब की फैशन से हुआ है| पाजेब अर्थात पायल| एक बार अगर फैशन आती है तो सब उसके पीछे पडती है| एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। ऐसे ही लेखक के पास-पडोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में वही पाज़ेब दिखाई देने लगी| जिसके चलते लेखक अर्थात 'मैं' की बेटी मुन्नी ने भी वही पाजेब पहनने की जिद्द की| जिसकी उम्र अभी चार बरस की है फिर अपने पिताजी को कहती है जैसे रुकमन और शीला पहनती है, वैसे पाजेब मुझे चाहिए| संयोग वश मुन्नी की बुआ इतवार उसके लिए पाजेब लेकर आती है| वह खुश होती है और अपनी पाजेब सबको दिखाकर आती है| केवल वही खुश होती है ऐसा नहीं तो उसका बडा भाई आशुतोष भी खुश होता है और आस-पास पाजेब दिखाने के लिए उसे लेकर जाता है| तब उसे अपनी बहन से इर्ष्या होती है और वह पिताजी को बाईसिकिल मांगता है| तब बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएँगे।आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे। बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं। और लड़कियाँ रोती हैं।’कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?
इसतरह रविवार का दिन हंसी-ख़ुशी गुजरा| परंतु रात में श्रीमती ने लेखक से कहा, अपने कहीं पाजेब को देखा? दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह सँभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है। सँभालकर रखी थीं,तो फिर यहाँ-वहाँ क्यों देख रही थी? जहाँ रखी थीं वहीं से ले लो न। वहाँ नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।श्रीमती का शक पहले नौकर बन्सी पर जाता है| परंतु उसने साफ इन्कार कर दिया था|
तब उसी वक्त संयोग वश आशुतोष पतंग; लेकर आया था| उसे पतंग बहुत पसंद था| शायद उसके लिए उसने पाजेब ली होगी ऐसा पिता जी को शक होता है| अब रात हो गयी थी| सुबह उसे पिता ने पूछा, एक पाजेब मिल नहीं रही कहीं तुमने तो नहीं ली| वह सर हिलाकार इन्कार करता है| फिर उन्होंने एक नहीं दो तीन चार बार वही बात उसे पूछी| तब उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज़ में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिए। उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।
परंतु उन्हें यह बात रह रहकर खा रही थी बच्चे ने चोरी की यह बात बहुत ही भयावह है और मां-बाप के रूप में यह हमारी बडी आलोचना है | इसीलिए पुनश्च उसे पूछते है, देखो बेटा डरो नहीं अगर किसी को दे दी है तो कहो| हमारा सच्चा बेटा| मैंने बहुत ख़ुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को? उसने सिर हिला दिया।इस पर मां को बहुत हर्ष हुआ देखा हमारा बेटा सच बोला| आशुतोष भी मुस्करा आया, मगर एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी। उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाज़ेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ। उसने जवाब में मुँह नहीं खोला। मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा? अब उन्हें और भी डर लगने लगा| बच्चा सच बोलने के बाद भी किस बात से डर रहा है|
यह बात छुन्नू की मां को समझती है| वह उसे मारती है तब भी कबूल नहीं होता तब छुन्नू की मां पाजेब की किमत देने की बात करती है| उस वक्त वे कहते है छुन्नू को मेरे सामने लाओ| जब सामने आता है उसे भी वही सवाल पूछा जाता है| तब छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया और बताया कि पाज़ेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है। मैंने ख़ूब देखी थी, वह चाँदी की थी।
अब उन्होंने श्रीमती को कहा बच्चे से प्यार से सब बाते निकाल लेना| इस उम्र में डांटना अच्छा नहीं| जब शाम को दफ़्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाज़ेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं।इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है। कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है। दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।
वह बहुत खुश होते है| तब आशुतोष अपने दोस्त के साथ खेल रहा था| वे नौकर को उसे बुलाने के लिए कहते है| तब उन्होंने उसे गोद में लेकर प्यार किया। आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ। उसकी माँ ने ख़ुश होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है। आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था। मैंने कहा कि आओ चलो। अब क्या बात है। क्यों हज़रत, तुमको पाँच ही आने तो मिले हैं न? हम से पाँच आने माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे!
बाद में कमरे में जाकर फिर से पांच आने की बात पूछी| तब उसने वह छुन्नू के पास होने बात कही| छुन्नू से पैसे लाने के लिए कहा तो उसके पास पैसे नहीं ऐसा भी कहा| अब उन्हें क्रोध आ रहा था| वे अपने भाई प्रकाश को बुलाते है और कहते है देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न?” यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो,पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाज़ेब माँगेगा। अव्वल तो यह पाज़ेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डाँटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा। बच्चों से माल ठगता है? समझे? नरमी की जरूरत नहीं हैं।” “और आशुतोष, अब जाओ। अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था। सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया। अब की बार उन्हें बहुत क्रोध आया कारण आशुतोष चाचा के साथ गया परंतु बीच रास्ते ही भाग आया है| अब की बार उसे जोर से थप्पड मारा और कोठरी में बंद किया| फिर भी उसके आखों से आंसू बिल्कुल नहीं निकले|
फिर से उसे समझाया| उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाज़ेब माँग लेना कोई घबराने की बात नहीं। तुम समझदार लड़के हो।” अब की बार भी उसने कहा कि जो पाज़ेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा? “इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाज़ेब दी है। न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?” वह चुप हो गया। आख़िर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा।
उसका मुँह भारी देखकर डाँटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी। बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रख कर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ। आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा। बुआ ने पूछा, “क्या बात है?” तब वह उसे उठाकर ले जाने के लिए कहते है| नौकर और प्रकाश उसे उठकर ले जा रहे थे की बुआ कहती है, क्यों उसे सता रहे हो| मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे।” मैंने कहा कि कुछ नहीं, ज़रा यों ही-फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रँग फैलाती है। इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह काग़ज़ है जो तुमने माँगें थे। और यहाँ—यह कह कर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाज़ेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या? बोली कि उस रोज़ भूल से यह एक पाज़ेब मेरे साथ चली गई थी।
इसप्रकार प्रस्तुत कहानी में बच्चों की मानसिकता को समझने की बात लेखन ने चित्रित की है|
बहुविकल्पी प्रश्न
1) 'पाजेब' जैनेद्र कुमार लिखित कहानी है|
2) 'पाजेब' में बाल
मनोवैज्ञानिक चित्रण है|
3)
‘पाजेब’ कहानी का नायक आशुतोष है|
4) आशुतोष
के पिता मैं है|
5) आशुतोष
की बहन का नाम मुन्नी है|
6) आशुतोष
के दोस्त का नाम छुन्नू है|
7) आशुतोष
के चाचा का नाम प्रकाश है|
8)
मुन्नी को पाजेव बुआ लेकर आयी थी|
9)
पाजेब गलती से बुआ के साथ ही गये थे|
10)
मुन्नी चार बरस है |
11)
मुन्नी के सहेलियों के नाम रुकमन और शीला है|
12)
आशुतोष पिताजी को बाईसिकिल मांगता है|
13) जब
पाजेब गुम हो गयी थी उसी दिन आशुतोष घर में पतंग
लेकर आया था|
14)
पाजेब गुम होने पर पिताजी को आशुतोष पर
शक जाता है|
15)
श्रीमती का शक पहले नौकर बन्सी पर जाता है|
16) कहानी
में पतंगवाले ने पाजेब के बदले पांच
आने दिये है|
17)
पाजेब गुम होने की घटना से सबसे अधिक मानसिक तनाव आशुतोष को
झेलना पडा है|
18)
कहानी का प्रारंभ बाजार में आई पाजेब की फैशन से हुआ है|
Modul 3.0
कहानियां
युनिट नं 3.3
ठंडक - महीप सिंह
(मूल कहानी)
जैसे ही उस विशाल भवन का कुछ भाग दिखाई दिया, जीवन ने कहा, 'देखो, वह है...पूरा एयरकंडीशंड है।' फिर वह स्वयं ही संकुचित-सा हुआ, सत्या एयरकंडीशंड का मतलब क्या समझेगी। वह समझाने लगा, 'देखो, अभी कितनी गर्मी है। वहाँ पहुँचोगी, तो ऐसा लगेगा. जैसे किसी ठंडे पहाड़ पर आ गई हो।' परंतु वह फिर संकुचित हुआ, सत्या ठंडा पहाड़ भी क्या समझेगी। क्या वह कभी वहां गई है? और वह खुद भी कहां गया है। उसने भी तो केवल सुना ही है कि पहाड़ ठंडे होते हैं। अमीर लोग गर्मियों में पहाड़ पर चले जाते हैं। उसने फिर समझाया, 'देखो, इसमें ऐसी मशीन लगी है, जिससे सारा मकान ठंडा हो जाता है।' फिर उसने एक नजर सत्या के कपड़ों की ओर डाली। पतली-सी सत्या के पतले-से शरीर पर पतली-सी साड़ी थी, पतला सा ब्लाउज था। वह बोला, 'तुमको हाल में ठंड लगने लगेगी, देखना।'
उसे लगा, यदि हाल में सत्या को सचमुच ठंड लगने लगे तो वह बड़ा खुश हो। इससे एयरकंडीशन के संबंध में बताई हुई बात पुष्ट हो जाएगी।
सत्या उसके साथ बढ़ी चली जा रही थी। उसे लग रहा था, वह चल नहीं रही है, कोई हिलोर है जो उसे अपने-आप बढ़ाए लिए जा रही है। दो महीने हुए, अपने छोटे-से नगर से वह इस महानगरी में आ गई थी। ससुर के साथ घूँघट में कब वह गाड़ी से उतरी, कब टैक्सी में बैठी और कब अपनी खोली में पहुँच गई, उसे अच्छी तरह याद नहीं। अपने कानों में पड़े कोलाहल से वह जान गई थी कि वह शहर में आ गई है। पर शहर ऐसा होता है। हाँ, शहर ऐसा ही होता है। सभी तो इसे शहर कहते हैं। तभी उसके कस्बे का हर आदमी वहाँ भाग आना चाहता है।
वे सिनेमा-हाल के निकट पहुँच गए। एयरकंडीशनिंग की भीनी-भी खुशबू उस तक पहुंचने लगी थी। जीवन के चेहरे पर गर्व की खुशी दौड़ गई। बोला 'देखा, कैसे ठंडी-ठंडी खुशबू आ रही है।'
सिनेमा-हाल के बाहर बड़ी भीड़ थी। अभी पहला शो समाप्त नहीं हुआ था। रंग-बिरंगी साड़ियों, पैंटों और टाइयों की चहल-पहल सत्या को मेले जैसी लग रही थी। वह मेला ही याद कर सकती है। मेला उसने कई बार देखा है। वहाँ भी कुछ ऐसी ही चहल-पहल होती। पर कितना अंतर है दोनों मेलों में! एक में वह हलकी-फुलकी डोंगी-सी उतराती चली जाती है, दूसरे में भारी पत्थर की तरह बैठती जा रही है।
जीवन ने नजर इधर-उधर दौड़ाई। पता नहीं शो समाप्त होने में अभी कितनी देर है, पर बाहर की यह रंगीन चहल-पहल भी तो किसी शो से कम नहीं। लोग गुटों में बँधे हुए हैं, हँस रहे हैं, बातें कर रहे हैं, कुछ खा-पी रहे हैं। इस वातावरण में वह भी अपने-आपको किसी चीज से वंचित नहीं पाता। सत्या सहित उसका भी अपना एक गुट है। लोगों को आपस में बातचीत करते देख वह भी सत्या से कुछ बातचीत करने लगता है। लोगों को हँसता देख वह हँस पड़ता है। वह और सत्या एक ही पैकेट से निकालकर बेफर खा रहे हैं। चारों और फैली हुई फिजा में वह अपने-आपको कितना हल्का महसूस कर रहा है।
सिनेमा-हाल के बाहर रखे हुए हाउस फुल के बोर्ड की ओर इशारा करते हुए जीवन ने सत्या से कहा, 'भीड़ काफी है। देखो, अब एक भी टिकट नहीं बचा। कितने लोग बेचारे निराश लौटे जा रहे हैं।' फिर उसने अपनी पैंट की जेब में पड़े पर्स को अनुभव किया, उसमें पड़े दो टिकटों को अनुभव किया और एक गहरे संतोष की लहर उसके सारे शरीर में दौड़ गई।
'सुनो,' सत्या बोली, 'वह सामने एक लड़का खड़ा है... देख रहे हो न...?' जीवन ने उधर देखा, 'कौन लड़का ...?' 'अरे वो, जो गंदी-सी बुश्शर्ट पहने है। लंबा-सा।' जीवन फिर भी कुछ नहीं समझा, क्योंकि उस ओर गंदी बुश्शर्ट की कमी थी, न लंबों की, परंतु यदि वह उसे देख भी ले तो क्या? बोला, 'आखिर बात क्या है?'
'वो अर्जुन है।'
'अर्जुन...? कौन अर्जुन...?'
'अर्जुन को नहीं जानते?' सत्या खीझती हुई बोली, 'अपनी गली के मोड़ पर वो सिंधी नहीं रहते, मनसुखानी, उनका लड़का।'
जीवन खीझ उठा। उसकी गली में बहुत से सिंधी रहते हैं और उनके बहुत लड़के हैं-अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव। पर क्या वह सबकी खोज खबर रखता है? बोला, 'उसका लड़का? पर हमें इससे क्या?'
सत्या ने उसे ऐसे आश्चर्य से देखा जैसे वह दिन को रात कह रहा हो, 'तुम्हें मालूम नहीं, वह कई दिन से अपने घर से लापता है? इसकी माँ बेचारी रो-रोकर अंधी हुई जा रही है।'
जीवन ने फिर उस ओर देखा। गंदी बुश्शर्ट वाला चौदह-पंद्रह साल का लंबा लड़का अब उसकी नजर में आ गया था।
'सुनो,' सत्या बोली, 'जरा बुलाओ तो उसे।'
जीवन को यह कहना कुछ अजीब-सा लगा, फिर भी उसने सी... सी करके उसे बुलाया। वह पास आ गया। जीवन ने सत्या की ओर देखा और सत्या ने जीवन की ओर, फिर दोनों ने उस लड़के की ओर देखा। सत्या ने आँखों से ही इशारा किया, 'पूछो।'
जीवन को कुढ़न हुई, 'क्या पूछें भला...?' सत्या ने जीवन की आकृति निरपेक्ष देखी, तो उस लड़के की ओर उन्मुख हुई, 'तुम्हारा क्या नाम है?... तुम्हारा नाम अर्जुन है न...?'
