दादू दयाल का परिचय
मध्यकालीन भारत का भक्ति आंदोलन सामाजिक और धार्मिक चेतना का सशक्त
माध्यम रहा है। इस आंदोलन के निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख संतों में दादू दयाल
का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने सरल, प्रभावशाली उपदेशों और
काव्य-वाणी के माध्यम से समाज में व्याप्त जाति-भेद, कर्मकांड
और धार्मिक आडंबर का विरोध किया। प्रेम, सत्य और मानव
समानता के संदेश के कारण दादू दयाल न केवल एक महान संत, बल्कि हिंदी भक्ति साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ भी माने जाते हैं। जिनका
सामान्य परिचय इसप्रकार –
1) जीवनवृत्त
:-
संत कबीर के जन्म के बारे में जिस प्रकार अनेक किवदंतियां है, उसीप्रकार इनके बारे में भी अनेक किवदंतियां प्रचलित है| इनका जन्म सं 1601 अर्थात इ.स. 1544 में गुजरात प्रदेश के अहमदाबाद नगर में हुआ | कहा जाता है कि वे लोधीराम ब्राह्मण को साबरमती नदी में बहते हुये मिले थे|आपकी माता का नाम बसी बाई था|
दादू
बारह वर्ष की आयु में ही सत्संग के लिए घर से निकल पडे थे| किंतु
माता-पिता ने पकडकर इनका विवाह कर दिया था| गरीबदास और
मिस्कीनदास नामक इनको दो पुत्र हुए| विवाह बंधन इन्हें बांध नहीं सका| विवाह के सात बरस
बाद यह फिर घर निकलकर ये 1568 ई. में सांभर आ गए। परिणामस्वरूप आपके जाती के विषय में विवादास्पद तथा संधिग्द बातें
मिलती है| कोई
इन्हें गुजराती ब्राह्मण और कोई मोची या धुनिया कहता है | बंगाल के बाउल संप्रदाय में इनका नाम बडे आदर से लिया जाता है| इससे ही वे मुसलमान धुनिया होने का अनुमान लगाया जाता है| संभवत: ये
निरक्षर थे| मतलब आपके गुरु का कोई पता नहीं| परंतू आपने कविताओं में कई स्थानों पर कबीर का नाम लिया है और
सैद्धांतिक रूप उसे आप उन्हीं के अनुयायी जान पडते हो| आपको
कबीर पंथी बुडढन बाबा (वृद्धानंद अथवा ब्रह्मानंद) से दीक्षा मिली थी| इनके गुरु वृद्धानंद थे। आगे
आपने एक अपना स्वतंत्र पंथ चलाया जो 'दादू पंथ' के नाम से जाना जाता है| दादू सम्प्रदाय की स्थापना दादू
दयाल जी ने 1574 ई. में की थी। इस सम्प्रदाय की प्रमुख
गद्दी नरैना (नरायणा, जयपुर) में है। ये ग्रहस्थी थे| इनके पुत्र-पुत्रियों का नाम
भी लिया जाता है| ये आमेर के राजा मानसिंह और मुगल
बादशाह अकबर के समकालीन थे। सन 1556 ई. में अकबर के निमंत्रण पर वे फतेहपुर सीकरी
गये थे और वहां अकबर के साथ काफी दिनों तक अध्यात्मिक चर्चा करते रहे| सम्राट अकबर इनके उपदेश से अत्याधिक प्रभावित
हुआ था| दादू दयाल जी
का निधन जेठ वदी अष्टमी, संवत् 1660 तथा सन् 1603 ई. में राजस्थान के नारायणा(नरैना) में हुआ था। दादू द्याल के 152 शिष्य
थे, जिनमें 100 ग्रहस्थ थे
एवं 52 साधु थे। जो दादू पंथ के 52 स्तम्भ कहलाए| इनके प्रमुख शिष्यों में उनके दोनों
पुत्र गरीबदास व मिस्किनदास थे। संत दादूदयाल ने
सुन्दरदासजी सहित श्रीलाखाजी और नव्हरिजी को दौसा के पास स्थित गेटोलाव में अपना
शिष्य बनाकर दादूपंथ की दीक्षा दी थी। अन्य शिष्यों में बखना, रज्जबजी, संतदास, जगन्नाथ दास एवं माधोदास थे।
2) व्यक्तित्व:-
दादू का स्वभाव अत्यंत सरल था| वे
त्यागी और क्षमाशील थे| प्राय: संत मत की समस्त मान्यताएं
इनके काव्य में देखने को मिलती है| वे स्वभाव से दयाळू थे,
कदाचित इसी कारण ए दादू कहलाए| इन्होंने
