हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा
हिंदी साहित्य की धारा अबाध रूप से अवश्य प्रवाहित होती रही है, किंतु उन्नीसवीं शती के अंत तक हिंदी साहित्य का इतिहास बिखरी हुई राशि के समान पडा रहा| उन्नीसवीं शती के अंत तक अनेक कवियों और लेखकों द्वारा अनेक ऐसे ग्रंथ निर्माण हुए जिनमें हिंदी साहित्य के निर्माताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख मिलता है किंतु यह सब कुछ व्यष्टि रूप से हुआ, समष्टि रूप से नहीं| इसके अतिरिक्त उनमें ऐतिहासिक चेतना का अभाव भी है| इन ग्रंथों में नाभादास द्वारा लिखत भक्तमाल, गोकुलनाथ लिखित चौरासी वैष्णवन की वार्ता है| इनमें कवियों का निर्देश किसी धर्म अथवा संप्रदाय विशेष की भावना से किया गया है, व्यक्तित्व और कृतित्व को ध्यान में रखकर नहीं| इसमें कालक्रम और सन संवत का अभाव है| अत: 19 वीं शतीं तक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं मिलता| फिर भी इस परंपरा का प्रारंभ उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मिलता है और वहां से उसका विकास हुआ है, जिसका परिचय निम्नलिखित रूप में देख सकते है-
1) गार्सा-द-तासी:-
यह आश्चर्य की बात है कि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का सर्वप्रथम प्रयास एक फ्रेंच विद्वान 'गार्सा-द-तासी' ने किया है| अत: 'गार्सा-द-तासी' हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहाकार माने जाते है| उनके द्वारा लिखे इतिहास ग्रंथ का नाम है , 'इस्तवार द ला लितरेत्युतर ऐंदुए ऐंदुस्तानी' | इसमें लेखक ने अंग्रेजी वर्ण क्रम से हिंदी और उर्दू के कवियों और कवित्रियों का विवरण दिया गया है| इसका प्रथम भाग सन 1839, द्वितीय भाग 1847 और तृतीय भाग 1871 में प्रकाशित हुआ है| इसमें केवल कवियों के नामों की सूची होने के कारण इतिहास ग्रंथ के तथ्यों और सूचनाओं की प्रामाणिकता की दृष्टि से यह ग्रंथ इतना विश्वसनीय नहीं फिर भी इतिहास लेखन की दिशा में किया गया प्रथम प्रयास के रूप में इसका महत्व नकार नहीं सकते|
2) श्री महेश दत्त शुक्ल - भाषा काव्य संग्रह
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के संदर्भ में दूसरा ग्रंथ सन 1930 में श्री महेश दत्त शुक्ल द्वारा लिखित 'भाषा काव्य संग्रह है| इसमें प्राचीन कविताएं संग्रहित की हैं और फिर उन्हीं कवियों का जीवन-चरित्र तथा समय आदि संक्षेप में दिया है | अंत में कठीन शब्दों का कोश भी है|
3) शिवसिंह सेंगर -
इसी ग्रंथ पर आधारित शिवसिंह सेंगर ने सन 1883 में 'शिवसिंह सरोज नामक इतिहास ग्रंथ लिखा|इसमें भी कवियों का विवरण और उनका काव्य-संग्रह है, किंतु इसमें तासी के ग्रंथ की अपेक्षा कवियों की संख्या में अधिक वृद्धी हो गई है| तासी के ग्रंथ में हिंदी कवियों की संख्या 70 से ऊपर है और 'सरोज' में भाषा कवियों की संख्या उनके जीवन चरित्र और उनकी कविताओं के उदाहरण के सहित 'एक सहस्त्र हो गई है| इसीलिये हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की परंपरा का यह दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है|
4) जॉर्ज ग्रियर्सन -