दोनों प्रश्न एक साथ सुनकर जैसे उस लड़के की सिट्टी मारी गई। वह कुछ क्षण टुकर-टुकर दोनों को देखता रहा, फिर धीरे से बोला, 'नहीं, मेरा नाम तो किशन है।'
उत्तर सुनकर सत्या को लगा, जैसे भरे बाजार में किसी ने उसका पल्लू खींच लिया है और जीवन को लगा, जैसे सचमुच सत्या का पल्लू ही खिंच गया है। दोनों हक्के-बक्के से खड़े कभी एक-दूसरे को और कभी उस लड़के को देखते रहे। वह फिर उसकी ओर उन्मुख हुई, 'तुम्हारा नाम अर्जुन नहीं है...? तुम कुर्ला में नहीं रहते हो?' इस बार उस लड़के के मुँह से 'नहीं, नहीं' निकला। वह चुपचाप खड़ा रहा। सत्या को बल मिला, 'तुम तीन दिन से अपने घर से भागे हुए नहीं हो?'
लड़का चुप रहा। पर जीवन के लिए यह सब असह्य हो गया था। खीझकर बोला, 'इससे तुम्हें क्या लेना-देना है, सत्या? ख़ामख़्वाह बेकार की झंझट ले बैठी हो। यह अर्जुन है या किशन, हमें इससे क्या मतलब है?'
'तुम्हें मालूम है, जब से यह लापता है, इसके घर की क्या हालत है?' सत्या के चेहरे पर अजीब-सी तमतमाहट आ गई थी।
जीवन घबरा-सा गया। जैसे उसे कुछ सूझा नहीं कि वह क्या कहे। इतने में वह लड़का मुड़ा और चल पड़ा। पर सत्या ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, 'तुम्हें शर्म नहीं आती, बिना खबर दिए तीन दिन से घर से गायब हो। तुम्हारी माँ रो-रोकर अंधी हुई जा रही है। तुम्हारा बाप तुम्हें ढूंढ़ता हुआ मारा-मारा फिर रहा है और और तुम सिनेमा देखने आए हो...। बेशरम...!'
जीवन खीझा और भौंचक्का-सा सत्या को देख रहा था। यह उसे क्या हो गया है? और सत्या की तमतमाहट ऊर्ध्वमुखी होकर जब विगलित हो रही थी। उसका गला रुंध गया था और नेत्र भर आए थे। उसके होंठ काँप रहे थे। उस लड़के की बांह पकड़ते हुए उसके हाथ में अजीब-सी थरथराहट हो रही थी। और लड़का सत्या के सम्मुख भेड़ बना खड़ा था-न उसके मुँह से कुछ निकल रहा था, न किसी प्रकार का प्रतिरोध करने की वह चेष्टा कर रहा था।
जीवन को बड़ी बेचैनी महसूस हुई जब उसने देखा चारों ओर खड़े लोगों का ध्यान भी उधर आकर्षित हो गया है। तमाशबीन उसके चारों ओर इकट्ठे होने लगे थे। वह धीरे से बोला, 'अच्छा, इसे छोड़ो तो।'
सत्या ने हाथ ढीला कर दिया। लड़का मुड़कर बिना कुछ बोले चला गया था। जीवन ने देखा, लोग सामने के दरवाजे से अंदर जा रहे हैं। बोला, 'चलो, पहला शो छूट गया।' सत्या ने एक बार उधर देखा, जिस तरफ वह लड़का गया था, फिर वह चल दी। अंदर घुसते ही। एग्रकंडीशनिंग की ठंडक ने जीवन को अभिभूत कर दिया। उसने मुस्कराकर सत्या की ओर देखा, परंतु उसके चेहरे पर छाई तप्तता वैसी ही बनी थी। जीवन को लगा, जैसे उसके समग्र आनंद को किसी चीज ने खंडित कर दिया है। कितनी साध थी उसे, सत्या को यह राजमहल जैसा सिनेमा हाल दिखाने की! पर बीच में यह काँटा कहाँ से चुभ गया? उसने फिर कोशिश की, 'सत्या, बिलकुल राजमहल जैसा लगता है न? देखो, ज़मीन पर बिछे गलीचे कैसे मुलायम हैं। पैर धँसते चले जाते हैं।'
सत्या ने नीचे की ओर देखा, फिर जीवन की ओर। उसकी आँखों में उसकी बात का समर्थन तो था, पर वह उल्लास नहीं था, जो जीवन देखना चाहता था।
जीवन का उत्साह मंद पड़ गया। वह पता नहीं कितनी चीजें दिखाना चाहता था--चारों ओर दीवारों पर लगे आदमकद शीशे, छत से लटकते फानूस, पर वह दिखाए किसे? सत्या तो वहाँ थी ही नहीं।
वे हाल के अंदर अपनी सीटों पर जाकर बैठ गए। सामने लगा कीमती मखमल का परदा धीरे-धीरे दोनों और खिसक गया। पीछे सफेद परदा दिखाई दिया। हाल में बत्तियाँ बुझ गई। सफेद परदे पर विज्ञापन दौड़ने लगे। फिर न्यूजरील शुरू हुई। जीवन को सत्या की धीमी आवाज सुनाई दी, 'सुनो, यह अर्जुन अपने घर से भाग क्यों गया?"
जीवन को लगा, जैसे किसी ने उसे कचोट लिया। तुनककर बोला, 'वह मुझे बताकर तो भागा नहीं। मुझे क्या मालूम?'
'तुम तो बेकार नाराज हो रहे हो। मैं पूछती हूँ आखिर ये लड़के अपने घर से भाग क्यों जाते हैं?'
जीवन और तुनका, 'अच्छा, पिक्चर देख लेने दो। घर चलकर मैं इसी विषय पर रिसर्च शुरू करूंगा।'
सत्या चुप हो गई।
पिक्चर शुरू हो गई। जीवन इस पिक्चर का पूरा आनंद लेना चाहता था। वह सत्या को उस पिक्चर में काम करने वाले हर पात्र का नाम और उसके गुण बताना चाहता था। वह दुःख के स्थलों पर संवेदना प्रकट करना चाहता था। वह हँसी के स्थानों पर जी भरकर हँसना चाहता था। परंतु यह क्या हो गया है। जीवन के आनंद की शीतल जल धारा जैसे किसी तप्त रेगिस्तान में खो गई।
जाने कितनी देर दोनों गुमसुम पिक्चर देखते रहे। उसे सत्या की धीमी आवाज फिर सुनाई दी, 'सुनो, अर्जुन की माँ ने तीन दिन से अन्न का दाना मुंह में नहीं डाला।'
जीवन ने उस अंधेरे में ही घूरकर सत्या की ओर देखा। उसने अन्न का दाना मुँह में नहीं डाला तो वह क्या करे? क्या उसने उसके लड़के को घर से भगा दिया है? और सत्या भी बस विचित्र है। इतनी देर से उसी का रोना लिए बैठी है।
वह कुछ नहीं बोला। आधा घंटा गुजर गया। सत्या की बुदबुदाहट उसे फिर सुनाई दी, 'सुनो, हम लोगों ने गलती की। उसे छोड़ना नहीं चाहिए था। उसके बाप ने तीन दिन से अपनी दुकान नहीं खोली। उसके छोटे भाई-बहन स्कूल नहीं गए। माँ तो हमेशा रोती रहती है। हम उसे पकड़कर घर ले जाते। पिक्चर का क्या काम है? पिक्चर फिर कभी देख लेते।'
जीवन को लगा, सत्या ने उसके सिर के बाल नोच लिए है। वह क्रोध में उबल पड़ा। दाँत पीसता और आवाज दबाता हुआ बोला, 'तुम बकबक किए ही जाओगी या चुप भी बैठोगी? उस लड़के के घरवालों के साथ इतनी हमदर्दी है, तो मेरे साथ इतनी दुश्मनी क्यों कर रही हो? सारी पिक्चर का मजा किरकिरा करके रख दिया। पगली कहीं की! अब ज्यादा बकबक की तो मैं हाल छोड़कर चला जाऊँगा।'
सत्या सुन्न हो गई। पिक्चर चलती रही, परंतु वह स्थिर थी। इंटरवल हुआ। पिक्चर फिर शुरू हुई, परंतु वह स्थिर ही रही, न हिली, न डुली, न कोई बात की।
दूसरे दिन सुबह जीवन उठा, तो सत्या चाय का प्याला सामने रखती हुई बोली, 'सुनो, देखो सुबह-सुबह नाराज मत होना। अब इतना तो करो कि अर्जुन के पिता को बता आओ कि वह हमें कल सिनेमा में मिला था। बेचारों की कुछ चिंता तो दूर हो।'
परंतु जीवन के मुँह में कल का कसैलापन पूरी तरह बाकी था। वह सख्ती से बोला, 'मुझे क्या गरज पड़ी है। मैंने क्या दुनिया का ठेका ले रखा है? तुम्हें बड़ी हमदर्दी है तो जाओ, रोकता कौन है?'
सत्या चुप होकर बिस्तर सँभालने लगी। इतने में दरवाजे पर खटखट हुई। सत्या ने दरवाजा खोला। जीवन ने अंदर बैठे-बैठे ही सुना, कोई स्त्री कह रही थी, 'बहन, तुम्हारी बड़ी मेहरबानी! अर्जुन रात को ही घर आ गया था। तुम उसे सिनेमा में मिली थी न। तुमने उसे खूब डाँटा था न...। बस, वह सीधा घर आ गया। बहन, तुम्हारी बहुत मेहरबानी। तुमने मेरे बेटे को मिलाया, मेरा दिल ठंडा कर दिया।'
प्रश्न
1) ‘ठंडक’ कहानी कि कथावस्तु लिखिए|
2) ‘ठंडक’ कहानी का अर्जुन|
3) ‘ठंडक’ कहानी की सत्या|
4) ‘ठंडक’ कहानी में चित्रित मानवता|
उत्तर
'ठंडक' महीप सिंह लिखित कहानी है| जिसमें मनुष्य की भावनाओं को चित्रित किया है| अत: इस कहानी के माध्यम से लेखन ने यह बताने का प्रयास किया है कि असली ठंडक बाहर नहीं तो मनुष्य के हृद्य अर्थात दिल में होनी चाहिए, जो उसे रिश्ते निभाने में काम आ सकती है|अर्थात मनुष्य मन से जितना शांत और दिल से जितना साफ होता है, उतना ही वह रिश्तें निभाने में सफल होता हैं|अत:
इसे असली ठंडक कह सकते है| परंतु मनुष्य बाहरी ठंडक को महसूस करना चाहता है, जिसके चलते वह अपने दिल के ठंडक को भूल रहा है| अर्थात वह अपनी भावनाओं को भूल रहा है| परंतु असली ठंडक वही है, यही बतानेवाली यह कहानी है| जिसका कथ्य इसप्रकार-
पात्र जीवन
सत्या अर्जुन(किसन)
मनसुखानी – सिंधी
जीवन अपनी पत्नी सत्या को छोटे से नगर से शहर लेकर आया था|आस- पास के कोलाहल को सून सत्या को शहर आने का एहसास हुआ
था| शायद इसीलिए लोग शहर की ओर भागते है, ऐसा उसे लगता है| सत्या पहली बार शहर आई है, इसीलिए जीवन उसे शहर का परिचय करवा देना चाहता है| सबसे पहले वह एयरकंडीशंड क्या होता हैं? कैसे ठंडक होती है वह सत्या को बताना चाहता था इसीलिए वह उसे सिनेमा दिखाने के लिए लेकर गया था| जीवन उसे एयरकंडीशंड क्या होता यह समझाने का प्रयास करता है| वहां पहाड जैसी ठंडक होती है| पर सत्या को पहाड भी पता नहीं होगा इसका एहसास होता है| कारण ठंडी में घुमने के लिए अमीर लोग पहाडों पर जाते है| जीवन भी पहाडों पर नहीं गया, उसने सिर्फ सूना है|
उसने फिर समझाना शुरू किया कि एक मशीन होती है जो सारा मकान ठंडा करती है| तुम्हें इन कपडों में ठंड लगेगी देखना| कारण उस वक्त सत्या नें पतली -सी साडी पर पतला - सा ब्लाउज पहना था| जीवन भी यही चाहता था कि उसे लगे ताकि एयरकंडीशंड के बारे में उसे बताई हुई बात की सच हो जायेगी| तब वह बहुत खुश होगा|
दोनों सिनेमा हॉल पर पहुंचते है| जीवन को सत्या को सबकुछ दिखाने की बहुत जल्दी हो गयी थी, परंतु पहला शो अभी तक खत्म नहीं हुआ था| बाहर मेले के जैसे भीड जमा हो गयी थी| सब हंस-हंस एक दूसरे से बातें कर रहे थे| जीवन भी उसी तरह सत्या से बातें करता है| सिनेमा-हाल के बाहर रखे हुए हाउस फुल के बोर्ड की ओर इशारा करते हुए जीवन ने सत्या से कहा, 'भीड़ काफी है। देखो, अब एक भी टिकट नहीं बचा। कितने लोग बेचारे निराश लौटे जा रहे हैं।' फिर उसने अपनी पैंट की जेब में पड़े पर्स को अनुभव किया, उसमें पड़े दो टिकटों को अनुभव किया और एक गहरे संतोष की लहर उसके सारे शरीर में दौड़ गई।
वह बहुत खुश होकर सत्या से बातें कर रहा था| परंतु उसका ध्यान वहां खडे एक लडके पर है| उसे लगता है उनके गली के मोड में जो सिंधी मनसुखानी है, उनका बेटा अर्जुन है| जो तीन हुये घर से गायब है| सत्या उसे बुलाने के लिए कहती है| परंतु जीवन को क्रोध आ रहा था| वह खीझ उठा। उसकी गली में बहुत से सिंधी रहते हैं और उनके बहुत लड़के हैं-अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव। पर क्या वह सबकी खोज खबर रखता है? बोला, 'उसका लड़का? पर हमें इससे क्या?'
