साहित्यिक भाषा का स्वरूप

 

साहित्यिक भाषा  का  स्वरूप

भाषा के विभिन्न रूप होते है| जिसमें साहित्यिक भाषा का अपना महत्व है| कारण यही वह भाषा है जो अपने समाज का प्रतिनिधित्व करती है| इस  साहित्यिक भाषा का सामान्य परिचय निम्नलिखित रूप में देख सकते है|

साहित्यिक भाषा की परिभाषा:-

साहित्यिक भाषा इसमें दो शब्द है एक साहित्यिक और दो भाषा| इसमें ‘साहित्यिक’ का अर्थ साहित्य से जुडा हुआ और ‘भाषा’ का अर्थ विचार व्यक्त करने का साधन| इस प्रकार साहित्यिक भाषा वह भाषा है जिसका प्रयोग साहित्य की रचना-जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध आदि में किया जाता| इसीलिए यह भाषा  सामान्य बोलचाल की भाषा की अपेक्षा अधिक परिष्कृत, प्रभावशाली और कलात्मक होती है। इसके अतिरिक्त इसकी निम्नलिखित परिभाषाएं मिलती हैं-

भाषा विज्ञान कोश:-

 1) साहित्यिक भाषा को पारिभाषित करते हुए लिखा है - "किसी भाषा की वह विभाषा जो सर्वश्रेष्ठ समझकर साहित्य रचना के लिए प्रयोग की जाएं तथा बोलचाल की भाषा की अपेक्षा कुछ विशिष्ट हो।"

2)डॉ. मंगलदेव शास्त्री साहित्यिक भाषा को स्वीकारते हुए लिखते हैं- "जिसमें साहित्य सृजन हुआ हो तथा जिसका प्रयोग विशेषतया समूह या शिष्ट वर्ग करता हो वह साहित्यिक भाषा है।"

साहित्यिक भाषा की प्रमुख विशेषताएँ

1) सृजनात्मकता:-

       साहित्यिक भाषा में सृजनशीलता की ताकद होती है| साहित्यिक भाषा का सृजन रूप बहुत ही विस्तृत है, जिसमें साहित्य के विभिन्न रूप समाज के हर क्षेत्र सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक आदि पहलु, गतिविधियों, वर्तमान, भूतकाल और भविष्यकाल की परिकल्पना वहीं समुद्र, नदी, पर्वत, वन, रास्ते, गाँव, शहर, आजीविका के साधन आदि कईयों रूपों में साहित्य सृजन होता है और हर एक रूप अपनी अलग-अलग शब्दावली से साहित्य रचता है। इसी शब्दावली के शिष्ट प्रयोग से वाचक साहित्य की और आकर्षित होता है। साहित्य भाषा के माध्यम से इतना प्रभावशाली बन सकता है कि जैसे यदि देश भक्ति पर कविता हम सुने या पढ़ें तो हमारी अंतरात्मा भी कविता के भावों में ओत-प्रोत हो जाती है। हास्य कविता या लेख को पढ़कर सुनकर हम हँसने लगते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि साहित्यिक हिंदी की ताकत हमारे रोजमर्रा के जीवन, जीवन की गतिविधियों और विचारों को कुछ समय के लिए ही क्यों न हो अपने रंग में ढाल लेती है। यदि साहित्यिक भाषा समाज के सत्य को दर्शाती है कटु परिस्थितियों और अनदेखी बातों, मुद्दों को एक विशिष्ट शैली द्वारा हमारे सामने रखती है, तो इसके माध्यम से जन जागृति जैसा जटिल कार्य भी आसान हो जाता है। इसीलिए प्रेमचंद ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा है।

2) भावात्मकता:-

       साहित्यिक भाषा भावों को व्यक्त करने में सक्षम होती है| जिसके द्वारा लेखक या कवि अपने मनोभावों को व्यक्त करता है। यह भाव किसी एक प्रकार के नहीं होते हैं। यह विधा, लेख या कविता पर निर्भर होते हैं। और यही भाव पाठक या वाचक के मन को भी उत्प्रेरित करते हैं। इसे साहित्यिक लेखनी की सार्थकता कही जा सकती है।

साहित्य सृजन में जिस हिंदी का प्रयोग होता है वह साहित्यिक हिंदी कहलाती है। साहित्य क्षेत्र में हिंदी भाषा, विषय, भाव, विचार और विधा के अनुरुप अपना विशिष्ट स्वरूप स्वीकारती है। यह आम आदमी की बोलचाल की भाषा न होकर एक विशिष्ट शब्दावली से गुंथी हुई भाषा होती है।

