हिंदी की बोलियाँ और अवधी बोली का परिचय


 हिंदी की बोलियाँ और अवधी बोली का परिचय 

        बोलियों की दृष्टि से हिंदी भाषा का विशेष महत्त्व है। इसकी बोलियों की संख्या भारत की ही नहीं विश्व की सभी भाषाओं से अधिक है, क्योंकि यह एक बृहत्तर क्षेत्र की भाषा है। हिंदी बोलियों की सबसे बडी विशेषता यह है कि उनकी संख्या अत्यधिक होने पर भी उनमें परस्पर बहुत साम्य मिलता है। विश्व की शायद ही ऐसी कोई भाषा हो, जिसमें इतनी अधिक बोलियाँ होते हुए भी उनमें काफी साम्य दिखाई देता है। ये बोलियाँ अपनी सीमा रेखा में नहीं हैं, वरन् दूसरी बोली में भी प्रविष्ट होती चली गयी हैं, जिनसे पारस्पारिक साम्य के कारण विभाजन रेखा खींचना कठिन हो जाता है। ध्वनि, व्याकरण, शब्दकोश आदि की दृष्टि से इन सभी बोलियों में साम्य की स्थिति देखकर आश्चर्य प्रतीत होता है। ये सारी बोलियाँ अलग-अलग होते हुए भी संपूर्ण हिंदी प्रदेश के लोगों द्वारा शत प्रतिशत् समझी जाती हैं।

        हिंदी भाषा का क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, पंजाब का कुछ भाग, हरियाना, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश तथा बिहार है। जिसे हिंदी भाषी प्रदेश कहते हैं। पूरे क्षेत्र में हिंदी की पांच उपभाषाएँ हैं, जिनके अंतर्गत मुख्य 17 बोलियाँ हैं, इनके अतिरिक्त हिंदी का एक 'दक्खिनी हिंदी' नामक रूप भी प्रचलित पाया जाता है| वह इस प्रकार -

      

अ.नं

उपभाषा

बोलियां

1

पश्चिमी हिंदी

1) खडी बोली (कौरवी) 2) बांगरु (हरियाणवी)  

3) ब्रज   

4) बुंदेली

5) कनौजी

2

पूर्वी हिंदी

1) अवधी

 2) बघेली 3)छत्तीसगढी

3

राजस्थानी हिंदी

1) मारवाडी  

 2) जयपुरी   

3) मेवाती 

4) मालवी

4

बिहारी हिंदी

1) भोजपुरी       

2) मगही      

3) मैथिली

5

पहाडी हिंदी

1) पश्चिमी पहाडी 

2) मध्यवर्ती पहाडी 

(कुमायूँनी, गढ़वाली)

उपरोक्त तालिका में हिंदी भाषा को पांच वर्गों में विभाजित किया गया है। पश्चिमी हिंदी में 5 बोलियाँ, पूर्वी हिंदी में 3 बोलियाँ,राजस्थानी हिंदी में 4 बोलियाँ,  बिहारी हिंदी में 3 बोलियाँ, पहाड़ी हिंदी में 2 बोलियाँ मिलती हैं। यहाँ अवधी, खड़ीबोली, मारवाड़ी, तथा गढ़वाली हिंदी का सामान्य परिचय कर लेंगे।

 1) अवधी :

    यह पूर्वी हिंदी की एक प्रमुख बोली है। यह उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र की बोली है। अवध का प्राचीन नाम 'कोसल' था। अतएव इसे 'कोसली' भी कहते हैं।

    इसके विकास के संबंध में विद्वानों में एकमत नहीं है। जार्ज ग्रियर्सन इसकी उत्पत्ति अर्धमागधी से मानते हैं। डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार इसका संबंध 'पालि' से अधिक है। डॉ. उदयनारायण तिवारी अवधी की उत्पत्ति किसी बोलचाल की भाषा से मानते हैं। इन तीनों मतों में अंतिम मत अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। खडीबोली की भाँति अवधी का विकास भी कोसल प्रदेश में बोली जानेवाली मध्यकालीन किसी जनभाषा से जुडा हुआ है।

