भाषा परिवर्तन के कारण

 भाषा परिवर्तन के कारण 

        भाषा के परिवर्तनशीलता के कारण 

        भाषा की परिवर्तनशीलता से तात्पर्य है 'भाषा का विकास' लेकीन यहां इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि भाषा विकास यानी भाषा का उंची होना नहीं हैं| बल्की विकास का अर्थ केवल आगे बढना नहीं है| भाषा परिवर्तन हमेशा कठीणता से सरलता की ओर होता है| भाषा के विकास पर अनेक विद्वानों ने  विचार प्रस्तुत किए है| जिसमें पतंजलि, वामन, कात्यायन, पाल, स्टूर्टवेंट या येस्पर्सन आदि| परंतु इस विषय पर गर्भिता और व्यवस्थित रूप से विचार करनेवाले प्रथम व्यक्ति डैनिश विद्वान जे. एच. ब्रेड्सडार्फ है| अत: भाषा परिवर्तन के कारणों को दो वर्गों में विभाजित किया हैं| 

      1) आंतरिक (अभ्यंतर) 

      2)  बाहरी  

 1) आंतरिक (अभ्यंतर)  :-

    इन्हें भितरी कारण भी कहा जाता है| इस वर्ग के अंतर्गत भाषा की अपनी स्वाभाविक गती के साथ साथ वे भी कारण सम्मिलित है, `जो प्रयोगता की शारीरिक या मानसिक योग्यता आदि संबंधित स्थिति से संबंध रखते है| संक्षेप में जो कारण भाषा की प्रकृति या स्वरूप से संबंधित हीं उन्हें अभ्यंतर कारण कहा जाता है| इस वर्ग के अंतर्गत आनेवाले कुछ प्रधान कारण इस प्रकार- 

1) प्रयत्न लाघव 

2) अधिक प्रयोग 

3) बलाघात 

4) अनुकरण की अपूर्णता 

5) मानसिक योग्यता 

6) जानबुझकर परिवर्तन 

7) भाववेश/ भावातिरेक 

8) जातिय मनोवृत्ति 

9) असावाधानी 

10) सादृश्य 

1) प्रयत्न लाघव:-

    भाषा में विकास या परिवर्तन उपस्थित करनेवालों में यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है| इसे 'मुख सुख' भी कहते है| कठीणता से सरलता जाना मानव की स्वबह्विक वृत्ति हैं| सरलता की यह प्रवृत्ति उसके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देती है, जिसे प्रयत्न लाघव कहा जाता है| मनुष्य कम से कम प्रयत्न से शब्द को उच्चारित करना चाहते है| इस प्रयत्न में कभी शब्दों को बडा तो कभी शब्दों को छोटा बना डालता है| तो कभी संयुक्त व्यंजनों को सरल कर देते है| जैसे कृष्ण का कन्हैया, भक्त का भगत, धर्म-धरम आदि| अंग्रेजी में KNOW का उच्चारण NOW, KNIFE का उच्चारण NIFE उसी का परिणाम है| सरलता के लिए कुछ छोटे कर लिए जाते है| जैसे उपाध्याय का झा, मास्टर साहब का मास्साब, पंडित जी से पंडिजी आदि| कुछ शब्द सरल बनाने के लिए बडे किए जाते है| जैसे- प्रसाद- परसाद, स्कूल-इस्कुल, स्त्री-इस्त्री आदि| इस प्रकार संक्षेप का प्रयोग प्रयत्न लाघव की दृष्टि से किया जाता है| 

2) अधिक प्रयोग- 

    परिवर्तन का यह कारण भाषा में स्वाभाविक विकास ला लेता है| अधिक प्रयोग के कारण धीरे-धीरे अन्य सभी चिजों की भान्ति भाषा में स्वाभाविक रूप से परिवर्तन होता है| संस्कृत की कारकीय विक्तियां इसी प्रकार धीरे-धीरे घिसते-घिसते समाप्त हो गयी| जिसके फल स्वरूप हिंदी भाषा में पर सर्गों की आवश्यकता पडी| जैसे- राम: के स्थान पर राम ने, रामस्य के स्थान पर राम का जैसे नए रूप इसिका परिमाण हैं| 

