भारतेंदूयुगीन काव्य की विशेषताएं
हिंदी साहित्य के इतिहास के अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से उसे चार कालों में विभाजित किया, जिसमें से चौथा काल आधुनिक काल है| जिसका समय सं 1900 से लेकर अब तक | पुनश्च इस काल निम्न भागों में विभाजित किया हैं-
1) भारतेंदू युग- प्रथम चरण- उत्थान काल- नव जागरण या पुनर्जागरण काल - 1857- 1900 ई.
2) द्विवेदी युग- द्वितीय चरण- या उत्थान काल - जागरण सुधार काल - पूर्व स्वच्छंदता काल 1900 -1918 ई.
3) छायावादी युग- तृतीय चरण- उत्थान काल - प्रसाद युग - प्रौढता काल - छायावाद काल स्वच्छंदता वाद काल -1918 - 1938
4) प्रगतिवादी- प्रयोगवादी काल - छायावादोत्तर काल - उत्तर स्वच्छंदता काल - प्रसादोत्तर काल - 1938 - 1953 ई
5) नव लेखन काल - अभिनव लेखन काल - 1953 से आज तक
भारतेंदू युग आधुनिक युग का प्रवेश द्वार है| जिसका समय 1857 से 1900 ई तक माना जाता है| 1857 ई. के बाद महारानी विक्टोरिया का भारत पर अधिकार हो गया और 1900 ई0 तक आते-आते ब्रिटिश सरकार ने कई सुधार कार्य किये लेकिन वे बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं थे। कई लोगों को सरकार द्वारा कल्याणकारी कदम उठाये जाने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना के बाद भारतीय जनता को अंग्रेज़ी राज्य के औपनिवेशिक हितों के विषय में पता चला। इस तरह 1857 ई. से 1885 ई. तक ब्रिटिश सरकार के स्पष्ट स्वरूप के विषय में एक द्वंद्व की स्थिति रही। इसीलिए इस युग की कविता में जहाँ राष्ट्रभक्ति के स्वर मिलते हैं, वहीं राजभक्ति की भावनाएँ भी मिलती हैं। पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के परिचय से 19वीं शताब्दी में भारत में नवजागरण की लहर आई जिससे भारत में प्रत्येक क्षेत्र में बुद्धिवाद, मानवतावाद, विवेक, सहिष्णुता, न्यायप्रियता एवं व्यक्तिवाद को महत्त्व दिया जाने लगा। इस युग में न तो रीतिकालीन राज्याश्रय था और न ही रीतिवादी मानसिकता। अतः इस काल में जो कविता लिखी गई उसमें देश, समाज की चिंता प्रमुख थी। भारतेन्दु युग से हिन्दी साहित्य में आधुनिकता का उदय होता है। आधुनिकता एक वैचारिक दृष्टिकोण है जो ईश्वर की जगह मानव को तथा आस्था की जगह तर्क को केंद्र में रखती है। आधुनिकता वैज्ञानिक दृष्टिकोण में विश्वास रखती है एवं कोरी भावुकता का निषेध करती है। इसीलिए आधुनिकता के दौर में जो साहित्य लिखा गया, वह लौकिक जीवन की चिंता करता है। इस युग में ईश्वर की धारणा व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है, साहित्य या कि कलाओं में उसका चित्रेण प्रासंगिक नहीं रह जाता। आधुनिकता नवजागरण का परिणाम थी। नवजागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा थी जो मनुष्य के संपूर्ण एवं संश्लिष्ट रूप की खोज व उसका परिष्कार करना चाहती थी। संपूर्ण मनुष्य की यह परिकल्पना भारतीय नवजागरण का केंद्र बनी।
भारतेन्दु युग की साहित्यिक प्रवृत्तियां-
1) देशभक्ति राष्ट्रीयता या राजभक्ति या राष्ट्रभक्ति
3) सामाजिक चेतना या सामजिक समस्यायों का चित्रण
4) भक्ति भावना
5) शृंगारिकता
6) प्रकृति चित्रण
7) समस्यापूर्ती
8) रीति निरुपण
9) अंतर्विरोधियों का साहित्य
10) हास्य व्यंग्य
11)काव्यानुवाद
12) जन जीवन का चित्रण
13) प्राचीनता और नवीनता का समन्वय
14) इतिवृतात्मकता
15) कला पक्ष
काव्यरूप , भाषा , छंद , अलंकार
1) राजभक्ति या देशभक्ति :-
भारतेंदू युगीन कविता में राजभक्ति या देशभक्ति के भाव मिलते है| इसे ही हम राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रीयता कह सकते है| भारतेन्दु युग के प्रारंभ के कवियों में ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति के भाव थे। इसका कारण यह था कि प्रारंभ में वे साम्राज्यवादी सरकार के स्वार्थ को स्पष्ट रूप से समझ नहीं सके। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने कुछ सुधार अवश्य किये परंतु ऐसा करने के पीछे उनकी सदिच्छा नहीं थी। इस आरम्भिक दौर में ब्रिटिश सरकार का सही रूप स्पष्ट न हो सका। इसीलिए आरंभिक दौर में तत्कालीन अंग्रेज सरकार के प्रति इन कवियों में राज्यभक्ति का भाव मिलता है | परंतु आगे जब उनकी नीति समझ में आई तब इन कविताओं में देशभक्ति के भाव उभरने लगे| अर्थात प्रारंभ में इस युग में जहां महारानी विक्टोरिया के प्रति प्रसंशा के भाव मिलते है वही देश प्रेम या राष्ट्र प्रेम मिलता है| जैसे भारतेंदू हरिश्चंद्र लिखते है-
"अंग्रेजी राज सुख साज सजे सब भारी,
पै धन विदेश चली जात है इहै अति ख्वारी|"
इस प्रकार एक ओर उन्होंने अंग्रेजों की स्तुति की पर अंग्रेजों के कारण देश की जो दशा हुई थी इसे भी व्यक्त किया है
भीतर भीतर सब रस चूसे, बाहर से तन मन धन मूसे|
जाहिर बात्न में अति तेज, क्यों सखि! साजन, नहिं अंग्रेज|"
इसके चलते जो तनावपूर्ण स्थिति निर्माण हुई थी, उससे निकलने का कोई मार्ग तब सामने नहीं दिखाई दे रहा था इसीलिये ए कवि भारत की दुर्दशा पर आंसू बहाने की लिए भी विवश हो गया था| जैसे भारतेंदू हरिश्चंद्र लिखते है-
रोवहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई,
हा हा ! भारत दुर्दशा देखी न जाई |"
इस प्रकार कह सकते है कि देश के प्रति जागृती का यह प्रारंभिक काल था, इसीलिये राष्ट्रीयता या देशभक्ति का इतना व्यापक स्वरूप नहीं मिलता |
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