'शिवसिंह सरोज' पर आधारित जॉर्ज ग्रियर्सन ने सन 1988 में 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्थान' इसे सच्चे अर्थ में हिंदी साहित्य का पहला इतिहास कहा जाता हैं| कारण इसमें लेखन ने कवियों और लेखकों का कालक्रमानुसार वर्गीकरण करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है| इसमें सामग्री को यथा संभव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है| ग्रंथ विभिन्न काल-खंडों में विभक्त किया गया है तथा प्रत्येक अध्याय काल विशेष का सूचक है| प्रत्येक काल के गौण कवियों को प्रत्येक अध्याय के अंत में उल्लेखित किया है| विभिन्न युगों की काव्य प्रवृत्तियों की व्याख्या करते हुए उनसे संबंधित सांकृतिक परिस्थितियों व प्रेरणा स्त्रोतों के भी उद्घाटन का प्रयास भी उन्होंने किया है| इसके अतिरिक्त हिंदी साहित्य के विकास क्रम का निर्धारण चारण काव्य, धार्मिक काव्य, प्रेम काव्य, दरबारी काव्य के रूप में करना तथा 16 -17 वीं शताब्दी के युग को हिंदी काव्य का स्वर्णयुग मानना इनकी महत्वपूर्ण उपलब्धि है| इस प्रकार हिंदी साहित्य को वै ज्ञानिक पद्धति पर सर्वप्रथम सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने का श्रेय जॉर्ज ग्रियर्सन को जाता है|
5) बाबू श्याम सुंदर दास-
इन्होंने 'हिंदी कोविद रत्नमाला नाम में से इतिहास लेखन किया है| यह ग्रंथ दो भागों में प्रकाशित हुआ है| पहला भाग सन 1966 और दूसरा भाग 1971 में प्रकाशित हुआ है| इनमें 80 आधुनिक लेखकों के जीवन चरित्र, उनकी कृतियों के निर्देश के साथ दिये गये हैं| इन जीवनियों में इतिहास का कोई सूत्र नहीं है, केवल लेखक विशेष का साहित्य आवश्य बतला दिया गया है|
6) मिश्रबंधु विनोद :-
सर्व प्रथम इतिहास का इतिवृत्तात्मक लेखन मिश्रबंधुओं ने किया है| यह लेखन चार भागों में प्रकाशित हुआ है| प्रथम तीन भाग सन 1913 में और चौथा भाग 1934 में प्रकाशित हुआ है| इसमें कवियों के विवरणों के साथ-साथ साहित्य के विविध अंगों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है| अनेक कवि जो अज्ञात थे, प्रकाश में लाए गये है और उनके साहित्यिक महत्व का मूल्य आंका गया है| कवियों की श्रेणियां बनाई गयी है और उन श्रेणियों में कवियों का वर्गीकरण किया गया है| इसके चार भागों में 4591 कवियों का वर्णन है, किंतु बीच में अन्य कवियों का पता मिलने पर उनके नंबर बटे से कर दिये है| इस इसमें 5000 से अधिक कवियों का विवरण मिलता है| यद्यपि कवियों के काव्य की समीक्षा प्राचीन काल के आदर्शों के आधार पर की गयी है, पर उनकी विवेचन में हम आदर्श दृष्टिकोन नहीं पाते| जीवन की आलोचना, कवि का संदेश, लेखक की अंतदृष्टि और भावों की भावों की अनुभूति आदि के आधार पर उसमें कवियों और लेखकों की आलोचना नही है | भाषा भी आलोचना के ढंग की नहीं है फिर भी साहित्य के प्रथम इतिहास को विस्तारपूर्वक लिखने का श्रेय मिश्र बन्धुओं को है|
इन्होंने ही सन 19 67 में 'हिंदी नवरत्न' ग्रंथ लिखा | जिसमें नौ कवियों की विस्तृत समालोचना की है|
7) रामनरेश त्रिपाठी -
सन 1974 में इन्होंने 'कविता कौमुदी' इतिहास ग्रंथ लिखा| इसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र के पहले तक के 89 कवियों का जीवन वर्णन , उनकी कविता के साथ दिया गया है| इसमें कवियों की आलोचना न होकर केवल परिचय मात्र है| इसका दूसरा भाग 1983 में प्रकाशित हुआ है जिसमें 49 आधुनिक लेखकों और कवियों का विवरण है| इस पराक्र इस ग्रंथ में 138 कवियों का विवरण है|
8) एडविन ग्रीब्स -
इन्होंने सन 1974 में ही 'ए स्केच आव हिंदी लिटरेचर' नाम से साहित्य का इतिहास लिखा यह पुस्तक बहुत संक्षिप्त है| हिंदी साहित्य के इतिहास को पांच भागों में दिया है| दो भाग धार्मिक काल पर, बाकी हिंदी के भविष्य का सुंदर अध्याय है| इस प्रकार इसमें केवल साहित्यिक गतिविधि का परिचय मात्र है|
