भक्तिकालीन साहित्यिक परिस्थिति
भक्तिकाल का समय सं. 1375 से सं. 1700 तक निर्धारित किया गया है| साहित्य समाज की उपज होता है और समाज से कटकर साहित्य की कोई उपयोगिता नहीं रहती| साहित्यकार स्वयं भी समाज की उपज होता है और सामाजिक परिस्थितियां ही उसे बनाती है| किसी भी युग के साहित्य को जानने के लिए उस युग की परिस्थितियों को जानना आवश्यक मना गया है| भक्तिकाल में भक्ति की प्रधानता होने के कारण आ. शुल्क जी ने इसे भक्तिकाल कहा है| 300 वर्षो तक भक्ति साहित्य का सृजन कोई सहज सरल घटना नहीं है इसके पीछे तत्कलीन परिस्थितियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है| इस कालखंड में भक्ति एक आंदोलन के रूप में चली है| जो दो रुपों में मिलती है - 1) दक्षिण का भक्ति आंदोलन और 2) उत्तर का भक्ति आंदोलन | अत: इन्हीं रुपों को परिपूर्ण करनेवाली साहित्यिक परिस्थिति भक्तिकाल मी नजर आती है| जिसका परिचय इसप्रकार:-
1) प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य सृजन:-
भक्ति काल में भक्ति आंदोलन के रूप में सामने आई है| अत: जन -जन तक पहुंचना इसका मुख्य उद्देश्य होने के कारण इस काल के साहित्यकारों ने जनभाषा को अपने साहित्य का माध्यम बनाया | अत: साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो इस युग में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश की अपेक्षा मुख्यत: प्रादेशिक भाषाओं में ही साहित्य सृजन होने लगा| इस युग के अंतर्गत भारत के पूर्व- पश्चिम तथा दक्षिण प्रदेशों में प्रांतीय या प्रादेशिक भाषाओं को ही अधिक महत्व मिला और साहित्य के भाषाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ | अर्थात बंगाल में बंगाली, गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी भाषा में साहित्य सृजन होने लगा| हिंदी प्रदेश में हिंदी भाषा में सहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया| भक्ति कालीन साहित्य इसका प्रतिक है| कबीर हिंदी के श्रेष्ठ कवि माने जाते है| जिन्होंने जनभाषा में लोगों को उपदेश दिया| इस समय में संस्कृत सुशिक्षित लोगों की भाषा रही| अर्थात संस्कृत का अध्ययन सीमित लोगकरने लगे| सामान्यत: पंडित लोग ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे| इस प्रकार मध्ययुग तक आते-आते संस्कृत सीमित लोगों की भाषा बन गयी| भक्तिकालीन साहित्य में तुलसी, नंदादास ऐसे कवि है, जिन्होंने हिंदी कविता में संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है| परंतु आमतौर पर हिंदी भाषा ही साहित्य की प्रमुख भाषा रही है| इस युग में रामकाव्य और कृष्ण काव्य यह भी दो प्रमुख धाराएं दिखाई देती है| रामकाव्य की भाषा अवधि और कृष्ण काव्य की भाषा ब्रजभाषा है| भक्ति काव्य में सुफी साहित्य भी अपना विशेष महत्व रखता है इनमें अरबी, फारसी भाषा की अधिकता दिखाई देती है| अत: भक्ति कालीन साहित्य में विभिन्न भाषाओं समन्वय दिखाई देता है|
2) साहित्य अध्यात्म के माध्यम से जन आंदोलन के साथ जुडा :-