फिर सत्या उसे पास बुलाने के लिए कहती है| न चाहते हुये जीवन उसे बुलाता है| सत्या उसे उसे बहुत सवाल करती है| तुम कुर्ला में रहनेवाले अर्जुन ही हो| जीवन को लगता है वह अर्जुन हो या किसन हमें क्या करना है| तब वह लडका वहां से भागने ने का प्रयास करता है, तब सत्या उसका हाथ पकडकर उसे डांटती है, 'तुम्हें शर्म नहीं आती, बिना खबर दिए तीन दिन से घर से गायब हो। तुम्हारी माँ रो-रोकर अंधी हुई जा रही है। तुम्हारा बाप तुम्हें ढूंढ़ता हुआ मारा-मारा फिर रहा है और और तुम सिनेमा देखने आए हो...। बेशरम...!'
उस लडके पर क्रोधित हुए सत्या का गला रुंध गया था और नेत्र भर आए थे। उसके होंठ काँप रहे थे। उस लड़के की बांह पकड़ते हुए उसके हाथ में अजीब-सी थरथराहट हो रही थी।जीवन को बड़ी बेचैनी महसूस हुई जब उसने देखा चारों ओर खड़े लोगों का ध्यान भी उधर आकर्षित हो गया है। तमाशबीन उसके चारों ओर इकट्ठे होने लगे थे। वह धीरे से बोला, 'अच्छा, इसे छोड़ो तो।' इतने में पिक्चर का पहला शो छूट गया| जीवन ने कहा अब छोडो भी चलो| उस लडके का हाथ ढिला किया तब वह लडका बिना बोले निकल गया|
सिनेमा हॉल के अंदर घुसते ही एयरकंडीशंडकी ठंडक ने जीवन को अभिभूत कर दिया। उसने मुस्कराकर सत्या की ओर देखा, परंतु उसके चेहरे पर छाई तप्तता वैसी ही बनी थी। जीवन को लगा, जैसे उसके समग्र आनंद को किसी चीज ने खंडित कर दिया है। कितनी साध थी उसे, सत्या को यह राजमहल जैसा सिनेमा हाल दिखाने की! पर बीच में यह काँटा कहाँ से चुभ गया? उसने फिर कोशिश की, 'सत्या, बिलकुल राजमहल जैसा लगता है न? देखो, ज़मीन पर बिछे गलीचे कैसे मुलायम हैं। पैर धँसते चले जाते हैं।' सत्या न जाने उसे क्या दिखाना चाहता था पर सत्या वहां जैसे थी ही नहीं| अभी भी वह उस लडके बारे में सोच रही थी| वह धीमी आवाज में जीवन को पूछ्ती है यह अर्जुन अपने घर से भाग क्यों गया?" घर चलकर मैं इसी विषय पर रिसर्च शुरू करूंगा।' जीवन कहता है सत्या चुप हो जाती है|
पिक्चर शुरू हो जाती है । जीवन इस पिक्चर का पूरा आनंद लेना चाहता था। वह सत्या को उस पिक्चर में काम करने वाले हर पात्र का नाम और उसके गुण बताना चाहता था। वह दुःख के स्थलों पर संवेदना प्रकट करना चाहता था। वह हँसी के स्थानों पर जी भरकर हँसना चाहता था। परंतु यह क्या हो गया है। जीवन के आनंद की शीतल जल धारा जैसे किसी तप्त रेगिस्तान में खो गई।जाने कितनी देर दोनों गुमसुम पिक्चर देखते रहे। उसे सत्या की धीमी आवाज फिर सुनाई दी, 'सुनो, अर्जुन की माँ ने तीन दिन से अन्न का दाना मुंह में नहीं डाला।'
जीवन ने उस अंधेरे में ही घूरकर सत्या की ओर देखा। उसने अन्न का दाना मुँह में नहीं डाला तो वह क्या करे? क्या उसने उसके लड़के को घर से भगा दिया है? और सत्या भी बस विचित्र है। इतनी देर से उसी का रोना लिए बैठी है।
वह कुछ नहीं बोला। आधा घंटा गुजर गया। सत्या की बुदबुदाहट उसे फिर सुनाई दी, 'सुनो, हम लोगों ने गलती की। उसे छोड़ना नहीं चाहिए था। उसके बाप ने तीन दिन से अपनी दुकान नहीं खोली। उसके छोटे भाई-बहन स्कूल नहीं गए। माँ तो हमेशा रोती रहती है। हम उसे पकड़कर घर ले जाते। पिक्चर का क्या काम है? पिक्चर फिर कभी देख लेते।'
जीवन को लगा, सत्या ने उसके सिर के बाल नोच लिए है। वह क्रोध में उबल पड़ा। दाँत पीसता और आवाज दबाता हुआ बोला, 'तुम बकबक किए ही जाओगी या चुप भी बैठोगी? उस लड़के के घरवालों के साथ इतनी हमदर्दी है, तो मेरे साथ इतनी दुश्मनी क्यों कर रही हो? सारी पिक्चर का मजा किरकिरा करके रख दिया। पगली कहीं की! अब ज्यादा बकबक की तो मैं हाल छोड़कर चला जाऊँगा।'
सत्या सुन्न हो गई। पिक्चर चलती रही, परंतु वह स्थिर थी। इंटरवल हुआ। पिक्चर फिर शुरू हुई, परंतु वह स्थिर ही रही, न हिली, न डुली, न कोई बात की। दूसरे दिन सुबह जीवन उठा, तो सत्या चाय का प्याला सामने रखती हुई बोली, 'सुनो, देखो सुबह-सुबह नाराज मत होना। अब इतना तो करो कि अर्जुन के पिता को बता आओ कि वह हमें कल सिनेमा में मिला था। बेचारों की कुछ चिंता तो दूर हो।'
परंतु जीवन के मुँह में कल का कसैलापन पूरी तरह बाकी था। वह सख्ती से बोला, 'मुझे क्या गरज पड़ी है। मैंने क्या दुनिया का ठेका ले रखा है? तुम्हें बड़ी हमदर्दी है तो जाओ, रोकता कौन है?' सत्या चुप होकर बिस्तर सँभालने लगी। इतने में दरवाजे पर खटखट हुई। सत्या ने दरवाजा खोला। जीवन ने अंदर बैठे-बैठे ही सुना, कोई स्त्री कह रही थी, 'बहन, तुम्हारी बड़ी मेहरबानी! अर्जुन रात को ही घर आ गया था। तुम उसे सिनेमा में मिली थी न। तुमने उसे खूब डाँटा था न...। बस, वह सीधा घर आ गया। बहन, तुम्हारी बहुत मेहरबानी। तुमने मेरे बेटे को मिलाया, मेरा दिल ठंडा कर दिया।'
इस तरह जीवन बाहरी ठंडक महसूस करना चाहता था पर सत्या किसी के दिल को ठंडक देना चाहती थी| जिसके कारण उनके जीवन में आनंद वापस आ गया था| सत्या के कारण घर से भागा हुआ बेटा घर वापस आजाता है| जो उस मां के दिल को ठंडा कर देता है| जिस ठंडक को जीवन सत्या को अनुभूत करना चाहता था वास्तव वह ठंडक उसके दिल में ही है| जिसके कारण वह परायों को भी अपना बना लेती है| अत: लेखन ने इसी अंदर की ठंडक का महत्व इस कहानी के माध्यम से चित्रित किया है| अंदर की ठंडक यांनी दिल का साफ होना| इसका एहसास इस कहानी के माध्यम से दिया है|
बहुविकल्पी
प्रश्न
1) 'ठंडक' महीप सिंह लिखित कहानी है|
2) 'ठंडक' कहानी की नायिका सत्या है|
3) सत्या के पति का नाम जीवन है|
4) आस- पास के कोलाहल को सून सत्या को शहर आने का एहसास हुआ था|
5) जीवन सत्या को सिनेमा
दिखाने के लिये ले गया था|
6) ठंडी में घुमने के लिए अमीर लोग पहाडों पर जाते है|
7) सिंधी मनसुखानी का बेटा अर्जुन है|
8) अर्जुन
तीन से घर से गायब था|
9) जीवन बाहरी ठंडक महसूस करना चाहता था पर सत्या किसी के दिल को ठंडक देना चाहती थी|
10)
कहानी के प्रारंभ में जीवन एयरकंडीशंड सिनेमा
हाल कि गर्व से बात कर रहा था|
11)
जीवन को सिनेमा हाल के बाहर की भीड मेले जैसी लग रही थी|
12)
सत्या दो महीने हुए, अपने छोटे-से नगर से वह इस महानगरी में आ गई थी।
13)
सत्या जिसे अर्जुन समझ रही थी उसका असली नाम किसन
है|
14)
जीवन को पास में दो टिकट होने का संतोष था|
15)
सत्या ने अर्जुन को डांटा था|
16)
अर्जुन के परिवार के प्रति सत्या की भावनाओं को देख जीवन नाराज
होता है|
Modul 4.0
कहानियां
युनिट नं 4.1
एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया
एक समय की बात है । एक विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग के एक प्रतिष्ठित अध्यापक थे , जिनका नाम द्रोणाचार्य था । पद - क्रम के अनुसार वे ' रीडर ' कहलाते थे । ' रीडर ' उस अध्यापक को कहते थे, जिसे कक्षा में पढ़ाना नहीं आता था और वह पाठ्य-पुस्तक या कुंजी कक्षा में पढ़कर काम चला लेता था ।आचार्य द्रोणाचार्य के दो शिष्य थे । एक का नाम अर्जुनदास था और दूसरे का एकलव्यदास । अर्जुनदास एक धनी बाप का बेटा था , जिनका समाज में प्रभाव था और राजदरबार में भी उनका मान होता था । आचार्य रोज़ अर्जुनदास के घर जाते थे और अर्जुनदास भी रोज़ उनके घर आता था । उनका साथ इतना घना था कि कोई यदि आँखें बन्द करके आचार्य प्रवर की कल्पना करता , तो आचार्य का शरीर कल्पना में आते-आते उसमें एक दुम निकल आती और दुम के छोर पर अर्जुनदास का चेहरा बन जाता । एकलव्य ग़रीब आदमी का लड़का था , इसलिए उसे आचार्य का साक्षात्कार बहुत कम होता था । पर गुरु के प्रति उसकी भक्ति थी । उसने अपने कमरे में द्रोणाचार्य का एक चित्र टाँग रखा था और उनकी लिखी हुई एक कुंजी सिरहाने रखकर सोता था । दोनों शिष्य एम . ए . की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे । ( एम. ए. एक ऐसी परीक्षा थी जिसे पढ़ने के बाद तीन वर्ष का बेकारी का कोर्स पढ़ना पड़ता था।-सं. ) अर्जुन जानता था कि विद्या पढ़ने से नहीं , बल्कि गुरु-कृपा से प्राप्त होती है । वह निरन्तर गुरु की सेवा में रहता था । वह आचार्य के घर में किराना , कपड़ा , सब्जी आदि पहुँचाता था । त्योहार पर आचार्य के पाँच बच्चों को बाजार ले जाता और उन्हें मिठाई , कपड़े , खिलौने आदि खरीद देता । वह आचार्या को सिनेमा - नाटक दिखाता था और अन्य अध्यापकों की पत्नियों की कलंक - कथाएँ गढ़कर , उन्हें सुनाकर उनका मनोरंजन करता था । वह आचार्य के कुशल - क्षेम पर ध्यान देता था । रात को उनके सामने अन्य आचार्यों की निन्दा करता था , जिससे उनकी आत्मा का उत्थान होता था । उधर एकलव्य गुरु सेवा से विमुख होकर रात-दिन अध्ययन में लगा रहता था । एक दिन आचार्य और अर्जुन में इस प्रकार संवाद हुआ : " आचार्यवर , मैं आपके घर में किराना , कपड़ा , सब्जी आदि पहुँचाता हूँ कि नहीं ? " " हाँ वत्स , पहुँचाते हो । "आचार्या को सिनेमा - नाटक कौन दिखाता है ? बच्चों को मिठाई, खिलौने और कपड़े कौन खरीद देता है ? " तू ही , बेटा । तू ही यह सब करता है ।" “क्या कोई दूसरा शिष्य है , जो आपके मुँह पर आपकी प्रशंसा मुझसे अधिक करके आपके मन को प्रसन्न करता हो ? " "नहीं , कोई नहीं ।" " क्या कोई ऐसा अध्यापक बचा है , जिसकी निन्दा न करके मैंने आपके दुखाया हो ? " " नहीं , कोई नहीं बचा , वत्स।" "क्या यह सत्य नहीं कि आपके रीडर बनने में मेरे पिताजी का बड़ा हाथ है ?" "यह सर्वथा सत्य है।" "आगे विभागाध्यक्ष बनने के लिए आप किसकी सहायता लेंगे?" "निःसन्देह तेरे पिता की।" "क्या एकलव्य ने आपकी सेवा की है?" "बिलकुल नहीं ।
उसे तो गुरु की कोई सुझी ही नहीं| वह तो हमेशा निर्जीव ग्रंथों में डूबा रहता है| अच्छा यह बताई गुरुदेव कि आपका प्रिय शिष्य कौन है| तू है वत्स , तू है| तुझ-सा प्रिय शिष्य न कभी हुआ और न कभी होगा| सहसा अर्जुन हाथ जोडकर खडा गया और बोला तो गुरुदेव मुझे वर दीजिए कि मैं ही फर्स्टक्लास फर्स्ट आउं और छात्रवृत्ति लेकर विदेश जाऊ| यह सूनकर आचर्य थोडी दर सोच में पडे रहे और फिर बोले यह तो मैं भी चाहता हूं | पर एकलव्य इसमें बाधक होगा| वह सबसे कुशाग्र बुद्धि और परिश्रमी भी है| अर्जुनदास ने कहा यह मैं कुछ नहीं जानता| मैं तो इतना जानता हूं यही मैं प्रथम नहीं आया तो गुरु की महिमा भंग हो जायेगी| आगे कोई शिष्य गुरु ऐसी सेवा नहीं करेगा और इस अधम परंपरा को आरंभ करने का कलंक आपको लगेगा| आचार्य फिर सोच में पडे| धीरे-धीरे उनके मूख पर निश्चय की दृढता आ गयी| अर्जुन उस क्षण गुरु के उस तेजोदिप्त मूख को देखकर अभिभूत होने लगता था| आचार्य के जीवनभर पुण्य आभा बनकर मूख पर प्रकट हुए थे| आचार्य ने दृढ स्वर में कहा तेरी मनोकामना पूरी होगी