9) एफ. ई. के. -
इन्होंने सन 1977 में ' द हिस्ट्री आव हिंदी लिटरेचर' नाम से इतिहास लिखा| इन्होंने वैज्ञानिक ढंग से इतिहास लिखा है, किंतु इसमें भी साहित्य का परिचय मात्र है|
10) वियोगी हरि -
इन्होंने सन 1980 में ;ब्रज माधुरी सार' नामक ग्रंथ लिखा| इसे तीन भाग प्रकाशित हो गए है| दूसरा भाग 1990 और तिसरा 1996 में प्रकाशित हुआ है| इस ग्रंथ में कोई ऐतिहासिक काव्य मीमांसा नहीं है| कवियों का काव्य-संग्रह काल क्रमानुसार अवश्य किया गया है|
11) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी -
इन्होंने हिंदी साहित्य को आलोचनात्मक ढंग से समझाने का प्रयास किया| इस दृष्टि से सन 1980 में 'हिंदी साहित्य विमर्श' नामक ग्रंथ लिखा है| यह वास्तव में हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक विकास के संबंध में लिखे कुछ निबंधों का संग्रह है| इन निबंधों में साहित्य की विविध प्रवृत्तियों का पांडित्यपूर्ण विभाजन और मूल्यांकन किया गया है| तथा कवियों और लेखकों के साहित्यगत व्यक्तित्व पर पूर्ण प्रकाश डाला है|
12) बदरीनाथ भट्ट :-
इन्होंने सन 1982 में मिश्रबंधु विनोद, शिवसिंह सरोज इन ग्रंथों की सहायता से हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास से संबंध रखनेवाली 'हिंदी' नामक छोटी-सी पुस्तक लिखी है| इसमें हिंदी भाषा और साहित्य की रूपरेखा मात्र है|
13) श्री अखौरी गंगा प्रसाद सिंह -
इन्होंने सन 1983 में 'हिंदी के मुसलमान कवि' नामक ग्रंथ लिखा| इसमें 152 मुसलमान कवियों का जीवन चरित्र और काव्य संग्रह किया गया है| इसमें हिंदी साहित्य के इतिहास की एक रूपरेखा भी है| कवियों का क्रम ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार है| प्रारंभ में कवियों की जीवनी है, फिर उसकी कविता का अत्यंत ललित और सुंदर संग्रह है|
14) श्री गौरीशंकर द्विवेदी -
इन्होंने 1984 में 'सुकवि सरोज 'नामक ग्रंथ लिखा है| इसमें बलभद्र मिश्र, केशवदास, बिहारी लाल आदि 16 कवियों के प्रामाणिक जीवन-चरित्रों के साथ उनकी सुंदर रचनाओं का प्रकाशन किया है| कवियों का चुनाव सनाढ्य जाति से किया है|
15) आ. रामचंद्र शुक्ल -
इन्होंने सन 1929 में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रंथ लिखा| इस ग्रंथ का साहित्य के इतिहास की परंपरा में सर्वोच्च है| जो मूलत: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित शब्द सागर की भूमिका के रूप में लिखा गया है| आगे इसे परिवर्तित करके स्वतंत्र पुस्तक का रूप दिया गया है| इसमें इन्होंने संपूर्ण इतिहास को चार कालखंडों में विभाजित किया है| प्रत्येक काल का नामकरण किया है| यह नामकरण भी तत्कालीन काल की प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर किया है| आ. शुक्ल जी का काल विभाजन, वर्गीकरण, नामकरण सामन्य पाठकों की दृष्टि से अत्यंत सरल एवं स्पष्ट है|