3) बलाघात :-

    भाषा के परिवर्तन का बलाघात भी एक मुख्य कारण है| 'बलाघात' से तात्पर्य है किसी व्यंजन, स्वर, शब्द पर बोलते समय अधिक बल देना| बलाघात के कारण स्वर या व्यंजन परिपूर्ण रूप से गायब हो जाते है| यह परिवर्तन ध्वनि और अर्थ दोनों में देखा जा सकता है| जैसे  निम का निंब होना, अभ्यंतर का भीतर होना| अंग्रेजी शब्द HISTORY शब्द में 'S' पर बलाघात होने से k के बाद आनेवाला स्वर निर्बल हो जाता है| फलस्वरूप इस शब्द का उच्चारण हिसस्टोरी न होकर हिस्ट्री हो गया| Important, Conduct ऐसे ही शब्द है| 

    ध्वनि की भान्ति अर्थ में भी बलाघात काम करता है| जैसे- 'जुगुप्सा'  शब्द अर्थ परिवर्तन इसका अच्छा उदाहरण है| यह शब्द 'गुप' धातु से बना है| जिसका आरंभ का अर्थ रक्षा करना या पालन करना है| रक्षा या पालन छिपाकर भी किया जाता है| अत: इसमें छिपाने का भाव आ गया| कुछ दिनों में यही भाव प्रधान हो गया| अधिकतर वही क्रियाएं या वस्तुएं छिपाई जाती है, जो घृणित होती है| अत: घृणा शब्द के लिए यह शब्द चल पडा| आज जुगुप्सा शब्द का प्रयोग घृणा के लिए होता है| 

    इस प्रकार 'राम ने श्याम को दंडे से मारा' यह सामन्य वाक्य है इस वाक्य में राम पर बल देने से अर्थ होगा राम ने मारा अन्य किसी ने नहीं| श्याम को शब्द पर बल देने से अर्थ होगा श्याम को मारा अन्य किसी को नहीं| दंडे पर बल देने से अर्थ होगा दंडे से मारा किसी और चीज से नहीं| 

4) अनुकरण की अपूर्णता:-

    भाषा की विशेषताओं के अंतर्गत हम देख चुके है कि भाषा अर्जित संपत्ति है| मनुष्य उसका अनुकरण समाज से करता है लेकिन यह अनुकरण हर समय पूर्ण ही होता|ऐसा नहीं कभी-कभी अनुकरण कर्ता अनुकरण करते समय या तो कुछ भाषिक तथ्यों को छोड देता है या फिर कुछको अपनी ओर से अनजाने में ही जोड देता है| शारीरिक विभिन्नता ध्यान की कभी अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण अनुकरण अपूर्ण रह जाता है| जैसे देश का देस, क्षेत्रीय का छत्री आदि| कुछ विदेशी शब्द भी अज्ञान या अशिक्षा के कारण क्या से क्या हो गए हैं| जैसे- लायब्ररी का लायब्रोरी टाईम का टेम आदि| अनुकरण की अपूर्णता क्रमश: एक पीढी से दूसरी पीढी में बढती है| 

5) मानसिक योग्यता :-

    जिस प्रकार मनुष्य के विभिन्न सामाजिक स्तर होते है, उसी प्रकार अनेक मानसिक स्तर भी होते है| मनुष्य के इस मानसिक स्तर की भिन्नता का प्रभाव उसके द्वारा प्रयुक्त शब्दों पर भी होता है| बोलनेवालों के मानसिक स्तर में परिवर्तन होने से विचारों में परिवर्तन होता है| विचारों में परिवर्तन होने से अभिव्यंजना में परिवर्तन होता है और उसका का प्रभाव भाषा पर भी पडता है| भाषा का यह परिवर्तन विशेष रूप से शब्दों के अर्थ में देखने को मिलता है| पर कभी-कभी ध्वनि पर भी इसका असर देखा गया है| ठक्कर नामक भाषा वैज्ञानिक ने शब्दों के संबंध में ठीक ही कहा है कि :शब्द एक प्रकार का सिक्का है जिसका मूल्य निश्चित नहीं है| सुननेवाले की मानसिक योग्यता के अनुसार उसका अर्थ घटता- बढता रहा है| जैसे- 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ एक दार्शनिक के लिए और एक सामान्य मनुष्य के लिए अलग-अलग हो सकता| 

6) जान बुझकर परिवर्तन :-

    कभी-कभी भाषा के प्रयोग कर्ता भाषा में जान बुझकर भी परिवर्तन कर देते है| यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उस भाषा के लेखक आदि वर्ग में पाए जाते है| कभी वे शब्दों का नया प्रयोग करके उसे विलक्षण रूप देना चाहते है| और तभी ज्ञान प्रदर्शन की लालसा से भी शब्दों में परिवर्तन कर देते है| वस्तुत: यह परिवर्तन स्वाभाविक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता| हिंदी के प्रसिद्ध जयप्रकाश शंकर ने अलेक्झांडर का अलक्षेंद्र कर दिया है| कभी-कभी उपयुक्त शब्द न मिलने पर लोग जान बुझकर किसी मिलते जुलते शब्द का प्रयोग कर देते है| जैसे- ट्रेजेडी का त्रासदी, क्मेडी का कामदी आदि| अभिव्यक्ति में चमत्कार या नवीनता आदि लाने के लिए कलाकारों द्वारा निरंकुश प्रयोग भी भाषा में इस प्रकार का परिवर्तन ला देता है|

