एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया

एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखाया 

हरिशंकर परसाई 


एक समय की बात है । एक विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग के एक प्रतिष्ठित अध्यापक थे , जिनका नाम द्रोणाचार्य था । पद - क्रम के अनुसार वे ' रीडर ' कहलाते थे । ' रीडर ' उस अध्यापक को कहते थे , जिसे कक्षा में पढ़ाना नहीं आता था और वह पाठ्य-पुस्तक या कुंजी कक्षा में पढ़कर काम चला लेता था ।आचार्य द्रोणाचार्य के दो शिष्य थे । एक का नाम अर्जुनदास था और दूसरे का एकलव्यदास । अर्जुनदास एक धनी बाप का बेटा था , जिनका समाज में प्रभाव था और राजदरबार में भी उनका मान होता था । आचार्य रोज़ अर्जुनदास के घर जाते थे और अर्जुनदास भी रोज़ उनके घर आता था । उनका साथ इतना घना था कि कोई यदि आँखें बन्द करके आचार्य प्रवर की कल्पना करता , तो आचार्य का शरीर कल्पना में आते-आते उसमें एक दुम निकल आती और दुम के छोर पर अर्जुनदास का चेहरा बन जाता । एकलव्य ग़रीब आदमी का लड़का था , इसलिए उसे आचार्य का साक्षात्कार बहुत कम होता था । पर गुरु के प्रति उसकी भक्ती थी । उसने अपने कमरे में द्रोणाचार्य का एक चित्र टाँग रखा था और उनकी लिखी हुई एक कुंजी सिरहाने रखकर सोता था । दोनों शिष्य एम . ए . की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे । ( एम . ए . एक ऐसी परीक्षा थी जिसे पढ़ने के बाद तीन वर्ष का बेकारी का कोर्स पढ़ना पड़ता था।-सं. ) अर्जुन जानता था कि विद्या पढ़ने से नहीं , बल्कि गुरु-कृपा से प्राप्त होती है । वह निरन्तर गुरु की सेवा में रहता था । वह आचार्य के घर में किराना , कपड़ा , सब्जी आदि पहुँचाता था । त्योहार पर आचार्य के पाँच बच्चों को बाजार ले जाता और उन्हें मिठाई , कपड़े , खिलौने आदि खरीद देता । वह आचार्या को सिनेमा - नाटक दिखाता था और अन्य अध्यापकों की पत्नियों की कलंक - कथाएँ गढ़कर , उन्हें सुनाकर उनका मनोरंजन करता था । वह आचार्य के कुशल - क्षेम पर ध्यान देता था । रात को उनके सामने अन्य आचार्यों की निन्दा करता था , जिससे उनकी आत्मा का उत्थान होता था । उधर एकलव्य गुरु सेवा से विमुख होकर रात-दिन अध्ययन में लगा रहता था । एक दिन आचार्य और अर्जुन में इस प्रकार संवाद हुआ : " आचार्यवर , मैं आपके घर में किराना , कपड़ा , सब्जी आदि पहुँचाता हूँ कि नहीं ? " " हाँ वत्स , पहुँचाते हो । " " आचार्या को सिनेमा - नाटक कौन दिखाता है ? बच्चों को मिठाई , खिलौने और कपड़े कौन खरीद देता है ?  " तू ही , बेटा । तू ही यह सब करता है । " “ क्या कोई दूसरा शिष्य है , जो आपके मुँह पर आपकी प्रशंसा मुझसे अधिक करके आपके मन को प्रसन्न करता हो ? " " नहीं , कोई नहीं । " " क्या कोई ऐसा अध्यापक बचा है , जिसकी निन्दा न करके मैंने आपके दुखाया हो ? " " नहीं , कोई नहीं बचा , वत्स । " " क्या यह सत्य नहीं कि आपके रीडर बनने में मेरे पिताजी का बड़ा हाथ है ? " " यह सर्वथा सत्य है । " " आगे विभागाध्यक्ष बनने के लिए आप किसकी सहायता लेंगे ? " " निःसन्देह तेरे पिता की । " " क्या एकलव्य ने आपकी सेवा की है ? " " बिलकुल नहीं ।