आ. शुक्ल की इतिहासकार के रूप में सबसे बडी विशेषता है कि कवियों और साहित्यकारों के जीवन चरित संबंधी इतिवृत्त के स्थान पर उनकी रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन को प्रमुखता देना है| इसी प्रकार उन्होंने विभिन्न कालों एवं काव्य धाराओं की विशेषताओं एवं प्रवृत्तियों के उद्घाटन में भी अपनी सूक्ष्म एवं व्यापक दृष्टि का परिचय दिया है| फिर भी हमें यह न भूलना चाहिए कि उनके द्वारा इतिहास की रचना उस समय हुई थी जब कि हिंदी का अधिकांश प्राचीन साहित्य अज्ञात, लुप्त एवं अप्रकाशित अवस्था में पडा था| तथा जो प्राप्त भी था उसका प्रामाणिक अध्ययन विश्लेषन नहीं हो पाया| ऐसी स्थिति में स्वाभविक था कि इतिहास के जिस पक्ष का संबंध स्वतंत्र चिंतन एवं विवेचन शक्ति से था उसमें तो उन्हें पर्याप्त सफलता मिली, किंतु जिस पक्ष का संबंध इतिहास की आधारभूत सामग्री से था उसमें उन्हें अनेक स्थलों पर अनुमान एवं कल्पना से काम लेना पडा जिससे उनके तत्संबंधी कतिपय निष्कर्ष निराधार सिद्ध हुए और अनेक काव्य धाराओं, प्रवृत्तियों एवं रचनाओं को उनके इतिहास में यथोचित स्थान नहीं मिला| फिर इतिहास लेखन में शुक्ल जी का महत्व हमेशा रहेगा|
16) आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी -
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की शृंखला में आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के 'हिंदी साहित्य की भूमिका', हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास तथा हिंदी साहित्य का आदिकाल एक नविन दिशा को प्रस्तुत करता है| इनमें एक नविन दृष्टि, नूतन समग्री और अभिनव विवृत्ति है| आ. शुक्ल ने प्रत्येक युग के साहित्य की प्रवृत्तियों के निर्धारण में युगीन परिस्थिति को प्रमुखता दी जब कि आ. द्विवेदी ने इस देश की प्राचीन परंपराओं, इस देश के संस्कृति, शास्त्रीय एवं लोक परंपराओं के व्यापक संदर्भ में प्रत्येक युग के साहित्य का मूल्यांकन किया है| उदा. द्विवेदी जी ने यह सप्रमाण सिद्ध किया है कि हिंदी साहित्य में भक्ति का आंदोलन न तो निराशाजन्य परिस्थितियों का परिमाण है और न ही यह इस्लाम धर्म की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मा है बल्की भारत के दर्शन, धर्म व साधना का यह परिपाक है| इसके साथ इन्होंने मध्यकालीन साहित्य के स्त्रोतों और परंपराओं का गवेषणात्मक अध्ययन कर उनकी मानवतावादी दृष्टिकोन से स्थापना की है| वैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोन से देखा जाए तो किसी भी घटना, रचना या धारा की शुद्ध विकासवादी व्याख्या करने के लिए परंपरा और युग-स्थिति दोनों पक्ष ही विचारणीय है| इसीलिए जहां आ. द्विवेदी जी ने परंपरा पर बल किया है वहां शुक्ल जी ने युग स्थिति पर, अत: कहा जा सकता है कि दोनों के मत इस दृष्टि से एक-दूसरे के पूरक है|
17) डॉ. रामकुमार वर्मा -
आ. शुक्ल के बाद इतिहास लेखन में डॉ. रामकुमार वर्मा का नाम आता है| उन्होंने सन 1938 में 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' इतिहास ग्रंथ लिखा है| इसमें संवत 750 से 1750 वि. तक की कालावधि को ही लिया है| संपूर्ण ग्रंथ को सात प्रकरणों में विभक्त करते हुए सामन्यत: रामचंद्र शुक्ल के ही वर्गीकरण का अनुसरण किया है| इतना अवश्य है कि युगों व धाराओं के नामकरण में किंचित परिवर्तन करके उन्हें सरल रूप दे दिया है| जैसे- निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा, निर्गुण प्रेम मार्गी शाखा जैसे लंबे-लंबे नामों के स्थान पर संत काव्य, प्रेम काव्य आदि आसन नामों का प्रयोग किया है| शैली की सरसता व प्रवाहपूर्णता के कारण इनका इतिहास पर्याप्त लोकप्रिय हुआ है| परंतु यह इतिहास भक्ति काल तक ही सीमित है|
18) डॉ. गणपति चंद्र गुप्त -
