आत्मकथा का उद्भव और विकास
जीवनी साहित्य के भान्ति ही आत्मकथा भी हिंदी साहित्य की एक सरस
संस्मरणात्मक विधा है| संस्मरणात्मक
होते हुये भी यह विधा संस्मरण साहित्य से भिन्न है| यह
भी हिंदी की आधुनिक नवीन विधाओं में एक मुख्य
विधा है| हिंदी साहित्य में आत्मकथा का प्रचलन अन्य
भाषाओं की अपेक्षा बहुत कम है| तथ्य – विवेचना की तुलना
में आत्मकथा को अधिक पुष्ट एवं प्रामाणिक माना जाता है| जब कोई व्यक्ति स्वयं अपने बिते जीवन का व्यवस्थित वर्णन लिखता है, तब आत्मकथा की सृष्टि होती है|अत: आत्मकथा का उद्भव
और विकास की देखने से पूर्व आत्मकथा किसे कहते है यह देख लेंगे|
1) आत्मकथा का अर्थ और परिभाषाएं:-
आत्मकथा का शाब्दिक अर्थ है – ‘अपनी कथा’ जिस विधा में लेखक
स्वयं ही अपना जीवन वृत्त प्रस्तुत करे उसे आत्मकथा कहते है| जिसकी परिभाषाएं इस प्रकार –
1)
डॉ. आशा कुमारी – आत्मकथा ऐसी जीवन कथा है, जो किसी व्यक्ति द्वारा लिखी जाती है, जिसके जीवन वृत्त का वर्णन अभीष्ट है| दूसरे
शब्दों में अपने विषय में लिखे गए संस्मरणों का अधिक व्यवस्थित और विस्तृत रूप ही
आत्मकथा है|
2) हिंदी साहित्य कोश – आत्मचरित और आत्मचरित्र हिंदी में आत्मकथा के अर्थ
में प्रस्तुत शब्द है और तत्वत: आत्मकथा से भिन्न नहीं है|
3) डॉ.
श्याम सुंदर घोष - " जब लेखक अपनी जीवनी स्वयं लिखे तो वह आत्मकथा है| आत्मकथा के लिए हिंदी में आत्मचरित या आत्मचरित्र शब्द प्रयुक्त होते है|
4) डॉ.
माजदा असद :- स्वयं लिखी अपनी जीवनी आत्मकथा कहलाती है | इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है - जब को व्यक्ति कलात्मक, साहित्यिक ढंग से अपनी जीवनी स्वयं लिखता है तब उसे आत्मकथा कहते है|
5) डॉ. हरिचरण शर्मा - "आत्मकथा एक संस्मरणा त्मक विधा है
जिसमें स्वयं लेखक अपने जीवन के विषय में निरपेक्ष होकर लिखता है| आत्मकथा वह साहित्यिक विधा है|
5) शिप्ले:- ” आत्मकथा
और संस्मरण देखने में समान साहित्यिक स्वरूप मालूम पड़ते हैं, किंतु दोनों में अंतर है। यह अंतर बल संबंधी है। एक में चरित्र पर बल दिया
जाता है और दूसरे में बाह्य घटनाओं और वस्तु आदि के वर्णनों पर ही लेखक की दृष्टि
रहती है। संस्मरण में लेखक उन अपने से भिन्न व्यक्तियों, वस्तुओं, क्रियाकलापों आदि के विषय में
संस्मरणात्मक चित्रण करता है जिनका उसे अपने जीवन में समय-समय पर साक्षात्कार हो
चुका है।”
6) अब्राहम काउली :- "किसी आदमी को अपने बारे
में खुद लिखना मुश्किल भी है और दिलचस्प भी क्योंकि अपनी बुराई या निन्दा लिखना
खुद हमें बुरा मालुम होता है और अगर हम अपनी तारीफ करें तो पाठकों को उसे सुनना
नागवार मालूम होता है।”
7) गुलाब राय:- "साधारण जीवन चरित्र से
आत्मकथा में कुछ विशेषता होती है। आत्मकथा लेखक जितनी अपने बारे में जान सकता है
उतना लाख प्रयत्न करने पर भी कोई दूसरा नहीं जान सकता किन्तु इसमें कहीं तो
स्वाभाविक आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति बाधक होती है और किसी के साथ शील-संकोच
आत्म-प्रकाश में रुकावट डालता है।”
इस प्रकार आत्मकथा द्वारा लेखक अपने बिते हुए
जीवन से समस्त संबंध मार्मिक और रमणीय घटनाओं का सिंहावलोकन करता है तथा अपनी हार-
जीत, दुर्बलताओं, सबलताओं, प्रेम, इर्ष्या, घृणा आदि की
अभिव्यक्तियों के द्वारा अपना आत्मनिरीक्षण करता है |
2) आत्मकथा का उद्भव :-
आत्मकथा विधा का कब उद्भव