ⅰ) क्षेत्र :

अवधी का क्षेत्र अत्यंत व्यापक एवं विस्तृत है। यह लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, खीरी, फैजाबाद, गोंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ तथा बाराबंकी में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त गंगा के पार इलाहाबाद, फत्तेहपुर, कानपुर, मिर्जापुर, एवं जौनपुर जिलों के कुछ भागों में अवधी बोली जाती है।

ii) अवधी के क्षेत्रीय रुप :

डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार अवधी के निम्न तीन रूप हैं-

1) पश्चिमी अवधी : इसमें खीरी (लखीमपुर), सीतापुर, लखनऊ, उन्नाव तथा फतेहपुर की अवधी आती है।

2) केंद्रीय अवधी : इसमें बहराइच, बारबंकी, एवं रायबरेली की अवधी आती है।

3) पूर्वी अवधी: पूर्वी अवधी के अंतर्गत गोण्डा, फैजाबाद, सुलतानपुर, इलाहाबाद, जैनापुर, तथा मिर्जापुर की अवधी का समावेश है।

iii) साहित्य :

अवधी में तीन धाराओं का साहित्य मिलता है। 1) संतकाव्य, 2) प्रेमकाव्य, 3) रामकाव्य।

1) संतकाव्य : संतकाव्य परंपरा के उन कवियों के जिन्होंने अवधी को अपने काव्य का माध्यम बनाया है मलूकदास, मथुरादास, धरनीदास, संतचरणदास, दयाबाई, सहजो बाई आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

2) प्रेमकाव्य : प्रेमकाव्य के अधिकांश कवियों का निवासस्थान अवध प्रदेश होने के कारण उनके काव्य में 'अवधी' भाषा का प्रयोग होना स्वाभाविक है। प्रेमकाव्य के अवधी भाषा के कवियों में मलिक मुहम्मद जायसी सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनका 'प‌द्मावत' अवधी भाषा का उत्कृष्ट ग्रंथ है।
3) रामकाव्य : रामभक्तिशाखा के मूर्धन्य कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। इनका 'रामचरितमानस' अवधी भाषा का उत्कृष्ट ग्रंथ है। गोस्वामी जी की रचनाएँ, शुद्ध, परमार्जित तथा व्याकरणसम्मत हैं।

iv) विशषेताएँ :

1) अवधी में 'ण' के स्थान पर 'न' तथा 'ड' के स्थान पर 'र' का प्रयोग मिलता है | जैसे- कारण > कारन, चरण > चरन, लडाई >लराई , फल >फर 

2) अवधी में हिंदी की सभी स्वर ध्वनियां विद्यमान है| जैसे -  'ऐ' को 'अई' तथा 'औ' को 'अऊ' कहा जाता है; जैसे कि जैसे-जइसे, और अउरत | 'श','ष' 'स' का उच्चारण 'स' किया जाता है; जैसे कि विश्वास-विस्वास, भूषण-भूसन।

4) व्यक्तिवाचक तथा विदेशी शब्दों में 'वा', 'इवा' लगाया जाते हैं; जैसे कि जगदीसवा, रजिस्टरवा।

5) बहुवचन के लिए कहीं-कहीं एकवचन का प्रयोग होता है; जैसे कि तोहार (तुम के लिए)

6) 'न', 'न्ह', 'नि', 'न्हि' लगाकर बहुवचन बनाए जाते हैं; जैसे लोगन, लरिकन ।
7) संज्ञाओं के तीन रूप मिलते हैं - समान्य, दीर्घ और दीर्घतर जैसे घोडा >घोड्ना >घोडौना 
8) अवधी में कुछ क्रिया विशेषण विचित्र हैं| जैसे - फिन>फिर, एहर>इधर, ओहर > उधर, हिआं > यहां, हुआं > वहां आदि|
9) वर्तमान सहायक क्रिया के लिए अहै, आटे, बाटे, का भूतकालीन सहायक क्रिया के लिए भए, रहे का और भविष्य काल के लिए ब, बू, बे, बो का प्रयोग होता है 



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