राजभाषा हिंदी
1) हिंदी को राजभाषा बनाने का इतिहास -
संविधान में हिन्दी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जब शासन की बागडोर भारतीयों के हाथों में आई तब शासन प्रणाली को तय करने का सवाल उठा। सन् 1947 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के लिए संविधान तैयार करने के लिए एक संविधान सभा की थी । संविधान सभा की प्रथम बैठक दिसंबर, 1946 में हुई। संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष के रूप में डा० राजेन्द्रप्रसाद को चुन लिया गया। संविधान सभा ने अपने कार्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए अनेक समितियों की स्थापना की । इनमें सबसे मुख्य 'प्रारूप समिति थी, जिसने निरन्तर परिश्रम के बाद 21 जनवरी, 1948 को संविधान का प्रारूप तैयार कर लिया। इसपर नवंबर, 1948 में सभा द्वारा विचार-विमर्श हुआ। अन्ततः 26 नवंबर, 1949 को सभा द्वारा उसे अन्तिम रूप से स्वीकार कर लिया गया। 26 जनवरी, 1950 से भारत का यह संविधान लागू हुआ। इसी संविधान सभा में राजभाषा का प्रश्न भी उपस्थित हुआ। स्वतंत्र भारत की राजभाषा को तय करने का सवाल उठा और शिक्षा के व्यापक प्रसार के लिए इसका माध्यम क्या हो, इसपर भी निर्णय करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके पहले इस देश में डेढ़-पौने दो सौ वर्षों तक अंग्रेजों की हुकूमत थी। सरकार की राजभाषा और शिक्षा-माध्यम के रूप में अंग्रेज़ी की सत्ता थी। इस कारण से कई शतियों में भारतीय भाषाओं को समुचित विकास करने का मौका नहीं मिला।देश के सभी कानून आदि अधिकारिक रूप मेंअंग्रेजी भाषा मेंही थे। स्वतंत्र राष्ट्र में एक विदेशी भाषा को राजभाषा के रूप में बनाए रखने के औचित्य पर देश के राष्ट्रीय नेता विचार करने लगे और यह महसूस करने लगे कि अंग्रेजी के स्थान पर किसी भारतीय भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया जाए। अखिल भारतीय स्तर पर एक भारतीय भाषा का चयन करना इसलिए भी आवश्यक महसुस हुआ कि भारत जैसे बहु- भाषा-भाषी देश में, जहां अनेकानेक भाषाओं, बोलियों और उपबोलियो का प्रचलन है, भावात्मक एकता स्थापित करने के लिए संपर्क भाषा नितान्त आवश्यक है। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही देश में धार्मिक, राजनीतिक एवं धार्मिक नेताओं एवं संस्थाओं द्वारा राष्ट्रभाषा की आवश्यकता के लिए व्यापक प्रयास किए जा चुके थे। राष्ट्रभाषा आन्दोलन के परिणामस्वरूप देश में जो वातावरण बना, उससे संविधान सभा के सदस्य परिचित थे ही और वे इस बात पर सहमत ये कि देश में एक ऐसी भाषा अवश्य होनी चाहिए जो भावात्मक एकता को मजबूत करने में सहायक सिद्ध हो और जो अन्तप्रांतिय और केन्द्र सरकार के कार्य के लिए अंग्रेजी का स्थान ले सके। यह बात बिलकुल स्पष्ट थी कि अंग्रेजी के स्थान को लेने के मामले में भारतीय भाषाओं में केवल हिन्दी ही समर्थ थी । इसका यह कारण नही या कि साहित्यिक दृष्टि से हिन्दी अन्य भारतीय भाषाओं से अधिक समृद्ध थी, परन्तु हिन्दी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह था कि वह देश में सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी एवं बोली जाती थी और सदियों से वह अखिल भारतीय स्वरूप को प्राप्त कर चुकी थी । जब संविधान सभा में राजभाषा के रूप में हिन्दी का मामला आया तब कुछ मतभेद अवश्य उठ खड़ा हुआ। हिन्दी के पक्ष और विपक्ष में अनेक बातें कही गई। राष्ट्रीय एकता के लिए भाषा को मानने वालों में भाषा के प्रश्न पर वाद- विवाद शुरू हुआ। इस मतभेद का प्रमुख कारण 'राजभाषा' का नामकरण था। स्वतंत्रता प्राप्ति के संदर्भ में 'हिन्दी' और 'हिन्दुस्तानी के प्रश्न को लेकर राजनीतिक नेताओं के बीच में जो मतभेद था और वह अब इस रूप में प्रस्तुत हुआ कि देश की राजभाषा एवं संघभाषा को 'हिन्दी' नाम से अभिहित किया जाए या उसे 'हिन्दुस्तानी' नाम दिया जाए। 'हिन्दी' नाम का समर्थन करने वाले नेताओं का तर्क यह था कि भारत के विभाजन औरपाकिस्तान के निर्माण के बाद 'उर्दू' भाषा का महत्त्व स्वतः कम हो गया है, इसलिए हिन्दी और उर्दू की मिश्चित शैली में 'हिन्दुस्तानी' शब्द की आवश्यकता अब नहीं रही। कुछ दूसरे नेता ऐसा भी सोचते थे कि गांधीजी द्वारा समर्पित और प्रचारित शब्द 'हिन्दुस्तानी' ही देश की राजभाषा के लिए अधिक उपयुक्त है। संविधान सभा में हिन्दी और हिन्दुस्तानी के प्रश्न को लेकर काफी वाद-विवाद हुआ। स्पष्ट रूप से राजनीतिक नेता दो दलो में बंटे हुए थे । देश के अनेक उच्चकोटि के नेता 'हिन्दुस्तानी' का समर्थन करने लगे । 'हिन्दी' के समर्थक भी कम नहीं थे। हिन्दुस्तानी के समर्थक ऐसी भाषा के पक्ष मे थे जो संस्कृत और फारसी के शब्दों से बोझिल न हो । अहिन्दी भाषी प्रदेशो के बहुत-से प्रतिनिधि 'हिन्दुस्तानी' के पक्ष में नहीं थे और देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को ही राजभाषा मानने के पक्ष में थे। बहुत से अन्य नेता जो हिन्दुस्तानी के समर्थक थे, जो यह चाहते थे कि गांधीजी के द्वारा समर्थित हिन्दुस्तानी को रखना गांधीजी की स्मृति की स्थिर रखने के लिए भी वांछनीय है। हिन्दी के समर्थकों का यह भी दावा था कि हिन्दुस्तानी जैसी भाषा का देश में अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे विचारको का यह तर्क था कि हिन्दुस्तानी तो हिन्दीका आम बोलचाल का रूप है। इसलिए वह हमारे विधि-विधान की भाषा कभी नही बन सकती । हिन्दुस्तानी के समर्थक तो आम भाषा होने के कारण हिन्दुस्तानी को चाहते थे। हिन्दी और हिन्दुस्तानी के प्रश्न के साथ-साथ संविधान सभा में अंकों के सम्बन्ध में भी गहरा मतभेद हुआ। कुछ प्रतिनिधियों का यह विचार था कि विशुद्ध भारतीय नागरी अंक ही ग्रहण किया जाए, जबकि दूसरे कुछ नेता अरवी रोमन अंकों का समर्थन करते थे। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा सेठ गोविन्ददास आदि नेता नागरी अंकों के प्रबल समर्थक थे तथा दूसरी ओर श्री जवाहरलाल नेहरू आदि कुछ अन्य नेता रोमन अंको का समर्थन करते थे। उनका विचार था कि रोमन अंक अतर्राष्ट्रीय अंक हैं, इसलिए इन्हें ही देश की राजभाषा में स्थान मिलना चाहिए । संविधान सभा के बाहर हिन्दीका प्रबल समर्थन होने लगा था। कांग्रेस दल की एक बैठक में हिन्दी के पक्ष में निर्णय किया गया। इस बीच में अगस्त, 1949 में राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद् का एक विराट् सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ और इस सम्मेलन में अनेक अहिन्दीभाषी विद्वानों एवं नेताओं ने हिन्दी का समर्थन किया। अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि देवनागरी में लिखित हिन्दी को ही 'राजभाषा' के रूप में स्वीकार किया जाए । परिषद् के इस महत्त्वपूर्ण निर्णय का प्रभाव संविधान सभा पर भी पड़ा । संविधान सभा में 11, 12, 13 तथा 14 दिसम्बर, 1949 को इस प्रश्न पर बड़ा वाद-विवाद हुआ। सभा के समक्ष कई विकल्प प्रस्तुत थे। राजपि पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा सेठ गोविन्ददास आदि ने हिन्दी तथा नागरी अंकों के समर्थन में पूरा जोर लगाया तथा प्रारूप में कई संशोधन भी प्रस्तुत किए गए । अन्ततः पर्याप्त वाद-विवाद के बाद सभा ने इस प्रश्नको हल कर ही लिया। संविधान सभा मे देवनागरी लिपि में लिखित 'हिन्दी' को राजभाषा स्वी- कार किया गया । अंको के सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय (रोमन) अंकों को स्वीकार किया गया । राजभाषा के रूप में 'हिन्दी को स्वीकृति देने में तीन मुख्य बातें थीं- 1. हिन्दी का राजभाषा के रूप में विकास किया जाए, 2. संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष तथा अंग्रेजी ही राजभाषा रहे और 3. हिन्दी के विकास के कारण अन्य भारतीय भाषाओं के हितों को उपेक्षा न हो । संविधान सभा के निर्णय का सामान्य रूप से पूरे देश मे स्वागत हुआ।
