आदिकालीन काव्य की विशेषताएं

 आदिकालीन काव्य की विशेषताएं 

            हिंदी साहित्य का आदिकाल साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धी है| हिंदी साहित्य के आरंभिक काल में उस साहित्य में कौन-सी प्रवृत्तियां दिखाई देती है, इस दृष्टि से साहित्य की विशेषताएं या प्रवृत्तियां अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं| यदि आदिकालीन साहित्य की युगीन पृष्ठभूमी को देखा जाए तों राजनीतिक दृष्टि से यह युग पतन का युग है| धार्मिक दृष्टि से शिलता का युग कहा जा सकता है| इसीलिए इस युग की साहित्यिक विशेषताएं अपना महत्व रखती है कि उनमें युगीन साहित्य का प्रतिबिंब दिखाई पडता है| आदिकालीन साहित्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नरूप मे देखी जा सकती है| 

1) संदिग्ध रचनाएं 

2) ऐतिहासिकता का अभाव 

3)युध्दों का सजीव वर्णन 

4) वीर रस की अभिव्यक्ति 

5) शृंगार रस की अभिव्यक्ति 

6) अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन 

7) जनजीवन की उपेक्षा 

8) संकुचित राष्ट्रीयता 

9) रास और रासों ग्रंथो की अधिकता 

10) प्रकृति चित्रण की विशिष्ठता 

11) भाषाशैली 

12) छंदों का विवध मुखी प्रयोग 

13) अलंकार विधान 

14) काव्य के विविध रूप 

1) संदिग्ध रचनाएं :-

    हिंदी के आदिकाल में मुख्यत: जो साहित्य उपलब्ध हुआ उस साहित्य के कुछ ग्रंथों के बारे संदिग्धता निर्माण हुई है| आदिकाल में प्राय: रासो साहित्य के बारे में यह संदिग्धता अधिक दिखाई पडती है| इस काल में रचित चार महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ  खुमान रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वी राज रासो, परमाल रासो| ये ऐसे चार ग्रंथ हैं जिनकी समीक्षा करके समिक्षकों ने इन ग्रंथों को संदिग्ध माना है| इनकी भाषाशैली सामग्री आदि के बारे में संदेश निर्माण होता है| पृथ्वी राज रासो काव्य के बारे में यह संदिग्ध बहु चर्चित हैं| कुछ विद्वान रासो काव्य को पूरी तरह अप्रामाणिक मानते है, कुछ अर्ध प्रामाणिक मानते है और कुछ प्रामाणिक भी मानते है| अर्थात in ग्रंथों में ऐतिहासिक घटनाएं भाषा और काव्य रुपों की विविधता आदि में तालमेल नहीं है| पृथ्वीराज रासो के चार रूप प्राप्त हैं| इनमें से कौन-सा रूप प्रामाणिक है? यह एक पहेली बन गया है| मतलब आदिकालीन रचना की प्रामाणिकता संदेह निर्माण करती है| इस प्रकार आदिकालीन रचनाएं संदिग्ध है|

2) ऐतिहासिकता का अभाव :-

    हिंदी के आदिकाल में जो अनेक काव्य ग्रंथ उपलब्ध हुए उनमें से अधिकतर काव्य ग्रंथ ऐसे है जिनमें ऐतिहासिक का अभाव है| यद्यपि इस काल के कुछ काव्य ग्रंथों के नायक इतिहास प्रसिद्ध है| परंतु कवियों ने  उनका वर्णन ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं किया है| इन काव्य ग्रंथों में कवियों द्वारा दिए गए संवत, तिथियां इतिहास से मेल नहीं खाती| इस प्रकार इन ग्रंथों में इतिहास की अपेक्षा कल्पना की अधिकता है| इसका कारण यही है कि आदिकालीन कवि राजाश्रित कवि थे| उन्हों ने अपने नायकों का या आश्रय दाताओं का अतिरंजित और प्रशंसा परक वर्णन किया है| इसीलिये in ग्रंथों में येतीहासिकता का अभाव दिखाई देता है| 

