नीलकंठ - हरिशंकर परसाई
'नीलकंठ' हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्यात्मक निबंध है| लेखक ने इस निबंध में ऐसे लोगों पर व्यंग्य किया है, जो प्रशंसा और लाभ के लिए नीलकंठ बने फिरते है अर्थात त्याग का अभिनय करते है| वास्तव में नीलकंठ सच्चे त्याग का प्रतीक है| परंतु समाज में झुठी सहानुभुति प्राप्त करने के लिए अपने दुखों और त्याग का प्रदर्शन करनेवालो लोगों की संख्या बढ रही है| ऐसे लोग अपने लाभ के लिए दुख सहने और त्याग करने का प्रदर्शन करते है, परंतु ऐसे दुख सहने और त्याग का प्रदर्शन करने से कोई महान नहीं बनता| सच्चा नीलकंठ जो बिना प्रचार और स्वार्थ से समाज के हित के लिए कष्ट सहन करता , जैसे शिव जी ने किया था, परंतु समाज में दुख का प्रदर्शन करनेवाले इतने है की सच्चा कष्ट करनेवाला पीछे ही रह जाता, इसका एहसास दिलाते हुए प्रस्तुत निबंध में ऐसे पाखंडी लोगों पर व्यंग्य किया है वह इस प्रकार -
1) शिव जी की नीलकंठता पर व्यंग:-
लेखक लिखते है कि जिस हलाहल से सृष्टि अकुला रही थी उसका शिव जी ने पान कर बडा अच्छा किया, बडी बहादुरी का काम किया| पर मन में प्रश्न निर्माण होता है कि इतने अलौकिक शक्ति संपन्न होने के कारण उन्होंने विष तो पचा लिया फिर भला अपना कंठ नीला क्यों होने दिया| चाहते तो अपने कंठ को नीला होने नहीं देते| फिर ऐसा क्यों नहीं किया| शायद लोग कम-से-कम लोग यह जाने कि उन्होंने जहर पिया है| भला यह कैसी बात हुई उन्होंने विष पिया है, यह लोगों को मालूम न हो| परंतु शिव अपने नीलकंठ के दिखाने के मोह से बच नहीं पाए| लेखक यहां व्यंग करते है कि शिव विष जैसी भयंकर चीज़ तो सहन कर गए, लेकिन नीले कंठ को दिखाने का मोह नहीं छोड़ पाए। लेखक को यहां तक संदेह है कि अगर कंठ नीला पडने का यकीन न होता, तो शायद शिव जी भी विष पीने से इन्कार करते| अर्थात मनुष्य बड़े से बड़ा त्याग या कष्ट सहन कर सकता है, लेकिन अपने त्याग या उपलब्धि को दूसरों को दिखाने का मोह छोड़ना कठिन होता है। परंतु शव जी ने सच्चा त्याग तो किया था, पर आज समाज में ऐसी वृत्ति बढ रही है कि त्याग अधिक नहीं पर कंठ मात्र अधिक-से अधिक नीला हो| ऐसी इच्छा वाले अधिक लोग बढ रहे है| यहां तक कोई-कोई तो गले पर नीली स्यायी पोतकर 'नीलकंठ बने फिरते है| इस मनुष्य के दिखावे वृत्ति कैसी होती है इस पर लेखन के यहां व्यंग्य किया है|
2) स्वतंत्रता सेनानी ने वृत्ति पर व्यंग्य:-
लेखक ने एक ऐसे व्यक्ति का व्यंग्यात्मक वर्णन किया है, जो स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुआ था। स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे लगा कि स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण उसे विशेष सम्मान और सुविधाएँ मिलनी चाहिए। लेखक कहता है कि सामान्यतः युद्ध में विजेता पक्ष हारने वाले पक्ष से धन-संपत्ति लूटता है। लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि अंग्रेज भारत छोड़कर सात समुद्र पार चले गए। इसलिए कुछ लोगों ने अपने ही देश में लूटमार और स्वार्थ का रास्ता अपनाया। वह सज्जन स्वतंत्रता संग्राम में आगे की पंक्ति में थे, लेकिन आज़ादी के बाद मिलने वाले