राजभाषा का अर्थ -
किसी भी देश अथवा राष्ट्र में बहुसख्यक जनता द्वारा व्यवहृत अखिल देशीय सम्पर्क भाषा को राष्ट्रभाषा और शासक अथवा शासन प्रवन्ध की भाषा को राजभाषा की संज्ञा दी जा सकती है।
राजभापा (Official Language) राजभाषा का सामान्य अर्थ है राजकाज की भाषा, अर्थात् यह भाषा जिसके द्वारा राजकीय कार्य किया जा सके । दूसरे शब्दो म किसी देश अथवा राष्ट्र म प्रशासनिक व्यवस्था के लिये जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है उसे राजभाषा कहते है। आचार्य नददुलारे वाजपेयी वे अनुसार 'राजभाषा उसे बहुत हैं जो केन्द्रीय और प्रादेशिक सरकारी द्वारा पत्रव्यवहार, राजकार्य और सरकारी लिखा-पढी के काम में लायी जाय ।'39 भारत जैसे जनतत्रात्मक दुहरे शासनपद्धति वाले राष्ट्रा में राजभाषा की स्थिति दो प्रकार की है प्रथम केन्द्रीय राजभाषा, जिसे भारतीय संविधान में सघ की राजभाषा (Official Language of the Union) कहा गया और द्वितीय राज्या की राजभाषा (Official Language of the States) सामान्यत् केन्द्रीय राजभाषा को सिर्फ राजभाषा और राज्यो की राजभापा कहा जाता है।
सविधान सभा द्वारा स्वी- कृत भारतीय संविधान में राजभाषा से संबंधित अनुच्छेद इस प्रकार हैं:
संघ की राजभाषा 343 (1) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अर्को का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। (2)खण्ड (1) से किसी बात के होते हुए भी इस संविधान के प्रारंभ से पन्द्रह वर्ष की कालावधि के लिए संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी, जिनके लिए ऐसे प्रारंभ के ठीक पहले यह प्रयोग की जाती थी, परन्तु राष्ट्रपति उक्त कालावधि में, आदेश द्वारा संघ के राजकीय प्रयोजनों में से किसीके लिए अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ हिन्दी भाषा का तथा भारतीय अंकों के अन्तर्राष्ट्रीय रूप के साथसाथ देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा। (2) इस अनुच्छेद मे किसी बात के होते हुए भी संसद उक्त पन्द्रह साल की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भाषा का, अथवा (ख) अंकों के देवनागरी रूप का, ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबन्धित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हो । राजभाषा के लिए संसद का आयोग और समिति 344 (1) राष्ट्रपति इस संविधान के प्रारंभ में पांच वर्ष की समाप्ति पर तथा तत्पश्चात् ऐसे प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर आदेश द्वारा एक आयोग गठित करेगा, जो एक सभापति और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित भिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य सदस्यो से मिलकर बनेगा, जैसे कि राष्ट्रपति नियुक्त करे, तथा आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया का आदेश परिभाषित करेगा । (2) राष्ट्र पति को- (क) संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा के लिए उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग के, (ख) संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसीके लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बन्धनो के, (ग) अनुच्छेद 348 में वर्णित प्रयोजनों में से सब या किसीके लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के, (घ) संघ के किसी एक या अधिक उल्लिखित प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले अंकों के रूप के, (ङ) संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य केबीच अथवा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच संचार की भाषा तथा उसके प्रयोग के बारे में राष्ट्रपति द्वारा आयोग से पृच्छा किए हुए किसी अन्य विषय के बारे में सिफा रिश करने का आयोग का कर्तव्य होगा।(3) खंड (2) के अधीन अपनी सिफारिश करने में आयोग भारत की औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का तथा लोकसेवाओं के बारे में अहिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के लोगों के न्यायपूर्ण दावों और हितों का सम्यक् ध्यान रखेगा। (4) तीस सदस्यों की एक समिति गठित की जाएगी, जिनमें से बीस लोकसभा के सदस्य होंगे तथा दस राज्यसभा के सदस्य होंगे, जोकि क्रमशः लोकसभा के सदस्यों तथा राज्यसभा के सदस्यों द्वारा अनुपाती प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे । (5) खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशों की परीक्षा करना तथा उनपर अपनी राय का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करना समिति का कर्तव्य होगा। (6) अनुच्छेद 343 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति खण्ड (5) में निदिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् इस सारे प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निदेश निकाल सकेगा। राज्य को राजभाषा या राजभाषाएं 345 - अनुच्छेद 346और 347 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा उस राज्य के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसीके लिए प्रयोग के अर्थ उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अनेक को या हिन्दी को अंगीकार कर सकेगा, परन्तु जब तक राज्य का विधानमण्डल विधि द्वारा इससे अन्यथा उपबन्ध न करे तब तक राज्य के भीतर उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा प्रयोग की जातीर हेगी, जिनके लिए इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले वह प्रयोग की जाती थी । एक राज्य और दूसरे राज्य के बोच में अथवा राज्य और संघ के बीच में संचारके लिए राज्यभाषा 346 - संघ में राजकीय प्रयोजनों के लिए तत्समय प्राधिकृत भाषा, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच में तथा किसी राज्य और संघ के बीच में संचार के लिए राजभाषा होगी, परन्तु यदि दो या अधिक राज्य करार करते हैं कि ऐसे राज्यों के बीच में संचार के लिए राजभाषा हिन्दी भाषा होगी तो ऐसे संचार के लिए वह भाषा प्रयोग की जा सकेगी। 347- तद्धिपयक मांग की जाने पर यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि किसी राज्य के जनसमुदाय का पर्याप्त अनुपात चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली कोई भाषा राज्य द्वारा अभिज्ञात की जाए तो वह निदेशदे सकेगा कि ऐसी भाषा को उस राज्य में सर्वत्र अथवा उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिए जैसा कि वह उल्लिखित करे, राजकीय अभिज्ञा दी जाए। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में तथा अधिनियमों, विधेयकों आदि में प्रयोग की जाने वाली भाषा 348 (1) - इस भाग के पूर्ववर्ती उपबन्यों में किसी बात के होते हुए भी जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपलब्ध न करे, तब तक क. उच्चतम न्यायालय में तथा प्रत्येक उच्च न्यायालय में सब कार्यवाहियां, जी 1. विधेयक अथवा उनपर प्रस्तावित किए जाने वाले जो संशोधन संसद के प्रत्येक सदन में पुनःस्थापित किए जाएं, उन सबके प्राधिकृत पाठ । 