देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता

 देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता 

        मानव जीवन में भाषा का अत्यंत महत्त्व है। भाषा का वर्णमाला एवं लिपि से घनिष्ठ संबंध है। प्रत्येक भाषा के लिए एक अलग वर्णमाला आवश्यक होती है। डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के अनुसार "वर्णमाला का ध्वनियों के सांकेतिक चिह्न विशेष की ही संज्ञा लिपि है।" लिपि शब्द 'लिप्यते' से निकला है, जिसके अनेक अर्थ हैं लिंपन करना, लेप देना आदि। जब मनुष्य की शाब्दिक अभिव्यक्ति को सांकेतिक चिह्नों के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए उन चिहनों में उसका अर्थलीपंन किया जाता है। तब लिपि का जन्म होता है। किसी भी भाषा की समृ‌द्धि में लिपि का योग सर्वाधिक होता है।

        देवनागरी लिपि भारत की प्रमुख लिपि है। भारतीय संविधान ने इसे राजलिपि, राष्ट्रलिपि के पद पर प्रतिष्ठत किया है। किसी भाषा का ध्वन्यात्मक प्रतिनिधित्व करनेवाली लिपि ही वैज्ञानिक और पूर्ण लिपि कहलाती है। जब हम देवनागरी की तुलना संसार की अन्य लिपियों; रोमन, अरबी आदि से करते हैं, तो पता चल जाता है कि उन लिपियों की अपेक्षा देवनागरी में कुछ ऐसे गुण या विशेषताएँ हैं जिनके फलस्वरूप उसे वैज्ञानिक लिपि कहा जाता है। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता संबधी विद्वानों ने अपने मत निम्नानुसार व्यक्त किए हैं-

विदेशी विद्वान :

1) प्रो. मेनियर विलियम्स "सफल रूप से कहा जा सकता है कि देवनागरी अक्षरों से बढ़कर पूर्ण और उत्तम अक्षर दूसरें नहीं है।"

2) पिटमैन "संसार में यदि सर्वांश पूर्ण अक्षर हैं, तो देवनागरी के हैं।

3) ग्राउस : "कचहरी के लिए फारसी की यह शैली स्वीकार कर लेने पर विवश होकर नागरी लिपि भी छोड देनी पडेगी, जो एक सर्वोत्तम वैज्ञानिक लिपि है।"

भारतीय विद्वान :

1) सेठ गोविंद दास "हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं, समस्त संसार की लिपियों में से सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। हमारी लिपि में स्वरों और व्यंजनों का जैसा वैज्ञानिक पृथक्करण है वैसा अन्य लिपियों में नहीं।"

2) डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी "संसार की लिपियों में भारतीय लिपियों की यह विशेषता उल्लेखनीय है कि इसके वर्णक्रम नितांत वैज्ञानिक हैं।"

3) डॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री "विश्व की आधुनिक सभी लिपियों में देवनागरी लिपि का स्थान, सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।"

देवनागरी की वैज्ञानिकता :

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। इसकी वैज्ञानिकता निम्नलिखित विशेषताओं से स्पष्ट होती है:-

1) वर्णमाला की पूर्णत: 

    देवनागरी लिपि में 52 वर्ण हैं| इसके अतिरिक्त और वर्ण भी विदेशी भाषाओं के संपर्क के कारण इसमें आए हैं| इतने अधिक वर्ण विश्व की किसी भी अन्य लिपि में नहीं है| रोमन लिपि में केवल 26 वर्ण है| यही कारण है कि हिंदी की सभी ध्वनियों को व्यक्त करने के लिये लिपि चिन्ह रोमन में नहीं है| वाग्न्मय और त्र जैसे ध्वनियों के लिये भी रोमन में कोई लिपि चिन्ह नहीं है | इसके विपरीत देवनागरी लिपि में रोमन लिपि के सभी वर्णों को या ध्वनियों  को व्यक्त करने की क्षमता है|  

 2)   वर्णमाला या  अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण :

देवनागरी की वर्णमाला का क्रम वैज्ञानिक है। जैसे स्वर पहले वह भी ह्रस्व और दीर्घ क्रम से, बाद में व्यंजन। व्यंजन भी उच्चारण स्थान तथा प्रयत्न के अनुसार कंठ्य्, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य, ओष्ठ्य, आदि रूप में हैं। व्यंजन वर्णमाला में भी पहले दो अघोष व्यंजन (क, ख, च, छ) फिर दो घोष (ग, घ, ज, झ आदि) और पाँचवाँ वर्ण अनुनासिक है। इसी प्रकार 'क' वर्ग आदि पाँचों वर्गों के दूसरा और चौथा वर्ण (ख, घ आदि) महाप्राण हैं और पहला तथा तीसरा (क, ग आदि) अल्पप्राण हैं। वर्षों की ऐसी वैज्ञानिक व्यवस्था विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। रोमन, अरबी लिपियों में 'स्वर' 'व्यंजनों' का अलग-अलग वर्गीकरण नहीं है, तथा उच्चारित ध्वनियों का उच्चारण स्थान के क्रमानुसार वर्गीकरण भी नहीं है, जो देवनागरी मे निम्नप्रकार पाया जाता है

1) क- कंठ्य क, ख, ग, घ, ड़

2) च-  तालव्य च, छ, ज, झ, ञ

3) ट -  मूर्धन्य ट, ठ, ड, ढ, ण

4) त - दंत्य त, थ, द, ध, न

5) प -  ओष्ठ्य- प, फ, ब, भ, म

6) अन्तस्य - य, र, ल, व 

7) उष्म - श,  ष, स, ह        देवनागरी लिपि के ये वर्ण ध्वनियों के उच्चारण स्थान को ध्यान में रखकर पंक्तिबद्ध बिठाए गए हैं जो ध्वनियाँ क्रमशः कंठ्य से सुरू होकर ओष्ठ तक संपन्न होती हैं।

3) एक ध्वनि के लिए एक लिपि चिह्न :

प्रत्येक ध्वनि के लिए स्वतंत्र लिपि चिह्न आवश्यक है। देवनागरी में प्रत्येक ध्वनि के लिए स्वतंत्र एक-एक लिपि चिहन है। जबकि संसार की अन्य लिपियों में यह व्यवस्था नहीं है। जैसे रोमन और उर्दू। रोमन में C, Q, K तीन लिपि चिह्न हैं और उच्चारित ध्वनि 'क' एक ही है। उदा. cat= कैट, kite = काइट, Queen = क्वीन। मतलब, रोमन लिपि में 'क' ध्वनि के लिए K, Q, C का प्रयोग होता है। उर्दू लिपि में भी 'स' ध्वनि के लिए तीन लिपि चिहन हैं 'से', स्वाद, सीन, इसी प्रकार 'ज' के लिए 'जे' तथा 'जोय'। इस प्रकार एक ध्वनि के लिए अनेक लिपि चिह्न का प्रयोग अवैज्ञानिक है।

 देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता की दृष्टि से यह भी एक विशेषता है कि इसमें एक ध्वनि के लिए एक ही ध्वनि चिह्न का प्रयोग दिखाई देता है। रोमन लिपि में इस दृष्टि से दोप है। उसमें एक ही ध्वनि चिह्न अनेक अक्षरों को व्यक्त करते हैं। K, C, CH, CK, Q क ध्वनि के लिए चिह्न हैं। इस कारण भी रोमन देवनागरी लिपि की तुलना नहीं कर सकती ।

4) एक चिन्ह एक ध्वनि - 

    अन्य लिपियों की तुलना में देवनागरी लिपि में एक चिन्ह एक ध्वनि की व्यवस्था है| फारसी और रोमन लिपि में एक लिपि चिन्ह एक निश्चित ध्वनि व्यक्त नहीं करता| फारसी के अकेले l (अलिफ)में चार ध्वनियां है, अंग्रेजी के 'w' के लिए पांच ध्वनियां हैं| पर देवनागरी में केवल व के लिए प्रयुक्त होती है| अंग्रेजी 'put' पुट कहलाता है| तो 'But' बट कहलाता है| अर्थात एक लिपि चिन्ह अगर डॉ ध्वनियों को व्यक्त करता है तो वह अवैज्ञानिक है| 