3) परिष्कृत एवं मानक:-

साहित्यिक भाषा परिष्कृत एवं मानक होती है| साहित्यिक भाषा व्याकरण के नियमों का पालन करती है। इसमें शब्दों का चयन सावधानी से किया जाता है। साहित्यिक भाषा अपने शिष्टाचारों के माध्यम से आगे बढ़ती है। यही शिष्टाचार का माध्यम लेखक के उद्देश्य को सार्थक करता है। साहित्यिक भाषा शब्द शक्ति, रस, पद, अलंकार, शैली, बिम्ब, प्रतीक आदि की उपयोगिता या प्रायोगिकता साहित्यकार की विद्वता को पुष्ट और परिपूर्ण करती है। साहित्यिक शब्द शक्तियों में अभिधा, लक्षणा, व्यंजना और शब्दगुण में ओज, माधुर्य और प्रसाद गुण प्रमुख है। साहित्य में लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का होना उच्च दर्जे का साहित्य माना जाता है। इस प्रकार का काव्य पाठक के मन में आस्वादन करने में अहम् भूमिका निभाता है। अंतः साहित्य निर्माण ही साहित्यिक भाषा को परिनिष्ठित पद दिला सकता है।

4) कलात्मकता:-

साहित्यिक भाषा में सृजनात्मकता और आकर्षण जितना होता है उतना ही अलंकार, बिंब, प्रतीक, उपमा आदि का प्रयोग भाषा को सौंदर्य प्रदान करता है। कारण इसका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठक पर प्रभाव डालना भी होता है। भाषा पाठक को सोचने, महसूस करने और कल्पना करने के लिए प्रेरित करती है।इसीलिए कम से कम शब्दों में गहन अर्थ व्यक्त करने की कला साहित्यिक भाषा में होती है|  

साहित्यिक भाषा का स्वरूप 

साहित्यिक भाषा से श्राशय एक ऐसी भाषा से है जिसमें अच्छा-खासा साहित्य हो, और जिसको मुख्यतया शिक्षित समुदाय ही बोल सकता हो। यह प्रायः सरकारी या राज-काज की भाषा होती है। इसकी शिक्षा और रक्षा या तो बोलचाल के परम्परागत संप्रदाय से होती है, या अधि-कतर लेख-द्वारा, जैसे समाचार-पत्र, मासिक-पत्र, कविता, कथोपाख्यान की पुस्तकों से। इस प्रकार पुस्तकों की भाषा होने से यह शिक्षित मनुष्यों की भाषा बन जाती है। वे ही इसको शुद्ध रीति से बोल सकते हैं। ये लोग इसपर इतने मुग्ध हो जाते हैं कि क्रमशः ग्रामीण, प्रान्तीय या स्थानीय भाषा से, जो प्रायः उनकी मातृ-भाषा होती है, घृणा करने लगते हैं।

उदाहरणं के लिये, उत्तर भारत में जिस फारसी के पढ़ने का प्रचार है वह वस्तुतः फारस देश की मध्यकालीन साहित्य-संबन्धी भाषा है। उसका फारस देश की ग्रामीण, या भिन्न भिन्न प्रान्तीय बोलियों से साक्षात् कोई संबन्ध नहीं। यह नहीं, एक मनुष्य जो भारतवर्ष में फ़ारसी का पूर्ण विद्वान् गिना जाता है उसके लिये यह आवश्यक नहीं कि वह फारसदेश की आधुनिक साहित्य-संबन्धी भाषा से भी ठीक तरह परिचित हो ।

फारसी भाषा के आधुनिक और मध्य-कालीन साहित्य-संबन्धी भेदों के उल्लेख से यह बात स्पष्ट हो गई होगी कि साहित्य-संबन्धी भाषा के दो रूप या भेद हो सकते हैं। एक तो साहित्यिक भाषा ऐसी हो सकती है जिसकी शिक्षा सामा-न्यतः पुस्तकों के ही द्वारा हो सकती है, क्योंकि उसके बोलने वालों की संख्या नहीं के तुल्य होती है। जैसे संस्कृत, ग्रीक ( प्राचीन), लैटिन आदि। इनमें नया साहित्य भी प्रायः नहीं लिखा जाता। दूसरा भेद उनका है जिनकी शिक्षा बोलचाल तथा आधुनिक साहित्य से भी हो सकती है। उनको लाखों मनुष्य दिनरात बोलते हैं और उनमें नया साहित्य भी लिखा जाता है। आजकल की पुस्तकों की हिन्दी, इंग्लिश, जर्मन, फ्रेंच इत्यादि की गणना इसी भेद में है।



साहित्यिक भाषा का प्रारम्भ सर्व साधारण की भाषा के किसी एक रूप से, किसी कारण वश उसे प्राधान्य मिल जाने से, होता है। इस प्राधान्य के मिलने का कारण प्रायः राजनैतिक या धार्मिक होता है। इसी से साहित्यिक भाषा प्रायः राज-भाषा या धार्मिक भाषा के रूप से प्रचलित हो जाती है। इसी से वह शिक्षित लोगों की तथा साहित्य की भाषा बन जाती है। शिक्षा और सभ्यता की वृद्धि के साथ साथ भिन्न भिन्न प्रान्तों में परस्पर संव्यवहार और गमना-गमन की बढ़ती होती है। प्रान्तीय और स्थानीय विशेषताओं से लगभग शून्य होने के कारण साहित्यिक भाषा से इस संव्यवहार में बड़ी सुबिधा होती है। इसलिये इसका पद सर्व-साधारण की भाषा से ऊँचा गिना जाता है और यह शिक्षितों की प्रेमपात्री हो जाती है। राजनैतिक या धार्मिक कारणों से कभी कभी यह अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का पद ग्रहण कर लेती है।