2.अधिनियम संसद द्वारा था राज्य के विधानमण्डल द्वारा पारित किए जाएं तथा जो अध्यादेश राष्ट्रपति या राज्यपाल या राजप्रमुख राष्ट्रपति की पूर्वसम्मति से हिन्दी भाषा का या उस राज्य मेंराजकीय प्रयोजन के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग उस राज्य में मुख्य स्थान रखने वाले उच्च न्यायालय में की कार्यवाहियों के लिए प्राषिकृत कर सकेगा, परन्तु इस खंड की कोई बात वैसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय, आज्ञप्ति अथवा आदेश को लागू न होगी। 3. खण्ड (1) के उपसड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, वहां किसी राज्य के विधानमंडल ने, उस विधानमंडल में पुनःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल या राजप्रमुख द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड की मंडिका (3) मे निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम,विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से अन्य किसी भाषा के प्रयोग को विहित किया है, वहां उस राज्य के राजकीय सूचना-पत्र में उस राज्य के राज्य पाल या राज- प्रमुख के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद उस खण्ड के अभिप्रायों के लिए उसका अंग्रेजी भाषा में प्राषि कृत पाठ समझा जाएगा।भाषा संबंधी कुछ विधियों के अधिनियमिय करने के लिए विशेष प्रक्रिया 143 349 - इस संविधान के प्रारंभ से 15 वर्षों की कालावधि तक अनुच्छेद 348 के खण्ड (1) में वर्णित प्रयोजनों में से किसीके लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा के लिए उपबन्ध करने वाला कोई विधेयक या संशोधन ससद के किसी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना न तो पुरः स्थापित और न प्रस्तावित किया जाएगा तथा ऐसे किसी विधेयक के पुरःस्थापित अथवा ऐसे किसी संशोधन के प्रस्तावित किए जाने की मंजूरी अनुच्छेद 344 के खण्ड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफारिशो पर तथा उस अनुच्छेद के खण्ड (4) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर, विचार करने के पश्चात् ही राष्ट्रपति देगा ।350- किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी पदा- धिकारी या प्राधिकारी को यथास्थिति संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभिवेदन देने का प्रत्येक व्यक्ति को हक होगा। हिन्दी भाषा के विकासके लिए निदेश 351 - हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप-शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उस शब्दभण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः वैसी उल्लिखित भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना सघ का कर्तव्य होगा। संविधान के 343 अनुच्छेद के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी है। इससे देश के बहुमत की इच्छा ही प्रतिध्वनित होती है। इसी अनुच्छेद की दूसरी धारा के अनुसार संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की कालावधि के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग की जो व्यवस्था की गई थी, उसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि हिन्दी सरकारी कामकाज के लिए सक्षम नही थी । अंग्रेजी के शामनकाल में सरकारी कामकाज की भाषा और उच्च शिक्षा की भाषा अंग्रेजी थी और देश के सभी कानून144 राजभाषा हिन्दी: विकास के विविध आयांम अंग्रेजी में थे, इसलिए व्यावहारिक रूप से यह उचित समझा गया कि पन्द्रह वर्ष तक अर्थात् जनवरी, सन् 1965 तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जाए। इसके पीछे यह मंशा थी कि इस अवधि के अन्तर्गत सभी कानून विधि आदि हिन्दी में तैयार कर लिए जाएंगे ताकि नियत तारीख से राजभाषा में ही काम होने लगे । साथ ही राष्ट्रपति को यह भी अधिकार दिया गया था कि वे इस कालावधि में अंग्रेजी के साथ कुछ कार्यों के लिए हिन्दी के प्रयोग का भी आदेश दे सकते हैं। इस अनुच्छेद की तीसरी धारा के अन्तर्गत संसद को यह अधिकार प्रदान किया गया था कि वह पन्द्रह साल की अवधि के बाद भी विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को जारी रखने के लिए उपबन्ध कर सकती है। अनुच्छेद 344के अनुसार राष्ट्रपति संविधान के प्रथम पांच और दस वर्ष के बाद राजभाषा आयोग नियुक्त कर सकता है। इन आयोगों का मुख्य संवि धानिक प्रयोजन यह था कि वे राष्ट्रपति को संघ के सरकारी कार्यों के लिए हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर एवं अधिक प्रयोग के संबंध में और संघ के सरकारी प्रयोजनों में से सब या किसीके लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को कम करने या उसपर रोक लगाने के लिए सिफारिश करें। उस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने और उनपर अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को पेश करने के लिए इसी अनुच्छेद में संसद के (20 लोकसभा के और 10 राज्यसभा के) सदस्यों की एक संसदीय समिति की स्थापना की भी व्यवस्था थी। अनुच्छेद 345 में यह व्यवस्था है कि राज्य का विधानमण्डल विधि द्वारा एक था अधिक प्रादेशिक भाषाओं या हिन्दी को सरकारी प्रयोजनों के लिए स्वीकार कर सकेगा। अनुच्छेद 346में यह स्पष्ट किया गया है कि एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच तथा किसी राज्य और संघ के बीच में पत्र-व्यवहार के लिए संघ की राजभाषा का ही प्रयोग होगा । अनुच्छेद 347 के अनुसार अगर किसी राज्य का पर्याप्त अनुपात चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली कोई भाषा राज्य द्वारा अभिज्ञात की जाए तो राष्ट्रपति उस भाषा को सरकारी अभिज्ञा दे सकता है। अनुच्छेद 348 मे उच्च तम न्यायालय और उच्च न्यायालयों आदि की भाषा की व्यवस्था है। अनुच्छेद 349 में यह व्यवस्था है कि संविधान के प्रारंभ से पन्द्रह वर्षों की अवधि तक अंग्रेजी के स्थान पर कोई दूसरी भाषा प्राधिकृत पाठ के लिए स्वीकार्य नही हो सकती। अनुच्छेद 350 में भाषागत अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है|
हिन्दी के भावी रूप की परिकल्पना 145 संविधान का अनुच्छेद 351 सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमे हिन्दी के भावी स्वरूप के विकास की परिकल्पना सन्निहित है। हिन्दी को विकसित करने की दिशाओं का इसमें संकेत है। इस अनुच्छेद के अनुसार संघ सरकार का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दी भाषा के विकास और प्रसार के लिए समुचित प्रयास करेगा ताकि भारत में राजभाषा हिन्दी के ऐसे स्वरूप का विकास हो,जो समूचे देश में प्रयुक्त हो सके और जो भारत की मिली जुली संस्कृति की अभिव्यक्ति की वाहिका बन सके। इसके लिए संविधान में इस बात का भी निर्देश दिया गया है कि हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दावली और शैली को भी अपनाया जाए और मुख्यतः संस्कृत तथा गौणतः अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण कर उसके शब्द-भण्डार को समृद्ध किया जाए। संविधान के निर्माताओं की यह प्रवल इच्छा थी कि हिन्दी भारत में ऐसी सर्वसामान्य भाषा के स्वरूप को ग्रहण करे जो सब प्रान्तों के निवासियों को स्वीकार्य हो । संविधान के निर्माताओं को यह आशा थी कि हिन्दी अपने स्वाभाविक विकास में भारत की अन्य भाषाओं से वरिष्ठ सम्पर्क स्थापित करेगी और हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच में साहित्य का आदान-प्रदान भी होगा। भारतीय