विद्यापति का परिचय
हिंदी के आदिकालीन कवियों में विद्यापति का असाधारण स्थान है| 'मैथिल कोकिल' उपाधि से विख्यात विद्यापति संस्कृत, प्राकृत और मैथिल भाषा के विद्वान थे| उन्होंने मैथिली, संस्कृत और अवहट्ट भाषाओं में विविध ग्रथों की रचना करके हिंदी साहित्य समृद्ध और संपन्न किया है| उनके व्यक्तित्व और जीवन संबंधी विद्वानों में मतभिन्नता है| फिर भी विद्यापति हिंदी के अजरामर कवि बन चुके है| जिनका सामान्य परिचय इस प्रकार-
1) जीवनवृत्त -
विद्यापति का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के अंतर्गत स्थित विपसी ग्राम में सं. 1425 में हुआ| उनके संबंध में एक बात प्रसिद्ध है कि ग्राम मिथिला के महाराज शिवसिंह ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर उन्हें 'अभिनव जयदेव' की उपाधि से विभूषित किया था| विद्यापति एक प्रतिभासंपन्न कवि थे| उन्हें यह प्रतिभा परंपरा से प्राप्त हुई थी| उनके पिता गणपति ठाकूर संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान और विख्यात संत जयदत्त के पुत्र थे| उनका परिवार सुसंस्कृत था| उनके पूर्वज संस्कृत और मैथिली भाषा के कवि थे| इसप्रकार उन्होंने अपनी परंपरा को आगे विकसित किया और एक श्रेष्ठ कवि के रूप में विख्यात हुए|
विद्यापति के जन्म के बारे में विद्वानों में मतभिन्नता पाई जाती है| श्री नगेंद्रनाथ गुप्त के अनुसार उनका जन्म 1358 में माना जाता है| डॉ. उमेश मिश्र के अनुसार 1361 माना जाता है| कुछ अन्य विद्वान 1360, 1357 इस प्रकार भी मानते है तो इस [प्रकार 1357 - 1359 के बीच उनका जन्म माना जाता है|
मैथिल कोकिल विद्यापति राजाश्रित कवि थे| उन्होंने अनेक राजघराणों से अपना घनिष्ठ संबंध बनाए रखा था| फिर भी उनके प्रिय आश्रयदाता राजा शिवसिंह और राजा कीर्तिसिंह माने जाते है| यद्यपि अपनी पदावली में राजा शिवसिंह और उनकी पत्नी लखिमा देवी का उल्लेख विस्तार से किया है| और उनके प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है| शिवसिंह के युध्द मारे जाने के पश्चात मिथिला में अराजकता निर्माण हुई| तब लखिमा देवी और राज परिवार के लोगों को विद्यापति ने ही सहायता की| वे एक आदर्श मित्र थे उनकी आदर्शवादिता को देखते हुए डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखा है, " विद्यापति वास्तव में धनलोलुप कवि नहीं थे| वे युद्ध विपत्ति और निर्धनता में भी अपने आश्रय दाता का साथ निभानेवाले एक आदर्श पुरुष थे|"
2) व्यक्तित्व :-
विद्यापति का व्यक्तित्व नाना प्रकार की परस्पर विरोधी विचार- धाराओं का स्तबक है| यह तत्कालीन युग का ही परिमाण है| विद्यापति वस्तुत" संक्रमण काल के प्रतिनिधि कवि है, वे दरबारी होते हुए भी जन कवि है, शृंगारिक होते हुए भी भक्त है, शैव, शाक्त या वैष्णव कुछ भी होते हुए भी वे धर्म निरपेक्ष है संस्कारी ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने पर भी विवेक, संत्रस्त या मर्यादावादी नहीं है| इस प्रकार का विद्यापति का व्यक्तित्व अत्यंत गुंफित और उलझा हुआ है| वे दर्शन, न्याय आदि प्रकांड पंडित थे| वे सौंदर्य उपासन कवि थे| उनका व्यक्तित्व बहुमुखी रहा है| उसमें पांडित्य, कला,रसिकता और भावुकता का अद्भुत समन्वय है|
3) कृतित्व:-
विद्यापति एक महान पंडित थे| भाषा की दृष्टि से उनकी रचनाओं को तीन भागों में विभाजित कर सकते है-
1) संस्कृत की रचनाएं -