सर्वसाधारण की भाषा तथा साहित्यिक भाषा में अन्तर

सर्वसाधारण की भाषा ही, जिसे बोलचाल की भाषा भी कहते हैं, परिस्थिति-वश महत्त्व प्राप्त कर लेने से साहित्यिक भाषा का रूप ले लेती है। इस महत्त्व-प्राप्ति का कारण या तो राजनीतिक होता है या धार्मिक। यही कारण है कि प्रत्येक साहित्यिक भाषा या तो. किसी धर्म की भाषा होती है या किसी राज्य की शिक्षित तथा सभ्य लोगों की भाषा होने के कारण धीरे-धीरे साहित्यिक भाषा सर्वसाधारण की भाषा से पृथक हो जाती है। उसका रूप कुछ आदर्श भाषा-जैसा हो जाता है। बह स्थानीय विशेषताओं से रहित तथा प्रान्तीय प्रभावों से परे हो जाती है। सक्षेप में, शिक्षा-दीक्षा, पठन-पाठन, पत्र लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं की भाषा होने से उसका स्तर सर्वसाधारण की भापा से कुछ ऊँचा हो जाता है।

सर्वसाधारण की भाषा तथा साहित्यिक भाषा में मुख्य रूप से निम्नलिखित अन्तर रहता है-,

(2) सर्वसाधारण की भाषा अकृत्रिम होती है, किन्तु साहित्यिक भाषा कृत्रिम होती है। यहाँ कृत्रिमता से अभिप्राय है कलात्मकता का होना या स्वाभाविक्ता का न होना । इस दृष्टि से सर्वसाधारण की भाषा की तुलना एक निरन्तर प्रवाहशीला नदी से तथा साहित्यिक भाषा की तुलना एक कृत्रिम, बनावटी, कलात्मक, झील से की जाती है। जिस प्रकार नदी में अपना प्राकृतिक सौन्दर्य होता है, वह अपने प्राकृ-तिक मार्ग पर सदैव आगे बढ़ती रहती है, उसमें स्वच्छ जल प्रवाहित होता रहता है, इन सबके कारंण उसमें एक सजीवता बनी रहती है, उसी प्रकार सर्वसाधारण की भाषा भी स्वाभाविक रूप से विकसित होती रहती है, उसमें सदैव सजीवता बनी रहती है। इसके विपरीत, जैसे झील का सौन्दर्य, कलात्मक होने से अधिक भले ही हो, किन्तु फिर भी उसमें एक प्रकार की कृत्रिमता रहती है तथा उसका पानी रुका हुआ होने के कारण निर्जीव-सा प्रतीत होता है, उसमें ताजगी तथा सजीवता का अभाव रहता है, उसी प्रकार साहित्यिक भाषा भी नियमों के बाँधों से बँधी, अलङ्कारों की छटा से अलंकृत तथा व्याकरण के नियमों से परिष्कृत होती है। उसमें सौन्दर्य तो होता है, किन्तु कृत्रिम । इसी कारण कुछ समय पश्चात् साहित्यिक भाषा जीवनहीन सी प्रतीत होने लगती है, जबकि सर्वसाधारण की भाषा में दैव जीवन बना रहता है।

. (२) सर्वसाधारण की भाषा गतिशील होती है, किन्तु साहित्यिक भाषा अपेक्षा-कृत स्थिर रहती है। सर्वसाधारण की भाषा का स्वरूप सदैव  मौखिक ही होने के कारण वह अनजाने ही हर क्षण बदलती रहती है| भाषा वैज्ञानिक इसे ही भाषा का विकास मानते है| साहित्यिक भाषा व्याकरण के नियमों से जकदी होणे के कारण तथा लिखित रूप में परिवर्तन का काम अवकाश होने के कारण चिरकाल तक बनी रहती है| 

निष्कर्ष

साहित्यिक भाषा भाषा का वह कलात्मक और संवेदनशील रूप है जो विचारों, भावों और कल्पनाओं को प्रभावपूर्ण तथा सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। यही विशेषताएँ उसे सामान्य व्यवहारिक भाषा से अलग और विशिष्ट बनाती हैं।भाषा- जिस भाषा में प्रचुर साहित्य की रचना होती है, वह साहित्यक-भाषा कही जाती है। जब कोई बोली किसी कारण प्रधानता प्राप्त कर लेती है, तो वह शिक्षितों की तथा साहित्य की भाषा बन जाती है। साहित्यिक-भाषा स्थानीय प्रभावों से बच्छूती रहती है। विभिन्न क्षेत्रों या प्रान्तों के शिक्षित लोगों के पारस्परिक व्यवहार में भी प्रायः इसी का प्रयोग होता है। अपने साहित्य के कारण साहित्यिक-भाषा बहुत समय तक अपनी स्थिरता तथा अस्तित्व को बनाये रखती है। यह व्याकरण द्वारा नियमित होती है। प्राचीन संस्कृत तथा बाधुनिक हिन्दी आदि भाषाएँ इसका उदाहरण हैं।

 

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