इस काल की साहित्यिक परिस्थिति इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है कि इस काल के साहित्य ने समाज परिवर्तन का काम किया है| इस काल के कवि भक्त के साथ समाज सुधारक रहे है| उन्होंने धर्म और भक्ति को आधार बनाकर काव्य रचनाएं की है| इस काळ के साहित्य को देखकर यह कहा जा सकता है जिसने न केवल धर्म की व्याख्या की है बल्की हिन्हू समाज को सुख शांती प्रदान की है| इसके के लिए धर्म और समाज के व्याप्त विभिन्न बुराईयों का विरोध किया है| समाज और धर्म के वास्तविक स्वरूप को निर्धारीत करने का प्रयास किया है| इनके द्वारा प्रतिपादित धर्म-विषयक मार्ग भले ही पूर्णत: दोष रहित न हो लेकिन इस काल के साहित्य ने विशेषत: संत साहित्य ने ऐसे निर्गुण- निराकार ईश्वर की पर संकेत किया है जो सर्व व्यापक और सार्वभौमिक है| अर्थात ईश्वर की भक्ति के माध्यम से इस साहित्य ने मानवता की पृष्ठभूमी तैयार कर दी थी जिसके कारण तत्कालीन साहित्यिक परिस्थिति जन आंदोलन की रही है|
3) भक्ति का प्रचार और सिद्धांत का प्रतिपादन-
भक्ति काल में जिस साहित्य की रचना हुई वह अधिकांश पद्य में अर्थात छंदोबद्ध काव्य रूप में है| उस समय संस्कृत जो उच्च हिंदू वर्ग के लोगों की काव्य भाषा थी| शाही दरबारों में अरबी-फारसी का प्रयोग होता था| परंतु हिंदी की लोकभाषाओं का, विशेष रूप से अवधि तथा ब्रज भाषा का काव्य में प्रयोग होता था| अत: भिन्न-भिन्न प्रांतीय भाषाओं के साहित्य के वर्ण्य विषय, काव्य रूप और उसकी रचना शैली अलग-अलग थी| इस प्रकार का साहित्य अनगढ सा प्रतीत होता थाइसी अनगढ साहित्य और अपरिष्कृत साहित्य की प्रतिक्रिया स्वरूप का साहित्य रचा गया है| उसमें निखार है, भाषा का परिष्कार है, शैलियों में प्रवाह है| उल्लेखनीय यह है की इस काल के साहित्य ने किसी भी प्रकार की मौलिक उद्भवना नहीं की है , पर भक्ति का प्रचार और सिद्धांत का प्रतिपादन की भावना को अधिक महत्व दिया है|
4) प्रमुख साहित्य तथा साहित्यकार:-
इस युग में साहित्य में चार प्रमुख धाराओं का प्रभाव रहा| ज्ञानाश्रयी अर्थात संत काव्य, प्रेमाश्रयी काव्य, राम काव्य और कृष्ण काव्य| संत कवियों ने अपने अनुभूति के बलबुते पर नामस्मरण की महत्ता को समझाया है| सुफी कवियों ने प्रेम के मार्ग से आत्मा और परमात्मा के महत्व को समझाया है| राम और कृष्ण काव्य में विष्णु के सगुण रूप की उपासना पर बल दिया है| इसमें प्रमुखता जीवन के कर्मकांड से रहित निर्मल प्रेम से ही ईश्वर की सहजनुभूति प्राप्त हो सकती है इस पृष्ठभूमी का प्रभाव दिखाई देता है| इसी दृष्टि से संत कवि कबीर जी की प्रमुख रचना 'बीजक', सूफी कवि जायसी की प्रमुख रचना 'पद्मावत' तुलसीदास की प्रमुख रचना 'रामचरितमानस' सूरदास की 'सुरसागर' इन रचनाओं को देख सकते है| इसमें मुक्तक काव्य से लेकर महाकाव्य तक का समावेश हैं|
संक्षेप में भक्तिकालीन हिंदी साहित्य भाषा की दृष्टि से ब्रज और अवधि भाषा का साहित्य है| काव्य रुपों की दृष्टि से भक्तिकालीन साहित्य की पृष्ठभूमी महत्वपूर्ण है| इस युग में मुक्तक काव्य, महाकाव्य दोनों रूप प्रचलित है| जायसी 'पद्मावत' तुलसीदास की प्रमुख रचना 'रामचरितमानस' महाकाव्य के उत्कृष्ठ उदाहरण है| कबीर, सूरदास और मीरा के पद मुक्तक काव्य के उत्कृष्ठ उदाहरण है| इसप्रकार मध्ययुगीन काव्य की पृष्ठ्भूमी एक ठोस साहित्यिक भावभूमी है| जिस पर भक्ति साहित्य का यशोमंदिर खडा है|
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