हिंदी का शब्द समूह

 हिंदी का शब्द समूह 

किसी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्दों के समूह को उस भाषा का शब्द समूह कहते हैं। किसी भाषा के पूरे शब्द समह का ठीक-ठाक अनुमान संभव नहीं है। शब्द समूह की दृष्टि से हिंदी का सबसे बड़ा कोश बृहत हिंदी कोश है। अंदाज से इसमें बताया जाता है कि इसमें 136000 शब्द है। 

जिस प्रकार भिन्न-भिन्न जाति धर्म आचार-विचार करने वाले व्यक्ति जब परस्पर संपर्क में आते हैं तब तब एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। एक दूसरे से प्रभावित होते है। यही स्थिति भाषा में होती है। दो भाषा भाषियों का मिलन दोनों की भाषाओं को प्रभावित करता है| परिमाणस्वरूप शब्दों का आदान-प्रदान होता है| शब्दों का यह आदान-प्रदान केवल देशी भाषाओं में नहीं, बल्की विदेशी भाषाओं के साथ भी होता है| धीरे-धीरे भाषा के शब्दों की संपत्ती बढती जाती है| शब्द भंडार की दृष्टि से प्रत्येक भाषा खिचडी होती है| यही कारण है कि संसार की कोई भाषा यह दावा नहीं कर सक्ती कि वह पूर्णत: शुद्ध है| उसमें अन्य किसी भाषा के शब्द नहीं है| इस प्रकार हिंदी भाषा के शब्द समूह में केवल भारतीय भाषाओं के शब्द है ऐसा नहीं तो उसमें विदेशी भाषाओं के शब्द भी है| 

    हिंदी भाषा के शब्द समूह का परिचय प्राप्त करने के लिए उसे दो वर्गों में विभाजित करते है -

1) परंपरागत शब्द 

2) नविन शब्द 

 1) परंपरागत शब्द :-

     परंपरागत शब्द वे है, जो किसी भाषा को अपनी पूर्व वर्ती भाषा से निकलने के साम्य पैतृक संपत्ति के रूप में मिलते हैं| हिंदी भाषा संस्कृत से लेकर पाली-प्राकृत-अपभ्रंश से विकसित हुई है| जिनके शब्द हिंदी में प्रचूर मात्रा में आए हैं| परंपरागत शब्दों के अंतर्गत तत्सम, अर्ध तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी आदि शब्द आ जाते है| उनका परिचय इस प्रकार-

1) तत्सम शब्द- 

    यह शब्द दो शब्दों के योग से बना है | जैसे- तत्+सम=तत्सम | तत् अर्थात उसके समान अर्थात संस्कृत के समान| इस प्रकार तत्सम शब्द वे है, जिन्हें बिना परिवर्तन के साथ सीधे संस्कृत से ग्रहण किया जाता है| उदाहरण के लिए हिंदी में कृष्ण, गृह, कर्म,हस्त, धर्म, पुष्प, जेष्ठ, संपत्ति आदि| 

    हिंदी में तत्सम शब्दों का आगमन चार स्त्रोतों से होता है- 

1) प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए अनेक शब्द यथावत हिंदी में चाले आए है| जैसे- काल, कुसूम, दंड, दम, जंतू, अचल, अचला, कली आदि|

2) संस्कृत के व्याकरणिक नियमों के आधार पर हिंदी में अनेक तत्सम शब्दों का निर्माण कर लिया गया है| इस प्रकार के अधिकांश शब्द शब्दों की कमी की पूर्ती के लिए बनाए गये है| उदा. - जलवायु, समाचारपत्र, पत्राचार, रेखाचित्र, वायुयान आदि|

3) संस्कृत से सीधे हिंदी में लिए गये शब्द | जैसे- कर्म, विद्या, ज्ञान, पुस्तक, मत्स्य, पुष्प आदि|

4) आधुनिक युग में अन्य भारतीय आर्य भाषाओं से काफी शब्द हिंदी में आए है| जैसे- मराठी से -प्रगति, वांग्मय, बंगाली से - उपन्यास, गल्प , तत्वावधान, आपत्ति, संदेश, धन्यवाद,निर्भर, स्वप्नील आदि|

कुछ ऐसे शब्द जो तत्सम न  होते हुए भी तत्सम जैसे समझे जाते है | जैसे- चंद्रमा, नभ, वृक्ष, यश, वय, मन, तम आदि| 

2) अर्ध तत्सम शब्द:-

    तत्सम और तद्भव के बीच का रूप लिए शब्द अर्ध तत्सम कहलाते है| ऐसे शब्द संस्कृत-पाली-प्राकृत- अपभ्रंश से होकर थोडे परिवर्तन के साथ हिंदी आदि भाषाओं में आए हैं| जैसे- किरपा ऐसे शब्दों की संख्या कम है | जैसे- किसन-किसनु , धर्म, कर्म आदि| 