हुआ हिंदी का आत्मकथा साहित्य लगभग 400 वर्ष पुराना है | सन 1641 में
जैन कवि बनारसीदास रचित 'अर्द्धकथा' हिंदी
की पहली आत्मकथा मानी जाती है| इसके संबंध में संपादक का कहना है कि “कदाचित
समस्त आधुनिक आर्य भाषा –साहित्य में इससे पूर्व कोई आत्मकथा नहीं है| डॉ. रामचंद्र
तिवारी ने भी आत्मकथा लेखन का प्रारंभ यही से माना है| उनका कथन है कि “आत्मकथा
लिखने वालों में जिस निरपेक्ष और तटस्थ दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह निश्चय ही
बनारस दास में थी| उसने अपने सारे गुण दोषों को सच्चाई के साथ व्यक्त किया है| यह
आत्मकथा पद्य में लिखी गयी है| इसके
अतिरिक्त पूरे मध्यकाल में किसी अन्य आत्मकथा का उल्लेख नहीं मिलता” इस
आत्मकथा में अकबर दे समय की परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण हुआ है| हिंदी आत्मकथा
का जन्म और विकास भी गद्य की अन्य विधाओं की भान्ति वस्तुत: भारतेंदु युग से ही
होता है|
3) आत्मकथा के विकास क्रम को हम इस प्रकार देख सकते है –
1) स्वातंत्र्योत्तर
पूर्व युग
2) स्वातंत्र्योत्तर युग
1) स्वातंत्र्योत्तर पूर्व युग :-
स्वातंत्र्योत्तर पूर्व युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बहुमुखी
प्रतिभा के साहित्यकार थे। अधिकांश विद्वानों द्वारा प्रथम आत्मकथा-लेखन का श्रेय
भारतेन्दु को ही दिया जाता है। भारतेंदु
हरिश्चंद्र ने पत्रिकाओं में प्रकाशन के द्वारा इस विधा को न सिर्फ पल्लवित किया
बल्कि अपितु इसे आगे बढ़ाने में अहम् भूमिका भी निभायी। उन्होंने अपने स्वयं के
जीवन पर आधारित आत्मकथा “एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगबीती” का लेखन किया। जिसका
आरंभिक अंश “प्रथम खेल” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। यह आत्मकथा आम-बोलचाल की
भाषा में लिखी गई जो कि रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग किए जाने वाले शब्दों की बहुलता इस आत्मकथा में
दिखाई देती है। लिखी जिसमें उनकी यौवनकालीन रोचक काव्यात्मक घटनाएं निरूपित हैं, किन्तु यह कृति अपूर्ण है। भारतेन्दु
जी के बाद आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती'
पत्रिका में अपनी 'अधूरी कहानी' प्रकाशित करायी। उनके परवर्ती सम्पादकों में पं. देवीदत्त शुक्ल, पदुमलाल पुत्रालाल बख्शी ने आत्मकथाएँ लिखीं थीं। इसके अतिरिक्त इस युग में
जो आत्मकथाएं लिखी वह इस प्रकार-
आत्मकथा कार और उनकी कृतियां इस प्रकार
1)
1879 - स्वामी दयानंद सरस्वती - स्वरचित आत्मचरित्र
2)
पहला खण्ड सन् 1909 - सत्यानंद अग्निहोत्री - ‘मुझ में देव जीवन का विकास’ दूसरा खण्ड सन् 1918 में
प्रकाशित हुई।
3)
1914 – मेरे जीवन के अनुभव – संत राय
4)
1914 - तोताराम सानाढ्य – फिजी द्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष
5)
1920 – राधाचरण
गोस्वामी –मेरा संक्षित जीवन चरित्र – मेरा लिखित
6)
पं. अम्बिकादत्त व्यास - 'निजवृत्तान्त'
7)
सन् 1921 - परमानंद जी की आत्मकथा ‘आपबीती’ प्रकाशित हुई। काले पानी के कारावास की कहानी
8)
सुधाकर द्विवेदी
- ‘रामकहानी’
9)
1921- भवानी
द्याल सन्यासी की 25 देशभक्तों की
जेलकथाएं प्रकाश में आई| भारतीय देशभक्तों की कारावास की कहानी उनमें भवानी द्याल
सन्यासी तथा महात्मा गांधी की जेल कथाओं को सर्वप्रथम श्रेय दिया जाता है |
10)
1924 - स्वामी श्रद्धानंद - -
‘कल्याणमार्ग का पथिक’
11)
