हम हशमत कहानी की कथावस्तु
‘हम हशमत-भीष्म सहानी’
कृष्णा सोबती संस्मरण लिखित संस्मरण है, जो उनके पहले संस्मरण संग्रह से लिया हैं| जिसका नाम हम हशमत है| हशमत का अर्थ है, ‘गौरव, वैभव| अर्थ कृष्णा सोबती लिखित ‘हम हशमत’ संस्मरणों में ऐसे ही
गौरवशाली, वैभवशाली व्यक्तियों स्मृतियों को उजागर किया है
और उनके साहित्यिक लेखनी पर प्रकाश डाला है|
ऐसे हिंदी साहित्य में गौरवशाली व्यक्ति भीष्म जी रहें है|
अत: प्रस्तुत संस्मरण के माध्यम से कृष्णा जी ने भीष्म जी
के स्थिर व्यक्तिमत्व के साथ हिंदी भाषा की समर्थता और सुथरापने स्पष्ट किया है|
संस्मरण का प्रारंभ भीष्म
जी को मिलने की इच्छा से हुआ है| इसीलिए उन्हें फोन किया था
और एक रेस्तराँ में मिलने का तय हुआ
था| पहली ही मुलाकात थी इसीलिए इसलिए किसी पत्रिका
में छपी फोटो का ध्यान कर हम भीष्म साहनी को पहचानने की कोशिश करने लगे थे| दरवाजे पर टकटकी लगाए सोचने लगे कि अभी कोई लम्बा ऊँचा
साहनी अन्दर दाखिल होगा, तो हमें गर्मजोशी से हाथ
मिलाना होगा और पाठकों के अन्दाज में कहना होगा- भीष्म साहिब, आपसे मिलने की बड़ी तमन्ना थी। आज पूरी हुई। आने के लिए
शुक्रिया। पर हुआ उल्टा| कारण उस वक्त पासवाले मेज
पर भीष्म पहले ही आकर बैठे थे| उन्होंने पहचाना ही नहीं|
जब वे इन्तजार करते-करते थक
गये तो वेटर को याद दिलाई- जरा बाहर देखिए... बरामदे में कोई साहब इन्तजार तो नहीं
कर रहे। भीष्म साहनी नाम है। तब पास में बैठे भीष्म जी ने उन्हें आवाज दी और कहा ‘हशमत साहब आप ही है|” इधर आइए कहा और गर्मजोशी से हाथ मिलाना| तब उन्हें यह महसूस हुआ कि यह भीष्म साहनी साहब नहीं उनके बेटे है| इसीलिए पास में बैठकर भी पहचान नहीं पाए थे |
इसके साथ भीष्म जी एक सहज व्यक्तित्व के धनी है| उनके गोरे-चिट्टे जवान चेहरे और तराशी हुई नोक-पलक (चेहरे
की गठन ) पर सहजता के दर्शन होते है| कारण उनके आँखों में
तलखी ‘न’ के बराबर। उनके पास
कोई हाशिया नहीं है। कोई परदा नहीं। इसतरह वह सादगी-पसन्द सादामिजाज इन्सान है।
कहने का मतलब यह है कि आप
किसी भी कबीले में भीष्म जैसे बरखुरदार को मजबूती से बँधा देख सकते हैं। भीष्म जो
है वह सामने है जितनी आँख और सब्र आपके पास है उतना ही सहजपन आप भीष्म के
इर्द-गिर्द देख सकते हैं, पा सकते हैं। भीष्म वह
चेहरा है जो हम-आप में से किसी का बेटा हो सकता है। किसी का भाई, किसी का भतीजा और हर किसी का दोस्त।
वैसे देखा जाए तो भीष्म जी के अपने जिंदगी की जमीन और उनके लेखन
की जमीन इसके बहुत अंतर था, परंतु अपने सहज व्यक्तिमत्व
के कारण ही उनका सोचना अँधेरे और उजाले में डगमगाया नहीं| उनकी नजर कटी नहीं| भीष्म ने इस विभाजन से
अपने को बचाया है।
जीने के स्तर पर भीष्म के पास एक सुथरा, सुरक्षित,
मजबूत चौखटा है जिसने भीष्म के समूचे लेखन और काफी हद तक जीवन-दृष्टि