7) भावावेश या भावातिरेक:-

    मनुष्य विचारशील होने के साथ-साथ भावुक भी है| यही कारण है कि विशेष परिस्थिति में वह भावावेश या भावातिरेक की यह स्थिति उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा पर भी प्रभाव डालति है और भाषा में परिवर्तन लाती है| प्रेम, क्रोध, घृणा, दु:ख आदि भावों के अतिरंक से शब्दों का रूप बदल जाता है जैसे बाबू- बबुआ, बच्चा का बचवा, बेटी का बेटियां,कृष्ण का किसनवा, देवर का देवरवा  आदि| 

8) जातिय मनोवृत्ति :-

    हर जाति की अपनी मनोवृत्ति होती है| और भाषा उसके अनुसार परिवर्तित होती है| इसीकरण एक हि भाषा दो या अधिक प्रकार से विकसित या परिवर्तित होती है| जिन जातियों में कोमलता या सिंग्धता होती है| उनकी भाषा मधुर होती है| जिन जातियों में दृढता तथा सबलता होती है| उनके भाव कठोर होते है| जैसे जर्मन जाति की कठोरता और सबलता का प्रमाण उनकी भाषा में प्रतिबिंबित होता है| तो फ्रान्सीसी भाषा की कोमलता और कलाप्रियता का प्रमाण फ्रान्सीसी भाषा में दिखाई देता है| 

9) असावाधानी :-

    मनुष्य के स्वभाव में असवधानी पायी जाती है| इस असावाधानी के कारण भी कभी-कभी भाषा में परिवर्तन हो जाता है| जैसे मतलब का मतबल, लखनौव का लखनव, चाकू का काचू, बंदूक का द्मबुक, पुलिस का पुसिल आदि| प्रयोग प्रभाव में आ जाने के कारण धीरे-धीरे यही विकृत शब्द भाषा में स्थान पाने लगते है| 

10) सादृश्य:- 

    जब मनुष्य किसी शब्द प्रयोग को देखकर उसके मूल आधार का पता लगाये बिना उसी के समान दूसरा शब्द गढ लेता है| तब वह  साहित्य के अंतर्गत आता है, वह वह सादृश्य के अंतर्गत आता है, यह सादृश्य प्रयोगता के अज्ञानता का परिणाम होता है| कुछ भाषा वैज्ञानिक इसे मिथ्या सादृश्य भी कहते है|  जैसे- सृष्टि के सादृश्य स्रष्ठा, के स्थान पर सृष्ठा गढ  लेते है| उसी प्रकार दृष्टा शब्द का निर्माण भी दृष्टि के सादृश्य पर हुआ है| जब कि सही शब्द है दृष्टा| अंग्रेजी में Shall, Will में 'L' रहने से 'Should', 'Would' के सादृश्य 'Could' में भी 'L' आ गया| इस प्रकार पैतींस के सादृश्य 'सैन्तीस' पर अनुनासिकता आ गयी| संस्कृत में द्वादश के सादृश्य एकादशी का दश हो गया | देहात से देहाती के सादृश्य पर शहर से शहराती हो गया है आदि|   

आ) बाहरी कारण:-

    बाहरी या बाह्य वर्ग के अंतर्गत वे कारण आते है, बाहर से भाषा को प्रभावित करते है| ये वातावरण सापेक्ष होते है| इस वर्ग के अंतर्गत आनेवाले प्रधान कारण इस प्रकार है| -

1) व्यक्तिगत प्रभाव -

    महान व्यक्तियों का भाषा के विकास पर प्रभाव  पडता है| कभी-कभी ऐसे युग पुरुष उत्पन्न होते है, जो अपने व्यक्तिओं से भाषा की गतिविधी को बहुत दूर तक प्रभावित कर देते है| गोस्वामी  तुलसीदास ने उत्तर भारत की भाषा, समाज एवं धर्म सभी को ऐंतेष्ठ प्रभावित किया है|  परिणाम स्वरूप उनके बाद की कविता की शैली भी उनसे प्रभावित हुई है| इसी प्रकार गांधीजी के कारण हिंदी की हिंदी उर्दू मिश्रित  हिंदुस्थानी शैली को काफी बल मिला था| मराठी में लोकमान्य तिलक का व्यक्तित्व भी ऐसा ही था| जर्मनी में मार्टिन ल्युथर ने जर्मनी भाषा को एक वारखी से कहा से कहा पहुंचा दिया| इसतरह भाषा के विकास में महिमाशाली व्यक्तिओं का प्रभाव अनुपेक्षणीय हो जाता है| 