1928 -रामप्रसाद
बिस्मिल - श्री गणेश विद्र्यार्थी द्वारा सर्वप्रथम ‘काकोरी के शहीद’ एक अंश के
रूप में प्रकाशित हुई|
12)
पृथ्वीसिंह
आजाद- क्रांतिकारी का पथिक
13)
1927 महत्मा
गांधी – सत्य के प्रयोग – हरिभाऊ उपाध्याय अनुवाद
14)
1930-रवीन्द्रनाथ ठाकुर- जीवन स्मृति – सुरजमल जैन ने अनुवाद किया|
15)
पं. जवाहरलाल नेहरू –माई स्टोरी – हरिभाऊ उपाध्याय ने कृष्णदत्त
पालीवाल तथा वियोगी हरी आदि के सहयोग से अनुवाद किया|
16)
1933 – लजाराम मेहता शर्मा – आपबीती
17)
1933- राम विलास शुक्ल – मैं क्रांतिकारी कैसे बना
18)
1938- शचीन्द्र सान्याल क्रांतिकारी – बंदी जीवन(बंगाली) हिंदी
अनुवाद में प्रकाशित
19)
1939 – प्रवासी की आत्मकथा – भवानी दयाला सन्यासी
20)
1941 – मेरी असफलताएं – बाबू गुलाबराय
21)
1941 - बाबू श्यामसुन्दरदास द्वारा लिखित 'मेरी आत्मकहानी' एक श्रेष्ठ आत्मकथा है। इस सम्बन्ध में डॉ. हरदयाल का कथन है-'श्यामसुन्दरदास की 'मेरी आत्म-कहानी' सन् में प्रकाशित हुई। यह बड़ी सुगठित और समृद्ध आत्मकथा है। इसमें
साहित्यिक शैली में डॉ. श्यामसुन्दरदास ने अपने जीवन के साथ-साथ उस समय के
साहित्य-इतिहास को प्रस्तुत किया है।"
22)
1943 – मूलचंद अग्रवाल – पत्रकार की आत्मकथा
23)
1943- महात्मा नारायण स्वामी – आत्मकथा
24)
1944, 1949, 1967 - पं. राहुल सांकृत्यायन – मेरी जीवन यात्रा वस्तुतः ये सभी आत्मकथाएँ केवल लेखकों के
जीवनवृत्त को ही नहीं बतातीं, वरन् तत्कालीन, सामाजिक, राजनीतिक,
साहित्यिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी अभिज्ञान कराती हैं।
25)
इसी युग में जयशंकर प्रसाद ने 'मेरा जीवन-प्रवाह' पद्य में
26)
मुंशी प्रेमचन्द ने गद्य में 'मेरा जीवन-प्रवाह' नामक आत्मकथा
लिखी।
27)
डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने राजनीतिक ‘आत्मकथा’ लिखी।
28)
श्री रामविलास शुक्ल ने भी 'मैं क्रान्तिकारी कैसे बना' आत्मकथाएँ
लिखीं।
2) स्वातन्त्रयोंत्तर युग का विकास –
द्विवेदी-युग के बाद स्वातन्त्र्योत्तर-युग में आत्मकथा का बहुमुखी
विकास हुआ । इसमें महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं, दलित लेखकों की आत्मकथाओं भी समावेश
हुआ है| स्वाधीन भारत में प्रकाशित प्रथम उल्लेखनीय आत्मकथा यशपाल रचित 'सिंहावलोकन' है।
इसमें क्रान्तिकारियों की आत्मकथा की मार्मिकता दर्शनीय है। इसके बाद अनेक आत्मकथाएं
सामने आती है वह इसप्रकार-
1)
1943- भगवानदास केला – मेरा
साहित्यिक जीवन
2)
1946 – लाला लजपतराय – आत्मकथा
3)
1947 कृष्णा हठी सिंह – कोई शिकायत नहीं – अनुवाद मुहम्मद हैरिस
4)
1947- रामकुमार विद्यार्थी ‘रावी’ – अपनों को खोज में या बुक सेलर की
डायरी
5)
1948 – गणेश नारायण सोमाणी – मेरी जीवन कहानी
6)
1948- वियोगी हरि – मेरा जीवन प्रवाह
7)
1949 – क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी – मेरी जीवन गाथा
8)
1950 – विनोद शंकर व्यास – उलझी स्मृतियां
9)
1951 – सत्यदेव परिव्राजक – स्वतंत्रता की खोज में
10)
1951 – गंगा प्रसाद उपाध्याय – जीवन चक्र
11)
1951 मम्मनाथ गुप्त – क्रांतिकारी की आत्मकथा
12)
1952 – अजित प्रसाद जैन – अज्ञात जीवन
13)
1952 - शांतिप्रिय द्विवेदी की आत्मकथा ‘परिव्राजक की
प्रजा’
14)
1952- 55 यशपाल - 'सिंहावलोकन'
15)
1953- देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा ’चाँद-सूरज के बीरन’
16)