लाभों को हासिल करने की दौड़ में पीछे रह गए। उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला। इसलिए वे अपने पुराने घाव दिखाकर लोगों से सहानुभूति और सम्मान प्राप्त करने लगे। लोग उन्हें देखकर कहते कि वे बहुत कष्ट सह रहे हैं और यह सुनकर उन्हें बहुत खुशी होती। धीरे-धीरे उनमें काम न करने और दूसरों से सम्मान पाने की आदत विकसित हो गई। उन्हें लगता था कि स्वतंत्रता सेनानी होकर कोई साधारण नौकरी करना उनके सम्मान के विरुद्ध है। लेकिन जब उनके घाव ठीक हो गए और लोगों की सहानुभूति भी कम हो गई, तब अंततः उन्होंने एक अच्छी नौकरी कर ली। अत: लेखक यहां बताना चाहते है कि केवल स्वतंत्रता सेनानी होना मतलब जीवनभर काम से बचने का कारण नहीं हो सकता।
3) सहानुभुति के लिए दुख का प्रदर्शन करनेवाले लोगों पर व्यंग्य -
लेखक कहता है कि किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु पर सिर मुंडाने का एक कारण यह भी है कि व्यक्ति का दुःख दूसरों को स्पष्ट दिखाई दे और समाज उसे शोकग्रस्त मान्यता दे। लेखक अपने मित्र का उदाहरण देता है। उसके चाचा की मृत्यु हुई थी और चाचा की सारी संपत्ति मित्र को मिलने वाली थी। इसलिए वह भीतर से प्रसन्न था, लेकिन लोगों के सामने बहुत दुखी होने का अभिनय करता था। जब कोई परिचित मिलता, तो वह तुरंत उदास चेहरा बनाकर कहता 'हम पर वज्रपात हो गया' या 'दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।' जैसे ही परिचित आगे निकल जाता, वह फिर प्रसन्न हो जाता। इससे लेखक बताता है कि कई बार मनुष्य दुःख का प्रदर्शन करके सहानुभूति प्राप्त करने में भी सुख अनुभव करता है।
4) दुख को व्यसन बनानेवाले लोगों पर व्यंग्य:-
इसके बाद लेखक कहता है कि दुःख भी कभी-कभी एक प्रकार का व्यसन बन जाता है। जैसे फोड़े को दबाने पर दर्द होता है, फिर भी उसमें एक विचित्र आनंद मिलता है, उसी तरह कुछ लोगों को अपना दुःख दूसरों को सुनाने और अपनी परेशानियों की शिकायत करने में आनंद मिलने लगता है।लेखक एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देता है, जिसके दो सौ रुपये किसी ने उधार लिए थे। वह व्यक्ति रुपये वापस करने के बजाय हर किसी के सामने अपने नुकसान और परेशानी का दुखड़ा रोता था। जब कर्जदार ने रुपये वापस करने की कोशिश की, तो उसने रुपये लेने से ही मना कर दिया। कारण यह था कि अगर पैसे वापस मिल जाते, तो दुःख मनाने और शिकायत करने का उसका आनंद समाप्त हो जाता। लेखक अंत में व्यंग्य करते हुए कहता है कि ऐसे लोग 'दुःख के बैंक' में अपना पैसा जमा कर देते हैं और उससे मिलने वाले शिकायत और कुढ़न के ब्याज पर जीवन बिताते हैं। लेखक को ऐसे लोग हठयोगियों जैसे लगते हैं, जो स्वयं कष्ट सहते हैं और दूसरों को अपना कष्ट दिखाकर आनंद लेते हैं।
5) दुख को सरताज बनानेवालों पर व्यंग्य:-
लेखक कहते हैं कि जब हमें लगता है कि हमने दूसरों की अपेक्षा अधिक दुःख सहा है, तो कई बार हमें उस दुःख पर भी गर्व होने लगता है। हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमें महान और गौरवशाली समझें। इसलिए हम अपने दुःख को ऐसे प्रदर्शित करते हैं जैसे वह हमारे सिर का 'दर्द का ताज' हो।