को भी प्रभावित किया है। उनकी अपनी राजनीतिक आस्थाएँ हैं, ‘इंटलेक्चुअल
कमिटमेंट’ है। मोटे तौर पर भीष्म को अपने कितने ही साथियों
से कहीं ज्यादा सुविधा और समग्रता जिन्दगी में मिली है। छोटी-मोटी सुविधाएँ- अच्छा
घर, पढ़ी-लिखी बीवी, किताबों से भरी शेल्फें और रवनाओं को एकसार करती
एक बँधी-बँधाई जिन्दगी। जीवन के इस सुरक्षित पैटर्न ने जहाँ भीष्म को पनपने में
मदद दी है वहाँ लेखन के लिए जमने की जो जमीन सिर्फ चुनौतियों से बनती है- भीष्म के
आगे से दूर कर दी है, हटा दी है। यही वजह है कि लेखन के स्तर पर भीष्म
को यह लड़ाई कुछ दूसरे ढंग से लड़नी पड़ती है।
भीष्म मध्यम वर्ग की खरोंचें, जख्म,
उसके दर्द और उसके ऊपरी खोल को छू-छूकर, अपने को उस भीड़ से
अलग खड़ा कर लेते हैं और नये सिरे से अपनी पुरानी चिर-परिचित जमीन में उन्हें अंकित
करने का निर्णय कर डालते हैं।
हशमत इतना जरूर कहना चाहेंगे कि जिस मध्यमवर्गीय खोखलेपन को भीष्म का लेखन उघाड़ता
है, उसे देखने की आँख भी उसे उसी वर्ग से मिली है। ‘चीफ की
दावत’ से लेकर ‘भगवान के आदमी’ तक की कहानियों में
परिवेश के यथार्थ को भीष्म ने अपनी साहित्यिक मान्यताओं से परे नहीं जाने दिया।
यही वह बिन्दु भी है जो भीष्म की रचनाओं को उसके मानसिक घनत्व के बराबर जोड़े रखता
है।
इंटलेक्चुअल तल पर
दर्जा-व-दर्जा उड़ानों या गहराइयों में खो जाने के साथ जिन्दगी के यथार्थ से हट
जाना, प्रतिभा के बल पर अपने को विभाजित कर लेना। अपने
पर खुद लीक लगाकर समाज से कट जाना, किसी भी लेखक के लिए विभाजन
से बड़ी ट्रैजडी है। पर अपने सहजता के कारण भीष्म जी इस विभाजन से बच गये |
उनकी तारीफ में लेखिका आगे लिखति है भीष्म जी का पेशा है अंग्रेजी
पढ़ाना परंतु अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने वालों की अमलदारी वाली ऊँची अदा भीष्म जी में
कतई नहीं। और अपनी मादरी जबान हिन्दी में साहित्य-सृजन करना। इसतरह अंग्रेजी
साहित्य के शिक्षकों और पाठकों को हिन्दी की हवा से हो जाने वाले जुकाम से भीष्म
ने अपने को आजाद रखा है।
अभी भी अंग्रेजी पर फिदा
दोस्तों की बहुत बड़ी कतार है जो मानकर चली है कि हिन्दी पिछड़ेपन की जबान है। इसमें
कुछ लिखा भी जा सकता है- इसमें भी उन्हें शक है। परंतु भीष्म जी ने इसे गलत सिद्ध
किया है| अकादमी पुरस्कार प्राप्त ‘तमस’ का पहला अध्याय पढ़कर भाषा और शिल्प के स्तर पर
हिन्दी न बिचारी लगती है, न पिछड़ी। हिन्दी समर्थ है,
सुथरी है और जो चाहे व्यक्त कर सकती है।
इसप्रकार प्रस्तुत संस्मरण के माध्यम से कृष्णा जी ने भीष्म सहानी
जी के सहज व्यक्तित्व के साथ उनके हिंदी भाषा में सहज लेखन के महत्व को स्पष्ट
करते हुए हिंदी भाषा की सार्थकता स्पष्ट की है |
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