1953- किशोरीलाल वाजपेयी –साहित्यिक जीवन का अनुभव
17)
1953- कालिदास कपूर – मुदर्रिस की रामकहानी
18)
1956 – रमादेवी मुरारका – मेरी जीवन कहानी
19)
1956 – एल. पी. नागर – समय का फेर
20)
1956 - जानकी
देवी बजाज – मेरी जीवन यात्रा यह एक अशिक्षित महिला थी इसीलिये इनकी कृति को रिषभ
देव रांका ने लिपिबद्ध किया
21)
1957- नरदेव शास्त्री – आत्मकथा – आपबीती जगबीती
22)
1957 – राधेश्याम कथावाचक – मेरा नाटक काल
23)
1958- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी – मेरी अपनी कथा
24)
1958- सेठ गोविन्ददास रचित 'आत्म-निरीक्षण' तीन भाग(),
दूसरी आत्मकथा ‘उथल – पुतल का युग (1963)
25)
1958 – रामप्रसाद बिस्मिल – आत्मकथा
26)
1959- देवराज उपाध्याय –‘बचपन के वे दो दिन’
अन्य खंड – यौवन के द्वापर – 1970
27)
1960 – सुमित्रानंदन पंत – साठ वर्ष : एक रेखांकन
28)
सन् 1960 में प्रकाशित पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ प्रकाशित हुई। पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' जी ने
अपने 20 वर्षों की कथा को निष्पक्ष, पर कलात्मक ढंग से
प्रस्तुत किया है।
29)
1962 - म. भगवान दीन –जीवन झांकी
30)
1963 - संतराम बी.ए. – मेरे जीवन के अनुभव
31)
1963 – आ. चतुरसेन शास्त्री – मेरी आत्मकहानी
32)
1966 – पृथ्वीसिंह आजाद – क्रांति पथ का पथिक
33)
1966 भुवनेश्वर माधव मिश्र – जीवन के चार अध्याय
34)
1967 - पं. गिरीधर शर्मा चतुर्वेदी – आत्मकथा और संस्मरण
35)
1968 - गुरु गोविंद सिंह – ‘विचित्र नाटक’– ब्रजभाषा
36)
इधर एक दशक के अन्तराल में सबसे महत्वपूर्ण आत्मकथा डॉ. हरिवंशराय
बच्चन की चार खण्डों में प्रकाशित है। (1) 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' 1969
(2) 'नीड़ का निर्माण फिर' 1970 (3) 'बसेरे से दूर'
1977 और (4) 'दश-द्वार से सोपान तक' 1985 । चार खण्डों में प्रकाशित हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा स्वयं उन्हीं
के शब्दों में एक 'स्मृति-यात्रा-यज्ञ' है। "इसमें उनका प्रारम्भिक जीवन-संघर्ष, इलाहाबाद
विश्वविद्यालय के अँगरेज़ी विभाग के प्रोफेसर के अनेक संदर्भ, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के उनके अनुभव, केम्ब्रिज
से डॉक्टरेट करके लौटने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उनके अनुभव, केम्ब्रिज से डॉक्टरेट करके लौटने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनकी
उपेक्षा, उनकी अनुपस्थिति में उनके परिवार का असुरक्षित
अनुभव करना, इलाहाबाद रेडियो स्टेशन पर हिन्दी प्रोड्यूसर का
उनका अनुभव, विदेश मंत्रालय में ऑफ़िसर आन स्पेश ड्यूटी
(हिन्दी) के रूप में राजनयिक कार्यों में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए
किये गये उनके प्रयत्न, सचिवालय के सचिवों की मानसिकता तथा
वहाँ से अवकाश लेने के बाद का उनका जीवन-अनुभव एक वृहद् उपन्यास की रोचक शैली में
जीवन्त और साकार हो उठा है। इस 'स्मृति-यात्रा-यज्ञ' में प्रकारान्तर से स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद का हिन्दी-भाषा और साहित्य
का पूरा संघर्ष ही मूर्त हो गया है। इस आत्मकथा में संस्मरण, यात्रावृत्त, कविता, साक्षात्कार,
नैरेशन आदि अनेक विधाएँ और शैलियाँ गुंफित हैं। सबसे बड़ी बात है-
लेखक के आत्म-स्वीकार का साहस ।" डॉ. बच्चन की आत्मकथा के संदर्भ में डॉ.