5) जैसे लिखा जाए-वैसे बोला जाए :( उच्च्चारण लेखन में एकरूपता) 

देवनागरी लिपि में वैज्ञानिकता का सबसे बडा प्रमाण यह है कि इसमें जो  बोला जाता है, वही लिखा जाता है और जो लिखा जाता है वही बोला जाता है। अर्थात देवनागरी लिपि में प्रत्येक वर्ण का उच्चारण होता है। जबकि रोमन में बहुत से वर्ण हैं। जिनका उच्चारण नहीं होता जैसे Knowledge का उच्चारण नॉलेज होता है, इसमें KWD आदि वर्णों का उच्चारण नहीं होता; उसी प्रकार Night, Half आदि शब्दों के उच्चारण ऐसे ही हैं।वैज्ञानिकता की दृष्टि से देवनागरी लिपि की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। रोमन लिपि में इस दृष्टि से दोष दिखाई देता है। वहाँ Put (पुट) है तो (But) (वट) है। इस कारण रोमन लिपि वहुत कठिन हो गयी है। इसके उल्टे देवनागरी लिपि में जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है। या जो योला जाता है, वही लिखा जाता है।

6)गत्यात्मकता एवं व्यावहारिकता :

देवनागरी लिपि गत्यात्मक एवं व्यावहारिक है। हिंदी भाषा कई अन्य भाषाओं के संपर्क में आने पर उसे नई-नई ध्वनियों की आवश्यकता महसूस हुई। इस आवश्यकता पूर्ति हेतु देवनागरी में नए लिपि चिह्नों का निर्माण किया गया। क, ख, ग, ज़, फ, ऑ आदि चिह्न इसके उदाहरण हैं। इसी तरह अन्य कुछ लिपि चिहनों का निर्माण किया जाए तो देवनागरी लिपि में विश्व की सारी भाषाओं को लिखने की क्षमता पैदा हो सकती है तथा वह अंतर्राष्ट्रीय लिपि बनने की भी क्षमता रख सकती है।

7) लेखन और मुद्रण की एकरूपता -

    रोमन लिपि में चार प्रकार से वर्ण लिखा है - AB, ab, 𝒜ℬ, 𝒶𝒷 इसके अतिरीक्त छापने और लिखने की वर्णमाला में आकृती का अन्तर है, अंग्रेजी में नया वाक्य कॅपिटल से प्रारंभ किया जाता है| लेकिन हिंदी में ऐसा कोई नियम नहीं है|

8) स्थान साध्य नहीं है -

     देवनागरी में वर्ण अत्यंत कलात्मक, सुंदर और सुडौल है| इस लिपि शब्द अपेक्षा कृत कम स्थान घेरते है| जैसे देवनागरी लिपि में लिखा 'महेश्वर' के जगह रोमन में 'maheswar' अधिक स्थान घेरता है|  

9) व्यंजन चिन्हों की अक्षरिकता -

    देवनागरी का प्रत्येक व्यंजन चिन्ह व्यंजन ण होकर व्यंजन और स्वर का योग है| जैसे- क= क्+अ , ख= ख्+अ आदि| लिपि का ऐसा होना अक्षरिकता है| अर्थात व्यंजन चिन्ह वस्तुत: अक्षर है| ' अक्षर का यहां अर्थ व्यंजन और स्वर का संयुक्त रूप | यह भी देवनागरी की अपनी विशेषता है| 

10) अर्ध्य अक्षर के रूप में सुगमता - 

    एक आदर्श और वैज्ञानिक लिपि में अर्ध्य वर्णो या अक्षरों की रूप रचना की सुगमता रहती है| देवनागरी में यह कार्य बडी सुगमता से या खडी पायी हटाकर किया जाता है| जैसे- ख =ख्य , प=प्य आदि| खडी पाई रहित वर्णो के नीचे 'हल' चिन्ह लगाकर उनका अर्ध्य रूप बनाया जाता है | जैसे- ट, ठ, ड् आदि | रोमन आदि में ऐसी सुविधा नहीं| 

11) हस्व और दीर्घ की स्पष्टता :