समाज में दुःख को अक्सर पवित्र और सम्मान योग्य माना गया है। लेखक व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि दुःख को इतना महत्त्व देने में उन लोगों का भी बड़ा योगदान है जो दूसरों को दुःख देते हैं। ईसा का कथन है कि “दीन धन्य हैं, क्योंकि वही स्वर्ग के राज्य के अधिकारी होंगे।” लेकिन उनके अनुयायियों ने इस विचार का गलत अर्थ निकालकर अनेक लोगों को गरीब, दीन और दुखी बना दिया। फिर उन्हें यह कहकर सांत्वना दी कि वे स्वर्ग के अधिकारी होंगे।
'क्रूसेड' से आशय मध्यकालीन ईसाई धर्मयुद्धों से है। लेखक का व्यंग्य यह है कि उन युद्धों से लेकर आधुनिक शीतयुद्ध तक अनेक लोगों को दुःख, हिंसा और मृत्यु का सामना करना पड़ा और मानो उन्हें 'स्वर्ग का अधिकारी' बनाकर समय से पहले स्वर्ग भेज दिया गया। इसके बाद लेखक प्रश्न करते हैं कि वास्तव में वह स्वर्ग कहाँ है? पृथ्वी पर तो अभी तक ऐसा कोई स्वर्ग दिखाई नहीं दिया। साम्यवादी लोग भी दीन-दुखियों का राज्य स्थापित करने की बात करते हैं, लेकिन वे ईसा को नहीं मानते। इसलिए लेखक व्यंग्यपूर्वक पूछते हैं कि क्या ईसा ने अपने अनुयायियों को स्वयं शाप दिया है और अपने वचन को पूरा करने का काम उन लोगों को सौंप दिया है जो ईश्वर के अस्तित्व को ही नहीं मानते?
6) दुःख को महान मानने की आलोचना:-
लेखक आगे कहते हैं कि केवल दुःख की प्रशंसा करना गलत है। कुछ लोग कहते हैं कि दुःख मनुष्य को महान बनाता है, लेकिन यह हमेशा सच नहीं है। दुःख मनुष्य को महान भी बना सकता है और नीच भी।उसके मन को प्रकाशमय भी कर सकता है और अंधकारमय भी।उसे संवेदनशील और परिपक्व भी बना सकता है तथा निराश और कटु भी। इसलिए दुःख अपने-आप में महान या पूजनीय नहीं है। दुःख से मनुष्य किस प्रकार प्रभावित होता है, यह उसके व्यवहार और मानसिकता पर निर्भर करता है। पर जो दुख का स्वागत 'पधारे म्हारो महाराज, हम तो कृतार्थ हो गये' करते है अर्थात अपने दुःख का स्वागत इस तरह करते हैं जैसे कोई बहुत सम्मानित अतिथि आया हो| लेखक को यह मानसिकता बिल्कुल पसंद नहीं है। उनका कहना है कि दुःख त्याज्य और अप्रिय है, उसे जबरदस्ती महान या पूजनीय बनाना उचित नहीं है। लेखक लिखते है की ठीक है 'गर्दिशे ऐय्याम तेरा शुक्रिया, हमने हर पहलू से दुनिया देख ली है' अर्थात दुख में दुनिया असली चेहरा नजर आता है यह ठीक है| व्यक्ति कहता है कि कठिन परिस्थितियों के कारण उसे यह समझ में आ गया कि कौन अपना है और कौन पराया, कौन मित्र है और कौन धोखेबाज। लेकिन लेखक इस विचार पर भी व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं, ठीक है, दुःख ने तुम्हें दुनिया की सच्चाई दिखा दी, लेकिन उस प्रक्रिया में तुम्हारी अपनी हालत क्या हुई? तुम स्वयं बुरी तरह टूट गए। केवल यह संतोष करना कि 'मैं डूब गया, लेकिन मैंने तुम्हें नहाते हुए नग्न देख लिया' अर्कोथात मेरा नुकसान हुआ ठीक है, पर तुम्ईहारी असलियत सामने आयी इसमें वे खुश होते है| वास्तविक यह उचित नहीं है, कारण इसमें हमें नुकसान होता है|
7) दुख का व्यापार करनेवालों पर आलोचना:-