रामचन्द्र तिवारी की ही तरह धर्मवीर भारती ने भी कहा है "हिन्दी में अपने
बारे में सब कुछ इतनी बेवाकी, साहस और सद्भावना से कह देना
यह पहली बार हुआ है।"
37)
1970- वृन्दावनलाल वर्मा की ‘अपनी कहानी’
38)
1970 – हीरालाल शास्त्री – प्रत्यक्ष जीवन शास्त्र
39)
1970- देवराज उपाध्याय की ‘यौवन के द्वार पर’
40)
1972- व्योहार राजेंद्र सिंह – सेवा, सृजन और संघर्ष
41)
1973 – राधा कृष्ण बिरला – भूली बातें याद करूं
42)
1973 – प्रणव कुमार वंद्दोपाध्याय- विदा बंधु विदा
43)
1974- पोद्दार रामवतार अरुण – एक आत्मकथा अरुणायन
44)
1976 –रामेश्वर टाटीया – राह चलते चलते
45)
1983 – 1986 – रामविलास शर्मा – घर की बात , अपनी धरती अपने लोग
46)
1984 – पुरुषोत्तमदस टंडन – राख से लपटें
47)
1985- शिवपूजन सहाय की ‘मेरा जीवन’
48)
1986 टुकडे- टुकडे दास्तान
49)
1987 – यशपाल जैन – मेरी जीवनधारा
50)
1988 – फणीश्वरनाथ रेणु – आत्म परिचय
51)
1988 डॉ . नगेंद्र – अर्ध कथा
52)
1989 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर – तपती पगडंडियों पर
पदयात्रा
53)
1990- प्रतिभा
अग्रवाल की ‘दस्तक ज़िंदगी की’
54)
1991 – रामदरश मिश्र – सहचर है समय
55)
1992- 2000 – कमलेश्वर – फुरसत के दिन, जो मैने जिया ,
यादों का चिराग, जलती हुई नदी
56)
1994 – गोपाल प्रसाद व्यास- कहो व्यास कैसी कटी
57)
2000 – रवींद्र कालिया- गालिब छुटी शराब
58)
2001 – राजेंद्र यादव – मुड मुडकर देखता हूं
59)
2001 – अखिलेश – वह हो यथार्थ था
60)
2003- भीष्म
साहनी की ‘आज के अतीत’
61)
2003 – अशोक वाजपेयी- पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज
62)
2003 – स्वदेश दीपक – मैंने मांडू नहीं देखा
63)
2004 – विष्णु प्रभाकर – पंखहीन मुक्त गगन में, पंछी उड
गया
64)
2005 – रवींद्र त्यागी- वसंत से पतझर तक
65)
2007 – कन्हैया लाल नंदन – एक अंतहीन तलाश
66)
2007 – देवश ठाकुर – गुजरा कहां कहां से
67)
भुवनेश्वर प्रसाद – ‘जीवन के चार अध्याय’
68)
एम- विश्वश्वरया – मेरे कामकाजी जीवन संस्मरण
69)
आचार्य चतुरसेन शास्त्री कृत 'मेरी आत्म-कहानी'
70)
वृन्दावनलाल वर्मा कृत 'अपनी कहानी' आदि इस विषय की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ
हैं।
71)
डॉ. बच्चन की आत्मकथा के अतिरिक्त डॉ. देवराज उपाध्याय कृत 'यौवन के द्वार पर'
72)
राजकमल चौधरी कृत 'भैरवी-तन्त्र',
73)
डॉ. रामविलास शर्मा कृत 'घर की बात'
74)
शिवपूजन सहाय कृत 'मेरा जीवन'
75)
कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' कृत 'तपती पगडंडियों
पर पद-यात्रा',
76)
फणीश्वरनाथ रेणु कृत 'आत्मपरिचय'
77)
डॉ. नगेन्द्र कृत 'अर्धकथा'
78)
अमृतलाल नागर कृत 'टुकड़े-टुकड़े दास्तान' आदि आत्मकथाएँ विशेष रूप से
चर्चित हैं।
