राष्ट्र का स्वरूप – वासुदेव शरण अग्रवाल
'राष्ट्र का स्वरूप' वासुदेवशरण अग्रवाल
लिखित निबंध है| इसमे लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि
अगर हमें राष्ट्र का यही विकास करना है तो सबसे पहले राष्ट्र के सही स्वरूप को समझना
आवश्यक है| इसमें लेखक ने इस निबंध में राष्ट्र के व्यापक
स्वरूप को स्पष्ट किया है और उसके विकास के लिए राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति को प्रयास करना है इसका एहसास दिलाया है| कारण राष्ट्र यह संकल्पना केवल देश या किसी भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं,
तो इसमें भूमि, जन और उनकी संस्कृति भी समाविष्ट
होती है| इन तीनों के विकास से ही राष्ट्र की अखंडता बनी रह सकती
है| इसके पहले इन तीनों को समझ लेना है, तभी जाकर उनके विकास में सही दिशा में योगदान दिया
जा सकता है| अत: राष्ट्र के इन तीनों
भागों का सही परिचय देकर उनके विकास में क्या करना चाहिए इसका परिचय लेखक ने प्रस्तुत निबंध में दिया है वह इस प्रकार -
1) राष्ट्र का
स्वरूप पहला अंग - भूमि :-
राष्ट्र के स्वरूप
का पहला अंग भूमि अर्थात पृथिवी है, जिसे देवों ने निर्माण किया
है और अनंत काल से है| इसीलिए
पहले उसके भौतिक रूप, सौदर्य और समृद्धी को समझना आवश्यक है|
कारण इसे समझे बैगेर राष्ट्रीय भावना का अंकुर पल्लवित नहीं होगा|
अत: उसके पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने जागृत होंगे उतनी ही हमारी
राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी| हमारी पृथिवी ही सच्चे अर्थ में
राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है| इसीलिये हमारी राष्ट्रीयता
को और गहरा बनाने के लिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आदि से अंत तक जानकारी प्राप्त
करना, उसकी सुंदरता, उपयोगिता और महिमा
को पहचानना हमारा आवश्यक धर्म बनता है| अगर ऐसी पृथिवी के साथ
हमारी राष्ट्रीयता नहीं बनी तो वह एक वह पूर्णत: नष्ट हो
जाती है|
इसके लिए पृथिवी के
प्रति जो कर्तव्य है, उसे सैकडों-हजारों प्रकार से पूरा करना
चाहिए| इसके पहले पृथिवी से जिस वस्तु का संबंध है,
चाहे वह छोटी हो या बडी उसके कुशलता के बारे में प्रश्न पूछने चाहिए|
जिसके लिए गांवो और नगरों में सैकडों केंद्रों
से पृथिवी का सांगोपांग अध्ययन
करना चाहिए| कारण ऐसा अध्ययन जागरणशील राष्ट्र के आनंदप्रद कर्तव्य
माना जाता है|
इन छोटे बडे प्रश्नों में अनेक प्रश्न आ सकते है| उदाहरण
के लिए देख सकते है कि उस मेघ का अध्ययन हमारे परिधि अर्थात सीमा के अंतर्गत आना चाहिए| कारण यह मेघ प्रतिवर्ष
समय पर आकर पृथिवी के उपजाऊ शक्ति को बढाने में मदद करता है| अत: इससे विकसित प्रत्येक तृण - लता और वनस्पति का सूक्ष्म परिचय प्राप्त करना
हमारा कर्तव्य है| इसके साथ राष्ट्र की आर्थिक उन्नत्ति के लिए इस धरती
माता के कोख में जो अमूल्य निधियां भरी से उससे से परिचित होना और इनकी जांच- पडताल करना अत्यंत आवश्यक है| इन निधियों
में समस्त खनिज- लौह, रजत, स्वर्ण,
कोयला, तेल आदि आते हैं| पृथिवी के गर्भ में इन्हें पोषण मिला है| दिन-रात बहनेवाली
नदियों ने पहाडों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टियों से इस पृथिवी के देह को सजाया
है| इतनाही नहीं तो पृथिवी के गोद में जन्म लेनेवाले प्रत्येक
पत्थर को अगर कुशल शिल्पियों द्वारा संवारा जाय तो अत्यंत सुंदर प्रतीक बन जाते है|
अनेक अनगढ नग विन्ध्य की नदियों के प्रवाह में धूप से चिलकते रहते है| जब चतुर कारीगर उन्हें पहलदार कटाव में बदल देते है तब प्रत्येक घाट से नई
शोभा और सुंदरता फूट पडती है और वे अनमोल हो जाते है| देश के
नर-नारियों के रूप-मंडन और सौंदर्य प्रसाधन में इन छोटे पत्थरों का सदा से योगदान रहा
है| अतएव इनका ज्ञान होना आवश्यक है|
पृथिवी और आकाश के
अंतराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथिवी के चारों ओर फैले हुए
गंभीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियां है, उन सबके प्रति
चेतना और स्वागत के नए भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए| राष्ट्र
के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नई किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब
तक हम सोए हुए के समान है|
विज्ञान और मेहनत दोनों
को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप को एक नया ठाट खडा करना है| यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अथक परिश्रम के द्वारा
नित्य आगे बढाना चाहिए| जिसके लिए राष्ट्र में जितने भी हाथ है,
वे सारे इसमें सम्मिलित करने का हमारा ध्येय होना चाहिए| तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धी और समग्र रूप मंडन प्राप्त किया जा सकता है
इस प्रकार जब चारों
ओर से हमारे ज्ञान के कपाट खुलेंगे,
तब सैकडों वर्षों से शून्य और अंधकार से भरे हुए जीवन के क्षेत्रों में
नया उजाला दिखाई देगा| और राष्ट्र का स्वरूप और विकसित होगा|
2) राष्ट्र का दूसरा अंग - जन
राष्ट्र का दूसरा अंग मातृभूमि पर निवास करनेवाला मनुष्य है| कारण भूमि है पर उस पर मनुष्य नहीं तो राष्ट्र की कल्पना ही नहीं कर सकते | अत: पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप संपादित होता है| जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है| पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थो में उसके पुत्र है| जसे लेखक लिखते है, "माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:|" अर्थात भूमि माता है, मै उसका पुत्र हूं| जन में यह सूत्र हमेशा रहना चाहिए| कारण इसीसे राष्ट्र निर्माण का अंकुर उत्पन्न होगा और राष्ट्रीयता की भावना का विकास होगा| यह भाव जब सशक्त रूप से जागता है, तब राष्ट्र निर्माण के स्वर वायुमंडल में भरने लगते है| इस भाव के द्वारा ही मनुष्य पृथिवी के साथ अपने सच्चे संबंध को प्राप्त करते है|जहां यह भाव नहीं वहां जन और भूमि का संबंध अचेतन और जड बना रहता है| जिस समय भी जन का हृद्य भूमि के साथ माता और पुत्र के संबंध को पहचानता है, उसी क्षण आनंद और श्रध्दा से भरा हुआ उसका प्रमाण-भाव मातृभूमि के लिए इस प्रकार प्रकट होता है, "नमो मात्रे पृथिव्यै| नमो मात्रे पृथिव्यै| अर्थात माता पृथिवी को प्रणाम है|
यह प्रमाण भाव ही भूमि और जन का दृढ बंधन है|इसी दृढ भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जा सकता है| इसी दृढ चट्टान पर राष्ट्र का चिर जीवन आश्रित रहता है| इसी मर्यादा का मानकर राष्ट्र के प्रति मनुष्यों के कर्तव्य और अधिकारों का उदय होता है| जो जन पृथिवी के साथ माता और पुत्र के संबंध को स्वीकार करता है, उसे ही पृथिवी के वरदानों में भाग पाने का अधिकार है| माता के प्रति अनुराग और सेवाभाव पुत्र का स्वाभाविक कर्तव्य है वह एक निष्कारण धर्म है| स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अध:पतन को सूचित करता है| तो जन मातृभूमि के साथ अपना संबंध जोडना चाहता है उसे अपने कर्तव्यों के प्रति पहले ध्यान देना चाहिए|
माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है| इसी प्रकार पृथिवी पर बसनेवाले जन बराबर है| उनमें उंच और नीच का भाव नहीं है| जो मातृभूमि के हृद्य के साथ जुडा हुआ है और समान अधिकार का भागी है| पृथिवी पर निवास करनेवाले जनों का विस्तार अनंत है- नगर और जनपद, पुर और गांव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं| ये जन अनेक प्रकार की भाषाएं बोलनेवाले और अनेक धर्मों के माननेवाले है, फिर भी वे मातृभूमि के पुत्र हैं और इस कारण उनका सौहार्द भाव अखंड है| सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक-दूसरे से आगे-पीछे हो सकते किंतु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका सौहार्द भाव अखंड है| सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक-दूसरे से आगे- पीछे हो सकते है, किंतु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो संबंध है उसमें कोई भेद-भाव उत्पन्न नहीं हो सकता पृथिवी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र है| समन्वयक के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है| किसी जन को पीछे छोडकर राष्ट्र आगे नहीं बढ सकता| अतएव राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी होगी| राष्ट्र के शरीर के एक भाग में यदि अंधकार और निर्बलता का विकास है तो समग्र राष्ट्र का स्वास्थ्य उतने अंश में असमर्थ रहेगा| इस प्रकार समग्र राष्ट्र को जागरण और प्रगति की एक की जैसी उदार भावना से संचालित होना चाहिए|