2) सामजिक प्रभाव:- 

        मनुष्य एक सामजिक प्राणी है|और उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा एक सामजिक संपत्ति है| जहां मनुष्य का समाज से घनिष्ठ संबन्ध है| वही उसकी भाषा भी समाज से अभिन्न रूप से जुडी हुई है| जब किसी समाज के अंतर्गत दूसरे समाज लोग आकर रहने लगते है, तब वे अपनी बोली तथा भाषा से धीरे-धीरे उस समाज की बोली एवं भाषा को प्रभावित करते है| अरबी, फारसी, अंग्रेजी, आदि भाषा भाषाओं का जब हिंदी भाषा का संपर्क हुआ तब उन भाषाओं के बहुत से शब्दों को हिंदी भाषा ने ग्रहण किया है| जैसे- अरबी, फारसी के पायजामा, बाजार, दुकान, कागज, कलम, किताब, तकिया, रजा आदि| अंग्रेजी के पेन, टेबल, पेन्सिल, कम्प्युटर आदि ऐसे हजारों शब्द सामजिक प्रभाव के कारण ही हिंदी भाषा में प्रयुक्त हो रहे है| 

3) धार्मिक प्रभाव:-

        व्यक्तिगत और सामजिक प्रभाव की तरह धर्म भी भाषा पर प्रभाव डालता हैं| जिससे भाषा में परिवर्तन होता है| जब एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायिओं के संपर्क में आते है तब उनमें परस्पर एक दूसरे के धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान होता है, साथ ही एक दूसरे के धार्मिक शब्दों का भी प्रभाव पडता है| इस प्रकार धार्मिक शब्दों को अपनाने से भी भाषा में परिवर्तन आ जाता है| वैदिक धर्म को मनानेवाले आर्यों का संपर्क जब युननिओं से हुआ तब युनान देश के लोगों ने वैदिक देवताओं के नाम ग्रहण किए इन नामों का प्रयोग जब युनानी भाषा में हुआ तब इन शब्दों में काफी परिवर्तन हुए| जैसे- देव का देवोस, असूर-अहूर, सोम का होम, सिंधू का हिंदू आदि| हिंदी भाषा भी जब इस्लाम और इसाई धर्म के प्रचारों के संपर्क में आए तब अरबी,  फारसी, फ्रेंच, अंग्रेजी आदि भाषाओं के धार्मिक शब्दों को उसने ग्रहण किया है| जैसे अल्लाह, मस्जिद, गिरजा आदि| इस प्रकार धार्मिक प्रभाव के कारण भी भाषा में परिवर्तन हुआ करता है| 

4) राजनीतिक प्रभाव:-

    भाषा को राजनीति भी अत्याधिक प्रभावित करती है| दुनिया के इतिहास में यह देखा गया है कि जब आक्रमणकारी किसी स्थान विशेष पर आक्रमण करते है, तो उस स्थान विशेष की सामाजिक स्थिति को प्रभावित करने के साथ-साथ उस स्थान की भाषा से उस स्थान की भाषा प्रभावित होकर परिवर्तित होती है| लेकिन शब्दों का यह आदान-प्रदान एकांगी नहीं होता| दोनों भाषाएं एक-दूसरे से प्रभावित होती है| जैसे भारत में संस्कृत के प्रचार-प्रसार के समय जब हून आदि जातियों का भारत में आगमन हुआ और यहां की राजसत्त्ता उनके हाथों में आई तब संस्कृत के शब्दों में भी परिवर्तन होने लगा| जैसे- धर्म का धम्म, कर्म का कम्म आदि| इसी प्रकार आगे जब मुसलमान आक्रमणकारियों के हाथों में राजसत्ता आयी तब उनके कारण हिंदी भाषा में परिवर्तन हुआ और तुर्की, फारसी आदि भाषाओं के ढेर सारे शब्दों को हिंदी भाषा ने ग्रहण किया| जैसे- अरबी, भाषा के शब्द- किताब, तावीज, रजाई, कागज, दुकान, हवा आदि| फारसी भाषा के शब्द इस प्रकार- इनाम, इमान, कदम, मैदान, फुरसत,आदि|  तुर्की भाषा के शब्द कैची, गालीचा, दरोगा, बह्दूर, सौगात, कुली आदि| इसी प्रकार बाद में अंग्रेजों के संपर्क से ऑफिस,स्कूल, कॉलेज, पेन, टेबल आदि| अंग्रेजी शब्दों का हिंदी भाषा में प्रयोग राजनीतिक प्रभाव के कारण ही है| 

