अमीर खुसरों का परिचय

 अमीर खुसरो का परिचय 

आचर्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ' हिंदी साहित्य का इतिहास' में आदिकालीन साहित्य के अंतर्गत फुटकल (छुटपूट) रचनाओं का जो समावेश किया है, उन रचनाकारों के अंतर्गत अमीर खुसरो और विद्यापति का महत्व आ जाता हैं| आदिकाल में प्रमुख रूप से वीर गाथाओं की रचनाएं दिखाई देती है| इसीलिए शुक्ल जी ने अमीर खुसरो और विद्यापति की रचनाओं को फुटकल रचनाएं कहा है| फिर भी अमीर खुसरो का महत्व आदिकालीन साहित्य में विशेष महत्वपूर्ण है| 

1) जीवनवृत्त -

    अमीर खुसरो का असली नाम 'अब्दुल हसन' है| उनके पिता का नाम अमीर सैफुद्दीन महमूद है| जो  तुर्कीस्थान में लाचीन कबीले के सरदार थे| मुगालों के अत्याचार से परेशान होकर हिंदुस्थान में आकर उत्तर प्रदेश के जिला एटा के पटियाली गांव आकर बस गये थे| इनकी मां का माया देवी उर्फ दौलत नाज उर्फ सय्यद मुबारक बेगम राजस्थान के एक संपन्न हिंदू राजपूत परिवार से थी| जब वे नौ वर्ष के थे तब पिताजी की मृत्यु हो गयी, तब नाना ने उनके शिक्षा-दिक्षा का उत्तरदायित्व निभाया|  अमीर खुसरो का जन्म 1192 में माना जाता है| डॉ. ब्रज रत्नाकर दास ने अमीर खुसरों का जन्म 1255 (1312) पटियाली जिला एटा में हुआ| इन्होंने अपनी आंखों से गुलाम वंश का पतन, खिलजी वंश का उत्थान तथा तुगलक वंश का आरंभ देखा है|अमीर खुसरों अनेक मुस्लिम शासको के दरबार से सम्बन्धित रहे है- गया सुद्दिन, अल्लाउद्दिन, जलालुद्दीन खिलजी आदि नाम उल्लेखनीय है| ऐसे इन्इहें राजनीतिक जीवन का काफी अनुभव था| इनके आंखों के सामने दिल्नली के शासन पर ग्यारह सुलतान बैठे थे| इनमें से सात की खुसरों ने सेवा की हैं|  शासकों के आश्रम में रहकर अमीर खुसरों ने अपने ग्रंथों की रचना कि परंतु हिंदी के आदिकालीन  रासो कवि और अमीर खुसरों में काफी अन्तर है| रासो कवियों ने अपने आश्रय दाता को केंद्र मानकर बढा-चढाकर उनकी प्रसंशा की है| परन्तु अमीर खुसरों अलग ढंग से काव्य लिखा है| उन्होंने अपने जीवन में जो देखा अनुभव किया उसिको अपने ग्रथों के रूप में व्यक्त किया है| 

    अमीर खुसरों का साहित्य जनसाधारण से जुडा हुआ है| वे अनुभूति जन्य कवि है और उनकी एक विशेषता है कि खडीबोली को उन्होंने काव्यभाषा के रूप में अपनाया| अर्थात अमीर खुसरो खडीबोली के प्रथम कवि माने जाते है| अमीर खुसरो को बचपन से ही साहित्य, संगीत, आध्यत्म, दर्शन आदि में रुची थी| वे आठ वर्ष की आयु में निजामउद्दिन अवलिया के संपर्क में आए और उनके शिष्य बन गए| इस संदर्भ में एक प्रसंग बताया जाता है, जब सं. 1324 (1381) में इनके गुरु निजामुद्दिन औलिया की मृत्यु हुई तो ए उस समय गयासुद्दिन तुगलक के साथ बंगाल में थे| मृत्यु का समाचार सुनते ही शीघ्र दिल्ली पहुंचे और औलिया के कब्र के निकट दोहा पढकर बेहोश होकर गिर पडे| 

    "गोरी सोवे सेज पर, मुखर पर डारे केस|

     चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देस|"      

    अंत में कुछ दिनों में इनकी भी उसी वर्ष मृत्यु हो गई| ये अपने गुरु की कब्र की नीचे गाड दिए गए| 