79)
'घर की बात'
डॉ. रामविलास शर्मा की विस्तृत आत्मकथा है। स्वयं शर्मा जी के
शब्दों में "घर की बात में वैज्ञानिक विवेचन कम, मानवीय
सम्बन्धों का चित्रण अधिक है।. इसमें कई पीढ़ियों के लेखक और वार्ताकार सम्मिलित
हैं।"
80)
'मेरा जीवन'
आत्मकथा में लेखक शिवपूजन सहाय का व्यक्तिगत जीवन तो उद्घाटित हुआ
ही है, साथ ही अनेक साहित्यकारों, साहित्यिक
घटनाओं और संदर्भों का प्रामाणिक दस्तावेज भी सामने आया है।
81)
'तपती पगडंडियों पर पद-यात्रा'
में कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' के तेजस्वी, सिद्धान्तवादी और कर्मठ व्यक्तित्व के
अनेक पक्ष उद्घाटित हुए हैं
82)
अपनी आत्मकथा 'आत्मपरिचय' में रेणु ने अपने जीवन और रचना-संघर्ष को
बड़ी सहजता के साथ उजागर किया है।
83)
डॉ. नगेन्द्र की 'अर्धकथा' में उनके जीवन का 'अर्धसत्य'
व्यक्त हुआ है।उन्हीं के शब्दों में, 'यह मेरे
जीवन का केवल अर्ध सत्य है अर्थात् उपर्युक्त तीन खण्डों में मैंने केवल अपने
बहिरंग जीवन का ही विवरण दिया है।........... जहाँ तक अंतरंग जीवन का प्रश्न है,
वह नितांत मेरा अपना है आपको उसका सहभागी बनाने की उदारता मुझमें
नहीं है।"3
84)
'टुकड़े-टुकड़े दास्तान' अपनी आत्मकथा की भूमिका में नागर जी ने कहा है- "मैं पत्थर परउकेरी
गई ऐसी मूर्ति हूँ जो कहीं-कहीं छूट गयी हो।' वस्तुतः इसमें
कथा-रस भरा हुआ है। यह आत्मकथा आधुनिक सांस्कृतिक जागरण का जीवन्त इतिहास कही जा
सकती है।
85)
इधर 'जहाँ मैं
खड़ा हूँ', 'रोशनी की पगडंडियाँ', 'टूटते-बनते
दिन', और 'उत्तर पथ' इन चार भागों में लिखी गयी रामदरथ मिश्र की आत्मकथा 'सहचर है समय' के नाम से प्रकाशित हुई है। इस कृति
में स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण परिवेश से निकलकर संघर्ष के रास्ते अपने जीव का
लक्ष्य ढूँढ़ने वाला एक साहित्यकार का पूरा अनुभव-संसार अपने विस्तार में लगभग आधे
भारत को समेटे हुए, सजीव रूप में उजागर हो उठा है। 'सहचर है समय' के सम्बन्ध में डॉ. रामचन्द्र तिवारी
ने लिखा है- "इसमें रामदरथ मिश्र ही नहीं आज की पूरी साहित्यिक पीढ़ी है,
बनते-बिगड़ते गाँव हैं जिनका जीवन-रस सूख रहा है, उभरते हुए नगर हैं जिनमें मनुष्यता मर रही है और सैकड़ों सामान्य लोग हैं
जिनके रोजी-रोटी के लिए किये जाने वाले ऊपर खुरदुरे संघर्ष के भीतर संवेदना और
सहानुभूति की तरल धारा आज भी प्रवाहित हो रही है। सचमुच यह आत्मकथा आज के भारत के
सामान्य आदमी के जीवन का दस्तावेज़ है।"
86)
इसके अतिरिक्त 'सारिका' पत्रिका ने 'गर्दिश के
दिन' नामक स्तम्भ में साहित्यकारों को अपनी संघर्ष-पूर्ण कथा
को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया था जिसमें भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, कामतानाथ और दूधनाथ सिंह की
