गढ़वाली :
मध्य पहाड़ी की दूसरी महत्त्वपूर्ण बोली गढ़वाली है, इसका क्षेत्र प्रमुख रूप से गढ़वाल प्रदेश है। प्राचीन काल का केदारखंड और उत्तर खंड कालांतर में गढों में विभक्त होकर गढवाल कहलाया| इसी गढवाल के नाम पर इस क्षेत्र की बोली 'गढ़वाली' कहलाई । गढ़वाली का परिनिष्ठित रूप 'श्रीनगरिया' है। गढ़वाली बोली की बहुत-सी उपबोलियाँ भी हैं। इनमें श्रीनगरिया, राठी, लोहव्या, बधानी, ननपुरिया, सलानी और टेहरी उल्लेखनीय हैं|
जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार गढ़वाली बोली बोलने वालों की संख्या 670824 थी। यहाँ के लोगों ने साहित्यिक व्यवहार के लिए हिंदी भाषा को ही अपना लिया है। गढ़वाली भी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।
गढ़वाली भाषा के मूल स्रोत या उत्पत्ति पर भाषाविदों ने अलग-अलग मत दिए हैं। डॉ० सुनीतिकुमार चटर्जी इसे दरद-खस से उद्भूत मानते हैं। उनका मानना है कि मध्य हिमालयी भाषा मूलतः दरद खस प्राकृत है, जो मध्यकाल में राजस्थानी और अपभ्रंश से प्रभावित हो गई। डॉ० शिवप्रसाद डबराल भी गढ़वाली का उद्भव खस प्राकृत से मानते हैं। डॉ० धीरेन्द्र वर्मा, डॉ० उदयनारायण तिवारी, डॉ० भोलाशंकर व्यास, डॉ० टी० एन० दुबे आदि विद्वान गढ़वाली का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से मानते हैं। वर्तमान में इसकी व्याकरणिक संरचना, वाक्य-विन्यास और विराम चिह्न अधिकांश शब्दावली हिंदी के ही समान है। केशव दत्त रुवाली मानते हैं कि गढ़वाली का मूल खस प्राकृत में निहित है पर हिंदी के अतिशय प्रभाव के कारण यह शौरसेनी से उद्भूत प्रतीत होती है। डॉ० सुरेश ममगाई का मानना है कि गढ़वाली का शब्द-भण्डार अपने आरम्भिक चरण में वैदिक, संस्कृत, प्राकृत तथा विभिन्न अपभ्रंशों द्वारा विकसित भाषाओं से समृद्ध था। आगे चल कर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन तथा यहाँ तीर्थ यात्रा पर आये लोगों के कारण उसमें अन्य भाषाओं की शब्दावली बढ़ती गई। वैदिक संस्कृत की शब्दावली पर हरिराम धस्माना जी, गुणानंद जुयाल जी, भजन सिंह 'सिंह' जी ने भी कुछ शब्द दिये हैं लेकिन कौन शब्द वेदों में किस सूक्त में प्रयुक्त हुआ है इस पर विवेचन नहीं किया गया है।
क्षेत्र :
गढ़वाली बोली का प्रयोग क्षेत्र गढ़वाल और इसके आसपास का प्रदेश, टेहरी, अलमोड़ा के अतिरिक्त देहरादून (उत्तरी भाग), सहारनपुर (उत्तरी भाग), बिजनौर (उत्तरी भाग) और मुरादाबाद (उत्तरी भाग) जिलों के उत्तरी भाग तक विस्तृत है।
साहित्य :
गढ़वाली में साहित्य लगभग नहीं है। किन्तु लोक साहित्य की दृष्टि से यह पर्याप्त संपन्न है। इसमें चंद्र मोहन, तारादत्त गैरौला, लोलाकृष्ण गैरोला, चक्रधर बहुगुणा, भोलादत्त देवरांनी, भगवती प्रसाद पांथरी, आदि आधुनिक गढवाली के रचनाकार है|
विशेषताएँ :
गढ़वाली की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
1. गढ़वाली बोली के कुछ ध्वनि परिवर्तन निम्नलिखित हैं-
क्ष > क-ऋक्ष > रिक् , त्स, प्स > छ मत्स्य माछो, अप्सरी > आछरी
शनिश्चर > छंछर श > छ-, ल > ळ-पाताल > पयाळ
2. गढ़वाली बोली में 'ग' का आगम मिलता है, जैसे-
'ग' का आगम- संसार > संगसार, 'ह' का लोप-,चान्स > चांगस
