रीढ - गुलजार

 रीढ - गुलजार 

कविता का आशय 

'रीढ़' कविता कुसुमाग्रज द्वारा लिखित 'प्रवासी पक्षी' कविता संग्रह में संकलित है। यह मूलतः मराठी भाषा में लिखी कविता है, मराठी में इसका शीर्षक है 'कणा'। हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार गुलजार जी ने इस कविता का अनुवाद हिंदी में 'रीढ़' शीर्षक से किया है। इस कविता में गुरू-शिष्य की परंपरा का चित्रण है, साथ ही संकट आने पर उसका डंटकर मुकाबला करने की सिख इस कविता के माध्यम से मिलती है। कविता में चित्रित छात्र बरसों बाद अपने गुरूजी के पास चला जाता है और बाढ़ की वजह से उसका सब कुछ तबाह होने की व्यथा सुनाता है। उसकी व्यथा बहुत ही प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत की गई है।

 'रीढ़' कविता का आशय :

बारिश में कोई आ गया और बोला, 'सर मुझे पहचाना क्या? उसके कपड़े मुचड़े हुए और सब बाल भीगे हुए थे। वह अंदर आकर बैठ गया और हँसते हुए ऊपर देखकर बोलने लगा कि गंगा मैया मेहमान बनकर आई थी और कुटिया में रह कर गई। माइके आई हुई लड़की की मानन्द चारों दीवारों पे नाची, परंतु वापस जाते वक्त खाली हाथ नहीं गई तो घर में जो कुछ था सब बहाकर लेकर गई। सिर्फ पत्नी बच गई, चुल्हा बुझ गया, दीवारें ढह गई, जो था नहीं था सब कुछ बह गया। प्रसाद के रूप में पलकों के नीचे पानी के चार कतरे रख गई है।

सर, मैं और मेरी पत्नी लड़ रहे हैं, मिट्टी कीचड़ फेंक कर दीवार उठा कर आ रहा हूँ। उसकी व्यथा सुनने पर सर जी का हाथ जेब की ओर गया कि वह हँसकर उठकर बोला कि सर मुझे पैसे नहीं चाहिए। घर-परिवार खोने के कारण बहुत अकेला लग रहा था, जरूर मेरा घर टूट गया लेकिन रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी। आप सिर्फ इतना करिये कि आपका हाथ मेरे पीठ पर रखिए और कहिए की बस सिर्फ लड़ते रहो।

'रीढ़' कविता का सरल भावार्थ या आशय इस प्रकार लिखा जा सकता है, बारिश के दिनों में एक पूर्व छात्र अपने गुरूजी के घर चला जाता है। बारिश के कारण उसके कपड़े मुचड़े हुए और बाल भीगे हुए हैं। वह बोलता है कि सर मुझे पहचाना क्या? ऐसा कहकर, ऊपर देखते, हँसकर बोलने लगा कि नदी गंगा मैया

में बाढ़ आ गई, एक मेहमान बनकर कुटिया में रही, पहली बार माइके आए लड़की तरह उछल-कूद की। वापस जाते वक्त यही बाढ़ खाली हाथ नहीं गई तो मेरा सबकुछ ध्वस्त करके चली गयी, सिर्फ पत्नी और मैं बच गया। हमारे ऊपर छत भी नहीं बची। इसी कारण सिर्फ हमारे आँखों में आँसू बचे हैं। मैं और मेरी पत्नी मिट्टी, कीचड़ फेंककर, दीवार खड़ी करने का प्रयास कर रहे हैं। छात्र की व्यथा कथा सुनने के बाद गुरूजी को लगता है कि शायद यह आर्थिक मदद चाहता है। इसी समय वे अपना हाथ अपनी जेब की ओर बढाते हैं, इतने में छात्र कहता है कि नहीं, मुझे पैसे नहीं चाहिए। मेरा सबकुछ नष्ट होने पर मुझे बहुत अकेला लग रहा था। मेरा घर टूट गया लेकिन मेरी रीढ़ की हड्‌डी नहीं टूटी है, आप सिर्फ पीठ पर हाथ रखकर कहिए की लड़ते रहो, यही मेरी अपेक्षा है। मतलब गुरूजी का आशीर्वाद साथ है तो छात्र किसी भी संकट का सामना कर सकता है।


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