आत्मकथाएँ प्रकाशित हुई। ये आत्मकथ्यपूर्ण आत्मकथा नहीं हैं। कारण यह कि इनमें
रचनाकारों का अलग-अलग व्यक्तित्व और अलग-अलग मिजाज व्यक्त हुआ है।
87)
सुमित्रानंदन पंत की आत्मकथा का उल्लेख नहीं मिलता परंतु उनकी रचना
‘साथ वर्ष और रेखांकन’ के माध्यम से इनका जीवन उजागर हुआ है|
पत्रिकाओं में आत्मकथा का विकास :-
इस युग में हिंदी की पत्र
पत्रिकाओं में लघु आत्मकथाएं प्रकाशित हुई है| वह इस प्रकार –
1)
बनारसीदास चतुर्वेदी - - प्रयाग के वे दिन
2)
विवेक राय – संसद में बारह वर्ष
3)
प्रताप चंद्र गंगोपाध्याय – स्मृति कथा
4)
आलोक कुमार – यादों की दोपहरी
5)
मन्मथनाथ गुप्त – अपने ही बारे में
6)
श्रीधर पाठक – आत्मकथा
7)
नारायण उपाध्याय- मेरा बचपन
अनुदित आत्मकथाएं :-
इस युग में कुछ भारतीय लेखकों के आत्मकथाओं का
अनुवाद भी हुआ है ऐसी अनुदित आत्मकथाएं भी मिलती है| अनुदित आत्मकथाएं और आत्मकथाकार ये वे आत्मकथाएँ
हैं जो मूलतः अन्य भाषाओं (उर्दू, बांग्ला, पंजाबी, अंग्रेज़ी,
मराठी, आदि) में लिखी गईं और बाद में हिंदी
में अनूदित हुईं। वह इस प्रकार -
1)
काक कालेलकर – 1953 – स्मरण यात्रा – खुशालसिंह ने गुजराती से हिंदी
में अनुवाद
2)
विनायक दामोदर सावरकर – काला पानी 1956
3)
श्रीवास्तव सहगल – प्रीजन अंड चोकलेट केक- - अनुवाद मुकुंदीलाल ने
‘मेरे बचपन की कहानी
4)
वेद मेहता – फेस टू फेस – मेरा जीवन संघर्ष
5)
महावीर की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद – अजमल अजमली ने जीक्रेमीर – 1961
6)
जहरुद्दीन मुहम्मद बाबर की फारसी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद – तुजक- ए-
बाबरी
7)
अमृता प्रितम की ‘रसीद टिकट’ हिंदी अनुवाद बटूक शंकर भटनागर ने किया
है| 1977
8)
मीर
तकी मीर- जिक्र-ए-मीर, उर्दू, 1783- जिक्रे-मीर हिंदी अनुवाद
9)
मुंशी
लुत्फुल्ला- एन ऑटोबायोग्राफी, अंग्रेजी,
1848- एक आत्मकथा
10)
महात्मा
गाँधी- आत्मचरित, गुजराती, 1926- आत्मकथा अथवा सत्य के प्रयोग
11)
सुभाष
चंद्र बोस- तरुणे सपन, बांग्ला, 1935- तरुण के स्वप्न
12)
जवाहर
लाल नेहरू- माई स्टोरी, अंग्रेजी,
1936- मेरी कहानी
13)
वेद
मेहता- फेस टू फेस, अंग्रेजी,
1958- मेरा जीवन संघर्ष
14)
शचीन्द्र
नाथ सान्याल- बंदी जीवन, बांग्ला, 1963- बंदी जीवन
15)
हंसा
वाडकर- सांगत्ये एका, मराठी, 1972- अभिनेत्री की आपबीती
16)
जोश
मलीहाबादी; अमृता प्रीतम- यादों
की बारात, उर्दू, 1972; रसीदी टिकट,
पंजाबी, 1977- यादों की बारात; रसीदी टिकट
17)
कमला दास माई स्टोरी, अंग्रेजी, 1977 मेरी कहानी
18)
दलीप कौर टिवाणा नंगे
पैरों दा सफर, पंजाबी,
1980 नंगे पैरों का
सफर
अन्य मौलिक आत्मकथाएं :-
इसके साथ कुछ मौलिक
आत्मकथाएं भी लिखी गयी| वह इस प्रकार –
1)