दूसरे दिन आचार्य ने एकलव्य को घर बुलवाया| उसे पूछा वत्स तूने अपने कमरे में मेरा चित्र क्यों टांग रखा है| एकलव्य ने कहा, क्योंकि आप मेरे गुरु है| और मेरी लिखी हुई कुंजीका तू सिरहाने रखकर क्यों सोता है? इसीलिए कि दिन में प्राप्त किया हुआ बिखरा ज्ञान रात में परीक्षा के प्रश्नोत्तरों में सिमटकर बंध जाए| आचार्य ने ध्यान से देखा और फिर कहा यही तू मेरा शिष्य है तो मुझे गुरु दक्षिणा दे| एकलव्य ने उत्तर दिया मैं क्या दे सकता हूं गुरुवर ? न मेरी किराणा की दुकान है, न होजिरी की, न मेरे पिता से भी इमान बेचते कभी नहीं बना, इसीलिए निर्धन है| आचार्य ने कहा मैं वह वस्तु मांगता हूं , जो तेरे पास है| तू मुझे अपने दाहीने हाथ का अंगुठा काटकर दे दे| उठा वह सुपारी काटने का सरोता और काट दे अंगुठा| एकलव्य शांत था| वह मानो इसके लिए तैयार था| उसने कहा गुरु वर अंगुठा तो मैं आपको सहर्ष काट कर दे दूं, पर यह आपके के किस काम आयेगा| आचार्य ने कहा सो मैं नहीं जानता हूं|मुझे एक महान परंपरा का निर्वाह करना है| अर्जुन की भक्ति से मैं प्रसन्न हूं| मैंने उसे वर दिया है कि तू ही प्रथम आयेगा| पर वह तब तक प्रथम नहीं आ सकता तब तक तुम लिखने में असमर्थ न होगा| तू लिख न सके और मेरा वचन पूरा हो इसके लिए मुझे तेरा दाहीना अंगुठा चाहिए| एकलव्य हंसा , बोला मगर दाहीना अंगुठा काट देने से भी आपका उद्देश्य पूरा नहीं होगा गुरुदेव| मैं बाए हाथ से भी उसी कुशलता से लिख लेता हूं| जब से मैंने होश संभाला और अपने नाम पर ध्यान दिया तभी मैं समझ गया कि कोई गुरु कभी मेरा अंगुठा मांगेगा| मैं तभी से दोनों हाथों से लिखने का अभ्यास कर रहा हूं | दोनों अंगुठे कटने से आपका उद्देश्य पूरा हो सकता है, पर शिष्य के दोनों अंगुठे कटवाने की परंपरा तो अभी तक नहीं है |आचार्य निराश होकर बोले अधम तूने गुरु द्रोह किया तूने दोनों हाथों से लिखने का अभ्यास कर लिया खैर मेरे पास दूसरे रास्ते भी है| उस श्याम को आचार्य ने अर्जुनदास से कहा, उसका अंगुठा मैं नहीं ले सका| पर मेरे पास अकाढ्य दांव भी है| उससे वह बच नहीं सकता| तुम्हारा एक पेपर जांचने के लिए मुझे मिलनेवाला है| और दूसरा मेरे परम मित्र देवदत्त शर्मा को| इन दोनों में तुम्हें सौ में से निन्यांवे नंबर मिल जायेंगे| और तुम एकलव्य से आगे निकल जाओगे| उसकी दोनों अंगुठीया कट जायंगे उसकी तीव्र बुद्धि और अध्ययन धरे के धरे रह जायेंगे| अर्जुन निश्चिंत हो गया| उसे गुरु की क्षमता पर विश्वास था| वे विभाग में इतने प्रभावशाली थे कि उनके मर्जी के खिलाफ पत्ता तक नहीं हिलता था| पेपर हो गये| अर्जुनदास और एकलव्य दोनों ने यथा बुद्धि प्रश्नों के उत्तर दिए| एकलव्य के मन में शंका थी | पर अर्जुनदास बिल्कुल निशंक था| उसे गुरु कृपा प्राप्त थी| अंतिम पर्चा करके श्याम को अर्जुन आचार्य के पास आया| आचार्य मुंह लटकाए हुये बैठे थे| अर्जुन का उत्साह ठंडा पड गया| वह आचार्य के मुंह के तरफ देखता रहा| आचार्य ने ठंडी सांसे खींचकर कहा मैं अधम हूं| मैं अपना वचन पूरा नहीं कर सकुंगा| भविष्य में कोई शिष्य गुरु की सेवा नहीं करेगा और आगामी गुरुओं की पीढीयां मुझे धित्कारेगी| क्योंकि मैं जो चाहा था वह नहीं कर सका| अर्जुन ने पूछा पर क्या हुआ गुरुदेव?आचर्य बोले धोका हुआ| पेपर जांचने न मुझे मिला न देवदत्त शर्मा को | उपकुपति ने अपने हाथ से किन्ही अज्ञात व्यक्तियों को पेपर दे दिया है|अर्जुन ने कहा पर ऐसा हो कैसे गया? पेपर किसे जाना है यह आपने ही तय कराया था| आचार्य बोले पर एकलव्य ने मेरी रिपोर्ट कर दी थी | गुरु शिष्य दोनों सर झुकाये बडी देर तक बैठे रहे| अर्जुन ने कहा गुरुदेव प्राचीन काल में भी एक एकलव्य हो गया है न? आचार्य बोले हां, पर उसमें और इसमें बडा अंतर है| वह पुण्य का युग था, यह पाप का युग है| उस एकलव्य ने बिना तर्क किए अंगुठा गुरु को दे दिया था, इस एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखला दिया है|
प्रश्न
1) ‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ कहानी का कथ्य|
2) ‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ कहानी का एकलव्य|
3) ‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ कहानी का अर्जुन|
4) ‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ कहानी में चित्रित व्यंग्य|
उत्तर
‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य कहानी है| जिसमें लेखन ने गुरु की नीतिमत्ता पर व्यंग्य किया है| शिष्यों के प्रति गुरु की नीतिमत्ता हमेशा एक समान होनी चाहिए| उसने शिष्यों का मुल्यांकन उसकी योग्यता के बल पर करना है न कि उसने दी हुए प्रलोभनों को देखकर करना है| अगर वह ऐसा करेगा तो आज का शिष्य यह होने नहीं देगा| कारण आज का शिष्य गुरु से भी ज्ञानवान है| वह अपनी परंपरा को नहीं भूला पर उस पर जब अन्याय हो रहा है इसका जब उसे एहसास होता है, तब वह शांत नहीं रहता है| उसका उत्तर देता है| कारण आज का शिष्य अंगुठा काटकर देनेवाला नहीं तो अंगुठा दिखानेवाला है| इसका एहसास गुरु को दिया है| अगर उसने अपने नीतिमत्ता में बदलाव नहीं किया तो परंपरा से चला आ रहा गुरु-शिष्य का रिश्ता यूं ही समाप्त हो जायेगा| अगर हमारी इस परंपरा को बनाए रखना है, तो गुरु का व्यवहार निष्पक्षपाती ही होना चाहिए, तभी समाज में गुरु के प्रति आदर बनाए रहेगा| वरना गुरु को पछ्तावा करना पडेगा इसका एहसास प्रस्तुत व्यंग्य रचना में दिया है |
साथ में इसमें शिष्य को भी यह सलाह दी है की उसे भी मेहनत और प्रामाणिकता से अध्ययन करना है तभी उसे सफलता मिलेगी अन्यथा उसे भी पछ्तावा ही करना पडेगा| यह भी इसमें बताने का प्रयास किया है|
विश्वविद्यालय
के राजनीति के प्रतिष्ठित अध्यापक द्रोणाचार्य के शिष्य है अर्जुन और एकलव्य|
अर्जुन गुरु को भेंट वस्तुएं देकर प्रसन्न करता है और कहता है अब कि बार परीक्षा
में उसे ही अव्वल नंबर मिलने चाहिए| गुरु भी उसे वाद करते है, पर इसमें एकलव्य कि
बाधा है| इसीलिए द्रोणाचार्य इस बाधा को रोकने के लिए उसके घर जाते है| परंतु
एकलव्य के पास न बडा घर है, न
उसके पास गुरु को देने के लिए ज्यादा धन है| परंतु व्ह प्रामाणिकता से
मेहनत कर रहा है| गुरु को भी विश्वास है एकलव्य ही इस परीक्षा में जीत जायेगा,
परंतु अर्जुन को वचन दिया है, इसीलिए वह एकलव्य को अपने दाहीने हाथ का अंगुठा
मांगते है| परंतु आज के युग का एकलव्य है| उसे पता था कि भविष्य उसे साथ ऐसा कुछ
होगा इसीलिए उसने दोनों हाथों से लिखने का प्रयास किया है| इसीलिये उसका अंगुठा
लेकर भी गुरु को कुछ लाभ नहीं होनेवाला| आगे पेपर हो जाते है | वे जांचने के लिए न
उनके पास आते है या देवदत के पास, तो अन्य प्राध्यापक के पास जाते है| चाहकर भी
द्रोणाचार्य कुछ कर नहीं सके कारण ‘एकलव्य ने
गुरु को अंगुठा दिखाया’
बहुविकल्पी प्रश्न
1) ‘एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया’ हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य कहानी है|
2) एक विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग के एक प्रतिष्ठित अध्यापक थे , जिनका नाम द्रोणाचार्य था ।
3) 'रीडर ' उस अध्यापक को कहते थे, जिसे कक्षा में पढ़ाना नहीं आता था और वह पाठ्य-पुस्तक या कुंजी कक्षा में पढ़कर काम चला लेता था ।
4) आचार्य द्रोणाचार्य के दो शिष्य थे|
5) अर्जुनदास एक धनी बाप का बेटा था|
6) एकलव्य ग़रीब आदमी का लड़का था|
7) एकलव्य ने अपने कमरे में द्रोणाचार्य का एक चित्र टाँग रखा था|
8) अर्जुनदास और एकलव्यदास एम . ए . की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे ।
9) अर्जुन जानता था कि विद्या पढ़ने से नहीं , बल्कि गुरु-कृपा से प्राप्त होती है ।
10) अर्जुनदास
गुरु की सेवा करता है|
11)आचार्य के पांच बच्चे
हैं|
12) एकलव्य तो गुरु की कोई सुझी ही नहीं| वह तो हमेशा निर्जीव ग्रंथों में डूबा रहता है|
13) द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य अर्जुनदास
हैं|
14) अर्जुनदास फर्स्टक्लास फर्स्ट आकर और छात्रवृत्ति लेकर विदेश जाना चाहता है|
15) एकलव्य ने
गुरु को अंगुठा दिखाया|
16) दोनों हाथ से लिखने के सराव एकलव्य को
था|
Modul 4.0
कहानियां
युनिट नं 4.2
सिलिया – सुशीला टाकभौरे
(मूल कहानी)
नानी प्यार से उसे सिलिया ही कहती थीं। बड़े भैया ने अपनी शिक्षा प्राप्त सूझबूझ के साथ उसका नाम शैलजा रखा था। माँ-पिताजी की वह सिल्ली रानी थी।
सिलिया ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। साँवली-सलोनी, मासूम-भोली, सरल और गम्भीर स्वभाववाली सिलिया स्वस्थ देह के कारण अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही लगती थी। इसी वर्ष 1960 की सबसे अधिक विशिष्ट घटना घटी, हिन्दी अखबार 'नई दुनिया' में विज्ञापन छपा- 'शूद्र वर्ण की वधू चाहिए'। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जाने माने युवा नेता सेठी जी अछूत कन्या के साथ विवाह करके समाज के सामने एक आदर्श रखना चाहते थे। उसकी केवल एक ही शर्त थी कि लड़की कम-से-कम मैट्रिक हो।
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के इस छोटे गाँव में भी विज्ञापन को पढ़कर हलचल मची थी। गाँव के पढ़े-लिखे लोगों ने, ब्राह्मण-बनियों ने सिलिया की माँ को सलाह दी, "तुम्हारी बेटी तो मैट्रिक पढ़ रही है, बहुत होशियार और समझदार भी है, तुम उसके फोटो, नाम, पता ओर परिचय लिखकर भेज दो। तुम्हारी बेटी के तो भाग्य खुल जाएँगे, राज करेगी। सेठी जी बहुत बड़े आदमी हैं, तुम्हारी बेटी की किस्मत अच्छी है...."
सिलिया की माँ अधिक जिरह में न पड़ केवल इतना ही कहतीं, "हाँ भैया जी... हाँ दादा जी... हाँ बाई जी, सोच-विचार करेंगे।"
सिलिया के साथ पढ़नेवाली सहेलियाँ उसे छेड़ती, हँसती और मजाक करतीं, मगर सिलिया इस बात का कोई सिर-पैर नहीं समझ पाती। उसे बड़ा अजीब लगता, "क्या कभी ऐसा भी हो सकता है?"
