स्वर और व्यंजन का उच्चारण स्थान

 स्वर और व्यंजन का उच्चारण स्थान 

प्रस्तावना :-

                     भाषा का मूल आधार ध्वनि है| ध्वनि भाषा की सबसे लघुत्तम इकाई है| ध्वनि कर्णगोचर होती है| उसे दृष्टिगोचर बनाने के लिए ही लिपि का निर्माण हुआ है| लिपि का मूल आधार स्वर और व्यंजन है| अत: ध्वनियों का सबसे प्रचलित और प्राचीन वर्गीकरण स्वर और व्यंजन के रूप में मिलता है| स्वर और व्यंजन को मिलाकर वर्ण कहा जाता है | वर्ण की परिभाषा इस प्रकार कर सकते है-"मनुष्य की वागेन्द्रियों द्वारा अभिव्यक्त ध्वनि की सबसे छोटी अर्थभेद्क इकाई का व्यवस्थित और लिपि बद्ध रूप है|" हिंदी में 13 स्वर, 39 व्यंजन हैं| इन वर्णो का विशिष्ठ अवयवों से ही उच्चारण  होता है उसिके अनुसार वर्णमाला में उनका स्थान निश्चित है|  अत: स्वर और व्यंजन का वाग्यंत्र में स्थान कैसे है इसकी जानकारी लेने से पूर्व स्वर और व्यंजन किसे कहते है यह समझना आवश्यक है| 

 स्वर और व्यंजन की परिभाषा:- 

1)  डायोनिशस थ्रैक्स:-

              स्वर और व्यंजन को सर्व प्रथम परिभाषित  करने का श्रेय प्रथम युनानी वैयाकरणकार डायोनिशस थ्रैक्स को जाता है| इनका समय ई.स. पूर्व दूसरी सदी रहा है|  

        'स्वर उन ध्वनियों को कहा जिनका उच्चारण बिना किसी अन्य ध्वनि की सहायता से किया जा सकता है| '

        'व्यंजन उन ध्वनियों को कहा जिनका उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता|'

2) ऋग्वेद:- 

        संस्कृत में स्वर का प्रथम प्रयोग ऋग्वेद में मिलता है| वहां इसका अर्थ ध्वनि है| यह शब्द 'स्वृ' धातु से बना है जिसका अर्थ ध्वनि करना है| 

3) ऐतरेय आरण्यक: 

        आगे चलकर इसका अर्थ बलाघात या सूर हो गया| इस अर्थ इसका प्रयोग ऐतरेय आरण्यक  में मिलता है| व्यंजन शब्द का संबंध अंज् धातु से  है जिसका अर्थ है 'जो प्रकट हो' 

4) पतंजलि:- 

        संस्कृत  में स्वर  और व्यंजन को  व्यवस्थित परिभाषित करने का सर्वप्रथम श्रेय महाभाष्यकार पतंजलि को जाता है| वे कहते है - "स्वयं राजन्ते स्वरा अन्वग भवति व्यंजनमति|" अर्थात स्वर स्वतंत्र है और व्यंजन उन पर आधारित है| दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते है- "स्वर उन ध्वनियों को कहते है जो स्वयं उच्चरित होते  है और व्यंजन उन ध्वनियों को कहते है जो स्वर की सहायता से उच्चरित होते है| 

5) देवेंद्रनाथ शर्मा:-

        देवेंद्रनाथ शर्मा ने स्वर को पारिभाषित करते हुए लिखा है-

             "स्वर वे ध्वनियां हैं जिनका उच्चारण करते समय निःश्वास में कहीं कोई अवरोध नहीं होता।"

            "व्यंजन वे ध्वनियों है, जिसके उच्धारण करते समय निःश्वास में कहीं न कहीं अवरोध होता है।"

6) ब्लाख और ट्रेगर, आउटलाइन्स ऑफ लिंग्विस्टिक्स एनेलिसिस :

            इन्होने केवल व्यंजन की परिभाषा की है| ब्लाख और ट्रेगर, आउटलाइन्स ऑफ लिंग्विस्टिक्स एनेलिसिस के अनुसार "व्यंजन वह ध्वनि है, जिसके उच्चारण में फेफड़ों से आने बाली वायु स्वरतंत्री या मुख मार्ग में कहीं पूर्णतया रोकी जाती है, या संकुचित मार्ग से निकलती है, या मुख विवर को स्वर सीमा से हटते हुए जिह्वा के एक या दोनों ओर से निकलती है या स्वरतंत्री से ऊपर वाले किसी वाग्अवयव में कम्पन पैदा करती है।"

 7) डॉ. भोलानाथ तिवारी:

        प्रसिद्ध भाषा शास्त्री डॉ. भोलानाथ तिवारी ने स्वर को पारिभाषित करते हुए लिखा है-

             "स्वर वह घोष (कभी-कभी अघोष) ध्वनि है जिसके उच्चारण में हवा अबाध गति से मुख-विवर से निकल जाती है।"

