संपर्क भाषा

 संपर्क भाषा 

        हिंदी आज अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है| इस कारण हिंदी के आज अनेक रूप दिखाई देते है| इस रुपों में से एक संपर्क भाषा का परिचय यहां प्रस्तुत हैं| 

संपर्क भाषा का आशय है, जनभाषा। जिस भाषा के माध्यम से किसी भूप्रदेश में रहनेवाले लोग सहजता से एक दूसरे से संपर्क स्थापित करते हैं, उसे जनभाषा या संपर्क भाषा कहते हैं। जो किसी क्षेत्र, राष्ट्र, अथवा वर्ग में परस्पर वैचारिक आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में कार्यरत रहती हो। संपर्क भाषा शासन तथा राज्याश्रय से उपेक्षित रहने पर भी जनमानस में बराबर अपनी जडे मजबूत करती रहती है। उसकी पहचान राष्ट्र के सभी लोगों में होती है। राष्ट्र या देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने पर जनता केवल उसी जनभाषा में संपर्क स्थापित करती है।

भारतीय संविधान द्वारा कुल 22 भाषाएँ स्वीकृत हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार बारह सौ भाषाएँ बोली जाती हैं ऐसी अवस्था में यहाँ के लोगों को परस्पर व्यवहार के लिए संपर्क भाषा की जरूरत होती है।

भारत जैसे विशाल देश में प्राचीन काल में मध्य देश की भाषा संपर्क भाषा के रूप में शीर्षस्थ रही है। मध्य देश में हिंदी बड़े पैमाने पर बोली जाती है भले ही उसकी बोलियाँ अलग-अलग हो सकती है मगर उनमें परस्पर बोधगम्यता है। प्राचीन काल में शंकराचार्य ने अपनी मलयालम भाषा छोड़कर संस्कृत को अपनाया था। बौद्ध काल में भगवान बुद्ध ने उपदेश के लिए जनभाषा को संपर्क भाषा के रूप में अपनाया। जो मध्य देश की पालि भाषा थी। अतः संस्कृत, पालि, शौरसेनी, प्राकृत, नागर, अपभ्रंश और कालांतर में पश्चिमी हिंदी राष्ट्र की संपर्क भाषा के रूप में विकसित हुई। स्वयं महात्मा गांधी जी ने अपनी मातृभाषा गुजराती को छोड़कर हिंदी को पूरे देश की राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा बनाने को प्रोत्साहित किया।

यदि सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट है, प्राचीन काल, मध्यकाल और ब्रिटिश काल में जनभाषा ही संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही है। 'उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक समस्त भारत में केवल हिंदी ही ऐसी भाषा रही है जिसे बोलने या समझनेवाले आसानी से मिलते हैं। इसीलिए हिन्दी को ही संपर्क भाषा की मान्यता प्राप्त होती है। इसकी सातवीं शती से सिद्धों, नाथों, संतों, भक्तों आदि ने हिंदी को अपनाया था, अर्थात हिंदी संपर्क की भाषा थी। स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था "एक राज्य से दूसरे राज्य को पत्रव्यवहार अथवा बोलचाल के लिए एक ही भाषा अपेक्षित है, वह है हिंदी भाषा। हिंदी भाषा ही उपयुक्त और उचित संपर्क भाषा बन सकती है।"

इसीकारण हिंदी प्राचीन काल से ही जनभाषा के रूप में दिखाई देती है| जिसका परिचय इस प्रकार \-

(1) आदिकाल में हिन्दी : डिंगल पिंगल अपभ्रंश संपर्क भापा के रूप में

        आदिकाल में हिन्दी का विकास डिंगल और पिंगल के रूप में दिखाई देता है। हिन्दी ने अपने पूर्व रूप डिंगल और पिंगल के आधार पर विचार विनिमय किया । आदिकाल के अनेक कवियों ने भी हिन्दी के इस पूर्वरूप को संपर्क के रूप में अपनाया। हिन्दी के शुरु-शुरु के कवि अमीर खुसरों आदि ने भी इसी प्राचीन हिन्दी का प्रयोग संपर्क भाषा में किया। उनकी पंक्तियाँ इसका उदाहरण हैं-

        'रासों ग्रंथों' के साथ ही साथ अन्य अनेक अपभ्रंश ग्रंथों के रूप में भी संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी के इस पूर्व रूप का उपयोग दिखाई देता है ।

(2) मध्यकाल : अवधी ब्रज मध्यकाल में व्रज और अवधी संपर्क भाषा के रूप में दिखाई देती है। व्रज और अवधी के साथ ही साथ मध्यकाल के उत्तर मध्यकाल में व्रजभाषा ही दिखाई देती है। शिवाजी के समकालीन कवि भूपण ने अनेक पदों का जो निर्माण किया, वह तात्कालीन संपर्क भाषा हिन्दी ही है।

(3) आधुनिक काल : खड़ी बोली आधुनिक काल में खड़ी बोली ही संपर्क

        भाषा दिखाई देती है। गद्य और पद्य में समान रूप से इसका प्रयोग दिखाई देता है। अनेक नेताओं ने स्वाधीनता का आंदोलन चलाया। इसके कारण अखिल भारतीय स्तर पर इसके विविध रूप दिखाई देते हैं। इसी कारण ही हिन्दी राजभाषा भी वन गयी राष्ट्रभाषा के रुप में उसका विकास हुआ, समाचार के माध्यमों, फिल्मों, दूरदर्शन और विविध कार्यक्रमों के आधार पर संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी इतनी विकसित हो गयी कि केवल राष्ट्र तक सीमित नहीं रही आज आधुनिक काल में विदेशों में भी संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। अनेक राष्ट्रों में यह भाषा बोली जाने के कारण ही हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप बढ़ता जा रहा है। हिन्दी आज अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है । भारत में किसी भी कोने में हिन्दी प्रयुक्त होती है। इतना ही नहीं उसका सहज प्रयोग किया जाता है। पाश्चात्य देशों में भी उनकी भाषाओं के साथ ही साथ हिन्दी का प्रयोग किया जा रहा है।

        वैश्वीकरण के कारण हिन्दी आज अनेक देशों में प्रयुक्त होती है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हिन्दी का संपर्क भाषा के रूप में विकास वहुत अधिक वढ़ता हुआ दिखाई देता है।

आज राजभाषा, राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के सामने कई व्यवधान हैं मगर जनभाषा, संपर्क भाषा के रूप में वह खुले साँस की अधिकारिनी है। संपर्क भाषा के रूप में उसे कोई बाधा नहीं है। हिंदी का समृद्ध साहित्य, कोमलता, हिंदी फिल्में आदि ने इसके संपर्क के रूप को अक्षुण्ण बना रखा है। आज पूरे भारत में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही कार्यरत है।

        संक्षेप में, मध्य देश की भाषा हिंदी अपने हजारों वर्षों की अनवरत यात्रा से आगे बढ़ते-बढ़ते विकास के चरम उत्कर्ष तक पहुँच गई है। इसी बीच कई व्यवधानों को पार कर, उपेक्षित रहकर भी उसने भारत भूमि में अपनी जड़े अतल गहराई तक जमा दी हैं। उसने आज राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में अपनी पहचान बना दी है। इसके अलावा मातृभाषा, संचारभाषा एवं माध्यम भाषा के रूप में भी वह सफल रुप में व्यवहृत है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