इस विषय में घर में भी चर्चा होती। पड़ोसी और रिश्तेदार कहते, "फोटो और नाम पता भेज दो।"
तब सिलिया की माँ अपने घरवालों को अच्छी तरह समझाकर कहती "नहीं भैया यह सब बडे लोगों के चोंचले हैं। आज सबको दिखाने के लिए हमारी बेटी के साथ शादी कर लेंगे और कल छोड़ दिया तो हम गरीब लोग उनका क्या कर लेंगे? अपनी इज्जत अपने समाज में रहकर ही हो सकती है। उनकी दिखावे की चार दिन की इज्जत हमें नहीं चाहिए। हमारी बेटी उनके परिवार और समाज में वैसा मान-सम्मान नहीं पा सकेगी, न ही फिर हमारे घर की ही रह जाएगी, न इधर की न उधर की, हमसे भी दूर कर दी जाएगी। हम तो नहीं देवें अपनी बेटी को। हम उसको खूब पढ़ाएँगे-लिखाएँगे। उसकी किस्मत में होगा तो इससे ज्यादा मान-सम्मान वह खुद पा लेगी।"
बारह साल की सिलिया डरी, सहमी-सी एक कोने में खड़ी थी और मामी अपनी बेटी मालती को बाल पकड़कर मार रही थी, साथ ही जोर-जोर से चिल्लाकर कहती जा रही थी, "क्यों री, तुझे नहीं मालूम, अपन वा कुएँ से पानी नहीं भर सके हैं? क्यों चढ़ी तू वा कुआँ पर, क्यों रस्सी-बाल्टी को हाथ लगाया?" और वाक्य पूरा होने के साथ ही दो-चार झापड़, घूसे और बरस पड़ते मालती पर। बेचारी मालती, दोनों बाँहों में अपना मुँह छिपाए चीख-चीखकर रो रही थी। साथ ही कहती जा रही थी, "ओ बाई, माफ कर दो, अब ऐसा कभी नहीं करूंगी"।
मामी का गुस्सा और मालती का रोना देखकर सिलिया अपराधबोध का अनुभव कर रही थी। अब अपनी सफाई में बहुत कुछ कहना चाहती थी, मगर इस घमासान प्रकरण में उसकी आवाज धीमी पड़ जाती। मामी को थोड़ा शान्त होते देख सिलिया ने साहस बटोरा, "मामी, मैंने तो मालती को मना किया था, मगर वह मानी ही नहीं। कहने लगी जीजी प्यास लगी है, पानी पिएँगे।" मैंने कहा, "कोई देख लेगा?" तो कहने लगी, "अरे जीजी भरी दोपहरी में कौन देखने आएगा, बाजार से यहाँ तक दौड़ते आए हैं, प्यास के मारे दम निकल रहा है।"
मामी बिफरकर बोली, "घर कितना दूर था, मर तो नहीं जाती। मर ही जाती तो अच्छा रहता, इसके कारण उसे कितनी बातें सुनानी पड़ी।" मामी ने दुःख और अफ़सोस के साथ अपना माथा ठोंकते हुए कहा था, "हे भगवान, तूने हमारी कैसी जात बनाई।"
सिलिया नीचे देखने लगी। सच बात थी। गाडरी मुहल्ला के जिस कुएँ से मालती ने पानी निकालकर पिया था, वहां से बीस-पच्चीस कदम पर ही मामा-मामी का घर था, जिसकी रस्सी-बाल्टी और कुएँ को छूकर मालती ने अपवित्र कर दिया था। वह स्त्री बकरियों के रेवड़ पालती थी। गाडरी मुहल्ले के अधिकांश घरों में भेड़-बकरियों को पालने का और उन्हें बेचने-खरीदने का व्यवसाय किया जाता था। गाडरी मुहल्ले से लगकर ही आठ-दस घर भंगी समाज के थे। सिलिया के मामा-मामी यहीं रहते थे। मालती सिलिया की ही हम उम्र थी। बस साल-छह महीना छोटी होगी, मगर हौसला और निडरता उसमें बहुत ज्यादा थे। जिस काम को न करने की नसीहत उसे दी जाए, उसी काम को करके वह खतरे का सामना करना चाहती थी। सिलिया गम्भीर और सरल स्वभाव की आज्ञाकारी लड़की थी।
मालती को रोता हुआ देख उसे खराब जरूर लगा, मगर वह इस बात को समझ रही थी कि इसमें मालती की ही गलती है, "जब हमें पता है कि हम अछूत दूसरों के कुएँ से पानी नहीं ले सकते तो फिर वहाँ जाना ही क्यों?" वह बकरीवाली कैसे चिल्ला रही थी, "ओरी बाई, दौड़ो री, जा मोड़ी को समझाओ... देखो तो, मना करने के बाद भी कुएँ से पानी भर रही है। हमारी रस्सी बाल्टी खराब कर दई जाने...।" और मामी को उसने कितनी बातें सुनाई थीं, "क्यों बाई, जई सिखाओं हो तुम अपने बच्चों को, एक दिन हमारे मुँड़ पर मूतने को कह देना। तुम्हारे नज़दीक रहते हैं तो का हमारा कोई धरम-करम नहीं है? का मरजी है तुम्हारी साफ़-साफ़ कह दो।" मामी गिड़गिड़ा रही थी, "बाई जी, माफ कर दो। इतनी बड़ी हो गई, मगर अकल नहीं आई इसको। कितना तो मारूं हूँ, फिर भी नहीं समझे।" और मामी वहीं से मालती को मारती हुई घर लाई थी।
"बेचारी मालती!" सिलिया सोच रही थी कि भगवान उसे जल्दी ही अक्ल दे देंगे, तब वह ऐसे काम नहीं किया करेगी।
इसके एक साल पहले की बात है- पाँचवीं कक्षा के टूर्नामिंट हो रहे थे। खेल-कूद की स्पर्धाओं में उसने भी भाग लिया था। अपने कक्षा-शिक्षक और सहपाठियों के साथ वह तहसील के स्कूल में गई थी। उसकी स्पर्धाएँ आरम्भ में ही लेने से जल्दी पूरी हो गई। वह लम्बी दौड़ और कुर्सी दौड़ स्पर्धाओं में प्रथम आई थी। वह अपनी खो-खो टीम की कैप्टन थी और खो-खो की स्पर्धा में उसी के कारण जीत मिली थी। खेल-कूद के शिक्षक गोकुल प्रसाद ठाकुर जी ने सबके सामने उसकी बहुत तारीफ की थी। साथ ही पूछा था, "शैलजा, यहाँ तहसील में तुम्हारे रिश्तेदार रहते होंगे, तुम वहाँ जाना चाहती हो, हमें पता बताओ, हम पहुँचा देंगे।"
सिलिया मामा-मामी के घर का पता जानती थी, मगर शिक्षकों के समक्ष उनका पता बताने में उसे संकोच हो रहा था। शर्म के मारे वह नहीं बता पायी। उसने कहा, "मुझे तो यहाँ किसी का भी पता मालूम नहीं।"
तब सर ने उसकी सहेली हेमलता से कहा था, "हेमलता, इसे अपनी बहन के घर ले जाओ। शाम को सभी एक साथ गाँव लौटेंगे, तब तक यह वहाँ आराम कर लेगी।"
हेमलता ठाकुर सिलिया के साथ ही पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी बड़ी बहन का ससुराल तहसील में था। उनका घर तहसील के स्कूल के पास ही था। हेमलता सिलिया को लेकर बहन के घर आई। बहन की सास ने हँसकर उनका स्वागत किया। हेमलता को पानी का गिलास दिया। दूसरा गिलास हाथ में लेकर सिलिया से पूछने लगी, "कौन है, किसकी बेटी है, कौन ठाकुर है?", सिलिया कुछ कह न सकी।
हेमलता ने कहा, "मौसी जी मेरी सहेली है, साथ में आई है। इसके मामा-मामी यहाँ रहते हैं, मगर इसे उनका पता मालूम नहीं है।"
बहन की सास उसे ध्यान से देखते हुए विचार करती रही, फिर हेमलता से जाति के विषय में पूछा, हेमलता ने धीरे से बता दिया। उसे लगा जाति सुनकर मौसी जी एक मिनट के लिए चौंकी। पर उन्होंने अपने आप को संयत करते हुए सिलिया से पूछा, "गाडरी मुहल्ला के पास रहते हैं?" सिलिया ने हाँ कहकर सिर झुका दिया। तब मौसी जी ने अतिरिक्त प्रेम जताते हुए कहा, "कोई नहीं बेटी, हमरा भैया तुम्हें साईकिल पे बिठा के छोड़ आएगा।" ऐसा कहते हुए मौसी जी पानी का गिलास लेकर वापिस अन्दर चली गई। सिलिया को प्यास लगी थी, मगर वह मौसी जी से पानी माँगने की हिम्मत नहीं कर सकी।
मौसी जी के बेटे ने उसे गाडरी मुहल्ले के पास छोड़ दिया था। सिलिया रास्ते भर कुढ़ती जा रही थी। आखिर उसे प्यास लगी थी तो उसने मौसी जी से पानी क्यों नहीं माँगकर पिया। तब मौसी के चेहरे पर एक क्षण के लिए आया भाव उसकी नजरों में तैर गया। कितना मुखौटा चढ़ाए रखते हैं ये लोग। मौसी जी जानती थीं कि उसे प्यास लगी है, पर जाति का नाम सुनकर पानी का गिलास लौटा ले गई। "क्या वे पानी माँगने पर इनकार कर देतीं?" सिलिया को यह सवाल साल रहा था।
सिलिया को देखकर मामा-मामी मालती और सभी लोग बहुत खुश थे, बड़े उल्लास के साथ मिल थे, मगर सिलिया हेमलता की बहन की ससुराल से मिली उमस को भूल नहीं पा रही थी। शाम के समय मामा ने उसे स्कूल पहुँचा दिया था। सिलिया का स्वभाव चिन्तनशील बनता जा रहा था। परम्परा से अलग नए-नए विचार उसके मन में आते। वह सोचती- "आखिर मालती ने कौन-सा जुर्म किया था- प्यास लगी, पानी निकालकर पी लिया।" फिर वह सोचती- "हेमलता की मौसी जी से वह पानी क्यों नहीं ले सकी थी? - और अब यह विज्ञापन-उच्च वर्ग का नवयुवक, सामाजिक कार्यकर्ता जाति भेद मिटाने के लिए शूद्र वर्ण की अछूत कन्या से विवाह करेगा – यह सेठी महाशय कस ढोंग है| - आडंबर है या सचमुच वे समाज की, परंपरा को बदलनेवाले सामाजिक क्रांति लानेवाले महापुरुष है|
उसके मन में यह विचार भी आता कि अगर उसे अपने जीवन में ऐसे किसी महापुरुष का साथ मिला तो वह अपने समाज के लिए बहुत कुछ कर सकेगी। लेकिन क्या कभी ऐसा हो सकता है? यह प्रश्न उसके मन से हटता नहीं था। माँ के यथार्थ के आधार पर कहे गए अनुभव कथन पर उसका आस्थापूर्ण विश्वास था। मध्यप्रदेश की जमीन में सन् 60 तक ऐसी फस्ल नहीं उगी थी, जो एक छोटे गाँव की अछूत मानी जानेवाली भोली-भाली लड़की के मन में अपना विश्वास जगा सके। और फिर दूसरों की दया पर सम्मान? अपने निजत्व को खोकर दूसरों के शतरंज का मोहरा बनकर रह जाना, बैसाखियों पर चलते हुए जीना नहीं कभी नहीं! सिलिया सोचती-"हम क्या इतने भी लाचार हैं, आत्मसम्मान रहित है, हमारा अपना भी तो कुछ अहं भाव है। उन्हें हमारी जरूरत है, हमको उनकी जरूरत नहीं। हम उनके भरोसे क्यों रहें। पढ़ाई करूंगी, पढ़ती रहूँगी, शिक्षा के साथ अपने व्यक्तित्व को भी बड़ा बनाऊँगी। उन सभी परम्पराओं के कारणों का पता लगाऊँगी, जिन्होंने उन्हें अछूत बना दिया है। विद्या, बुद्धि और विवेक से अपने आपको ऊँचा सिद्ध करके रहूँगी। किसी के सामने झुकूँगी नहीं। न ही अपमान सहूंगी।" इन बातों का मन-ही-मन चिन्तन-मनन करती सिलिया, एक दिन अपनी माँ और नानी के सामने कहने लगी, "मैं शादी कभी नहीं करूंगी।"
माँ और नानी अपनी भोली-भाली बेटी को ध्यान से देखती रह गईं। नानी खुश होकर बोली, "शादी तो एक-न-एक दिन करना ही है बेटी, मगर इसके पहले तू खूब पढ़ाई कर ले, इतनी बड़ी बन जा कि बड़ी जात के कहलानेवालों को अपने घर नौकर रख लेना।" माँ मन-ही-मन मुस्करा रही थी। सोच रही थी, "मेरी सिल्लो रानी को मैं खूब पढ़ाऊँगी। उसे सम्मान के लायक बनाऊँगी।"
प्रश्न
1) ‘सिलिया’ कहानी की कथावस्तु लिखिए|
2) ‘सिलिया’ कहानी पर
आधारित सिलिया का चरित्र चित्रण कीजिए|
3) ‘सिलिया’ कहानी में
जातिगत विषमता को किस प्रकार चित्रित किया है, स्पष्ट कीजिए|
4) सिलिया की मां|
5) सिलिया की नानी|
6) सिलिया के परिवर्तित
विचार
उत्तर
सिलिया सुशीला टाक भौरे लिखित कहानी है| इसमें 1960 के दशक की दलित समाज के लडकी के परिवर्तीत विचार की कहानी है| समाज में दलितों के प्रति जो छुआछूत की भावना है देख उसका मन दुखी होता है| अत: वह सोचती है कि वह इतना पढेगी कि समाज उसे खुद बखुद सम्मान देगा| अत: दलित समाज के लिए प्रेरणा बनी सिलिया की कहानी यहां प्रस्तुत है|
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के इस छोटे गाँव के लडकी यह कहानी है, जो अछूत परिवार है| जिसका नाम सिलिया है| नानी उसे प्यार से सिलिया कहती, तो पढे-लिखे भाई ने शैलजा नाम रखा था और माता-पिता के लिए वह सिल्ली रानी| ग्यारहवीं कक्षा में पढा रही साँवली-सलोनी, मासूम-भोली, सरल और गम्भीर स्वाभाववाली सिलिया स्वस्थ देह के कारण अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही लगती थी।
सन 1960 की घटना जिसने हलचल मचा दी थी| हिंदी अखबार ‘नई दुनिया’ में एक विज्ञापन छपकर आया था कि 'शूद्र वर्ण की वधू चाहिए'। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जाने माने युवा नेता सेठी जी अछूत कन्या के साथ विवाह करके समाज के सामने एक आदर्श रखना चाहते थे। उसकी केवल एक ही शर्त थी कि लड़की कम-से-कम मैट्रिक हो। गाँव के पढ़े-लिखे लोगों ने, ब्राह्मण-बनियों ने सिलिया की माँ को सलाह दी, "तुम्हारी बेटी तो मैट्रिक पढ़ रही है, बहुत होशियार और समझदार भी है, तुम उसके फोटो, नाम, पता ओर परिचय लिखकर भेज दो। तुम्हारी बेटी के तो भाग्य खुल जाएँगे, राज करेगी। सेठी जी बहुत बड़े आदमी हैं, तुम्हारी बेटी की किस्मत अच्छी है...."