कमलेश्वर- जो मैंने जिया, यादों के चिराग, जलती हुई नदी
2)
नानकचंद सू – डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के सहयोगी – जीवन के अंतिम वर्ष
3)
मोहन राकेश – समय सारथी
4)
भगवती चरण वर्मा – ये साथ और हम
5)
बजगोपाल दस अग्रवाल – नदिया से सागर तक
6)
रेणु- ऋणजल- धनजल
7)
राजेंद्र याद – मुड मुड के देखता हूं
8)
भीष्म सहानी – आज के अतीत
9)
कृष्णा सोबती – हम हशमत
दलित आत्मकथा का विकास –
1)
भगवानदास – मैं भंगी हूं – 1891
2)
मोहनदास नेमिशराय – अपने अपने पिंजरे भाग 1 1955 दूसरा भाग – 2000
3)
ओमप्रकाश वाल्मिकी – जूठन- 1997
4)
कौसल्या बैसंत्री – दोहरा अभिशाप – 1999
5)
सूरजपाल चौहान – तिरस्कृत- 2000 संतप्त- 2006
6)
2009 श्योराज सिंह बेचैन – मेरा बचपन मेरे कंधों पर
7)
2010 – डॉ. तुलसीराम – मुर्दहिया
8)
सुशीला टाकभौरे- शिकंजे का दर्द (२०११) मेरी कलम मेरी कहानी
9)
ममता प्रसाद – झोपडी से राजभवन
महिला लेखन धारा की आत्मकथाएँ:-
1)
प्रतिभा अग्रवाल - दस्तक जिन्दगी की (1990ई.) मोड़ जिन्दगी का (1996 ई.)
2)
कुसुम अंसल - जो कहा नहीं गया 1996
3)
कृष्णा अग्निहोत्री - लगता
नहीं है दिल मेरा 1997
4)
पद्मा सचदेव - बूंद बावड़ी – 1999
5)
शिवानी- सुनहुं तात यह अकथ कहानी – 1999
6)
शीला झुनझुनवाला - कुछ कही कुछ अनकही- 2000
7)
अनिता राकेश – चंद सतरें
8)
मैत्रेयी पुष्पा - कस्तूरी कुण्डल बसै (2002 ई.) गुड़िया भीतर
गुड़िया (2008 ई.)
9)
रमणिका गुप्ता – हादसे 2005 और अप हुदरी
10)
सुशीला राय – एक अनपढ कहानी – 2005
11)
चंद्रकिरण सौनरेक्सा – पिंजरे की मैना – 2007
12)
मन्नू भण्डारी - एक कहानी यह भी 2007
13)
प्रभा खेतान - अन्या से अनन्या 2007
14)
चन्द्रकिरण सौनरेक्सा - पिंजड़े की मैना- 2008
15)
निर्मला जैन – जमाने में हम – 2015
16)
डॉ. अहिल्या मिश्र – दरकती दिवारों से झांकती जिंदगी – 2021
महिला लेखिकाओं ने अपनी आत्मकथाओं में न केवल
निजी जीवन, बल्कि
पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की स्थिति, संघर्ष और
आत्मसम्मान की लड़ाई को दर्ज किया। इनमें स्त्री संवेदनाओं, विवाह
संस्था, घरेलू हिंसा, प्रेम, सामाजिक पूर्वाग्रह और स्त्री स्वतंत्रता जैसे विषयों को स्पष्टता और साहस
के साथ उठाया गया है।
उपर्युक्त आत्मकथाओं के प्रकाशन के बावजूद हिन्दी का आत्मकथा साहित्य
अभी समृद्ध नहीं कहा जा सकता। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि हिन्दी को माध्यम
बनाकर लिखने-पढ़ने वाले पण्डित और मनीषी महान् और गौरवशाली नहीं हो सकते। इसलिए
भारत की महान् विभूतियों ने अपने को व्यक्त करने के लिए हिन्दी को माध्यम नहीं
बनाया। फिर भी, आज
आत्मकथा विधा में अपूर्व श्रीवृद्धि हो रही है।
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