2) व्यक्तित्व :-

    अमीर खुसरों स्वभाव से प्रसन्न चित्त, मिलनसार तथा उदार थे| इनमें सांप्रदायिक कट्टरता नही थी| खुसरो योद्धा और क्रियाशील मनुष्य थे| इन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था| अमीर खुसरो अरबी, फारसी, तुर्की, हिंदी आदि कई भाषाओं  के जानकार थे| संस्कृत के पंडित थे| गायक और संगीत तज्ञ थे| इसीलिए कहा जाता है कि 'खुसरो मनोरंजन और रसिकता के अवतार थे| अमीर खुसरो मुख्यत: एक विनोदी व्यंगकार कवि थे| डॉ. नगेंद्र का कथन है, "जनजीवन के साथ घुलमिलकर काव्य रचना करनेवाले कवियों में खुसरो का महत्वपूर्ण  स्थान है| उन्होंने जनता के मनोरंजन के लिए पहेलियां और मुखरियां लिखी है| आदिकाल में खडीबोली को काव्य भाषा बनानेवाले वे पहले कवि है| 

    रामकुमार वर्मा ने अपने ग्रंथ में लिखा है, " चारणकालीन रक्तरंजित इतिहास में जब पश्चिम के चारणों की डिंगल कविता उदात्त स्वरों में गुंज रही थी और उसकी प्रतिध्वनी और भी उग्र थी| पूर्व में गोरखनाथ गंभीर धार्मिक प्रवृत्ति की शिक्षा दे रहे थे, उस काल में अमीर खुसरो की विनोदपूर्ण प्रकृति हिंदी साहित्य के इतिहास की महान निधी है| मनोरंजन और रसिकता का उज्वल रूप अमीर अपनी मौलिकता के कारण सदैव स्मरणीय रहेगा|"

3) कृतित्व :- 

    कहा जाता है अमीर खुसरो जी ने सौ से ऊपर ग्रंथों की रचना की है, परंतु उनमें से केवल 22 ग्रंथ उपलब्ध है| इनकी तीन रचनाएं प्रसिद्ध है-

1) किस्सा चाहा दरवेश 2) खालिक बारी 3) खुसरो की पहेलियां 

इस संदर्भ में डॉ. वासुदेवसिंह ने 'हिंदी साहित्य का उद्भव और काल' नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि अमीर खुसरो की हिंदी रचनाओं का एक संग्रह अलग से 'जवाहरे खुसरवी' नाम से प्रकाशित हुआ है| इसके प्रथम खंड में खालिक बारी है| दूसरे खंड में पहेलियां, मुखरियां, दो सुखने और ढकोसले है| तिसरे खंड में गजल है, जिसका एक चरण फारसी  और दूसरा चरण हिंदी में है| | चौथे खंड में हिंदी के दोहे और पांचवे खंड में गीत हैं| 

        हिंदी साहित्य में खुसरो का महत्व पहेलियों के कारण है| 'किस्सा-चाहा-दरवेश' फारसी भाषा में लिखा इतिहास ग्रंथ है| 'खालिक बारी' अरबी-फारसी-हिंदी शब्दकोश है| अमीर खुसरो कुछ पहेलियां, मुखरियां, ढकोसले लिखे है, उनके कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत है -

1) पहेली- एक थाल मोती से भरा, सबके सर पर औंधा धरा|

  चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न  गिरे|"

2) दो सुखने- 'पान सडा क्यो?'

                   घोडा अडा क्यों?

                   रोटी जली क्यों? (फेरा न  था)

3) ढकोसला-  'खीर पकाई जतन से, चरखा दिया जला|

                        आया कुत्ता खा गया, बैठी ढोल बजा|

4) मुखरियां - वे जब मेरे मंदिर में आवे, सोते मुझको आन जगावे|

                    पढत फिरत विरह के अच्छर, ए सखी साजन, ना सखी मच्छर|'

भाषाशैली-

    खुसरो ने अपने साहित्य में खडीबोली का प्रयोग किया है| खडीबोली उस समय बोलचाल की भाषा थी| आदिकाल के साहित्य में दो  भाषाओं का प्रयोग हुआ है- डिंगल और पिंगल| खुसरो ने इन दोनों भाषाओं को छोडकर खडीबोली को अपनाया है| 

    संक्षेप में कहा जा सकता है आदिकालीन  प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो जनसाधारण के कवि थे| उन्होंने खडीबोली हिंदी में रचना कर जनभाषा के कवि के रूप में अपना नाम अमर कर दिया है| उनकी मुखरियां, पहेलियां, दो सुखने, ढकोसले आज तक पाठकों को रस विभोर कर देते है| इस प्रकार अमीर खुसरो हिंदी के खडीबोली के प्रथम कवि है| 

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