लेखक कहता है कि जब उसने नौकरी छोड़कर लेखन को अपनी जीविका का साधन बनाया, तो लोगों ने उसे समझाया कि यह बहुत जोखिम भरा काम है। उन्हें लगा कि नौकरी छोड़ने के कारण अब लेखक आर्थिक संकट में पड़ जाएगा। कुछ लोग तो उसके प्रति सहानुभूति भी दिखाने लगे और कहने लगे, “बेचारा बहुत दुःख उठा रहा है, शायद खाने के भी लाले पड़ गए हैं।” लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत थी। लेखक के पास उन दिनों पाठ्य-पुस्तकों से दो हजार रुपये आए थे और वह आराम से जीवन बिता रहा था। फिर भी उसके चेहरे पर परेशानी दिखाई देती थी। इसका कारण आर्थिक संकट नहीं, बल्कि जूते का काटना था। उसने यह सोचकर नया जूता पहन लिया था कि न जाने अगला जूता कब मिलेगा। जूता बहुत तंग था और उसके पैरों में दर्द कर रहा था। यहाँ लेखक ने जूते को जीवन का प्रतीक बना दिया है। वह कहता है कि जीवन भी अनेक लोगों को उसी तरह काटता है जैसे तंग जूता, फिर भी लोग उसे पहने हुए जीते रहते हैं और दुःख सहते रहते हैं। वह 'पानी पीकर ज़हर पीने का श्रेय ले रहा था|' इसका अर्थ है कि लेखक वास्तव में कोई बहुत बड़ा कष्ट नहीं झेल रहा था, लेकिन लोग उसे महान त्यागी और दुखी व्यक्ति समझ रहे थे। लेखक को लगता है कि बिना वास्तविक कष्ट के कष्ट सहने का श्रेय लेना भी एक प्रकार का छल है। वह आगे कहता है कि समर्थ होते हुए भी दूसरों की करुणा प्राप्त करना चोरी और धोखा है, क्योंकि करुणा जैसी मूल्यवान भावना वास्तव में उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए जो सचमुच पीड़ित है।लेखक कहता है कि आज समाज में गरीब या पीड़ित व्यक्ति का दोहरा शोषण होता है| पहले उसकी रोटी और आर्थिक अधिकार छीन लिए जाते हैं। फिर उसके हिस्से की करुणा और सहानुभूति भी दूसरे लोग ले जाते हैं।अर्थात् जो व्यक्ति वास्तव में कष्ट झेल रहा है, उसे सहायता और सहानुभूति नहीं मिलती; जबकि जो लोग केवल दिखावे के लिए दुखी दिखाई देते हैं, वे समाज की सहानुभूति और श्रद्धा प्राप्त कर लेते हैं।
8) नीलकंठ का प्रतीक:-
नीलकंठ भगवान शिव का प्रतीक है। समुद्र-मंथन के समय निकले विष को शिव ने पी लिया था और संसार की रक्षा की थी। इसलिए नीलकंठ त्याग, विषपान और लोक-मंगल का प्रतीक है।लेखक इसी प्रतीक का व्यंग्यात्मक प्रयोग करता है। वह कहता है कि आज बहुत से लोग केवल नीलकंठ का रूप धारण करके श्रद्धा और सम्मान प्राप्त कर रहे हैं, जबकि वास्तव में जो व्यक्ति जीवन का विष पी रहा है, जो सचमुच कष्ट सह रहा है, वह समाज के किसी कोने में उपेक्षित पड़ा है। कारण सच्चा पीड़ित, सच्चा त्यागी और वास्तव में कष्ट सहने वाला व्यक्ति अक्सर प्रसिद्ध नहीं होता। समाज का ध्यान उन लोगों पर अधिक जाता है जो अपने दुःख का प्रदर्शन करते हैं।यह दुख का प्रदर्शन करनेवाले ही नीलकंठ का प्रतीक बन जाते है|
इसप्रकार इस निबंध के माध्यम से लेखन उन लोगों की व्यथा को चित्रित किया है जो सच्चे अर्थों में दुखी होते है | परंतु उनके दुख के तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता क्योंकि नकली दुख का प्रदर्शन करनेवाले लोगों यहां भीड लागीं है| जिस भीड में सच्चा दुखी दबकर रह जाता है| अर्थात सच्चा कष्ट करनेवाला उपेक्षित ही रह जाता है|
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