इन्होंने सन 1965 में 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' लिखा है| नाम की तरह इसका लेख करते वक्त गुप्त जी ने तथ्यों का आधार लिया है| जिसमें विकासवादी सिद्धांत के मुख्य घटक निहित ह| जैसे- सर्जनात्मक व्यक्तित्व, परंपरा, वातावरण, द्वंद्व, संतुलन | इन सिद्धांतों के आधार पर ही साहित्य के रुपों एवं उसके प्रवृत्ति की व्याख्या की है| हिंदी साहित्य का प्रारंभ सातवीं शताब्दी हुआ ऐसा उनके दृष्टि से भ्रांति पूर्ण है| इनके दृष्टि से हिंदी साहित्य का प्रारंभ 11 वीं शताब्दी में सन 1184 में लिखित मुनि शालभद्र सूरी लिखित 'भरतेश्वर बाहुबली रास रचना से हुआ है| हिंदी काल विभाजन की सीमा में संशोधन होना आवश्यक बताया है| इस तरह भक्ति काल में केवल राम और कृष्ण ही भगवान नहीं रहे| अत: भक्तिकाल को पौराणिक प्रबंध काव्य परंपरा या पौराणिक गीत काव्य परंपरा कहा जाए ऐसा उन्हों ने सूचित किया है| इस प्रकार हिंदी साहित्य संबंधी नवीनतम सामग्री के आधार पर इतिहास लेखन को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास इन्होंने किया है| इसके लिए अनेक परंपरागत स्थापनाओं एवं मान्यताओं का खंडन करना पडा है|
19) बाबू श्यामसुंदर दास :-
इन्होंने सन 1987 में 'हिंदी भाषा और साहित्य' ग्रंथ लिखा है| इसमें हिंदी की प्रमुख धाराओं, उसके विकास और विस्तार का निरुपण किया है| इसमें लेखक और कवियों की कृतियों के उदाहरण नहीं है, उसका विवरण आवश्य है| सन 2001 में इसका परिमार्जित रूप प्रकाशित हुआ है| इसका मूल उद्देश्य ही था कि भिन्न-भिन्न काल की मूल वृत्तियों का वर्णन करना|
20) पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय-
उन्होने पटना युनिव्हार्सिटी में 'हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास पर भाषण दिया| इसमें भाषा और साहित्य पर पांडित्यपूर्ण आलोचना की गई है और इतिहास का विकास भी अच्छी तरह से दिया है|
21) रामशंकर शुक्ल 'रसाल' -
इन्होंने संवत 1988 में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिखा है| इसमें हिंदी साहित्य की सभी ज्ञातव्य बातों का परिचय दिया गया है| साहित्य प्रकाश, (1988) साहित्य परिचय (1988)
22) श्री कृष्ण शंकर शुक्ल -
संवत 1991 में 'आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा' है| इसमें भारतेंदु से पूर्व का इतिहास तो बडे ही संक्षिप्त रूप में दिया गया है, किंतु आधुनिक इतिहास का विवेचन विस्तारपूर्वक किया गया है| इस इतिहास में ग्रंथकार की अपनी कोई धारणा नहीं है| उसने विस्तार से प्रत्येक कवि के विषय में ज्ञातव्य बातें लिख दी हैं|
23) श्री गौरीशंकर सतेंद्र:-
संवत 1993 में 'साहित्य की झांकी' नामक पुस्तक लिखी| जिसमें उनके सात निबधों का संग्रह है| लेखन ने इन निबंधों में यह दिखलाने की चेष्टा की है कि हिंदी साहित्य में विकास की धारा है और उसमें काल और परिस्थितियों का पूर्ण सहयोग है|
24) पं राहुल सांकृत्यायन -
इन्होंने सन 1994 में 'पुरातत्व निबंधावली में हिंदी के प्राचीन साहित्य पर बडी खोजपूर्ण सामग्री प्रस्तुत की है| साथ इसमें जो निबंध संकलित है उसमें साहित्य और धर्म परंपराएं अध्ययन के साथ लिखी गयी है|
25) डॉ. इंद्रनाथ मदान -
इन्होंने संवत 1996 में अंग्रेजी में ' मॉडर्न हिंदी लिटरेचर' नामक ग्रंथ लिखा| यह पंजाब युनिवर्सिटी में पीएच. डी. के लिए स्वीकृत थीसिस है| इसमें आधुनिक साहित्य का संक्षिप्त अध्ययन प्रस्तुत किया है| विषय विवेचन वैज्ञानिक दृष्टिकोन से है|
26) श्री ब्रज रत्न दास :-