ब्रह्म या परब्रह्म नाम का एक संप्रदाय चलाया किंतु आज दादू संप्रदाय नाम से आज
अधिक प्रसिद्ध है| इस संप्रदाय के लोग कोई सांप्रदायिक चिन्ह
धारण नहीं करते, जप करने की केवल सुमिरनी लिए रहते है|
सूफियों की भान्ति इन्होंने भी प्रेम को भगवान की जाति और रूप कहा
है| दादू द्याल का राजस्थान का कबीर कहा जाता है|
3) कृतित्व:-
दादू द्याल निरक्षर थे| मरणोपरांत उनकी बाणियों का संग्रह दादू दयाल के शिष्यों संतदास और
जगन्नाथदास ने 'हरड़े बानी' नाम से
किया था। कई वर्षों बाद रज्जब ने पुनः 'अंगवधू' शीर्षक से इनकी बानियों को संपादित किया। आ. परशुराम चतुर्वेदी ने उनकी
बाणियों का 'दादूग्रंथावली' नाम से
संपादन किया गया है, जो अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक मानी जाती
है। दादू के पदों की संख्या बींस हजार तक मानी जाती है।
इस
संप्रदाय के माधोदास का 'संतगुणसागर',
जनगोपाल का 'जन्म-लीला', राघौदास का 'भक्तमाल', जग्गाजी
का 'भक्तमाल' और जैमल की 'भक्तविरुदावली' दादू-पंथ के प्रामाणिक ग्रंथ माने
जाते हैं।
वर्तमान युग
में अजमेर, काशी, जयपुर और प्रयाग से
उनके संकलन प्रकाशित हुए हैं और प्रसिद्ध विद्वान क्षितिमोहन सेन ने बंगला में
दादू का जो अध्ययन ग्रंथ प्रस्तुत किया है, उसमें भी उनका
समावेश है|
इनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित पश्चिमी हिंदी है| कारण भले ही उनका जन्म अहमदाबाद
में हुआ था, परंतु इनकी कर्मभूमि राजस्थान ही रही है|
उसमें अरबी, फारसी शब्दों का प्रयोग भी बहुत
हुआ है| उनकी वाणी की तुलना कबीर जी से की जाती है| उनकी वाणी में कबीर के जैसे वाग्वैदग्ध्य नहीं है पर सरसता और गंभीरता
पर्याप्त है| उसमें आध्यात्मिक वातावरण की सुंदर सृष्टि हुई
है| दादू में खंडनात्मकता का स्वर इतना तीव्र नहीं जितना कि
कबीर में| आ. द्विवेदी दादू और कबीर का तुलनात्मक
अध्ययन करते हुए लिखते है, "कबीर के समान मस्तमौला न
होने के कारण वे परम के वियोग और संयोग के रुपकों में वैसी मस्ती नहीं ला सके,
पर स्वभावत: सरल और निरीह होने के कारण ज्यादा सहज और पुरअसर बना
सके|... दादू को मैदान बहुत-कुछ साफ मिला था और उसमें उनके
मीठे स्वभाव ने आश्चर्यजनक असर पैदा किया| यही कारण है की
दादू को कबीर की अपेक्षा अधिक शिष्य और सम्मानदाता मिले|"
दादू
की बानियों पर दादू की विनम्रता और सहजता की छाँप सर्वत्र देखी जा सकती है। अपने
मत के संबंध में वे लिखते हैं -
भाई रे ऐसा पंथ हमारा।
पब पूरे का एक हिस्सा है, और उसका आवरण एक आधार है।
नाम महिमा, गुरू-गोविंद
की एकता, प्रवृत्ति भावना, संसार का
मिथ्यात्व, हिंदू-मुस्लिम एकता, जाति-पाति
का निराकरण, माया मोह की भर्त्सना, निर्गुण
ब्रह्म के प्रति प्रणयानुभूति, नैतिक जीवन की सार्थकता आदि
दादू वाणी की बुनियादी विशेषताएँ हैं। हिंदू-मुस्लिम एकता पर प्रकाश डालते हुए वे
लिखते हैं -
अलह राम छूटा भ्रम मोरा।
हिंदू तुरक भेद कुछ नहिं देखें दर्शन तोरा ।।
मांसाहार, मदिरा-पान,
विषय-विकार आदि दुर्व्यसनों पर उन्होंने प्रहार किया है। परमात्मा
रूपी प्रियतम के वियोग में तडपती हुयी जीवात्मा की विरह व्यथा का बहुतही
हृदयस्पर्शी चित्र दादू ने अंकित किया है।
विरहिनी बापु ना संभारे,
निरा दिन तल के राम के कारण, अंतर एक विचारे।
दादू के पद, साखी और
आत्मबोध आदि रचनाओं में दार्शनिक पक्ष और काव्य का सुंदर समन्वय है। इनके द्वारा