3. गढ़वाली में संज्ञा के निम्न रूप मिलते हैं, जैसे नौना (लड़का), नौनो, नौनु, नौनर्नीन्, नौनूँन, नौनर्नीक, नौनूँक आदि।
4. गढ़वाली बोली में प्रयुक्त कुछ सर्वनाम दृष्टव्य हैं मैं, मइँ, मैंक, मैंकु, मेरो, मेरु, हमतें, हमुंतें, हमुमान, हमुसि, हमारु, तुइन, बु, ओ, एइ, सणि, क्वी, कुइ आदि।
5. इस बोली की कुछ क्रिया निम्नलिखित हैं चलदूँ, चलदू, चलणे, चलणै, चलण्यूँ, चल्यूँ, चल्यान आदि।
6. गढ़वाली बोली की कुछ सहायक क्रियाएं निम्नलिखित हैं छौं, छऊँ, छवाऊँ, छौं, छवाँ, छया, थी, थो, थयो आदि।
7. गढ़वाली में निम्न क्रियाविशेषण प्रयुक्त होते हैं अब, अबेर, जदि, जैअ, वख, वत्थ, यथें, वर्थे, जयें आदि।
8) गढवाली में 'अ' का उच्चारण अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होता है | जैसे- घर- घSर, घौर, घैर|
9) गढवाली में आठ कारक है, परंतु वह शुद्ध हिंदी से अलग है| जैसे कर्ता- न या ल (नौनान किताब बांचलि|)
10) सभी भाषाओं का इतिहास है कि वे कठिन से सरल की ओर अग्रसर होती हैं। आज गढ़वाली में सभी विधाओं में लेखक सरलता की ओर बढ़ रहे हैं जिससे पढ़ने वालों को आसानी हो रही है। आधे अक्षर जहाँ बहुत जरूरी हों वहीं प्रयोग किए जाएँ।
11) गढ़वाली भाषा के अधिकांश विद्वान संज्ञा और क्रिया के मूल पदों को ईकारान्त किए जाने की बात करते रहे हैं लेकिन ज्यादातर गढ़वाली लेखक इकारान्त का ही प्रयोग कर रहे हैं तथा गढ़वाली की मूल ध्वनि भी इकारान्त ही है। जैसे अपनी (अपणि), अपनी ही (अपणी), तुम्हारी (तुमारि), तुम्हारी ही (तुमारी), पानी (पाणि) आदि।
12) व्यावहारिक शब्दों में उकारान्त और ओकारान्त का प्रयोग अपनी-अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं। जैसे- मेरु/मेरो, पुंगडु/पुंगढ़ो, नथुलु/नथुलो आदि।
13) जैसे हिंदी को मानक स्वरूप बनाने के लिए मेरठ के आसपास की खड़ी बोली को आधार बनाया गया वैसे ही सिरनगऱ्या गढ़वाली को आधार माना गया। गढ़वाल के बाकी इलाकों के शब्द पर्यायवाची के रूप में प्रयोग होते रहेंगे।
14) सम्बन्ध कारक की जहाँ तक बात है हम हिंदी की तरह का, को, कु रूप में लिख रहे हैं। जबकि गढ़वाली के संज्ञा अर सर्वनाम के साथ सम्बन्ध कारक जोड़ा जाता है। जैसे भाषा की भार्ष, भाषा का भाषी, पिता जी का बाबी बुबी, मानकीकरण की मानकीकरण, मामा का मामी, सलाण गढ़वाळ्यौ, गढ़वाली के गढ़वाळ्या, उत्तराखण्ड भुलै चिट्ठी/भैजी चिट्ठी, देश का देसी, मुल्क की सलाण, गढ़वाल की गढ़वाळे, गढ़वाली का का- उत्तराखण्डौ, पहाड़ की पाई, भाई की चिट्ठी का मुलुकौ, श्रीनगर की सिरनगर।
15) गढ़वाली बोलने में 'घ' और 'श' का प्रयोग नहीं होता है पर लिखने में 'प', 'श', 'स' तीनों का प्रयोग हो रहा है। ऐसा तय हुआ कि तीनों का प्रयोग अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं।
16) 'ळ' और 'ल' ध्वनि पर भी बातचीत हुई। यह तय हुआ कि सुविधानुसार दोनों का प्रयोग कर सकते हैं। 'है' के लिए भी अपनी सुविधानुसार 'च' या 'छ' का प्रयोग कर सकते हैं।
17) क्रिया रूपों पर गहन चर्चा के बाद तय हुआ कि क्रिया का मूल पद अकारान्त होगा और तीनों कालों में इनका रूप इस प्रकार होना चाहिए। जैसे पढ़ना (बांचण), पढ़ दिया (बांच्यालि), पढ़ा (बाचि), पढ़ता है (बांचद), पढ़ रहा है (बांचणू छ), पढ़ेगा (बांचलु/बांचलो) ।
0 टिप्पणियाँ