सविधान में हिन्दी का उल्लेख दो स्थानों पर किया गया है पहला, संविधान के अनुच्छेद 343 में देवनागरी लिपि में लिखित संघ की राजभाषा हिन्दी और दूसरा, अनुच्छेद 351 में उल्लिखित अष्टम अनुसूची में बताई गई भारतीय भाषाओं में भी हिन्दी का समावेश किया गया है। इससे दो हिन्दी के उत्पन्न होने की गुजाइश हो सकती है। इससे हिन्दी के दो भिन्न-भिन्न रूपों- संघीय और प्रादेशक की ओर स्पष्ट संकेत मिलता है। कुछ हिन्दी- भाषी विद्वानो ने हिन्दी के इन दोनों रूपों की कल्पना से भयभीत होकर यह साबित करने का प्रयास किया है कि संविधान निर्माताओं का कभी भी हिन्दी के दो रूप को मानने का उद्देश्य नही या। दो जगहों पर हिन्दी का उल्लेस होने मे कोई आशंका भी नहीं है। संविधान के निर्माताओं ने उचित ढंग सेही यह आधा की थी कि राजभाषा हिन्दी अपने भावी रूप का विकास करने में अन्य भारतीय भाषाओं का सहारा लेगी। यह इसलिए था कि राजभाषा हिन्दी को सबके लिए सुलभ और ग्राह्य रूप धारण करना है और इस प्रक्रिया में वह सभी भारतीय भाषाओं से सरल से सरल शब्दों और शैलियों को अपना सकती है। इससे अष्टम अनुसूची में उल्लिखित हिन्दी की शैली से कोई टकराहट नहीं है। हिन्दी प्रादे- शिक भाषा के रूप में भी अपना साहित्यिक स्वरूप बनाए रख सकती है। इस प्रकार हिन्दी की दो शैलियों साहित्यिक और आमफहम- का विकास होसकता है। इस स्थिति से घबराने की कोई बात नहीं है। राजभाषा हिन्दी के विकास में सभी भारतीय भाषाओं का सहयोग अपेक्षित औरवांछनीय है। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरूप का महत्त्व इसीमें है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को भी अपने में आत्मसात करे। अनुच्छेद 351 हिन्दी भाषा के निरन्तर विकास में ही यह कल्पना करता है। यह संविधान विषयक भाषा नीति का मुख्य अंग है। इसके आलोक में हमे हिन्दी के प्रगामी प्रयोग, अभिवृद्धि एवं विकास के विषय में दिवाएं निर्धारित करनी हैं। संविधान 26 जनवरी, 1950 में आया और संविधान में हिन्दी को 1965 तक राजभाषा के पद पर आसीन करने की व्यवस्था कर दी गई। यह आशा की गई कि संचान के लागू होने के बाद पन्द्रह वर्षों में हिन्दी भारत की राजभाषा के रूप में सक्षम बन सकेगी। इसके बाद राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 343 के खण्ड 2 के प्रतिबन्धात्मक खण्ड द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करके एक आदेश जारी किया जिसका नाम था 'संविधान आदेश 1955 राष्ट्रपति द्वारा प्रसारित राजकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा-आदेश इस आदेश के उपबन्धों के अन्तर्गत भारत सरकार के सभी मन्त्रालय तया सम्बद्ध विभाग निम्न कार्यों के लिए अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी भाषा का भी प्रयोग कर सकेंगे: 1. जनता के सदस्यों के साथ पत्र-व्यवहार में । 2. प्रशासकीय रिपोर्ट सरकारी पत्रिकाओं तथा उन रिपोटों में जो संसद को दी जाने वाली हों। 3. सरकारी प्रस्तावों तथा संसदीय विधियों में । 4.उन राज्य शासनों के साथ पत्र-व्यवहार में जिन्होंने राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार कर लिया हो । 5. सन्धिपत्र तथा करारनामे में। 6. विदेशी राज्यो, उनके राजदूतों तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ पत्र- व्यवहारमें । 7. अन्तर्राजनैतिक तथा वाणिज्य- इनके अधिकारियो तथा अन्तर्राष्ट्रिीय संस्थाओं के भारतीय प्रतिनिधियों के लिए जारी किए जाने वाले लेखों मे । अग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी के प्रयोग को धीरे-धीरे बढ़ाने के लिए जो सुझाव दिए गए थे, उनपर भारत सरकार की एक अन्तविभागीय बैठक में चर्चा की गई और भारत सरकार के सभी मन्त्रालयों को अपने कुछ कामों मेउचित नहीं है। राजभाषा हिन्दी विकास के विविध आयाम 2. यद्यपि साहित्यिक दृष्टि से भारत की सभी भाषाएं समृद्ध हैं, फिर भी अधिक लोगों द्वारा बोली तथा समझी जाने के कारण हिन्दी समस्त भारत के लिए एक सुस्पष्ट भाषा माध्यम है। 3.पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में स्पष्टता, अर्थ की शुद्धता, सरलता, पांडित्यपूर्ण भाषा का त्याग एवं अधिकाधिक देशज और लोकप्रिय शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय शब्दावली को भारतीय भाषाओं की प्रकृति के अनुसार थोड़े हेर फेर के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए। पारि- भाषिक शब्दावली के निर्माण की गति तीव्र होनी चाहिए। 4. चौदह वर्ष की उम्र तक के प्रत्येक विद्यार्थी को हिन्दी का उचित शान प्राप्त कराया जाए ताकि प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक जीवन की गतिविधियों और सरकार की कार्यवाहियों को समझ सके । 5.सारे देश में माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी का शिक्षण अनिवार्य कर दिया जाए। हिन्दीभाषी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए दूसरी दक्षिण भारतीय भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य किरा जाना आयोग को मान्य नहीं है। 6.शिक्षा के माध्यम के रूप में विषय और शिक्षण की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए सभी विश्वविद्यालय आपस में परामर्श करके निर्णय करें कि भिन्न भिन्न अभ्यास कमों के लिए किस माध्यम को स्वीकार किया जाए। परन्तु फिर भी सभी विश्वविद्यालयों कोचाहिए कि हिन्दी माध्यम से जो विद्यार्थी परीक्षाओं में बैठना चाहें,उनके लिएने उचित प्रबन्ध करें। 7.प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए हिन्दी का निश्चित अवधि में आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए नियम लागू किया जाए और ऐसा न करने वालों को दण्डित किया जाए तथा निर्धारित स्तर से अधिक ज्ञान प्राप्त करने पर कर्मचारियो को पुरस्कार आदि देकर प्रोत्साहित किया जाए। 8 जनता से सीधा सम्पर्क रखनेवाले विभागों और संगठनी के आंतरिक कार्य में हिन्दी और जनता से व्यवहार हेतु क्षेत्रीय भाषा काम में लाई जाए।ऐसे विभागों में भर्ती के लिए क्षेत्रीय भाषा के ज्ञान के साथ-साथ हिन्दी की योग्यता का स्तर भी निर्धारित किया जाए और बाद में विभागीय प्रशिक्षण द्वारा हिन्दी की योग्यता बढ़ाई जाए। 9. भारत सरकार के संवैधानिक प्रकाशन अधिक से अधिक हिन्दी भाषा में प्रकाशित किए जाएं और हिन्दी की प्रगति के लिए सरकार द्वारा भरसक प्रयत्न किए जाएं । 10. राज्य और संघ सरकार के अधिकारियों के लिए किसी स्तर का हिन्दी का ज्ञान अनिवार्य किया जाए और उसके लिए उन्हें अधिकाधिक पुरस्कार देकरप्रोत्साहित किया जाए । 149 11. संसद और विधानमण्डलोंकी कार्यवाहियो की सफलता की दृष्टि से हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओंदोनों का व्यवहार होना चाहिए। स्वीकृत सरकारी कानून हिन्दी में ही होने चाहिए, परन्तु जनता की सुविधा के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में उनके अनुवाद प्रकाशित किए जाने चाहिए और माध्यम के पूर्ण रूप से बदल जाने पर देश के सम्पूर्ण संवैधानिक ग्रन्य हिन्दी भाषा में ही उपलब्ध होने चाहिए। 12. देश में न्याय देश की भाषा में किया जाए। इसके लिए यह जरूरी है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की समस्त कार्यवाही तथा अभिलेखों, निर्णयों और आदेशों के आवश्यकतानुसार क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद भी साथ में रसे जाएं। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को अंग्रेजी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी निर्णय देने का अधिकार होना चाहिए। 13.प्रतियोगिता परीक्षाओं का माध्यम सुसंगत होना चाहिए। अखिल भारतीय एवं केन्द्रीय सेवाओं के हेतु कर्मचारियों के लिए हिन्दी की योग्यता रखना आवश्यक किया जाए। अतः परीक्षाओं में हिन्दी का अनिवार्य प्रश्नपत्र रेखा जाए, परन्तु अहिन्दीभाषी विद्यार्थियों से इतर भाषाओं से सम्बन्धित विषयों पर बैंक ल्पिक प्रश्न पूछे जाने के लिए एक प्रश्नपत्र रखा जाए, जिससे समानता बनी रहे। 14. हिन्दी के विकास एवं प्रचार की दृष्टि से सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। सरकार स्वैच्छिक हिन्दी सस्थानी के कार्यों में मामजस्यस्थापित करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाए तथा उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करे। 15. भारत की सब भाषाओं के लिए यदि एक लिपि रखने का प्रश्न हो तो इसके लिए देवनागरी लिपि ही सर्वचा उपयुक्त होगी। रोमन लिपि को स्वीकार करने से कोई लाभ नहीं होगा। देवनागरी लिपि के सुधार के लिए भी सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिए। 16. हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं की शब्दावली तथा अभिव्यनित के मानकी करण के लिए सरकार को चाहिए कि वह भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों को इस दृष्टि सेसुविधाए प्रदान करेऔर इसके लिए हिन्दीनया क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार देने वाली सहयाओं के निर्माण करने का प्रयत्न करे। 17. राजभाषा हिन्दी के सफल उन्नयन एवं विकास तथा उसके उचित अधीक्षण का उत्तरदायित्व विशेष रूप से केन्द्रीय सरकार की एक प्रशासकीय इकाई पर डालना चाहिए। संघभाषा हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए भारतीय भाषाओं की राष्ट्रीय अकादमी' की यदि स्थापना की जाए तो अति हितकर होगा। 18. भारत के भाषागत एवं सांस्कृतिक ठाने में गहरी समानता लाने तथा भारत की विभिन्न भाषाओं के बीच की दूरी को कम करने के लिए बहु- भाषिकता के सिद्धांत को प्रोत्साहित किया जाए तथा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय की शिक्षा पद्धति में समुचित व्यवस्था को जाए। राजभाषा आयोग के उपयुक्न प्रमुख सुझावों पर दृष्टि डालते हुए यह कहा जा सकता है कि आयोग ने हिन्दी के अधिकाधिक और प्रगामी प्रयोग पर बल दिया था। सेर आयोग ने जो ठोस सुझाव रखे थे, सरकार ने उन्हे औपचारिक मानते हुए राजभाषा हिन्दी के विकाम के लिए कोईठोस कदम नही उठाए । आयोग के सुझावों को अमल में लाने के दुष्परिणाम आज राजभाषा हिन्दी को भोगने पड़ रहे हैं। अगर ठोस कदम उस वक्त उठाए होते तो राजभाषा हिन्दीका पक्ष काफी मजबूत होता और हिन्दी की वर्तमान स्थिति देखने की नौबत नहीं आई होती । संसदीय राजभाषा समिति राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन पर विचार करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 खण्ड (4) और (5) में दी गई व्यवस्था के अनुसार लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्यों की एक संसदीय समिति का गठन किया गया और तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री श्री गोविन्दवल्लभ पंत इस समिति के अध्यक्ष चुने गए। इस समिति ने लगातार कई बैठकों के पश्चात् अपना अतिम निर्णय लिया और 8 फरवरी, 1959 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत की। अप्रैल, 1959 में यही रिपोर्ट संसद में चर्चा के लिए प्रस्तुत की गई। समिति के प्रमुख सुझाव इस प्रकार थे: 1. सरकारी पदों और नौकरियों के लिए इस समय जो अग्रेजी की शिक्षा का स्तर निर्धारित है,संक्रमण की अवस्थाओं में हिन्दी ज्ञान का स्तर यदि कुछ कम भी हो तो चल सकता है। 2. निर्धारित समय मे कर्मचारियों द्वारा निर्धारित हिन्दी का ज्ञान प्राप्त न करने पर उनको दंडित किया जाना असगत होगा। 3.संघ सरकार के प्रशासन में जहा भारतीय पारिभापिक शब्दावली के विकास की आवश्यकता न हो तथा विदेशों से सम्बन्ध बनाए रखने के लिए अनिश्चित काल तक अग्रेजी का प्रयोग नहीं होना चाहिए। 4. 45 वर्ष से ऊपर की आयु वाले सरकारी कर्मचारियों को हिन्दी के प्रशि क्षण से छूट दी जानी चाहिए । 5.संघ सरकारद्वारा ऐसी योजना बनाई जाए, जिसमें हिन्दी का राजभाषा के रूप में अधिकाधिक प्रयोग एवं विकास किया जा सके ।6. सरकार एवं मंत्रालयों के प्रकाशनों में रोमन अंकों के साथ-साथ देवनागरी अंकों को प्रयुक्त करने के बारे में संघ सरकार की मूलभूत समान नीति होनी चाहिए। 7. संसद तथा राज्यों के विधानमण्डलों में पारित होने वाले विधेयको की भाषा अंग्रेजी का स्थान जब तक हिन्दी न ले ले, तब तक संपद में विधि-निर्माण का कार्य अंग्रेजी में होता रहे । कानूनों के हिन्दी में प्राधिकृत अनुवाद दिए जाए तथा संभवहो तो विभिन्न राज्यों की राजभाषाओं में भी उनके अनुवाद की व्यवस्था की जाए । 8. राज्यों की विधानसभाओं, अपने राज्यों की राजभाषाओं में विधि निर्माण कार्य कर सकती है, परन्तु संविधान के 348 अनुच्छेद के अनुसार कानूनों का प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी में प्रकाशित करना आवश्यक है। यदि कानून का मूलपाठ अन्य भाषा में है तो साथ में हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुर किया जा सकता है। 9. राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालयों में राज्य की राजभाषा अथवा हिन्दी का प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु उनके द्वारा किए जाने वाले निर्णयों, अभिलेखों और आदेशों को अंग्रेजी में ही होना चाहिए तथा दूसरी भाषाओं में दिए जाने वाले निर्णयों, डिग्रियों एवं आदेशों का अंग्रेजी अनु सद साथ में रहना चाहिए। 10. हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का ज्ञान न्यायाधीशों के लिए उपयुक्त हो सकता है, परन्तु उनके लिए भाषा सम्बन्धी परीक्षाए निर्धारित करना उचित नहीं है। 11. सांविधिक ग्रन्थों के अनुवाद तथा कानूनी पारिभाषिक शब्दावली आदि के निर्माण की उचित योजना बनाने तथा संपूर्ण कार्य की व्यवस्था करने के लिए भारत के विभिन्न भाषा-भाषी विधि विशारदों के स्थायी आयोग की उच्चस्तरीय समिति का निर्माण किया जाना चाहिए । 12. अखिल भारतीय तथा उच्चस्तरीय केन्द्रीय सेवाओं की परीक्षानोंके माध्यम के रूप मे अंग्रेजी को चलने दिया जाए तथा कुछ समय बाद हिन्दी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाए । तदनन्तर हिन्दी और अग्रेजी दोनों को वैकल्पिक माध्यम के रूप में चलने दिया जाए। 13.मन् 1965 तक भारत सरकार के राजकाज की प्रधान भाषा अग्रेजी रहे और इस अवधि में हिन्दी गौण राजभाषा रहे । यन् 1965 के बाद हिन्दी प्रधान राजभाषा रहे तथा अग्रेजी को सह-राजभाषा का स्थान दिया जाए। संसद अपने अधिनियमद्वारा अग्रेजी के प्रयोग के लिए जो गीमा एवं क्षेत्र निर्धारित करेगी तब तक आवश्यकतानुसार उनका प्रयोगजारी रहेसंसदीय राजभाषा समिति के पीछे दिए मुख्य मुकावों से राजवि पुरुषोत्तमदास टण्डन और सेठ गोविन्ददास असहमत और असंतुष्ट थे और उन्होंने यह आरोप लगाया कि सरकार ने हिन्दी को राजभाषा केरूप में प्रस्थापित करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए हैं। इन दोनों नेताओ ने समिति द्वारा अंग्रेजी को राजभाषा बनाए रखने का भी घोर विरोध किया। संसदीय समिति ने राजभाषा आयोग के अधिकांश सुझावों को स्वीकार करने की राय राष्ट्रपति को दी। इसके अनुसार राष्ट्रपति ने 27 अप्रैल, 1960 को सघ राजभाषा के सम्बन्ध में एक आदेश जारी किया। संघ राजभाषा के सम्बन्ध में राष्ट्रपति का 1960 का आदेश संसदीय समिति की रिपोर्ट पर संसद के दोनों सदनों में गंभीर चर्चा होने के बाद राष्ट्रपति ने संघीय राजभाषा के सम्बन्ध में 27 अप्रैल, 1960 को एक आदेश जारी किया। इस आदेश में दिए गए प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं: 1.