परंतु इस समय उसके मां ने बहुत समझदारी बात की थी| "नहीं भैया यह सब बडे लोगों के चोंचले हैं। आज सबको दिखाने के लिए हमारी बेटी के साथ शादी कर लेंगे और कल छोड़ दिया तो हम गरीब लोग उनका क्या कर लेंगे? अपनी इज्जत अपने समाज में रहकर ही हो सकती है। उनकी दिखावे की चार दिन की इज्जत हमें नहीं चाहिए। हमारी बेटी उनके परिवार और समाज में वैसा मान-सम्मान नहीं पा सकेगी, न ही फिर हमारे घर की ही रह जाएगी, न इधर की न उधर की, हमसे भी दूर कर दी जाएगी। हम तो नहीं देवें अपनी बेटी को। हम उसको खूब पढ़ाएँगे-लिखाएँगे। उसकी किस्मत में होगा तो इससे ज्यादा मान-सम्मान वह खुद पा लेगी।"
इसपर आज सिलिया स्वयं चिंतन कर रही है| माँ के यथार्थ के आधार पर कहे गए अनुभव कथन पर उसका आस्थापूर्ण विश्वास था। मध्यप्रदेश की जमीन में सन् 60 तक ऐसी फस्ल नहीं उगी थी, जो एक छोटे गाँव की अछूत मानी जानेवाली भोली-भाली लड़की के मन में अपना विश्वास जगा सके। परंतु सिलिया के मन में यह विश्वास निर्माण हो रहा था| कारण उसने अपने जीवन में ऐसी छुआछूत की बात अनुभूत की थी|
उसकी मामा-मामी तहसील के गाडरी मुहल्ले में रहते है| उनकी बेटी मालती सिलिया की हमउम्र है| बस साल-छह महीना छोटी होगी, मगर हौसला और निडरता उसमें बहुत ज्यादा थे। जिस काम को न करने की नसीहत उसे दी जाए, उसी काम को करके वह खतरे का सामना करना चाहती थी। एक दिन मालती ने गाडरी मुहल्ले के कुएं से पानी पिया था| वहां से बीस-पच्चीस कदम पर ही मामा-मामी का घर था, जिसकी रस्सी-बाल्टी और कुएँ को छूकर मालती ने अपवित्र कर दिया था। इसीलिए बकरीवाली चिल्ला रही थी "ओरी बाई, दौड़ो री, जा मोड़ी को समझाओ... देखो तो, मना करने के बाद भी कुएँ से पानी भर रही है। हमारी रस्सी बाल्टी खराब कर दई जाने...।" और मामी को उसने कितनी बातें सुनाई थीं, "क्यों बाई, जई सिखाओं हो तुम अपने बच्चों को, एक दिन हमारे मुँड़ पर मूतने को कह देना। तुम्हारे नज़दीक रहते हैं तो का हमारा कोई धरम-करम नहीं है? का मरजी है तुम्हारी साफ़-साफ़ कह दो।" मामी गिड़गिड़ा रही थी, "बाई जी, माफ कर दो। इतनी बड़ी हो गई, मगर अकल नहीं आई इसको। कितना तो मारूं हूँ, फिर भी नहीं समझे।" इसीलिये मामी उसे वहां से उसे मारती हुई लेकर आई थी| तब मालती रो भी रही और कहती जा रही थी, "ओ बाई, माफ कर दो, अब ऐसा कभी नहीं करूंगी"। इस समय सिलिया बारह साल की थी डरी, सहमी कोने में खडी रहती| उस वक्त उसे मालती की गलती लगती है| उसे लगता है "जब हमें पता है कि हम अछूत दूसरों के कुएँ से पानी नहीं ले सकते तो फिर वहाँ जाना ही क्यों?" पर वह आज सोचती है "आखिर मालती ने कौन-सा जुर्म किया था- प्यास लगी, पानी निकालकर पी लिया।"
ऐसी ही और एक घटना एक साल पूर्व हुई थी| वह अपने कक्षा-शिक्षक और सहपाठियों के साथ वह तहसील के स्कूल में गई थी। वहां पाँचवीं कक्षा के टूनमिण्ट हो हो रहे थे।वह लम्बी दौड़ और कुर्सी दौड़ स्पर्धाओं में प्रथम आई थी। वह अपनी खो-खो टीम की कैप्टन थी और खो-खो की स्पर्धा में उसी के कारण जीत मिली थी। खेल-कूद के शिक्षक गोकुल प्रसाद ठाकुर जी ने सबके सामने उसकी बहुत तारीफ की थी। साथ ही पूछा था, "शैलजा, यहाँ तहसील में तुम्हारे रिश्तेदार रहते होंगे, तुम वहाँ जाना चाहती हो, हमें पता बताओ, हम पहुँचा देंगे।"
परंतू वह अपने मामा- मामी मुहल्ले का नाम नहीं बता सकी, तब वह दोस्त हेमलता ठाकुर के बहन के घर चली जाती है| उसके बहन यह ससुराल है| वहां बहन की सास ने उसकी जाति पूछी तब पानी का ग्लास वापस लेकर गयी| वास्तव उसे बहुत प्यास लगी थी परंतु बिना पानी पिये वह वहां से अपने मामा मामी के घर चली गयी थी| आज वह सोचती है, "हेमलता की मौसी जी से वह पानी क्यों नहीं ले सकी थी? कारण वह हेमलता की बहन की ससुराल से मिली उमस को भूल नहीं पा रही थी। शाम के समय मामा ने उसे स्कूल पहुँचा दिया था। सिलिया का स्वभाव चिन्तनशील बनता जा रहा था। परम्परा से अलग नए-नए विचार उसके मन में आते। अब यह विज्ञापन-उच्च वर्ग का नवयुवक, सामाजिक कार्यकर्ता जाति भेद मिटाने के लिए शूद्र वर्ण की अछूत कन्या से विवाह करेगा – यह सेठी महाशय कस ढोंग है| - आडंबर है या सचमुच वे समाज की, परंपरा को बदलनेवाले सामाजिक क्रांति लानेवाले महापुरुष है|
उसके मन में यह विचार भी आता कि अगर उसे अपने जीवन में ऐसे किसी महापुरुष का साथ मिला तो वह अपने समाज के लिए बहुत कुछ कर सकेगी। लेकिन क्या कभी ऐसा हो सकता है? यह प्रश्न उसके मन से हटता नहीं था। माँ के यथार्थ के आधार पर कहे गए अनुभव कथन पर उसका आस्थापूर्ण विश्वास था। मध्यप्रदेश की जमीन में सन् 60 तक ऐसी फस्ल नहीं उगी थी, जो एक छोटे गाँव की अछूत मानी जानेवाली भोली-भाली लड़की के मन में अपना विश्वास जगा सके। और फिर दूसरों की दया पर सम्मान? अपने निजत्व को खोकर दूसरों के शतरंज का मोहरा बनकर रह जाना, बैसाखियों पर चलते हुए जीना नहीं कभी नहीं! सिलिया सोचती-"हम क्या इतने भी लाचार हैं, आत्मसम्मान रहित है, हमारा अपना भी तो कुछ अहं भाव है। उन्हें हमारी जरूरत है, हमको उनकी जरूरत नहीं। हम उनके भरोसे क्यों रहें। पढ़ाई करूंगी, पढ़ती रहूँगी, शिक्षा के साथ अपने व्यक्तित्व को भी बड़ा बनाऊँगी। उन सभी परम्पराओं के कारणों का पता लगाऊँगी, जिन्होंने उन्हें अछूत बना दिया है। विद्या, बुद्धि और विवेक से अपने आपको ऊँचा सिद्ध करके रहूँगी। किसी के सामने झुकूँगी नहीं। न ही अपमान सहूंगी।" इन बातों का मन-ही-मन चिन्तन-मनन करती सिलिया, एक दिन अपनी माँ और नानी के सामने कहने लगी, "मैं शादी कभी नहीं करूंगी।"
माँ और नानी अपनी भोली-भाली बेटी को ध्यान से देखती रह गईं। नानी खुश होकर बोली, "शादी तो एक-न-एक दिन करना ही है बेटी, मगर इसके पहले तू खूब पढ़ाई कर ले, इतनी बड़ी बन जा कि बड़ी जात के कहलानेवालों को अपने घर नौकर रख लेना।" माँ मन-ही-मन मुस्करा रही थी। सोच रही थी, "मेरी सिल्लो रानी को मैं खूब पढ़ाऊँगी। उसे सम्मान के लायक बनाऊँगी।"
इस प्रकार सिलिया अपने समाज में परिवर्तन करने के बात सोचती है, जिसके लिए उसने पढाई का रास्ता अपनाया हैं|
बहुविकल्पी प्रश्न
1)
‘सिलिया’ कहानी की लेखिका सुशीला टाकभौरे है|
2)
‘सिलिया’ कहानी की नायिका सिलिया
है|
3)
सिलिया को नानी प्यार से उसे सिलिया ही
कहती थीं।
4)
बड़े भैया ने उसका नाम शैलजा रखा था।
5) माँ-पिताजी की वह सिल्ली
रानी थी।
6) सिलिया ग्यारहवीं कक्षा
में पढ़ रही थी।
7) ‘सिलिया’ कहानी में 1960 की घटना का चित्रण है|
8) हिन्दी अखबार 'नई दुनिया' में विज्ञापन छपा- 'शूद्र वर्ण की वधू चाहिए'।
9) मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जाने माने युवा नेता
सेठी जी अछूत कन्या के साथ विवाह करके समाज के सामने एक आदर्श
रखना चाहते थे।
10) सिलिया मध्यप्रदेश के होशंगाबाद
जिले
के इस छोटे गाँव की है|
11) मामी के बेटी का नाम मालती है|
12) खेल-कूद के शिक्षक गोकुल
प्रसाद ठाकुर जी ने सबके सामने सिलिया की बहुत तारीफ की थी।
13) सिलिया अपनी खो-खो टीम
की कैप्टन थी|
14) सिलिया की सहेली हेमलता है|
15) हेमलता ठाकुर सिलिया
के साथ ही पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी।
16) सिलिया के मामा-मामी तहसील में गाडरी
मुहल्ले के पास रहते है|
17) सिलिया हेमलता
की बहन की ससुराल से मिली उमस को भूल नहीं पा रही थी।
Modul 4.0
कहानियां
युनिट नं 4.2
बेटी- मैत्रेयी पुष्पा
(मूल कहानी)
धूल नहाए पैरों से जिस रेत-भरे रास्ते पर मैं चल रही थी वह तनिक भी जजनबी नहीं था। यहाँ होकर तो मैं अपने बचपन में रोज स्कूल जाती रही हूँ। गाँव से सारे विद्यार्थी सुबह-सवेरे ही बस्ता लादेकर चल देते थे और भाग-भूगकर स्कूल के घंटा बजने का वक्त पकड़ ही लेते थे। मैं मन-ही-मन बड़ी दुखी होती थी-'मेरी माँ को भी न जाने क्यों मुझे पढ़ाने की धुन सवार है ?' मेरी सहेलियाँ पढ़ाई से मुक्त गाँव में ही उपले थापतीं, जाड़ों की धूप में बैठी खिलखिलातीं, रोटी बनाना सीखतीं और गीत गातीं। इन सभी कलाओं से वंचित होने का दुःख मेरे नन्हे कलेजे में हर वक्त सालता था।
जिस राह से मैं स्कूल भागी हुई जा रही होती थी, उसी रास्ते पर मेरी अभिन्न सखी मुन्नी के खेत थे। वह वहीं अपने पिता के साथ खेतों में बुवाई कराती मिलती, कभी पानी लगा रही होती और कभी रहट हाँक रही होती। मुझे मुन्नी से ईर्ष्या होने लगती थी कि उसके मजे हैं, चाहे जब घर चली जाएगी, रोटी खाएगी और फिर खेलेगी, बस। एक मैं हूँ... सारे दिन पढ़ाई में लगी रहूँगी, कभी न याद होने वाले इतिहास, भूगोल को मास्टरजी के डर से जोर-जोर से रहूँगी, फिर चार किलोमीटर पैदल चलूँगी, तब कहीं लौटकर घर का दरवाजा देख पाऊँगी भूख के मारे अलग बुरा हाल।
लौटकर ही मुन्नी से मिलना हो पाता था। मुझे देखते ही वह भागकर मेरे घर आ जाती-फिर जिस ललचाई निगाह से मेरे बस्ते की ओर देखती मुझे आज भी उसकी वह ललक-दृष्टि याद है। लेकिन उस समय वह मुझे निरी मूर्ख लगती-भला पढ़ाई के लिए क्या ललकना ? मेरे खयाल से उस समय पढ़ाई से ज्यादा नीरस कोई दूसरा काम नहीं था, लेकिन मुन्नी हमेशा मेरी किताबों को उलट-पलट करती रहती। मेरी और उसकी रुचियाँ सर्वथा भिन्न होते हुए भी हम न जाने किस सूत्र से एक-दूसरे से बँधे हुए थे। उसे छोड़कर मुझे स्कूल जाना जरा भी नहीं रुचता था। बहुत बार मैं स्कूल के रास्ते में मुन्नी के खेतों पर रह जाती और उसके साथ रहट हँकवाती रहती। कितनी बार उसकी माँ से भी मिन्नत की थी-
"चाची, मुन्नी को स्कूल भेज दो न !"
