खड़ीबोली :
पश्चिमी हिंदी की एक बोली खडीबोली है| इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है| इसके अन्य नाम हिंदोस्तानी, नागरी हिंदी, सरहिंदी तथा कौरवी भी है। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार 'खड़ीबोली' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है 'एक तो मानक हिंदी के लिए जिसकी तीन शैलियाँ हैं 'हिंदी', 'उर्दू' और हिंदुस्तानी और दूसरे उस लोकबोली के लिए जो दिल्ली, मेरठ में तथा उसके आस-पास बोली जाती है। इस्लाम के प्रभाव के कारण हिंदी की अन्य ग्रामीण बोलियों की अपेक्षा खडीबोली में अरबी-फारसी के कुछ शब्द आ गए हैं।' किंतु उनमें पर्याप्त ध्वन्यात्मक परिवर्तन भी हो गया है जैसे-मतलब 'मतबल' में गुवाही 'उगाही' में परिवर्तित हो गए हैं।
नामकरण :
बोली के संदर्भ में 'खड़ी' नाम का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1800 ई. में लल्लू लाल ने किया था। इसके अतिरिक्त सदल मिश्र ने भी 'खड़ीबोली' नाम का प्रयोग उसी अर्थ में किया है। खड़ीबोली के नाम के संदर्भमें निम्नलिखित मत प्रचलित हैं -
1) मेरठ, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर को सामूहिक रूप से कुरुप्रदेश भी कहा जाता है| यही कारण है कि राहुल सांकृत्यायन ने खडीबोली के लिए कौरवी नाम का प्रयोग भी किया है|
2) दिल्ली-आगरे की बोली के लिए पहले गिलक्राइस्ट ने और बाद में लल्लूलाल ने खडी बोली नाम
3) खडीबोली के नाम के स्फुरण में डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने लिखा है कि ब्रज भाषा की अपेक्षा यह खडी-सी लगती है, कदाचित इसीकारण इसका नाम खडी बोली पद गया होगा|
4) डॉ. चटर्जी का भी कहना है कि ब्रज, अवधी आदिई को 'पडबोली' समझा जाता था| अठारहवीं शती के अंत में हिंदुओं का ध्यान दरबार की परिनिष्ठीत बोली की ओर गया तो पडीबोली के सादृश्य पर खडीबोली नाम चल पडा|
5) आगे चलकर खडीबोली शब्द का अर्थ विस्तृत हुआ तो खडी का अर्थ खरी लिया जाने लगा| गिलक्राइस्ट ने भी हिंदुस्तानी से भिन्न उस भाषा को खडीबोली कहा है, जिसमें अरबी-फारसी के शब्द न हो|
6) खड़ीबोली में मूर्धन्य ध्वनियों की अधिकता है। इन कडी ध्वनियों के कारण इसका 'खडी' नाम पडा
7) कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इसे फोर्ट विलियम में ब्रज और बांगरू की टेक देकर खडा किया गया, इसलिए इसका नाम 'खडीबोली' हुआ।
8) आचार्य चंद्रबली पण्डेय ने 'खडी' का अर्थ ठेठ बताया है।
9) गिलक्रिष्ट प्रभृति पश्चिमी विद्वानों का मत है कि यह प्रचलित और स्टैण्डर्ड (परिनिष्ठित / खरी) भाषा के रूप में क्रमशः विकसित हुई है, इसलिए इसका नाम खडी बोली पडा।
10)डॉ. हरदेव बाहरी इस मत के समर्थक हैं। इस संदर्भ में उनका कथन है कि"याद रहे कि इस प्रदेश की भाषा का यह नाम (खडी बोली) तभी पडा जब इसका व्यवहार शिक्षा और साहित्य में 'स्टैण्डर्ड' भाषा' के रूप में होने लगा।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि पडी के वजन पर खडीबोली नाम का स्फुरण हुआ| फोर्ट- विलियम कॉलेज कलकत्ता के गिलक्राइस्ट ने उसे हिंदुस्तानी की शुद्ध या मानक बोली के अर्थ में प्रयुक्त किया| लल्लूलाल के 'यामिनी भाषा छोड, दिल्ली-आगरे की खडीबोली' कथन से स्पष्ट है कि खडीबोली का आधार दिल्ली, मेरठ, और आगरा की जनपदीय बोली है| अत: खडीबोली नाम तो अवश्य नया या अविष्कृत था, किंतु यह पहले से विद्यमान वही भाषा थी, जिसे हिंदुस्थानी, हिंदवी आदि नामों से जाना जाता था| तथा जो दिल्ली, मेरठ, और आगरा की जनपदीय बोली पर आधारित थी|
खडीबोली के रूप:-
खडीबोली के दो रूप है -
1) बोलचाल की ग्रामीण खडीबोली
2) साहित्यिक खडीबोली
क्षेत्र :