3) तद्भव शब्द :-

    'तद्भव' शब्द तत्+भव से बना है | इसका अर्थ है उससे उत्पन्न| 'तत्' से तात्पर्य संस्कृत भाषा से है| अत: तद्भव शब्द वे है जो संस्कृत भाषा से निकलकर प्राकृत या अपभ्रंश भाषा से होते हुए हिंदी भाषा में व्यवहृत होते है| हिंदी में तद्भव शब्दों की संख्या सर्वाधिक है| तद्भव शब्दों की सर्वाधिक संख्या सर्वनाम और क्रियापदों में मिलती है| जैसे- 'कृष्ण से कान्हा, दुग्ध से दूध, कर्म से काम, हस्त से हाथ, गृह से घर आदि|

4) देशज शब्द -

    जिनकी उत्पत्ति का कुछ पता नहीं चलता, उन्हें देशज शब्द कहलाते| जो लोकजीवन में व्यवहृत होते है| पर इनके मूल स्त्रोत का पता नहीं होता| इनमें वे शब्द भी आते है, जिनका आवश्यकता नुसार निर्माण होता है| हिंदी में देशज कहलानेवाले शब्दों को दो वर्गों में रखा जा सकता है| 

अ) अज्ञात व्युत्पत्तिवाले शब्द -

    जिनकी उत्पत्ति का कोई पता न हो| जैसे- झगडा, झट-झट, धब्बा, थेट, पेड, कबड्डी, तेन्दुवा, चंपत|

आ) अनुकरणात्मक -

    जो तत्सम, तद्भव, विदेशी नहीं है तथा हिंदी काल में अनुकरण के आधार पर बनाए गये है| इस वर्ग के अधिकांश शब्द ध्वन्यात्मक होते है| जैसे- फटफटियां, टराना, चट-पट, खट-खट, हट-हट, खड-खड आदि|

    5) विदेशी शब्द -

    अन्य देशों की भाषाओं से आए शब्द विदेशी कहलाते है| हिंदी में विदेशी भाषाओं के शब्दों की संख्या भी बहुत है | इसका कारण यह है कि एक दीर्घ समय से हिंदी का संपर्क विभिन्न भाषाओं से होता आया है| प्राचीन काल में आर्यों का संपर्क स्थान इराण तथा अरब से रहा है| अत: इन भाषाओं का एक दूसरे पर प्रभाव पडना स्वाभविक है| इस्लाम अनुयायी द्वारा भारत विजय के पश्चात अरबी फारसी का हिंदी में प्रवेश होना आरंभ हो गया| इस पराक्र मुगलों की भारत विजय की पश्चात तुर्की भाषा ने हिंदी को प्रभावित किया| 16-17 वीं शताब्दी में युरोपीय देशों के व्यापारीयों नें भारत आना प्रारंभ किया| इनमें फ्रान्सीसी, पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, आदि प्रमुख थे| अत: इनके भाषा के शब्द हिंदी में आए और व्यवहृत होने लगे| अन्गेजी के शब्द सर्वाधिक संख्या में पाए जाते है, जो भारत पर अंग्रेजी के लंबे राज्य को स्पष्ट करते है| 

विदेशी शब्द इस प्रकार-

1) अरबी-फारसी से आए शब्द -

    भारत पर मुसलमानों का शासन दीर्घ काल तक रहा और फारसी राज्य की भाषा बनी| फलत: फारसी अध्ययन-अध्यापन की ओर विशेष ध्यान दिया गया| फारसी के साथ बहुत वर्ष तक संपर्क में रहने के कारण हिंदी में फारसी शब्दों की संख्या 7000 से ऊपर है, परंतु अब यह शब्द हिंदी के अभिन्न अंग बन गए हैं| जैसे- रोजा, खुदा, हज, पैगंबर, मजहब, दर्जा, जुकाम, सब्जी, बादाम, शिपाई, वकील, अदालत, पायजमा, हमला, चपरासी, हलवा, हजामत, जुलाह, दिवार, हकीम, मंजिल, बर्फी, जलेबी, बालूशाई आदि \|

2) तुर्की के शब्द :-   तुर्की का भारत से राजनीतिक, व्यापारिक, धार्मिक आदि दृष्टियों से काफी संबंध रहा| परिणामस्वरूप तुर्की के बहुत शब्द हिंदी में आए हैं|  तुर्की से डेढ सौ शब्द हिंदी में आए है, जैसे- बाबू , कुली, कैंची, खच्चर, खां, गलीचा,गनीमत, चम्मच, चाकू,  चेचक, तोप, दरोगा, बाबा, बारूद, बीबी, बोगस, मुगल, लाश, सराय, सुरंग, आका, उर्दू, बहादूर, सौगात, तुर्क, मुचलका आदि|