"अरी बिटिया, क्या कहती हो ! वह लड़की जात, कहाँ जाएगी और क्या करेगी पढ़-लिखकर ! तुम्हारी बात और है वसुधा, अकेली औलाद, बेटा-बेटी तुम्हीं हो अपनी माँ की, सी जिन्दगी-भर पढ़ो तो कोई कुछ कहनेवाला नहीं, बाप न भइया।"
बेटी / 93
इतना लम्बा तर्क सुनकर मैं भी चुप हो गई। क्या कहती इसके आगे ! मैंने भी सोच लिया, मेरे पढ़ने का यही कारण है, नहीं तो माँ मुझे भी घर का काम सिखाती। वह लड़कपन था, शिक्षा का लाभ मुझे दिखता भी कैसे ?
इतवार का दिन था, मैंने बाल धोए थे... सुखाने छत पर पहुँच गई। मुन्नी के घर की छत से ही हमारी छत भी मिली थी। कुछ ही क्षण पश्चात् मेरे कानों में मुन्नी की आवाज पड़ने लगी-
"अम्मा, तुम मेरे साथ जो कर रही हो, वह कुछ अच्छा नहीं कर रहीं। तुम पाँच-पाँच लड़कों को पढ़ा सकती हो, लेकिन मेरे लिए तुम्हारे घर अकाल है...मेरी किताब-कॉपी के पैसे तुम्हें भारी हैं अम्मा !"
"रोज एक ही बात की हठ करती है तू। हमने कह दिया न, नहीं पढ़ा सकते तुझे..." उसकी माँ ने एक बात खींच के कह दी थी।
"क्यों नहीं अम्मा, मुझे क्यों नहीं ?"
"चुप होती है कि नहीं ? बहुत जबान चल गई है तेरी। तू लड़कों की बराबरी करती है ! बेटे तो बुढ़ापे की लाठी हैं हमारी, हमें सहारा देंगे। तू पराए घर का दलिद्दर। तेरी कमाई नहीं खानी हमें... कह दिया, कान खोलकर सुन ले।" मुन्नी इसके आगे क्या कहती ? एक ही हाँक में चुप हो गई। मैं इतना तो अवश्य समझती थी कि मुन्नी बड़ी चतुर और बुद्धिमान लड़की थी। अगर उसे पढ़ाया जाता तो वह अति प्रतिभाशाली छात्रा साबित होती, अपने भाइयों के मुकाबले वह कुशाग्रबुद्धि बालिका थी।
पढ़ाई के अतिरिक्त मुन्नी उन सारी विद्याओं में पारंगत हो गई थी जिन्हें सीखने का जरा-सा भी अवसर वह पा सकी। उसकी जैसी पाक-कला मुश्किल से ही देखने को मिलती। ढोलक पर थाप देकर गाना उठाती तो गली में चलते लोग एक पल को रुक जाते। पड़ोस में पंडितजी के हितेश की शादी में जब मुन्नी नाची थी तो मुझे अपनी सारी विद्या धूल नजर आने लगी थी। कैसी वाह-वाह हुई थी उसकी ! उसकी देह में अभूतपूर्व सौन्दर्य जगमगा उठा था... कमर की लचक के साथ ही घाघरा ऐसे घूम रहा था मानो जमीन नाच उठी हो। सिलाई-कढ़ाई में अति प्रवीण। वह मेरी सखी पूरे गाँव में अपना लोहा मनवा चुकी थी।
वह अपनी अम्मा की सारी जिम्मेदारी उठाकर घर का सारा काम करती रही। मुँह अँधेरे भाइयों के लिए पराँठे सेंकती रही, उन्हें स्कूल भेजती रही, उनके कपड़े धोती रही, पिता के साथ खेत में काम कराती रही और बासी-कूसी रोटी खाकर चन्द्रकला-सी बढ़ती रही। फिर भी ब्याह के कारण अपने माता-पिता की चिन्ता का विषय बनती रही। लेकिन चाचा को मुन्नी की शादी के लिए भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ी। वह रूपवती, गुणवती बड़ी सरलता से अपनी रिश्तेदारी में ब्याहकर चली गई।
जब वह गई तो मुझे लगा था कि जैसे मेरा कलेजा आधा कटकर रह गया हो। मुझे जितना कष्ट हुआ था, उसकी माँ उतनी ही आश्वस्त हो गई थीं। मुन्नी के जन्म से ही जिस भार को उन्होंने महसूस किया था, उससे मुक्त हो जाना अपने में एक अहम
94 / ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ
काम था। अब क्या था चाचा-चाची के यहाँ। सिर्फ लडके रह गए थे... उनका क्या, 'चैक' हैं कभी भुना लो... अपनी मनमर्जी पर निर्भर है। यही धारणा उनके लिए आनन्ददायिनी धी।
तो उसे ब्याहकर गंगा नहा चुके थे। वह आती तो एक धोती और डलिया के सामान मुन्नी गाँव आती-जाती तो थी... मायके आने की रस्म अदा करने, बस। चाचा-चाची का वजन ही पड़ जाता चाचा पर... बेटी दे ही क्या सकती है, लेकिन उसके मन में माँ के प्रति जो लगाव था, पिता के वात्सल्य का अथाह सागर था...उस पर किसी की दृष्टि कहाँ जाती थी ! वहाँ तो पुत्र-मोह का ऐसा ताना-बाना बुना पड़ा था जिसमें से मुन्नी झाँक तो सकती थी लेकिन उसके पार माता-पिता के स्नेह-आँचल तक नहीं पहुँच सकती थी।
समय बीतने लगा... लड़कों की शादियाँ होने लगीं। पढ़ाई-लिखाई में ऐसा खास तो कोई लड़का निकला नहीं। एक अवश्य जूनियर इंजीनियर हो गया। वह सबसे बड़ा था। ब्याह भी खूब दान-दहेज के साथ हुआ उसका... चाची के पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, लेकिन दूसरी बार आकर ही बहू ने सारा सामान समेटा और ऐलान कर दिया कि इस गँवई-गाँव में वह एक पल भी नहीं रह सकती... लड़का बीवी का सामना कहाँ कर सकता था... दबी जुबान से उसके समर्थन में ही खड़ा हो गया। अगले दिन ही दोनों हल्द्वानी को विदा हो गए। एक बार आया तो वह नकद रुपए भी ले गया, जो चाचा ने उसकी ससुराल से दहेज स्वरूप प्राप्त किए थे... किराए के मकान की मुश्किलें दिखाकर तथा नया फ्लैट लेने की योजना बताकर ।
विवाह होते गए, बहुएँ आती गईं, लड़कों के तेवर बदलते गए। दूसरे नम्बर का लड़का वहीं गाँव में ही दुकान करने लगा था अतः जाता कहाँ, लेकिन उसकी बहू असल बनिये की बेटी आई। चाचा-चाची की चाय-चीनी तक का हिसाब बड़ी तंगदिली से रखने लगी, अतः चाची उस कुलवधू से अलग चूल्हा कर बैठी।
इस प्रकार कोई किसी तरह, तो कोई किसी बहाने सब अपना-अपना अलग घोंसला बना बैठे। चाचा-चाची निपट अकेले-न्यारे पूत पड़ोसी दाखिल हो गए। मुन्नी के रहते चाची ने तवे पर चंदिया नहीं डाली थी लेकिन बुढ़ापे में तो खटना लिखा था। आँखें साथ नहीं देती थीं। धुँधला दिखने लगा था। घुटने के जोड़ अलग अकड़ने लगे थे। लड़कों के साथ बुढ़ापे ने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए। इसके अलावा पाँच-पाँच बहुओं की सास अपनी चार रोटी अलग डाले... इस तौहीन का दंश कहीं गहरे टीसता था। आस-पड़ोस में निकलने में भी झिझक लगती थी। अभी तक तो पाँच पुत्रों की माँ होने की उसक में अकड़कर रही थीं, सिर उठाकर चली थीं और मुहल्ले में सौभाग्य की प्रतीक बनकर रही थीं। कर भी क्या सकती थीं! कभी-कभी चाचा ही उफन जाते।
"अरे घर-घर चूल्हे मिट्टी के हैं। आजकल कौन किसी की मानता है।" कहकर चाचा को शान्त कर देतीं।
बहुत दिनों बाद मैं अब की बार गाँव आई थी। अपने घर थोड़ी देर ही बैठकर
चाची की कुशलक्षेम लेने उनके घर पहुँच गई।
"चाचीइइ," मैंने आवाज दी लेकिन कोई उत्तर नहीं आया, हालाँकि द्वार में घुसते ही वे मुझे आँगन के पार चौके में बैठी दीख गई थीं, उन्होंने इधर-उधर देखा लेकिन फिर पूर्ववत् चूल्हे की ओर झुक गईं।
"चाचीइइ !"
"कौन है ?" धुँधआते चूल्हे को प्रज्वलित करने का प्रयत्न करते हुए ही बोल रही थीं। पनियाती मोतियाबिंद उतरी आँखें शायद मुझे देख नहीं पा रही थीं। वे मुन्नी की माँ, जिनकी वह कैसी सेवा करती थी, आज ऐसी लाचार !
गई। "चाची... मैं वसुधा।" कहती हुई मैं उस बूढ़ी काया से करीब-करीब सटकर बैठ
"वसुधा बेटी, कब आई ? आँखें अन्धी हो चलीं, दिखाई कहाँ देता है बेटी, सो तुम्हें देख नहीं पाए हम।" इधर-उधर की बातें करती रही उनसे। जल्दी ही मैंने पूछ लिया "चाची, मुन्नी कब से नहीं आई ?"
"मुन्नी... मुन्नी कैसे आवे बिटिया... भाभी, भौजाइयों का घर... यहाँ हम ही निभजाएँ यही बहुत है। अरे क्या बताएँ बेटी, हमारे बनाए घर में से हमें ही निकालने को फिरती हैं ये बहुएँ। खेती-पाती बँटा ली, घर भी ले लेंगे तो हम रहेंगे कहाँ ? तुम न्याय की कहना वसुधा।"
"लड़के कुछ नहीं कहते चाची ?"
"उनकी क्या पूछो बिटिया, घोर कलजुगी हैं। बहुओं के गुलाम हो गए हैं नासपीटे।" चाची क्रोध का लावा उगलते हुए तैश में बोल रही थीं।
मैं भी उनके साथ दुखी हो उठी। कभी ऐसा सोचा नहीं होगा कि पाँचों ऐसे निकल जाएँगे। हमारी उम्मीदें ही हमें कहीं का नहीं छोड़तीं। ये मोहजन्य पीड़ाएँ वृद्धावस्था को और जर्जर करके रख देती हैं।
"मुन्नी को चिट्ठी लिखवाई है बिटिया, पर अपनी घर-गृहस्थी से उसे भी कहाँ फुर्सत होगी!" वे यह कहकर अपने मन को ही तसल्ली दे रही थीं। बेटी से किसी प्रकार की आशा उन्हें थी या नहीं, मैं कह नहीं सकती, लेकिन जिस दिन मुझे इस गाँव से लौटना था, हितेश दौड़ा-दौड़ा आया था मेरे घर-
"वसुधा, मुन्नी आ गई है। तुझे पूछ रही थी।"
है-सुनते ही मैं उसके घर की ओर भागी थी-देखा कि वह सामने से चली आ रही
"अरे वसुधा, खूब मिली अबकी बार।" कहती हुई वह मेरे गले लग गई। आँखें छलछला उठीं हम दोनों की। इस साख्य-भाव में भी न जाने कितने सागर समाए होते हैं!
"जब से गाँव आई हूँ मुन्नी, तुझे ही याद कर रही हूँ।"
"मेरे आने का तो था नहीं वसुधा, अम्मा की चिट्ठी पहुँची...तो अपने को रोक
96 / ललमनियों तथा अन्य कहानियाँ
नहीं पाई। साथ अपनी बेटी को भी ले आई हूँ। वह यहीं रहेगी, अम्मा की रोटियाँ बना दिया करेगी। अम्मा को दिखाई नहीं देता न..." कहते हुए मुन्नी फफककर रो पड़ी। देर तक खड़ी रोती रही, मैं उसे बहलाती रही-
"रो मत मुन्नी, अच्छा किया तूने। लेकिन मूर्ख, यह उसके पढ़ने की उम्र है, यहाँ पढ़ेगी कैसे ?"