              "डॉ. भोलानाथ तिवारी व्यंजन को परिभाषित करते हुए लिखते हैं व्यंजन वह ध्वनि है, जिसके उच्चारण में हवा अबाध गति से नहीं निकलने पाती, या तो उसे पूर्ण अवरुद्ध होकर आगे बढ़ना पड़ता है, या संकीर्ण मार्ग से घर्षण खाते हुए निकलना पड़ना है, या मध्य रेखा से हटकर एक था दोनों पाथों से निकलना पड़ता है, या किसी भाग को कम्पित करते हुए निकलना पड़ता है। इस प्रकार वायुमार्ग में पूर्ण वा अपूर्ण अवरोध उपस्थित होता है।"

        उपर्युक्त परिभाषाओं से तात्पर्य है कि निःश्वास में बिना अवरोध हुए, जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती है वे स्वर  कहलाती है। अर्थात् निःश्वास  वायु बिना किसी अवरोध या बाधा के मुख विवर से बाहर निकल जाती है।
व्यंजन की परिभाषा:

व्यंजन और स्वर का उच्चारण स्थान (वर्णो का उच्चारण स्थान): -

अ.नं.

वर्ण

उच्चारण स्थान

उच्चारण स्थान का परिचय

1

अ, आ, अ: क, ख, ग, घ, ङ्, ह

कंठ्य

मुख विवर के ऊपर की ओर तालु  है जिसके कंठ और दांतों के बीच  में क्रम से चार भाग हो सकते है 1) कोमल तालु 2) मुर्द्धा3) कठोर तालु 4) वर्त्स  जिव्हा के पिछले भाग के सहारे उच्चारीत होते है| जो तालु में कोमल तालु के स्थान पर होता होता है| मूर्धा के अंतिम अस्थिमय भाग को जहां कोमल मांस खंड का आरंभ होता है कोमल तालु कहते है| इसे ध्वनि उत्पादन का प्रमुख अवयव कहा जाता है|

2.

इ, ई, च, छ, ज, झ, त्र  य, श  

तालव्य

मुख विवर के ऊपर की ओर तालु  है जिसके कंठ और दांतों के बीच  में क्रम से चार भाग हो है| इसका स्थान कठोर तालु पर होता है| वर्त्स(मसुडे) से शुरू होकर मूर्धा तक का भाग कठोर तालु कहलाता है|  

3.

ऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, श, र

मूर्धन्य

मुख विवर के ऊपर की ओर तालु  है जिसके कंठ और दांतों के बीच  में क्रम से चार भाग हो है| इसका स्थान कठोर तालु पर होता है|  इसका स्थान तालु बिल्कुल बीचो बीच है| अर्थात कठोर तालु और कोमल तालु के बीच का हिस्सा|

4.

त,,थ, द,ध, न, ल, स

दंत्य

ऊपर के सामने वाले दांत से जिव्हा के स्पर्श से यह ध्वनियां उत्पन्न होती है|

5.

उ, ऊ, प,फ,ब,भ,म

ओष्ठ्य/

ध्वनि उत्पादन में ऊपर और नीचे के ओष्ठ (ओठ) भी कार्यरत होते है| 

6.

ल,स,र,न

वर्त्स

ऊपरी दंत पंक्ति और कठोर तालु की आरंभिक सीमा के बीच का भाग वर्त्स कहलाता है| आसान भाषा शैली में उसे मसुडें कह सकते है|  

7.

ए ऐ

कंठ तालव्य

कंठ और तालु पर इसका स्थान होता है|

8.

ओ औ

कंठोष्ठ

कंठ और ओष्ठ इसका स्थान होते है|

9.

व, फ

दन्तोष्ठ

दांत और  ओठ इसका स्थान होते है|

10

स्वर यंत्र मुखी/काकल्य

भोजन नली के छिद्र के साथ श्वास नली की ओर झुका हुआ एक छोटी जीभ जैसा मांस का तुकडा है उसे स्वर यंत्र मुख या अभिकाकल कहते है| इसे अलिजिव्हा भी कहते है| यह कोमल तालु का अंतिम भाग है|  

इस प्रकार 52 वर्णो का उच्चारण स्थान है| इसमें मूल स्वर 11 और अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:) मिलाकर कुल 13 स्वर हैं| मूल व्यंजन 33 है| इसमें संयुक्त व्यंजन चार (क्ष, त्र, ज्ञ श्र) और दो द्विगुण व्यंजन (ड़ और ढ़ ) भी है | ऐसे कुल मिलाकर 52 वर्ण  हैं | हाल ही में मराठी का व्यंजन ळ भी इसमें शामिल किया है|  अत: हिंदी में कुल मिलाकर 53 वर्ण है| 

स्वर और व्यंजन का वर्गीकरण :-

    स्वर और व्यंजन का वर्गीकरण देखने से पूर्व स्वर और व्यंजन की परिभाषा देखेंगे | 


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