3) युद्धों का सजीव वर्णन 

    हिंदी के आदिकालीन काव्य ग्रंथों में मुख्यतः वीरों की, शूरों की गाथाएं प्रस्तुत की है। यही कारण है कि आदिकालीन ग्रंथो युद्धों का वर्णन प्रमुख विषय रहा है।उस समय के कवि केवल चारण या भाट नहीं थे। तो प्रत्यक्ष युद्ध मे भाग लेने वाले तलवार चलाने वाले एसे बहादूर थे और उसका ज्वलंत उदाहरण है चंदबरदायी। विशेष बात यह है कि अधिकतर युद्ध आक्रमण मित्री कलह या नारी के सौंदर्य या। अपहरण के कारण हुए। अपने आश्रय दाताओं को युद्ध के लिए उत्तेजित करना उस कल के कवियों का प्रमुख कर्तव्य माना जाता था। इस प्रकार उसे समय युद्ध की प्रधानता थी। कहां जा सकता है कि आदिकालीन रासो काव्यमें मुख्यतः युद्धों का  व्यापक स्तर पर वर्णन किया गया है जो अत्यंत संजीव बन पड़ा है। 

4) वीर रस की अभिव्यक्ति 

आदिकालीन साहित्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता वीर रस की अभिव्यक्ति है। चंदबरदायी  ने पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान और उनके अनेक सरदार सामंतो के उत्साह का प्रासंगिक वर्णन किया है। इस वर्णन में सभी जगह वीर रस ही प्रमुख है।

    पृथ्वीराज द्वारा किए गए संयोगिता के अपहरण के समय युद्ध का जो वर्णन किया गया है। उस वर्णन में वीर रस की अपनी चरम सीमा पर पहुंचा है। पृथ्वीराज चौहान वास्तव में एक बड़े योद्धा थे। और वह अपने सरदारों को प्रसंग वश निडरवणी में फटकार करते थे। उसी समय पृथ्वीराज चौहान के शब्द वीर रस की अभिव्यक्ति से परिपूर्ण है। इसमें संदेह नहीं कि वीरगाथाओं में तत्कालीन युद्धप्रसंग युद्ध के उपकरण युद्ध कला और शौर्य के वर्णनों में वीर रस की व्यंजना दिखाई पड़ती है। उस युद्ध समय में प्रसंग वश कुछ वाद्य भी बजाए जाते थे और उन वाद्यों की ध्वनि को सूनकर योद्धा उल्हासित होकर युद्ध करते थे। और उनकी वीरश्री दिखाई देती थी। इस प्रकार आदिकालीन साहित्य में वीर रस की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। 

5) श्रृंगार रसकी अभिव्यक्ति -

   हमारे आचार्य ने श्रृंगार को रसराज कहा है। वह श्रृंगार की और आकृष्ट होता है। मानव का स्थाई भाव श्रृंगार है। आदिकालीन साहित् में भी श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति प्रचुर मात्रा में दिखाई देती है। आदिकालीन कवियों ने मुख्यतः स्त्री के श्रृंगार का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। शृंगार के संयोग और वियोग दोनों प्रकार का वर्णन किया है। पृथ्वीराज रासो ऐसा महाकाव्य है, जिसमें नारी श्रृंगार का अनूठाचित्रण किया गया है। कवि चंद बरदायी  ने पद्मावति  के सुंदरता का जो चित्रण किया है वह हिंदी साहित्य में बेजोड़ है। जैसे चंद कहते  हैं, पद्मावति  मानो चंद्रमा की कला के समान थी। वह अनेक कलाओं में से परिपूर्ण थी। उसकी नई उम्र थी चंद्रमा ने मानो  उसी का अमृत रस पान  किया है| हिंदी के रासों काव्य में वियोग का भी कुछ वर्णन मिलता है| पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दिन  गौरी के बीच का अंतिम युद्ध था|  तब वियोग शृंगार का बडा सुंदर और मार्मिक वर्णन है| प्रकृति के पृष्ठभूमी पर यह वर्णन किया गया है| जैसे- वही पावस की रात है| वही इंद्र का धनुष्य है, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्र, रात दिन है| दिल्ली के वे ही महल है और वे ही सहचर है|परंतु प्राणप्रिय पति के संयोग के बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता| इस प्रकार आदिकालीन साहित्य के अंतर्गत शृंगार रस का सुंदर चित्रण हुआ है| 

6) अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन:-

हिंदी के आदिकालीन साहित्य में प्रचुरमात्रा में अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन दिखाई देता है| इस काल के कवियों ने  विशेषता अपने आश्रय दाताओं का जो वर्णन किया है, जो प्रसंशा की है, वह अतिशयोक्तिपूर्ण है| जैसे- जब पृथ्वीराज जयचंद के साथ युद्ध करते है| उस समय कवि चंद ने सेना का जो वर्णन किया है वह अतिशयोक्तिपूर्ण है| जैसे सेना के बोझ से दबकर पाताल पिलपिला हो गया है| दसोदिशाओं में मतवाली हाथी हिल गए| इस प्रकार अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन है\इसमें संदेह नहीं कि वीरगाथा कालीन कवियों ने  अपने काल में आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए अतिशयोक्ति पूर्ण किया है| 

7) जन जीवन की उपेक्षा:-

    हिंदी की आदिकालीन साहित्य के मुख्यत: उन कवियों, राजाओं, सम्राटों, सामंतों का चित्रण किया गया है| तत्कालीन कवियों ने मुख्यरूप से राजाओं, सम्राट, सामंत पर अपना लक्ष केंद्रित किया इसका कारण स्पष्ट है कि तत्कालीन कवि राजाश्रित कवि थे| और उन्होंने तत्कालीन कवि राजाश्रित थे|और उन्होंने तत्कालीन युध्दों का, स्त्रियों का वर्णन किया है | विशेष बात यह है कि तत्कालीन सामान्य जनता की और इन  कवियों का ध्यान नहीं गया| वास्तव में किसी देश की संस्कृति में योगदान है| सामान्य जनता का महत्वपूर्ण स्थान है| परंतु आदिकालीन जनता के कवियों ने  सामन्य जनता को उपेक्षित रखा है| कहा जा सकता है उस समय की साधारण जनता से जन जीवन से कविता कटी हुई है| 

8) संकुचित राष्ट्रीयता-

    हिंदी के आदिकालीन काव्य मे एक बात स्पष्ट रूप से लक्षित होता है कि तत्कालीन कवियों ने समुचित राष्ट्र पर दृष्टि नहीं रखी है| बल्की जिस राजा के यहां वे काम करते थे उसी राजा के राज्य को राष्ट्र मानते थे| अर्थात आदिकालीन कवियों ने  अपने आश्रय दाता राजा को प्रसन्न करने के लिये छोटे- छोटे राज्यों को राष्ट्र की संज्ञा दी| वास्तव में पृथ्वीराज चौहान, जयचंद राठोड आदि राजा पराक्रमी थे| लेकिन इन  कवियों ने छोटे-छोटे राज्य को ही राष्ट्र माना और इसका परिमाण यही हुआ कि अपने ही राज्य को राष्ट्र माना और इसका परिमाण यही हुआ कि अपने ही राज्यों की रक्षा के लिए ये लढते रहे| वीरश्री से युक्त होते हुए भी इनमें राष्ट्रीयता का अभाव था| समुचय भारत एक राष्ट्र है| इस कल्पना को उन्होंने अपने जीवन में स्थान नहीं दिया| इसीकारण भारत पर विदेशी आक्रमण होते रहे| इस्लाम का भारत में प्रवेश प्रवेश इस बात का साक्षी है|| 

9) रास और रासों ग्रंथो प्रचूरता:-

    हिंदी के आदिकाल में कुछ ऐसे ग्रंथ लिखे गए जिनमें रास और रासों ग्रथों की प्रचूरता है| उस समय मुख्यत: कुछ रास ग्रंथ लिखे गये| जैसे- मंजुरास, उपदेश रसायन रास, भरतेश्वर बाहुबली रास, जीवदया रास, आदि रास ग्रंथ अपना महत्व रखते है|