"वसुधा, तू भी तो यहीं रहकर पढ़ी थी, ऐसे ही वह भी पढ़ लेगी..." कहकर वह अपनी रक्ताभ आँखें पोंछ रही थी।
प्रश्न
1) ‘बेटी’ कहानी की कथावस्तु लिखिए|
2) बेटी कहानी में बेटियों के प्रति जो परंपरागत दृष्टिकोन
है, उसे किस प्रकार चित्रित किया है, स्पष्ट कीजिए|
3) ‘बेटी’ कहानी की
वसुधा|
4) ‘बेटी’ कहानी की मुन्नी|
5) बेटों से बढकर बेटियां होती है, बेटी कहानी पर आधारित
स्पष्ट कीजिए|
6) ‘बेटी’ कहानी की मुन्नी की मां
उत्तर
‘बेटी’ मैत्रयी पुष्पा लिखित कहानी है| जिसमें लेखिका ने बेटियों के प्रति जो परंपरागत दृष्टिकोन है, उसे चित्रित किया है | बेटियां यानी बोझ| बेटियां पराये घर ही जानेवाली है, इसलिए उसे अधिक पढाना-लिखाना नहीं| बेटे ही बुढापे के आधार होते है| इन परंपरागत विचारों के कारण जन्म से ही बेटियों के साथ दोयम व्यवहार किया जाता है| उसके मन का कभी खयाल नहीं किया जाता| वास्तव में वही बेटी बुढापे में अपने बुढे मां-बाप के मन का खयाल रखती है, जो बेटे कभी नहीं रख पाते इस वास्तविकता को प्रस्तुत कहानी के माध्यम से स्पष्ट किया है और बेटियों का महत्व समाज को बताने का प्रयास किया है|
(पात्र:-वसुधा,
मुन्नी,
चाचा-चाची, मुन्नी के पांच भाई, हितेश(पडोसी))
‘बेटी’ कहानी का प्रारंभ वसुधा के यादों से हुआ है| वसुधा अपने मां-बाप की अकेली संतान है| जिसकी वजह वही मां-बाप के लिए बेटी और बेटा भी है| इसीलिए उसे पढना चाहिए, ऐसे विचार मुन्नी के मां के है| अत: कहानी का प्रारंभ स्कूल
के रास्तों से हुआ है| गांव के सारे विद्यार्थी
सुबह-सबेरे ही बस्ता लादकर स्कूल के रास्ते चल देते थे| परंतु वसुधा स्कूल जाते वक्त बडी दुखी होती| वह दुखी इसीलिए होती थी कारण उसकी सहेलियां पढाई से मुक्त गांव में ही उपलें थापती,जाडों की धूप में बैठी खिलखिलाती,रोटी बनाना सिखतीं और गीत गाती इन सभी कलाओं से वंचित होने का दुख उसके नन्हें कलेजे में हर वक्त सालता था| यह आनंद वह भी लेना चाहती थी पर वह कहती है, “मेरी मां को भी न जाने क्यों मुझे पढाने की धुन सवार है?”
इसीलिए वह अनमने मन से ही स्कूल जाती थी| ऊपर से जिस रास्ते से वह जाती थी उसी रास्ते में उसकी अभिन्न सखि मुन्नी के खेत थे| जहां मुन्नी अपने पिता के साथ खेतों में बुवाई कराती मिलती, कभी पानी लगा रही होती और कभी रहांट हांक रही होती तब उसे मुन्नी से इर्षा होती थी| वह सोचती मुन्नी के कितने मजा है| चाहे जब घर चली जायेगी, रोटी खायेगी और फिर खेलेगी और वह सारे दिन पढाई में लगी रहेगी| और कभी न याद होने वाले इतिहास, भूगोल मास्टर जी के डर से जोर - जोर से रटेगी|चार किलो मिटर चलकर घर वापस आने के बाद भूख के मारे उसका हाल बेहाल हो जाता| वापस आने के बाद कभी कभी मुन्नी से मिलना हो जाता |
मुन्नी उसकी किताबों को देखती रहती| उसकी ललचाई हुई आंखे आज भी उसे याद है| पर वसुधा को उसकी यह बातें निरी मूर्ख लगती थी| उस समय पढाई से ज्यादा निसर और कोई काम हो ही नहीं सकता ऐसा उसे लगता था|
इसीलिए कभी कभी वह मुन्नी के खेत पर रुक जाती| तब वह मुन्नी की मां को अर्थात चाची को मुन्नी को स्कूल भेजने की बात कहती| तब चाची कहती, “वह लडकी जात, कहां जाएगी और क्या करेगी पढ-लिखकर|” तुम्हारी बात अलग है| तुम चाहे जिंदगी भर पढ लो तुम्हें कोई भाई बहन पूछ्नेवाला नहीं| वसुधा भी फिर तर्क लगाती शायद इसीलिए मुझे पढाते है वरना मुझे भी मुन्नी की तरह घर का काम ही सिखाती| उसे शिक्षा का लाभ मिलता ही नहीं| ऐसे ही एक दिन वह छत पर बाल सुखा रही थी| तब मुन्नी की आवाज सुनाई देती है| वह अपने मां से पढाई के जिद्द कर रही थी| वह अपने मां से कह रही थी, तुम पांच-पांच लडकों को पढा सकती हो, पर मेरे लिए तुम्हारे घर अकाल है... मेरे किताब काफी के पैसे तुम्हारे लिए भारी है|
तब अम्मा उस पर क्रोधित होती है| तू लडकों को बराबरी करती है| बहुत जबान चल रही है तेरी कान खोल के सून ले, बेटे तो बुढापे की लाठी हैं हमारे, हमें सहारा देंगे| तू तो पराई घर का दलिद्दर| तेरी कमाई नहीं खानी हमें...कह दिया| इसके बाद मुन्नी बिल्कुल चूप हो गयी|
पर इतना आवश्य था मुन्नी बहुत चतुर और बुद्धिमान लडकी थी| अपने भाईयों के मुकाबले कुशाग्र बुध्दी की बालिका थी| अगर उसे पढाया जाता तो निश्चित कुशाग्र बुद्धि वाली छात्रा साबित होती|
वह
पढाई के अतिरिक्त अन्य बातों में भी पारंगत थी| जिसमें पाक कला, गायन कला,नृत्य कला उच्च कोटी की थी| जब पडोस के पंडित जी के हितेश के शादी में जब मुन्नी नाची थी तब वसुधा को भी अपनी सारी विद्या धूल नजर आने लगी थी| इसके साथ वह सिलाई
में भी प्रवीण थी| पूरे गांव में उसने अपना नाम बना लिया था| इतना नहीं तो उसने अपने अम्मा की सारी जिम्मेदारी उठा ली थी| पिता को खेती में मद्द करती है| भाईयों की लिए खाना पकाती, उन्हें स्कूल भेजती| घर में जो बासी कूसी रोटी मिलती वह खाकर भी वह चंद्रकला के जैसे बढती है| अब चाचा चाची को उसके शादी की चिंता सताने लगी| परंतु उन्हें उसकी रिश्तों के लिए अधिक
भागदौड नहीं करनी पडी कारण वह रूपवती और गुणवती थी|
देखते-देखते उसकी शादी हो
गयी|चाची का भार जैसे हल्का हो गया| अब वह आती केवल रस्म निभाने के लिए और तुरंत वापस जाती| वसुधा को उस वक्त बहुत बुरा लगा था जैसे उसका कलेजा किसी ने काट दिया हो| समय बीतने लगा| मुन्नी के भाई पढाई – लिखाई में कोई खास नहीं निकला| एक ज्युनियर इंजीनियर हो गया था| अब उनकी भी शादियां होने लगी| बडे लडके की शादी हो गयी तब बहुत
दहेज में बहुत दान मिला| तब चाची के पांव जमीन पर नहीं पडे| पर आनंद ज्यादा दिन नहीं टीका| बहू इस गांव को गंवई गांव कहकर अपने पति को हलद्वानी गांव लेकर गयी| बेटा भी बहू आगे कुछ कह नहीं सका| आगे दहेज में जो मिला उसे बेटा लेकर गया| दूसरा बेटा वही गांव में दुकान करने लगा था जिसकी असल बनिये की बेटी से हो जाती है| आते ही उसने चाचा चाची कें चाय- चीनी का हिसाब रखना शुरू
किया| तब चाची में अपना अलग चूल्हा लगाया| इस तरह कोई किसी तरह, कोई किसी बहाने अपना-अपना
अलग घोसला बना बैठा| चाची-चाची निपट अकेले रह गये| जिस चाची ने मुन्नी के रहते तवे पर कभी चंदिया नहीं डाली थी, अब उसी चाची की बुढापे में खटना पड रहा है| आंखे साथ नहीं दे रही थी घुटने के जोड अलग अकडनें लगे थे| अब
चाची को आस- पडोस में निकलने कि झिझक महसूस होती है| पर
चाचा ‘घर-घर मिट्टी के चूल्हे ऐसा कहके वे चाची को शांत कर देते थे| बहुत दिनों बाद वसुधा गांव आई थी चाची की कुशलक्षेम पूछने के लिए उनके घर पहुंचति है | चाचीइइ करके चाची को आवाज देती है पर चाची को अब सूनाई नहीं देता और आंखों से दिखाई भी नहीं देता| तब मुन्नी के बारे में कहती कि बहुत दिन हुए वह नहीं आई| इस चाची कहती है कैसे आवे बिटिया भाभी, भौजाइयों का घर
है यहां निभ ही जाएं बहुत है| चाची इसीलिये ऐसा कहती है कारण बहुएं घर से निकलने पर तुली थी| बेटे तो उनके गुलाम हो गये थे| यह सून वसुधा को दुख हुआ| वह सोचती है, चाची चाची ने कभी ऐसा सोचा न होगा कि पांचों की पांचों ऐसे निकलेंगे| सच हमारी उम्मीदें हमें कही का नहीं छोड्ती| परंतु ये मोहजन्य पीडाएं वृधावस्था को और जर्जर करके रख देती है| बेटी से उन्हें अब उन्हें आशा थी या नहीं पर जब वह वापस जा रही थी हितेश आकर बताता है कि मुन्नी आ गयी है | वह तुरंत दौड पडी | रास्ते में ही दोनों सहेलियां एक दूसरे के गले मिली| कितने दिनों का साख्य भाव दोनों की आंख भर आई|
वसुधा कहती है जब से आई हूं तब से तुम्हारे बारे में पूछ रही हूं| मुन्नी कहती है आने का तो निश्चित नहीं था पर मां की चिट्टी आई इसीलिए दौडी-दौडी आई हूं| अपनी बेटी को भी साथ लेकर आई हूं कम से कम मां को रोटी पकाकर तो देगी| अम्मा को दिखाई नहीं देता न कह मुन्नी रो पडी| पर वसुधा को लगता हैं उसके बेटी की अब पढने की उम्र है वह यहां कैसे पढेगी?मुन्नी इसका जबाब देती कि तू जैसे यहां रहकर पढी थी वैसे यह भी पढेगी|
इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में लेखिका ने यह बताने के प्रयास किया है जिस बेटी के प्रति मां हमेशा दूजा भाव रखती है वास्तव में वही बेटी अपने मां-बाप की भावनाओं को
समझती है| और बुढापे में वही उनका का सहारा बनती है| इसीलिये बेटी को पढाना-लिखाना बहुत जरुरी
है| जिसकी शुरुवात मुन्नी ही करती है|
बहुविकल्पी प्रश्न
1) ‘बेटी’ मैत्रयी
पुष्पा लिखित कहानी है|
2)
‘बेटी’ कहानी की नायिका वसुधा और मुन्नी है|
3)
मैत्रेयी पुष्पा ने
बेटियों के प्रति जो परंपरागत दृष्टिकोन है, उसे
बेटी
कहानी में चित्रित किया है |
4) ‘बेटी’
कहानी का प्रारंभ वसुधा के यादों से हुआ है|
5)
स्कूल के रास्ते में सहेली मुन्नी के
खेत है|
6) मुन्नी
चाहकर भी पढ नहीं सकी|
7)
वह लड़की जात, कहाँ जाएगी और क्या करेगी पढ़-लिखकर !
8) बेटे तो
बुढ़ापे की लाठी हैं हमारी, हमें सहारा देंगे।
9)
पढ़ाई के अतिरिक्त मुन्नी उन सारी विद्याओं में
पारंगत हो गई थी|
10)
हितेश की
शादी में जब मुन्नी नाची थी|
11)
चाचा को मुन्नी की शादी के लिए भाग-दौड़
नहीं करनी पड़ी।
12)
मुन्नी का बडा भाई जूनियर इंजीनियर हो गया था|
13)
बडा भाई हल्द्वानी रहने के लिए गया था|
14)
दूसरे
नम्बर का लड़का वहीं गाँव में ही दुकान करने लगा था|
15)
दूसरे नंबर के लडके की पत्नी असल बनिये की
थी|
16)
मुन्नी के
रहते चाची ने तवे पर चंदिया नहीं डाली थी लेकिन बुढ़ापे में तो खटना लिखा था।
17)
अरे घर-घर चूल्हे मिट्टी के हैं।
18)
मुन्नी के मां की आंखों में मोतियाबिंद हो गया था|
19)
हितेश ने
मुन्नी के आने की खबर दी थी|
20)
मुन्नी ने अपनी मां के लिए रोटी पकाने के लिए अपनी
बेटी को लेकर आयी थी|
21)
वसुधा चार किलोमीटर चलकर स्कूल जाती
थी|
22)
वसुधा मुन्नी के स्वतंत्रता से जलती थी|
23)शादी
के बाद केवळ रस्म निभाने के लिए मुन्नी
मायके आती रही|
24)
गांव में आते ही मुन्नी सबसे पहले वसुधा को मिलती है|
संदर्भ ग्रंथ सूची
1) पत्रकारिता – प्रशिक्षण एवं प्रेस विधि- डॉ. सुजाता
वर्मा, आशीष प्रकाशन कानपुर, प्रथम संस्करण 2005 |
2) मीडिया एवं हिंदी भाषा का स्वरूप :- डॉ. मनीष गोहिल,साधना
प्रकाशन, कानपुर,प्रथम प्रकाशन 2013 |
3) ग्लोबल मीडिया टुडे :- भगवान देव पांडेय, मिथिलेश कुमार
पांडेय, नरेंद्र प्रताप सिंह, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011
4) मीडिया लेखन :- सुमित मोहन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
तृतीय संस्करण, 2013
5)मीडिया लेखन सिद्धांत और व्यवहार :- डॉ. चंद्रप्रकाश
मिश्र, संजय प्रकाशन, दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2003
6) पत्र व्यवहार निर्देशिका :- प्रधान संपादक, डॉ. भोलानाथ
तिवारी, डॉ. विजय कुलश्रेष्ठ,अंकुर प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1986
6) ललमनियों तथा अन्य कहानियाँ:- मैत्रेयी पुष्पा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
7) मानसरोवर भाग 2
:- प्रेमचंद, राजकमल पेपरबैक्स प्रकाशन, दिल्ली, चौथा संस्करण, 2025 हंस प्रकाशन, इलाहाबाद,
प्रथम संस्करण 1966
9) https://bharatdarshan.co.nz/hindi-sahitya/1954/thandak-kahani
10) https://www.hindwi.org/story/pazeb-jainendra-kumar-story
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