अखिल भारतीय सेवाओं और उच्चतर केन्द्रीय सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षा का माध्यम अभी अग्रेजी बना रहे और कुछ समय बाद हिन्दी वैकल्पिक माध्यम के रूप में अपना ली जाए। बाद में किसी प्रकार की नियत कोटा प्रणाली अपनाए बिना परीक्षा के माध्यम के रूप में विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग शुरू करने की व्यवस्था की जाए । 2. प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए अंग्रेजी और हिन्दी दोनो है। परीक्षा का माध्यम रहें। 3. निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के निर्माण एवं समन्वय का प्रयत्न किया जाए तथा इसके लिए शिक्षा मंत्रालय आवश्यक व्यवस्था करते हुए एक आयोग का निर्माण करे । 4. सभी प्रशासनिक साहित्य का अनुवाद किया जाए तथा उसमें एकरूपता हो । 5.शिक्षा मंत्रालय हिन्दी-प्रचार की व्यवस्था को और इस कार्य में लगी गैरसरकारी संस्थाओं की भी सहायता करे। 6. केन्द्रीय सरकार विभागों के स्थानीय कार्यालय अपने आंतरिक कार्यों के लिए हिन्दी का प्रयोग करें और जनता के व्यवहार में प्रादेशिक भाषा का प्रयोग किया जाए । कर्मचारियो की भर्ती तथा विकेन्द्रीकरण आदि में इस आवश्यकता को ध्यान में रखा जाए । 7. संसदीय अधिनियम और विधेयक अंग्रेजी में बनते रहे, किन्तु उनका प्राधिकृत हिन्दी अनुवाद उपलब्ध कराया जाए।8. उच्चतम न्यायालय की भाषा अंततः हिन्दी होनी चाहिए। उच्च न्यायालय के निर्णयों, आज्ञाप्तियों और आदेशों के प्रयोजनों के लिए हिन्दी और राज्यों की राजभाषाओं का प्रयोग विकल्पतः किया जा सकेगा। इस सम्बन्ध में विधि मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए । 9. तृतीय श्रेणी से नीचे के कर्मचारियों, औद्योगिक संस्थानों के कर्मचारियों और कार्यप्रभारित कर्मचारियों को छोड़कर उन सभी केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी का सेवाकालीन प्रशिक्षण अनिवार्य बना दिया जाए, जिनकी आयु 1जनवरी, 61 को 45 वर्ष से कम हो । गृह मंत्रालय, टंककों और आशुलिपिको, को हिन्दी टंकण तथा आशुलेखन में प्रशिक्षण देने के लिए भी प्रबन्ध करे । 10. एक मानक विधि शब्दकोश बनाने, हिन्दी में कानून बनाने और कानूनी शब्दावली के निर्माण के लिए विभिन्न राष्ट्रीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कानून के विशेषज्ञों का एक स्थायी आयोग स्थापित किया जाए । राजभाषा अधिनियम, 1963 संविधान के अनुसार पन्द्रह वर्ष के बाद सारा सरकारी कामकाज हिन्दी में शुरू होना था, परन्तु सरकार की दुल मुल नीति के कारण यह सम्भव नहीं हो सका। हिन्दी की सक्षम बनाने के लिए जो ठोस कदम केन्द्र सरकार को और हिन्दीभाषी क्षेत्रों को उठाने थे, उनमें परिलक्षित शिथिलता की पृष्ठभूमि में देश के राजनीतिक स्वार्थी खिलाड़ियों ने हिन्दी के पक्ष को दुर्बल बनाने के लिए जान-बूझकर साधारण जनता को भड़काना शुरू किया । अहिन्दी क्षेत्र मे खासकर तमिलनाडु में राजनीति केस्वार्थी खिलाड़ियों ने हिन्दी विशेष की भड़का- कर राजनीतिक कोलाहल उत्पन्न किया। इसकी प्रतिक्रिया के क्षेत्र में हिन्दी- भाषी क्षेत्र में आग भड़क उठी और हिन्दी के कट्टरपंथी समर्थको ने भाषायी उन्माद को उभारा जिसके कारण हिन्दी की प्रगति के बदले हिन्दी को हानि पहुंची। हिन्दीभाषी क्षेत्रों में आयोजित आन्दोलनों ने वास्तव में हिन्दी को लाभ पहुंचाने के बदले भारी हानि पहुंचाई । सारे भारत में एकाएक भाषायी उन्माद का बवंडर उठा। हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी के समर्थन में और अहिन्दी क्षेत्रों में राजनीतिक कुचक में हिन्दी के विरोध में बुलन्द आवाजें उठी । ऐसे भाषायी आन्दोलन के जहरीले राजनीतिक भाषायी उन्माद के बीच भारत सरकार ने एक नये मध्यम मार्ग का अनुसरण करने का निश्चय किया और उसके परिणामस्वरूप नया राजभाषा विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। 13 अप्रैल, 1963 को लोकसभा में राष्ट्रपति की स्वीकृति से एक राजमापा विधेयक तत्कालीन गुहमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने प्रस्तुत किया। राजमाया विधेयक का उद्देश्य यह था कजहां राजकीय प्रयोजनों के लिए 15 वर्ष बाद हिन्दी का प्रयोग प्रारंभ होनाचाहिए था वहां व्यवस्था को पूर्ण रूप से लागू न करके उस अवधि के बाद भीसंघ के सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग बनाए रखा जाए। इस विधेयक पर लोकसभा में काफी गरमागरम चर्चाएं हुई। बहुत से सदस्यों ने इसविधेयक को संविधान के विरुद्ध घोषित किया। अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के कुछ सदस्यों ने अंग्रेजी का समर्थन किया। इस प्रकार विधेयक के पक्ष और विपक्ष मेविचार प्रकट किए गए। अंत में विधेयक 25 अप्रैल, 1963 को पारित हो गया और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर वह राजभाषा अधिनियम, 1963 के रूप मे लागू हुआ। जिस हिन्दी को 15 वर्ष में जो स्थान ग्रहण करना था उसे वह मिलनहीं सका और अंग्रेजी बराबर अपने स्थान में बैठी रही। शायद शास्त्रीजी कीयह युक्ति कि "भारत में उत्पन्न विभाजकता की भावना को रोकने के लिए यह राजभाषा विधेयक आवश्यक था, वास्तव में सच ही था।" क्योकि इसके कुछ समय बाद हिन्दी-विरोधी आन्दोलन भड़ककर शान्त हो गया और दिन-प्रति-दिन सरकारी क्षेत्रों में मन्दगति से हिन्दी का प्रयोग बढ़ता गया। द्विभापिक स्थिति, 1965 इस नये राजभाषा अधिनियम, 1963 के अनुसार संविधानके अनुच्छेद 343के अनुरूप 26 जनवरी, 1965 से हिन्दी संघ की राजभाषा तो रहेगी ही, परउस समय से हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी भी संघ के उन सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए बराबर प्रयुक्त होती रहेगी, जिनके लिए वह उस तिथि के तुरन्त पहलेप्रयुक्त की जा रही थी। इस प्रकार 26 जनवरी, 1965 से राजभाषा अधिनियम,1963 के अनुसार द्विभाषिक अवधि की स्थिति प्रारम्भ हुई, जिसमें कि संघ के सरकारी प्रयोजनो के लिए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाए प्रयुक्त की जा सकती थी। इस अधिनियम के मुख्य उपबन्धों के अनुसार संसद तथा राज्यों कीविधानसभाओं की सभी कार्यवाहियों की भाषा क्रमशः हिन्दी तथा प्रादेशिकभाषाएं होंगी और उनका प्राधिकृत अंग्रेजी अनुवाद देता होगा। इसकी धारा 5,उपधारा 2 के अनुसार सभी विधेयक दोनों भाषाओं में एकसाथ प्रस्तुत करने तथा दोनों को प्रामाणिक मानने की व्यवस्था की गई। धारा 4 में यह व्यवस्था रखी गई कि इसके लागू होने के दस वर्ष बाद तीस संसद सदस्यों की एक समितिहिन्दी की प्रगति की जाब करेगी। इसकी नियुक्ति संसद के द्वारा होगी। समितिके प्रतिवेदन पर राज्य सरकारों की राम ली जाएगी। पुनः यह रिपोर्ट संसद मेंप्रस्तुत होगी । तदनुसार राष्ट्रपति आदेश जारी करेंगे। 