शुद्ध रूप में खडीबोली सहारनपुर, मुज्जफ्फरनगर, मेरठ, देहरादून का मैदानी भाग, बुलन्दशहर के उत्तरी क्षेत्र में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त जिला सहारनपुर के पश्चात यमुना नदी के उस पार इस बोली का क्षेत्र अम्बाला तक व्याप्त है। यह अवश्य है कि अम्बाला के पूर्वी और हिमाचल के कलसिया के पूर्वी भाग में इस पर पंजाबी और पहाडी का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। मुरादाबाद तथा रामपुर जनपदों की बोली भी कौरवी या खडीबोली ही है। इसके प्रयोक्ता 1 करोड के ऊपर है|
खडीबोली का साहित्य :
खडीबोली को यदि एक लोक बोली के रूप में लिया जाए तो इसमें लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है जिसमें पवाडे मुख्य रूप में उल्लेख्य हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह भाषा अत्यंत समृद्ध है। आदिकाल से लेकर अद्यतन काल तक साहित्यकारों ने हिंदी को विकसित किया है। हिंदी, ऊर्दू, हिंदुस्तानी तथा दक्खिनी हिंदी एक सीमा तक खड़ी बोली पर ही आधारित हैं। विगत 100 वर्षों में इस बोली का आश्चर्यजनक ढंग से विकास हुआ है और साहित्यिक दृष्टि से भी जितनी खडी बोली समृद्ध है उतनी कदाचित कोई अन्य बोली या भाषा नहीं। साहित्य की प्रत्येक विधा काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, पत्र-पत्रिकाएँ आदि की अभिव्यक्ति का माध्यम यही बोली है। साहित्य के अतिरिक्त ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में भी इसका अभूतपूर्व महत्त्व है।
खडीबोली की प्रमुख विशेषताएँ :
1) स्वर लोप की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है, जैसे कि पंडित-पंडत, इलाज-लाज, मिठाई-मठाई।
2) प्रायः समस्त स्वर सानुनासिक रूप में मिलते हैं जैसे कि मंगता, आँक, बिंदी, गईं, गुंगा, लऊँ, बातें, मैं, सोंठ, धौंस।
3) यदि शब्द के आदि में 'ण' आता है, तो उसका उच्चारण नहीं होता किंतु शब्द के मध्य तथा अंत में 'न' के स्थान पर 'ण' बोलने की प्रवृत्ति बहुतायत से पायी जाती है।, जैसे जाना जाणा, नमक-णिमक, पाकिस्तानी-पाकिस्ताणी, आदि।
4) 'र' का 'ड', 'ड' का 'र' भी हो जाता है, जैसे चपरासी का चपडासी, कुडक का कुर्क आदि।
5) भिन्न व्यंजन संयोग की निम्नलिखित प्रवृत्ति दृष्टव्य है। यमुना यम्ना, कार्तिकी-कल्फी, बृहस्पती-भिस्पत, द्वादशी-द्वास्सी।
6) साहित्यिक हिंदी के ऐ, औ ग्रामीण खडीबोली में ए, ओ रूप में मिलते है| जैसे - बैठ-बेठ, है-हे, पैर- पेर, और - ओर आदि|
7) स्वराघात दीर्घस्वर के बाद द्वित्व की व्यापक प्रवृत्ति मिलती है|
जैसे- लोटा-लोठ्ठा, धोती-धोत्ती, बेटा - बेट्टा, रोटी- रोट्टी
8) आकारांत पुल्लिंग एकवचन संज्ञाएं त्रिर्यक रूप में एकरांत और बहुवचन में ओकारांत हो जाती है|
जैसे- कुत्ता रोट्टी खावै, कुत्ते ने रोट्टी खाई, कुत्तों ने रोट्टी खाई|
9) ग्रामीण खडीबोली ले कारकीय पर सर्ग अग्रांकिंत है- कर्ता- ने, नै, कर्म- के कूं, को, करन- तै, सै | संप्रदान - कूं, को , अपादान - सै, तै तथा अधिकरण- प, पे, में
10) पूर्वकालिक कृदंत 'के' जोडकर बनाए जाते है| जैसे- कहके - कहकर, सोके- सोकर | भूतकालिक कृदंत 'या' जोडकर बनाए जाते है| जैसे- कह्या - कहा, बोल्या- बोला, ग्या- गया| सामान्य वर्तमान पर गा, गे, गी जोडकर भविष्यकाल के रूप बनाए जाते है| जैसे- जांगा- जाएगा, खांगे - खाएगा|
11) इसमें महाप्राण के पूर्व इसी स्थिति में अल्प प्राण का आगम जैसे देक्खा, भुक्खा, आदि।
12) इसमें अरबी-फारसी के शब्दों का बाहुल्य है।
13) हिंदी की अन्य बोलियों की अपेक्षा खड़ीबोली में बलाघात कुछ जोर से पडता है।
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