इन्होंने संवत 1998 में 'खडीबोली हिंदी साहित्य का इतिहास' ग्रंथ लिखा| इसमें राष्ट्रभाषा हिंदी को तथा उसमें प्राप्त साहित्य को लेकर ही ऐतिहासिक दृष्टिकोन से विषय-विवेचन किया गया है|
27) श्री भुवनेश्वर नाथ मिश्र -
इन्होंने संवत 1999 में 'संत साहित्य पुस्तक लिखकर हिंदी साहित्य की निर्गुण धारा का स्पष्टीकरण किया है| इसमें महत्मा कबीर से लेकर स्वामी रामतीर्थ तक के प्राय: सभी निर्गुनोपासक संतो की अध्यात्मिक तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों की विवेचना की गयी है| इसमें आलोचना कम भावना अधिक है|
इसके अतिरिक्त अनेक इतिहाकारों ने हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन किया हैं| यहां उनका और उनके इतिहास ग्रंथ नाम्मोलेख किया गया है|
1) डॉ. धीरेंद्र वर्मा- आधुनिक हिंदी साहित्य
2) डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय - आधुनिक हिंदी साहित्य- सं. 1998
3) डॉ. कृष्ण लाल - आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास - 1999
4) श्री नंददुलारे वाजपेयी- हिंदी साहित्य - बीसवी शताब्दी 1999 हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
5) डॉ. माता प्रसाद गुप्त - संवत- 2002 'हिंदी पुस्तक साहित्य'
6) डॉ. नगेंद्र - रीति काव्य की भूमिका -
7) पं विश्वनाथ प्रसाद मिश्र- हिंदी साहित्य का अतीत
8) डॉ सुमन राजे - साहित्येतिहास: संरचना एवं स्वरूप -
9) डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी- आदिकालीन हिंदी साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
10) डॉ. शिवकुमार मिश्र- हिंदी साहित्येतिहास के सिद्धांत
11) डॉ. शम्भूनाथ सिंह- हिंदी साहित्य की सामजिक पृष्ठभूमि
12) डॉ. वासुदेव सिंह - हिंदी साहित्य का उद्भव काल
13) श्री रामनरेश त्रिपाठी- हिंदी का संक्षिप्त इतिहास
14)श्री रमाशंकर प्रसाद- हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
15) श्री मुन्शी राम वर्मा- हिंदी साहित्य के इतिहास का उपोदघात
16) श्री गणेश प्रसाद द्विवेदी - हिंदी साहित्य
17) बाबू गुलाब राय - हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास - 1989
18) डॉ. न गेन्द्र- हिंदी साहित्य का इतिहास / हिंदी वांगमय बीसवी शताब्दी
19) डॉ बच्चन सिंह- आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास
20) प्रो. राम स्वरूप चतुर्वेदी - हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास आदि |
इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा को प्रवर्तित हुए लगभग सवा सौ वर्ष ही हुए हैं किन्तु इस लघु अवधि में भी इसने प्रत्येक दृष्टि से संतोषजनक प्रगति कर ली है। विशेषतः इतिहास-लेखन के सिद्धान्तों, दृष्टि-कोणों एवं विचारों की दृष्टि से तो हिन्दी के लेखकों ने बहुत-कुछ नूतन अनुसंधान ही किया है जिसे अन्य भाषाओं के साहित्येतिहासकार भी अपना सकते हैं। इतिहास-लेखन की विभिन्न पद्धतियों एवं विधियों की भी नियोजना हिन्दी के क्षेत्र में सफलतापूर्वक हुई है। फिर भी ज्यों-ज्यों साहित्य-लेखन की परम्परा आगे बढ़ती जाती है तथा साहित्यानुसंधान के क्षेत्र में नये-नये तथ्यों का उद्घाटन होता जा रहा है त्यों-त्यों इतिहासकार का भी कार्य बढ़ता जा रहा है। वस्तुतः अतीत की प्रौढ़ परंपराओं, वर्तमान की स्वस्थ प्रवृत्तियों तथा भविष्य की सुन्दर योजनाओं में सामंजस्य स्थापित करने का उत्तरदायित्व इतिहासकार पर ही रहता है, अतः उसके कार्य एवं महत्त्व की कोई सीमा नहीं है।
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