1965 के बाद किसीभी राज्य के राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति से अंग्रेजी के साथ हिन्दी या राज्य की अन्य किसी भाषा को राजभाषा का स्थान दे सकते है। इस तरह इस अधिनियम की धारा 3 के अनुसार संविधान के प्रारम्भ होने से 15 वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का समी राज्यों में सभी प्रयोजनों के लिए प्रयोग जारी रखने की व्यवस्था की गई।" राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 समय-समय पर संसद में और बाहर पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिए गए आश्वासनों और श्री लालबहादुर शास्त्री द्वारा राजभाषा विधेयक, 1963 को प्रस्तुत करते समय अहिन्दीभाषियों को दिलाए गए विश्वास को मूर्त रूप प्रदान करने के उद्देश्य से 1967 में संसद ने एक नया राजभाषा संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसमें राजभाषा विधेयक, 1965 की धारा 3 के स्थान पर नये उपबन्ध लागू हुए । यह विधेयक लोकसभा में 17 नवम्बर, 1967 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और 16 दिसम्बर 1967 को लोकसभा ने उसे पारित कर दिया। 8 जनवरी, 1968 को इसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई। विधेयक में मुख्य रूप से इस बात की व्यवस्था की गई थी कि अंग्रेजी सर कार केकामकाज में सहभाषा के रूप में तब तक बनी रहेगी जब तक अहिन्दी- भाषी राज्य हिन्दी को एकमान राजभाषा बनाने के लिए सहमत न हो जाएं। जिस राज्य ने हिन्दी को सरकारी कामकाज के लिए नहीं अपनाया है, उसके साथ केन्द्रीय सरकार अंग्रेजी में पत्र व्यवहार करेगी। जब कोई ऐसा राज्य, जिसने हिन्दी को सरकारी कामकाज के लिए अपनाया है, उस राज्य से पत्रव्यवहार हिन्दी में होगा। जिस राज्य ने हिन्दी को सरकारी कामकाज के लिए नहीं अपनाया है, उसको अंग्रेजी पत्र के साथ हिन्दी अनुवाद भी भेजा जाएगा। लेकिन वह राज्य जिसने सरकारी कामकाज के लिए हिन्दी को नही अपनाया है, उसको अंग्रेजी पत्र के साथ हिन्दी अनुवाद भेजने के लिए बाध्य नहीं होगा। इन राज्यों को इस बात की छूट दी गई है कि वे हिन्दी राज्यों के साथ अथवा केन्द्र के साथ हिन्दी में पत्र-व्यवहार कर सकते है। केन्द्रीय सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों था कपनियों, निगमों आदि के कार्यालयों के पारस्परिक पत्र-व्यवहार में हिन्दी पत्र के साथ उसका अंग्रेजी अनुवाद और अंग्रेजी पत्र के साथ उसका हिन्दी अनुवाद भेजा जाएगा। सरकारी संकल्पों, सरकारी आदेशों, नियमों, अधिसूचनाओं, प्रशासनिक रिपोट, प्रेस विज्ञप्तियों आदि में हिन्दी और अंग्रेजी का साथ-साथ प्रयोग किया जाएगा। संस्कृत में प्रस्तुत किए जानेवाले कागज पत्र भी दोनों भाषाओं में रहेंगे और सरकार की ओर से किए गए संविदाओं, करारों आदि में तथा लाइसेंसों, परमिटी, टेंडर फार्मों आदि में भी दोनो भाषाओं का प्रयोग किया जाएगा । दिसम्बर, 1967 में ससद ने भाषा नीति-विषयक एक सरकारी संकल्प स्वीकार किया था जिसके अनुसार केन्द्रीय सरकार हिन्दी के प्रचार तथा विकाम और संघ के विभिन्न सरकारी प्रयोजनों के लिए उसके क्रमिका प्रयोग में तेजी लाने के लिए एक अधिक गहन और व्यापक कार्यक्रम तैयार करेगी और उसे कार्यान्वित करेगी । केन्द्रीय सरकार इस सम्बन्ध में किए गए उपायों तथा उसमें हुई प्रगति का ब्योरा देते हुए एक वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट भी संसद के दोनो सदनों के सभापटल पर प्रस्तुत करेगी । इस तरह एक लम्बी द्विभाषिक स्थिति शुरू हुई है, जिसमें प्रत्येक सरकारी कर्मचारी सरकारी कामकाज में हिन्दी या अंग्रेजी में किसी भी भाषा का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है। उसे हिन्दी या अंग्रेजी भाषा में तैयार किए हुए अपने नोट या ड्रापट का स्वयं दूसरी भाषा में अनुवाद नहीं देना है। साथ ही, कुछ प्रयोजनों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। द्विभाषिक नीति की सफलता के लिए यह बहुत जरूरी है कि केन्द्रीय सरकार के हिन्दी न जानने वाले कर्मचारियों को हिन्दी सिलाई जाए, ताकि वे हिन्दी में लिखे गए नोटों और मसौदों को पढ़ सकें। हालांकि संशोधित राजभाषा अधिनियम के अनुसार केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों मे कागज हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जारी होने चाहिए, लेकिन प्रशासनिक दिक्कतों के कारण 1968 में ऐसा करना सम्भव नहीं था। इसलिए इस अधिनियम के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में 6 जुलाई, 1968 को जारी किए गए आदेश में यह कहा गया कि हिन्दी भाषा, राज्यों में स्थित केन्द्रीय सरकार के कार्यालय इन कागज पत्रों को दोनों ही भाषाओं में अनि वार्यतः जारी करें और अहिन्दीभाषी राज्यों में स्थित कार्यालय, इसके लिए तैयारी करें। राजभाषा अधिनियम मे केन्द्रीय सरकार के उपक्रमों और निगमों का स्पष्ट उल्लेस है और इसकी ओर 6 जुलाई, 1968 के प्रशासनिक आदेश द्वारा मंत्रालयो का ध्यान दिलाया गया था। लेकिन 1971-72 के कार्यक्रम में हिन्दी- भाषी क्षेत्रों में स्थित उपक्रमो और निगमों से पहली बार कहा गया कि वे अधि- नियम का अनुपालन करने के लिए टाइपराइटरों, हिन्दी अनुवाद के लिए स्टाफ और अहिन्दीभाषी कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए पर्यात प्रबन्ध करें। जनवरी, 1973 से इन संस्थानों को हिन्दी के प्रयोग के बारे में तिमाही प्रगति रिपोर्ट अपने प्रशासनिक मंत्रालयों को प्रस्तुत करनी होती है।शुरू में हिन्दीभाषी क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों में राजभाषा नीति के कार्यान्वयन पर जोर दिया गया था । 6जुलाई, 1968 के कार्यालय ज्ञापन द्वारा अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों को राजभाषा नीति के कार्यान्वयन मे कुछ समय के लिए छूट-सी दी गई थी, लेकिन उनसे कहा गया था कि वे अनुवाद आदि के लिए जल्द से जल्द प्रबन्ध करें। 1973-74 और 1974-75 के कार्यक्रम में इन कार्यालयों से कहा गया कि वे अनुवाद के लिए स्टाफ की नियुक्ति, फार्मों का हिन्दी में अनुवाद और उनकी छपाई आदि प्रारम्भिक कार्रवाइयां करें और संकल्प, नियम, नोटिस, करार आदि हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जारी करने के बारे में कानूनी आवश्यकता के कम से कम 20 प्रतिशत का अनुपालन करें। 1975-76 के पहले अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में स्थित सरकारी उपक्रमों से राजभाषा नीति के उपर्युक्त उपबन्धों के अनुपालन के बारे में नही कहा गया था। 1975-76 के कार्यक्रम में पहली बार उनसे कहा गया कि ये उपक्रम अपने हिन्दी न जानने वाले कर्मचारियों को हिन्दी सिखाने का प्रबन्ध करें। प्रत्येक दफ्तर के लिए कम से कम हिन्दी का एक टाइपराइटर खरीदें, एक अनुवादक रखें तथा अपने कर्मपारियों को हिन्दी का सहायक साहित्य भी उपलब्ध कराएं। राजभाषा नियम, 1976 राजभाषा अधिनियम, 1963 में किए गए प्रावधान के अनुसार नियम बनाए गए । उन नियमों की राजभाषा नियम, 1976 नाम देकर 28 जून, 1976 को जारी किया गया। इन नियमों में किए गए प्रमुख प्रावधान इस प्रकार है: 1.ये नियम केन्द्रीय सरकार के सभी कार्यालयों पर लागू होते है। केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त आयोग, समितियां, अभिकरण तथा केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व वाले या नियंत्रणाधीन निगम या कम्पनी के कार्यालय आदि भी केन्द्रीय सरकार के कार्यालय की परिभाषा में आते है। 2. केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से पत्र आदि हिन्दीभाषी राज्यों को (जिन्हें 'क' क्षेत्र के राज्य कहा गया है) या ऐसे राज्यों में किसी अन्य कार्यालय या व्यक्ति को हिन्दी में भेजे जाएंगे। यदि किन्ही असाधारण दशाओं में कोई पत्रादि इन्हें अंग्रेजी में भेजे जाते हैं,तो उनका हिन्दी अनुवाद भी साथ में भेजा जाएगा । 3. केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से पत्रादि पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यों तथा चंडीगढ़ और अण्डमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के सघशासित क्षेत्री के प्रशासनो को (जिन्हें 'ख' में शामिल किया गया है) सामान्यतः हिन्दी में भेजे जाते हैं तो उसका हिन्दी अनुवाद भी साथ में भेजा जाएगा। लेकिन इनराज्यों में किसी व्यक्ति को भेजे जाने बात पत्रादि हिन्दी या अंग्रेजी दोनों मेंऐसी किसी भाषा में भेजे जा सकते हैं। 4. अन्य अहिन्दीभाषी राज्यों (जिन्हें 'ग' क्षेत्र कहा गया है) के किसीकार्यालय या व्यक्ति को पत्रादि सामान्यतया अंग्रेजी में भेजे जाएंगे । 5.केन्द्रीय सरकार के 'ख' तथा 'ग' क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों के बीचपत्रादि हिन्दी अथवा संग्रेजी में हो सकते हैं। 6. हिन्दी में प्राप्त पत्रादि के उत्तर हिन्दी में ही दिए जाएंगे। जब कभीकोई आवेदन, अपील या अभिवेदन हिन्दी में किया जाए या उसपर हिन्दी मेंहस्ताक्षर किए जाएं तो उसका उत्तर हिन्दी में दिया जाए । 7. केन्द्रीय सरकार का कोई कर्मचारी,जिसे हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञानप्राप्त है, तकनीकी और विविध दस्तावेजों को छोड़कर किसी हिन्दी दस्तावेजके अंग्रेजी अनुवाद की मांग नहीं कर सकता । 8.केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों से सम्बन्धित सभी मैनुअल, संहिताएं और अन्य प्रक्रिया सम्बन्धी साहित्य हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में द्विभाविक रूप मेंतैयार किए जाएंगे। सभी फार्मों और रजिस्टरों के शीर्ष, नामपट्ट, सूचनापट्टतथा स्टेशनरी आदि की अन्य गर्दै हिन्दी और अंग्रेजी में होंगी। 9. प्रत्येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह उत्तरदायित्व होगा किवह यह सुनिश्चित करे कि राजभाषा अधिनियम और इन नियमों का संमुचितरूप से अनुपालन किया जाता है। सभी कार्यालयों और विभागों में निम्नलिखित कार्यालयों के लिए नी अनु रोध किया गया है : 1.प्रदर्श नियों में जनता की सुविधा के लिए प्रचार-माध्यम के रूप मेंहिन्दी का पर्याप्त उपयोग किया जाए। 2. जब राज्य सरकारों से हिन्दी में पत्र प्राप्त हो तो वे उनसे ऐसे पत्रो का अंग्रेजी अनुवाद न मांगें । यदि आवश्यकता महसूस हो तो ऐसे पत्रों के अंग्रेजीअनुवाद की व्यवस्था मंत्रालय अथवा विभागस्वर्य करें । 3. ऐसे अधिकारी और कर्मचारी जो जनता के सम्पर्क में आते हैं और जिनको बिल्ला लगाना पड़ता है, यदि वे हिन्दीभाषी क्षेत्रों, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और चण्डीगढ़ में काम कर रहे हों तो बिल्ले हिन्दी में भी लगाएं। 4.केन्द्रीय सरकार के वे सभी मंत्रालयों / विभागों और हिन्दीभाषी क्षेत्रोमें स्थित उनके संबद्ध तथा अधीनस्थ कार्यालय, कम्पनियां और निगम, जिनका जनता से सीधा सम्बन्ध होता है, अपने यहां किसी प्रमुख स्थान पर इम आशय - का.सूचनापट्ट लगाएं कि वे हिन्दी में भरे गए फार्म आदि सहर्ष स्वीकार करते5. राजस्थान में स्थित कार्यालयों को चाहिए कि वे राजस्थान सरकार के निर्णयानुसार अपने सभी वेतन बिल आदि हिन्दी में ही तैयार करें। किन्हीं खास मामलों में विल अंग्रेजी में तैयार किए जा सकते हैं, पर इसके लिए कार्यालय के अध्यक्ष की अनुमति आवश्यक है और इन बिलों की स्वीकार करने के लिए सम्बन्धित जिलाधीश से लिखित अनुरोध करना होगा। राजभाषा अधिनियम में संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी विधेयको अथवा उनके संशोधनों के अंग्रेजी के प्राधिकृत पाठ के साथसाथ उनके प्राधिकृत हिन्दी अनुवाद देने का उपबन्ध है। यह 1970 के बजट सत्र से अनौपचारिक रूप से लागू किया गया था। अब इसकी 1 अक्तूबर, 1976 से औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया है। पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों तथा चंडीगढ और अण्डमान एवं निकोबार संघशासित क्षेत्रों में स्थित अधीनस्थ कार्यालयों और निगमो, कम्पनी तथा उद्यमों से हिन्दी के उपयोग सम्बन्धी तिमाही प्रगति रिपोर्ट मंगाने का निर्णय किया गया है। दिल्ली से बाहर बायोजित की जाने वाली राजभाषा कार्यान्वयन समितियों की बैठकों में वहां के हिन्दी शिक्षण योजना के वरिष्ठ अधिकारियों को भी आमंत्रित करने के अनुदेश जारी किए गए हैं, क्योंकि वे राजभाषा नीति के कार्यान्वयन से सम्बन्धित हैं और इन बैठकों में लिए गए निर्णय उनके लिए भी उपयोगी होते हैं। साथ ही,ये अधिकारी राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के बारे में इन बैठकों में उपयोगी सलाह दे सकते हैं। केन्द्रीय हिन्दी समिति के अनुमोदन से ऐसे आदेश जारी किए गए हैं कि केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व वाले या नियंत्रणाधीन निगमों, कम्पनियों, उद्यमों आदि द्वारा जो माल तैयार किया जाता है उस पर विवरण अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी में भी दिया जाए । केन्द्रीय हिन्दी समिति के अनुमोदन से यह निर्णय किया गया है कि अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में स्टेशनों आदि के नामपट्टों और जनता की सूचना के लिए लगाए जाने वाले सूचना बोडों में सबसे ऊपर क्षेत्रीय भाषा की लिपि, उसके बाद देवनागरी लिपि और सबसे नीचे रोमन लिपि का प्रयोग किया जाए ।केन्द्रीय पुलिस दलों और रक्षा सेवाओं के कर्मचारियों की नामपट्टियों में देवनागरी और रोमन लिपियों का प्रयोग करना होगा, लेकिन टोपियों और कंधों पर जो बिल्ले लगाए जाते हैं, उनमें केवल देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जा सकता है। स्पष्ट है कि केन्द्रीय सरकार की बराबर हो यह नीति रही है कि हिन्दी को संघ की राजभापा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए समुचित कार्यवाही की जाएकिन्तु ऐसा करते समय इस बात का बराबर ध्यान रखा जाए कि संघ सरकार की द्विभाषिक नीति ध्यान में रहे और जो भी कदम उठाए जाएं, उनसे किसीका अहित न हो और साथ ही अंग्रेजी के प्रयोग के बारे में जो कानूनी व्यवस्थाएं हैं,उनका भी पूरा पूरा अनुपालन हो ताकि अहिन्दीभाषी राज्यों को और हिन्दीन जानने वाले कर्मचारियों को किसी प्रकार की असुविधा न होने पाए
आज राजभाषा हिन्दी के विकास में और उसके प्रगामी प्रयोग में जो निराशा- जनक स्थिति है और देश में जो भाषायो अवरोध और कसुपित वातावरण है, उसके मेरे विचार में मुख्य कारण निम्नलिखित हैं- 1. शासक वर्ग का अंग्रेजी के प्रति मोह और शासनतंत्र में अंग्रेजियत विशिष्ट वर्ग के द्वारा अपने व स्व को बनाए रखने की भावना । के 2. मविधान निर्माणकाल में हिन्दी के प्रति उपेक्षा भाव और तदनुसार अवरोधात्मक संवैधानिक उपबंधों की व्यवस्था । 3. दोषपूर्ण शिक्षानीति और विभाषा फार्मूला के प्रति उदासीनता । 4. हिन्दी के तथाकथित समर्थकों की अदूरदर्शिता । 5. राजभाषा-नीति के नियमन व प्रवर्तन में अहिन्दी-भाषी क्षेत्र के हिन्दी के प्रबल समर्थकों के प्रति उपेक्षा-भाव । 6.देश की एकता के लिए हिन्दी को सीमेंट के रूप में अपनाने के बदले संकुचित भावना उभारने के लिए इसे हथोड़े के रूप में प्रयोग । 7. भाषा-समस्या को राष्ट्रीय समस्या के बदले राजनीतिक समस्या के रूप में ग्रहण !
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