    रास की तरह आदि काल में अनेक रासों ग्रंथ भी लिखे गए| जैसे- पृथ्वीराज रासो बीसलदेव रासो, खुमान रासो, परमाल रासो आदि| सामन्य तया यह रासो काव्य वीर रस से परिपूर्ण है| इस प्रकार आदि काल में रास और रासों ग्रथों की प्रचूरता दिखाई देती है|  

11) प्रकृति चित्रण की विशिष्ठता 

    हिंदी के आदिकालीन वीरगाथाओं में प्रकृति चित्रण का भी समावेश हुआ है| प्रकृति के आलंबन और उद्दीपन दोनों ही रूप इन काव्यों में मिलते है| पृथ्वी राज रासों और बीसलदेव रासो में प्रकृति चित्रण अति सुंदर बन पडा है| पृथ्वी राज रासों का बारह मासा और षड ऋतू वर्णन विशेष उल्लेखनीय है| यद्यपि प्रकृति चित्रण की जो शैली छायावादी युग में मिलती है, वह आदिकालीन वीरगाथाओं में नहीं मिलती|

12) भाषाशैली:-

हिंदी के आदिकालीन साहित्य में भाषा के अनेक प्रयोग दिखाई देते है| जैसे- जैन, सिद्ध, नाथों की वाणी|  अपभ्रंश और अपभ्रंश के कई रूप दिखाई देते है| हिंदी के आदिकालीन काव्य में डिंगल और पिंगल भाषाओं का सुंदर प्रयोग प्राप्त होता है| वस्तुत: ये भाषाएं है कि जिनमें अनेक रासो काव्य लिखे गए है| 

    आदिकाल में अपवाद भूत खडीबोली के प्रयोग को भी देखा जा सकता है| अमीर खुसरो अगर आदिकालीन कवि माना जाता है, तो उनके द्वारा लिखी हुई पहेलियां, मुखरियां खडीबोली के उत्कृष्ठ उदाहरण है| इस प्रकार आदिकालीन साहित्य में भाषा के अनेक रूप दिखाई देते है|

  13) छंदों का विवध मुखी प्रयोग;-

    छंदों का जितना बहुमुखी प्रयोग आदिकालीन साहित्य में हुआ है वह उल्लेखनीय है| छंदों की दृष्टि से दोहा, तोमर, तोटक, आर्या, सट्टक, रोला और कुंडलिया आदि| छंदों का कलात्मक प्रयोग इन कवियों ने किया है| इस प्रकार आदिकालीन साहित्य छंदों की दृष्टि अये विविधमुखी प्रयोग का साहित्य है|

14) अलंकार विधान -

    हिंदी के आदिकालीन साहित्य में अलंकारों का प्रयोग भी कुछ मात्रा में दिखाई देता है| सिध्दों और नाथों की वाणी में सिद्धांतों और उपदेशों की प्रधानता होने के कारण उनके काव्य में अलंकार कम दिखाई पडते है| परंतु रासों काव्य में प्रचूर मात्रा में अलंकार दिखाई देते है| जैसे- उपमा, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति और प्रतिप अलंकार आदि अलंकार मिलते है|  

14)  काव्य के विविध रूप -

    आदिकालीन हिंदी साहित्य में मुख्यत: काव्य के दो रूप दिखाई देते है जैसे- मुक्तक और प्रबंध काव्य| जैसे- बीससलदेव रासो मुक्तक शैली का उत्कृष्ठ उदाहरण है| और पृथ्वीराज रासो प्रबंध शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है| इतना ही नहीं तो वह हिंदी का प्रथम महाकाव्य है| 

    संक्षेप में उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि आदिकालीन हिंदी साहित्य का ऐतिहासिक और साहित्यिक दोनों दृष्टि से महत्व है| 

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