3) पुर्तगाली शब्द:- पुर्तगाली शब्दों का आगमन हिंदी में सीधे न होकर बंगला आदि भाषाओं के माध्यम से हुआ है| हिंदी में पुर्तगाली शब्दों की संख्या 100 से अधिक है| जैसे- अलमारी, कप्तान, इस्त्री, कर्नल, कमरा, गमला, गोभी, चावी, तौलिया, पपीता, संत्रा, इस्पात आदि|

4) पश्तो:-  पश्तों और अफगाण के संपर्क से पश्तों शब्द हिंदी में आए है| इनकी संख्या 100 से अधिक है- पठान, गुड्डा,मुंडा,आखरोट, पटाखा, डेरा, नगाडा, कलूटा, आचार, डंगर, हमजोली, खर्राटा आदि|

5) अंग्रेजी शब्द :-

    लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेजों का शासन भारत पर रहा| अंग्रेजी शिक्षा, सभ्यता, नीति ने भारत को पूरी तरह बदल डालने का प्रयास किय| अंग्रेजी राजभाषा होने के कारण अंग्रेजी के बहुत शब्द हिंदी में आए है|

जैसे- टेबल, मशीन, बस,स्कूटर, ट्रेन कॉलेज, आदि|

इनके अलावा, अन्य विदेशी, भाषाओं के शब्द, हिंदी में बहुत कम है| इसके कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत है- 

1) फ्रान्सीसी - एडवोकेट, कूपन, कप, कालर मार्शल, मेम, मेयर, वारंट, पिकनिक, टेबूल आदि|

2) डच- तुरूप, बम , स्क्रूप 

3) जर्मनी- डैक, बैंगन, ट्रेन, सेमिनार, डॉक आदि|

4) चीनी- सिंदूर, चीनांसुक, मुसार, लीजी, चीनी आदि|

5) मिस्त्री- मुद्रा, मुद्रिका, मिश्री आदि|

6) इरानी- मिहिर, तीर, मग, गंज, सिक्का आदि|

7) जापानी- रिक्शा, सायोनारा, हाईके, कराटे आदि|

8) स्पेनी- सिगार, पुउन, सिगरेट आदि| 

9) लैटिन - दीनार, रोमन आदि|

10) रूसी- रुबल, मैट्रो, बोद्का स्पुतनिक आदि| 

11) इटालियन - लाटरी, पियानो, कार्टून, मलेरिया, कन्सल्ट 

12) ऑस्ट्रेलियन - कांगारू 

13) आफ्रिकी शब्द- जेब्रा, चिपांजी आदि| 

14) युनानी भाषा - दाम, दमडी, कस्तुरी आदि| 

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के शब्द भी मिलते है| 

1) अनुकरणात्मक शब्द - 

    वास्तविक और कल्पित ध्वनियों के अनुकरण पर निर्मित शब्दों को अनुकरणात्मक शब्द कहते है| जैसे - फट फटियां, बगबग, खटखटाना आदि| 

2) पुनरुक्त शब्द- 

    शब्दों को दोहराकर बनाये गये शब्द पुनुरुक्त कहलाते है| जैसे- चलते-चलते, खाते-खाते आदि| 

3) प्रतिध्वनी शब्द- 

     प्रभाव डालने के लिए ऐसे शब्द प्रयुक्त होते है- घोडा-ओढा, काम-वाम आदि|

4) द्विज शब्द (संकर शब्द):-

    हिंदी में ऐसे बहुत से शब्द है जो उपर्युक्त वर्ग में से किन्हीं भी डॉ या अधिक योग से बने संकर या द्विज शब्द कहां जाते हैं| जैसे रेलगाडी, माल गाडी, रेलयात्रा, फुलदान, पावरोटी आदि|

नवीन शब्द - 

    नविन शब्द वे है जो उसके जन्म के बाद मिलते है| इसके तीन भेद है -

1) नवनिर्मित शब्द :-

    दो या अधिक शब्दों के योग से बने शब्द नवनिर्मित कहलाते हैं| उपसर्ग, प्रत्यय के संयोग से बने शब्द, ध्वनि या दृश्य के आधार पर निर्मित शब्द नव निर्मित शब्द के अंतर्गत आते है|

2) देशज शब्द :-

    जिनकी उत्पत्ति या मूल स्त्रोत का पता नहीं चलता ऐसे शब्द देशज कहलाते है|

3) गृहीत या आगम शब्द :-

    गुजराती, मराठी, बंगाली, आदि आधुनिक भारतीय भाषाओं से जब शब्द आते है, तब उन्हें आगम शब्द कहा जाता है| 

    इस प्रकार हिंदी का शब्द सुमह अत्यंत समृद्ध है| जिसके तत्सम, तद्भव और विदेशी शब्द समूह के कारण इसके शब्द भंडार में आज भी वृद्धि हो रही है| आज वैज्ञानिक युग को शब्द बद्ध करने के लिए पारिभाषिक शब्दावली को हिंदी ने अपनाया है| इस प्रकार शब्द समूह की दृष्टि से हिंदी एक संपन्न भाषा बन गयी है| 






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