रचित पदों में वेदांत, उपनिषद् व सांख्य दर्शन का सारगर्भित
वर्णन तथा विश्लेषण किया गया है। इनके शब्दों तथा साखियों में प्रेम और विरह का
निरूपण अत्यंत निर्मल और अनुपम हुआ है। दादू के शब्दों में हम अंतर को बेधने वाली
सूक्ष्म से सूक्ष्म दृष्टि और अमृत रस से सींचा हुआ स्वानुभव पाते हैं। दादू के
अनेक शब्दों व साखियों में कबीर का रंग देखने में आता है, पर
अनुभव दादू का अपना है। दादू की कबीर के प्रति श्रद्धा थी।
"साँचा सबद कबीर का, मीठा लागे मोहि।
दादू सुनता परमसुख वैसा आनंद होहि।।"
4) दादू पंथ की विशेषताएं:-
दादू दयाल के सैकड़ों शिष्य थे। इनके प्रमुख शिष्यों की संख्या 52 बतायी जाती है। यद्यपि किसी को
वे गुरु दीक्षा नहीं देते थे। उनके महान् त्याग, ऊँचे प्रेम
और अथाह दया ने हज़ारों लोगों को अपनी ओर खींच लिया था।
अपने जीवनानुभवों के आधार पर उन्होंने 'ब्रह्म संप्रदाय' नाम की एक संस्था स्थापित की। आगे चलकर उसी का नाम 'दादू
पंथ' हो गया। दादू के जीवनकाल में यह पंथ बहुत लोकप्रिय हुआ।
दादू ने 'दादू पंथ' चलाया जिसकी प्रमुख
पीठ वर्तमान में नरायणा (जयपुर) में स्थित है। दादू-पंथ को मानने वाले अनुयायी हाथ
में सुमरनी (छोटी जपमाला) रखते और 'सत्तराम' कहकर अभिवादन करते हैं। दादूपंथी साधु विवाह नहीं करते और बच्चों को गोद
लेकर अपना पंथ चलाते हैं। ये दादूद्वारा में रहते हैं। दादूपंथ के सत्संग को 'अलख -दरीबा कहा जाता है। कालांतर में दादू पंथ पाँच भागों में विभाजित हो
गया। खालसा (गरीबदास की आचार्य-परंपरा से संबंधित साधु, जो
मुख्य पीठ 'नरायणा' में रहते हैं।),
विरक्त (अकेले या मंडली में रमते-फिरते रहकर गृहस्थियों को दादू-पंथ
का उपदेश देने वाले साधु।), उत्तरादे या स्थानधारी (जो
राजस्थान छोड़कर उत्तरी भारत में चले गए। ये मुख्यतः हरियाणा और पंजाब में हैं। इस
शाखा के संस्थापक दादू दयाल के शिष्य बनवारीदास थे। इन्होंने रतिया (हिसार) में
अपनी गद्दी स्थापित की।), खाकी (जो शरीर पर भस्म लगाते हैं,
बड़ी-बड़ी जटाएँ रखते हैं, खाकी वस्त्र पहनते
हैं और छोटे-छोटे दलों में घूमते हैं।), नागा (ये नग्न रहते
हैं और शस्त्र रखते हैं। नागा साधु 'जयपुर' में सैनिक के रूप में काम करते थे।)
दादूपंथ में सैकड़ों संत कवि हुए हैं। अपने पुत्रों के अलावा बखना
मिरासी, रज्जब,
सुंदरदास, संतदास, गरीबदास,
जगन्नाथ, जनगोपाल, माधोदास
और बालिंद दादू के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं। दादू दयाल के प्रसिद्ध शिष्य
राघौदास के 'भक्तमाल' में दादू जी के
बावन शिष्यों का नामोल्लेख है। दादूजी ने नरायणा में भैराना पहाड़ी पर स्थित गुफ़ा
में ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी सन् 1603 को समाधि ली। इसी स्थान
पर दादूपंथियों की मुख्य गद्दी है, जिसे दादूद्वारा कहते
हैं।
निष्कर्ष :
संत दादू की विचारधारा कबीर से प्रभावित है। निर्गुणभक्त कवि होने पर
भी उन्होंने ईश्वर के सगुण स्वरूप को मान्यता दी है। इसी प्रकार भक्ति को सहजभाव
से अंगीकार किया है। किसी मतवाद की उलझन में वे नहीं पड़े हैं। दादू की काव्यभाषा
ब्रजभाषा है। जिसमें राजस्थानी और खड़ी बोली के शब्दों का मिश्रण मिलता है। उनकी
भाषा कबीर की अपेक्षा सरल और बोधगम्य है, उनकी वाणी में ओज तथा गांभार्य दोनों के दर्शन हो
जाते हैं।
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