5) सांस्कृतिक प्रभाव :-

    संस्कृति समाज का प्राण है|  अत: उसका भी प्रभाव भाषा पर पडता है| और उसके कारण भाषा में परिवर्तन होता है| जब-जब समाज में सांस्कृतिक आंदोलन होते है, भाषा स्वत: विकास के पथ पर आगे बढती है| भारत में आर्य समाज, बौद्ध मत, जैन मत आदि के आविर्भाव के साथ-साथ भाषा का आग्रह स्वाधीनता संग्राम से प्रेरित सांस्कृतिक जागरण का ही अन्यतम परिणाम है| स्वदेशी आंदोलन ने प्रत्येक स्वदेशी वस्तु के प्रति मनुष्य मन में प्रेमभाव जगाया है| इस सांस्कृतिक जागरण के कारण ही भाषा के स्वरूप में बडा क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है| हिंदी का शब्द भंडार संस्कृत बहुल हो गया| जैसे सत्याग्रह, आंदोलन आदि शब्द प्रयुक्त होने लगे|

6) भौगोलिक प्रभाव :-

    भाषा के परिवर्तन में भौगोलिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जलवायु का प्रभाव मनुष्य के शारीरिक गठन पर ही नहीं होता तो उसके चरित्र और ध्वनि पर भी पडता है| प्रत्येक देश की अपनी विशिष्ठ भौगोलिक स्थिति होती है| किसी स्थान की जलवायु उष्ण होती है, किसी स्थान की शितल तो किसी स्थान की शितोष्ण| जलवायू की इस विभिन्नता का प्रभाव उस स्थान के लोगों की भाषाओं पर भी पडता है| जिस प्रदेश की जलवायु उष्ण होती है वहां के लोगों का वाग्यांत्र अधिक खुला होता हैं| अत: उनके विचार स्पष्ट एवं मुखर होते है| इसके विपरित जिन प्रद्शों की   जलवायु शीत प्रधान होती है वहां के निवासियों का वाग्यांत्र अधिक खुल नहीं पाता इसीकारण उनके उच्चारण में अधिक स्पष्टता नहीं होती| जैसे- इंग्लंड आदि प्रदेशों में शीत प्रधान जलवायु के कारण लोग उच्चारण ठीक से नहीं कर पाते| जैसे- तोताराम को टोटाराम, तुम्हारा को टुमारा आदि|

7) वैज्ञानिक प्रभाव :-

    वर्तमान युग विज्ञान का युग है| विज्ञान ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है| विज्ञान के प्रभाव से भाषा में भी परिवर्तन हुए है| अत: भाषा संबंधी परिवर्तन के कारणों पर विचार करते समय विज्ञान की उपेक्षा करना उचित नहीं होगा| विज्ञान की विभिन्न शाखाओं ने पिछाली दो शताब्दीयों में अकल्पनीय प्रगति की है| जिसके कारण असंख्य नयी वस्तुओं का अविष्कार हुआ है| इन नई वस्तुओं के नामकरण की आवश्यकता के हजारों नए शब्द गढने पडे हैं| जिनसे भाषा अत्याधिक समृद्ध हुई है|   सामान्य रूप सेव जितने शब्द शताब्दियों में नहीं बन पाते उतने वर्षों में बन गए है| जैसे टेलीफोन, टेलीग्राम, ध्वनिमुद्रण आदि| 

इस विज्ञान का चमत्कार ही कहेगे कि प्रौद्योगिकी का विकास तेजी से हो रहा है| प्रौद्योगिकी वह माध्यम है जिसके द्वारा विज्ञान के ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करके नए उपकरण, मशीनें, सॉफ़्टवेयर और सेवाएँ विकसित की जाती हैं। जिसके फल स्वरूप भाषा का भी रूप बदल रहा है इसमें नए- नए शब्द आ गये है| जैसे - कंप्यूटर, स्मार्टफ़ोन, इंटरनेट, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आदि|  

    इस प्रकार भाषा में आंतरिक (अभ्यंतर) और बाह्य (बाहरी) कारण प्रभाव डालते है| 



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