यह नागरी की निजी विशेषता है। इसमें हस्व 'इ' और दीर्घ 'ई' में स्पष्ट भेद है। पर अंग्रेजी में दोनों ध्वनियों के लिए आई (1) से ही काम चल जाता है। जैसे (Nib) निब में '' हस्व है और Machine में (i) दीर्घ है।

12) व्यापक क्षेत्र :

देवनागरी लिपि देश के बहुत बडे क्षेत्र में प्रयुक्त हुई है। इसका प्रयोग हिमालय से लेकर महाराष्ट्र तक हरियाणा से बिहार तक है।

इन विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ और विशेषता इस में मिलती है वह इसप्रकार - 

      देवनागरी लिपि विश्व की प्रसिद्ध लिपि है। यह एक आदर्श लिपि है। इसे आदर्श लिपि मानने का कारण यह है कि, इसमें वैज्ञानिकता दिखाई देती है। वैज्ञानिकता के कारण ही यह लिपि लोकप्रिय वनी है। यहाँ हम वैज्ञानिकता की दृष्टि से देवनागरी लिपि की विशेषताओं को अंकित कर रहे हैं-

1) इसमें अभिव्यक्ति की दृष्टि से अधिक ध्वनि चिह्नों का प्रयोग दिखाई देता है। सम्पन्न ध्वनिचिह्नों से युक्त यह लिपि अभिव्यक्ति की विविध सूक्ष्मताओं को दशनि में सक्षम दिखाई देती है, इसी कारण यह दुनिया की उत्तम लिपि मानी जानी है।

2) वैज्ञानिकता की दृष्टि से देवनागरी लिपि की यह भी एक विशेषता है कि, उच्चारण की दृष्टि से समान लिपि चिह्नों की आकृति में भी समानता मिलती है। जैसे-ट, ठ, ड, ढ, प, फ, व, भ। इस कारण देवनागरी लिपि अत्यन्त सुन्दर बनी है। 

3)  देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता की दृष्टि से एक विशेषता यह है कि, इसमें 'त्वरा' का गुण दिखाई देता है। त्वरा के कारण ही बोलने और लिखने में या विविधता उपकरणों में जैसे - टंकलेखन, संगणक आदि में यह लिपि त्वरा के साथ प्रयुक्त की जाती है ।15) देवनागरी लिपि में रोमन लिपि की तरह छोटे-बड़े (कैपीटल, स्मॉल) अक्षरों की व्यवस्था नहीं है । इसके कारण अनावश्यक उलझन देवनागरी लिपि में नहीं है । वैज्ञानिकता की दृष्टि से देवनागरी की यह विशेषता है ।

4) देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता की दृष्टि से यह भी विशेषता है कि, इसमें थोड़ा वहुत परिवर्तन करने के बाद संसार की कोई भी भाषा सफलता पूर्वक लिखी जा सकती है। यही कारण है कि, देवनागरी लिपि आज विश्व की सबसे उत्तम लिपि मानी जाती है ।

5) देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता की दृष्टि से यह विशेषता है कि, इस लिपि के लिए एक दीर्घ परंपरा दिखाई देती है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश का समस्त वाङ्मय इसी लिपि में मिलता है। भारत की अधिकांश भाषाओं की लिपि भी यही है । इसकारण इस लिपि में भारत की सांस्कृतिक एकता दिखाई देती है। दुनिया की इतनी परंपरा से भरी हुई लिपि नहीं दिखाई देती है। इस परम्परा के कारण ही यह लिपि वैज्ञानिक बनी है ।

इस प्रकार यहाँ देवनागरी लिपि की विशेषताएँ प्रस्तुत हैं तथापि कुछ विद्वानों ने इसकी अक्षरात्मकता, वर्णमाला की पूर्णता, लेखन मुद्रण की एकरूपता, अर्द्ध अक्षर रूपों की सुगमता आदि कुछ और विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनके आशय उपरोक्त विशेषताओं में समाहित हैं।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि, देवनागरी लिपि अत्यधिक वैज्ञानिक दिखाई देती है । यह लिपि सरल तथा सुबोध होने के साथ-ही-साथ देश की परंपरा के अनुकूल ही है । वैज्ञानिकता के मापदंड के अनुकूल यह लिपि होने के कारण इसे सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक लिपि माना जाता है ।

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