2) शैव सर्वस्वसार 2) शैव सर्वस्वसार प्रमाणभूत पुराण संग्रह 3) भूपरिक्रमा 4) पुरुष परीक्षा 5) लिखनावली 6) गंगा वाक्यावली 7) दान वाक्यावली 8) विभाग सार 9) गया पत्तलक 10) वर्ण कृत्य 11) दुर्गा भक्ति तरंगिणी
2) अवहट्ट भाषा की रचनाएं -
1) कीर्तिलता 2) कीर्तिपताका
3) मैथिली भाषा की रचना - पदावली
1) कीर्तिलता और कीर्तिपताका
यह वीर रस के ग्रंथ है| इनमें महाराज कीर्तिसिंह की वीरता का वर्णन है| इन दो ग्रंथों का महत्व हिंदी साहित्य में दो कारणों से है| -
अ) ऐतिहासिक महत्व - कीर्तिलता और कीर्तिपताका का ऐतिहासिक दृष्टि से महत्व है| तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों का पूर्ण प्रतिबिंब इनमें है| ऐतिहासिक तथ्यों को कवि ने विकृत होने नहीं दिया है| कीर्तिसिंह की वीरता के वर्णन में आदिकालीन कवियों की तरह अतिशयोक्ति से काम नहीं लिया है|
2) भाषा विकास की दृष्टि से -
भाषा संबंधी परिवर्तन समझने के लिए इन ग्रंथों का महत्व है| इनमें अपभ्रंश और हिंदी के बीच की भाषा का प्रयोग हुआ है| इसे 'अवहट्ट भाषा' कहा जाता है| अपभ्रंश से हिंदी का विकास कैसे हुआ यह देखने के लिए अव हट्ट भाषा महत्वपूर्ण है|
2) विद्यापति की पदावली
हिंदी साहित्य में विद्यापति की अक्षय कीर्ति का आधार-स्तंभ उनकी पदावली है| पदावली में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं का मधुर और सरस शैली में गान है| संस्कृत कवि जयदेव के 'गीत गोविंद' को आधार बनाकर विद्यापति ने मधुर पदों की रचना की है| अत: विद्यापति को जयदेव का अवतार कहा जाता है| जिसके कारण उन्हें 'अभिनव जयदेव' की उपाधि दी जाती है| पदावली का मुख्य विषय शृंगार वर्णन है| उन्होंने शृंगार के दोनों पक्षों का चित्रण किया है - संयोग और वियोग| संयोग पक्ष का वर्णन अतिशय रमणीय है| संयोग पक्ष के वर्णन में विद्यापति को जितनी सफलता मिली है, उतनी वियोग पक्ष के बर्णन में नहीं मिली| इसीलिए कहा जाता है कि विद्यापति को वियोग का अनुभव ही नहीं था| जो तन्मयता संयोग वर्णन में है, वह वियोग वर्णन में नहीं| संयोग श्रुंगार की कोई भी स्थिति विद्यापति की दृष्टि से नहीं छुटी है| राधा और कृष्ण का सौंदर्य वर्णन अनुपम बन पडा है| राधा का नख-शिख वर्णन अद्वितीय बन पडा है|
'पदावली' आदर्श गीतिकाव्य है| गीति के सभी गुण जैसे- वैयक्तिकता, संक्षिप्तता, संगितात्मकता, कोमल भाषा आदि| पदावली का भाषा मैथिली है| मैथिली भाषा में इतने सुंदर और सरस पदों का निर्माण करने के कारण ही विद्यापति को 'मैथिल-कोकिल' कहा जाता है|
3) भक्त कवि या शृंगारी कवि -
पदावली को लेकर विद्वानों में विवाद है| विद्यापति को भक्त कवि माना जाय या शृंगारी कवि? कुछ विद्वानों ने इन्हें भक्त कवि माना है| परंतु विद्यापति शृंगारी कवि थे| राधा कृष्ण के माध्यम से उन्होंने वासनात्मक का चित्रण किया है| डॉ. रामकुमार वर्मा ने कहा है कि 'उनकी कविता विलास की सामग्री है| उपासना की साधना नहीं|" गणपतिचंद्र गुप्त के अनुसार विद्यापति मूलत: स्वच्छंद या रोमांटिक कवि हैं|
संक्षेप में आदिकालीन कवि विद्यापति एक प्रतिभा संपन्न आदर्श कवि के रूप में जाने जा सकते है| उन्होंने अपना साहित्य लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध एवं संपन्न किया है| इसीलिए रामकुमार वर्मा कहते है, "विद्यापति का संसार दूसरा है, वहां कोकिलाएं कुंजन करती है| उनके लिए सारा संसार गुलाबमय है| जहां फूल खिला करते है|
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