जन का प्रवाह अनंत होता हैं| सह्स्त्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन णे तादात्म प्राप्त किया है| जब तक सूर्य की रश्मियां नित्य प्रात:काल वेणुवन को अमृत से भर देती हैं तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन अमर है| इतिहास के अनेक उतार-चढाव पार करने के बाद भी राष्ट्र-निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढणे के लिए आज भी अजर- अमर है| जन का संततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है|
3) राष्ट्र के विकास का तीसरा अंग - संस्कृति
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है| मनुष्यों ने युग-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है| बिना संकृति के जन की कल्पना कबंधमात्र अर्थात धड है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है| संस्कृति के विकास और अभूद्य(उत्पत्ति) के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धी संभव है| राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संकृति का महत्वपूर्ण स्थान है| यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जाएं तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए| जीवन के विटप (वृक्ष) का पुष्प संस्कृति है| संस्कृति के सौंदर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौदर्य और यश अंतर्निहित है| ज्ञान और कर्म दोनों के पारंपारिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है| भूमि पर बसनेवाले जन ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा है और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, दोनों के रूप में हमें राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते है| जीवन के विकास की युक्ति ही संस्कृति के रूप में प्रकट होती है| प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ इस युक्ति को निश्चित करती है और उससे प्रेरित संस्कृति का विकास करती है| इस दृष्टि से प्रत्येक जन की अपनी-अपनी भावना के अनुसार पृथक-पृथक संस्कृतियां राष्ट्र में विकसित होती है, परंतु उन सबका मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय पर निर्भर है|
जंगल में जिस प्रकार अनेक लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य( दृढ) भाव से उठते हुए पारस्परिक संमिलन से अविरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन अपनी संस्कृतियों के द्वारा एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र में रहते हैं| जिस प्रकार जल के अनेक प्रवाह नदियों के रूप में मिलकर समुद्र में एकरूपता प्राप्त करते है, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवन की अनेक विधियां राष्ट्रीय संस्कृति में समन्वय प्राप्त करती है| समन्वययुक्त जीवन ही राष्ट्र का सुखदायी रूप है|
साहित्य, कला , नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद अनेक रुपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं| आत्मा का जो विश्वव्यापी, आनंद-भाव है वह इन विविध रुपों में साकार होता है| यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता हैं| जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संकृति के आनंद-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनंदित होता है| इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है|
गांवो और जंगलो में स्वच्छंद जन्म लेनेवाले अनेक गीतों में, तारों के नीचे विकसित लोक-कथाओं में संस्कृति का अमित भंडार भरा हुआ है|, जहां से आनंद की भरपूर मात्रा प्राप्त हो सकती है| राष्ट्रीय संस्कृति के परिचयकाल में उन सबका स्वागत करने की आवश्यकता है|
पूर्वजों ने चरित्र और धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संकृति के क्षेत्र में जो कुछ भी पराक्रम किया है उस सारे विस्तार को हम गौरव के साथ धारण करते हैं और उसके तेज को अपनी भावी जीवन में साक्षात देखना चाहते हैं| यही राष्ट्र-संवर्धन का स्वाभाविक प्रकार है| जहां अतीत वर्तमान के लिए भाररूप नहीं है, जहां भूत वर्तमान को जकड रखना नहीं चाहता वरन अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं|
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