          उसे तो गुरु की कोई सुझी ही नहीं| वह तो हमेशा निर्जीव ग्रंथों में डूबा रहता है| अच्छा यह बताई गुरुदेव कि आपका प्रिय शिष्य कौन है| तू है वत्स , तू है| तुझ-सा प्रिय शिष्य न कभी हुआ और न कभी होगा| सहसा अर्जुन हाथ जोडकर खडा गया और बोला तो गुरुदेव मुझे वर दीजिए कि मैं ही फर्स्टक्लास फर्स्ट आउं और छात्रवृत्ति लेकर विदेश जाऊ| यह सूनकर आचर्य थोडी दर सोच में पडे  रहे और फिर बोले यह तो मैं भी चाहता हूं | पर एकलव्य इसमें बाधक होगा| वह सबसे कुशाग्र बुद्धि और परिश्रमी भी है| अर्जुनदास ने कहा यह मैं कुछ नहीं जानता| मैं तो इतना जानता हूं यही मैं प्रथम नहीं आया तो गुरु की महिमा भंग हो जायेगी| आगे कोई शिष्य गुरु ऐसी सेवा नहीं करेगा और इस अधम परंपरा को आरंभ करने का कलंक आपको लगेगा| आचार्य फिर सोच में पडे| धीरे-धीरे उनके मूख पर निश्चय की दृढता आ गयी| अर्जुन उस क्षण गुरु के उस तेजोदिप्त मूख को देखकर अभिभूत होने लगता था| आचार्य के जीवनभर पुण्य आभा बनकर मूख पर प्रकट हुए थे| आचार्य ने दृढ स्वर में कहा तेरी मनोकामना पूरी होगी

          दूसरे दिन आचार्य ने एकलव्य को घर बुलवाया| उसे पूछा वत्स तूने अपने कमरे में मेरा चित्र क्यों टांग रखा है| एकलव्य ने कहा, क्योंकि आप मेरे गुरु है| और मेरी लिखी हुई कुंजीका तू सिरहाने रखकर  क्यों सोता है? इसीलिए कि दिन में प्राप्त किया हुआ बिखरा ज्ञान रात में परीक्षा के प्रश्नोत्तरों में सिमटकर बंध जाए| आचार्य ने ध्यान से देखा और फिर कहा यही तू मेरा शिष्य है तो मुझे गुरु दक्षिणा दे| एकलव्य ने उत्तर दिया मैं क्या दे सकता हूं गुरुवर ? न मेरी किराणा की दुकान है, न होजिरी की, न मेरे पिता से भी इमान बेचते कभी नहीं बना, इसीलिए निर्धन है| आचार्य ने कहा मैं वह वस्तु मांगता हूं , जो तेरे पास है| तू मुझे अपने दाहीने हाथ का अंगुठा काटकर दे दे| उठा वह सुपारी काटने का सरोता और काट दे अंगुठा| एकलव्य शांत था| वह मानो इसके लिए तैयार था| उसने कहा गुरु वर अंगुठा तो मैं आपको सहर्ष काट कर दे दूं, पर यह आपके के किस काम आयेगा| आचर्य ने कहा सो मैं नहीं जानता हूं|मुझे एक महान परंपरा का निर्वाह करना है| अर्जुन की भक्ति से मैं प्रसन्न हूं| मैंने उसे वर दिया है कि तू ही प्रथम आयेगा| पर वह तब तक प्रथम नहीं आ सकता तब तक तुम लिखने में असमर्थ न होगा| तू लिख न सके और मेरा वचन पूरा हो इसके लिए मुझे तेरा दाहीना  अंगुठा चाहिए| एकलव्य हंसा , बोला मगर दाहीना अंगुठा काट देने से भी  आपका उद्देश्य पूरा नहीं होगा गुरुदेव| मैं बाए हाथ से भी उसी कुशलता से लिख लेता हूं| जब से मैंने होश संभाला और अपने नाम पर ध्यान दिया तभी मैं समझ गया कि कोई गुरु कभी मेरा अंगुठा मांगेगा| मैं तभी से दोनों हाथों से लिखने का अभ्यास कर रहा हूं | दोनों अंगुठे कटने से आपका उद्देश्य पूरा हो सकता है, पर शिष्य के दोनों अंगुठे कटवाने की परंपरा तो अभी तक नहीं है |आचार्य निराश होकर बोले अधम तूने गुरु द्रोह किया तूने दोनों हाथों से लिखने का अभ्यास कर लिया खैर मेरे पास दूसरे रास्ते भी है| उस श्याम को आचार्य ने अर्जुनदास से कहा, उसका अंगुठा मैं नहीं ले सका| पर मेरे पास अकाढ्य दांव भी है| उससे वह बच नहीं सकता| तुम्हारा एक पेपर जांचने के लिए मुझे मिलनेवाला है| और दूसरा मेरे परम मित्र देवदत्त शर्मा को| इन दोनों में तुम्हें सौ में से निन्यांवे नंबर मिल जायेंगे| और तुम एकलव्य से आगे निकल जाओगे| उसकी दोनों अंगुठीया कट जायंगे उसकी तीव्र बुद्धि और अध्ययन धरे के धरे रह जायेंगे| अर्जुन निश्चिंत हो गया| उसे गुरु की क्षमता पर विश्वास था| वे विभाग में इतने प्रभावशाली थे कि उनके मर्जी के खिलाफ पत्ता तक नहीं हिलता था| पेपर हो गये| अर्जुनदास और एकलव्य दोनों ने यथा बुद्धि प्रश्नों के उत्तर दिए| एकलव्य के मन में शंका थी | पर अर्जुनदास बिल्कुल निशंक था| उसे गुरु कृपा प्राप्त थी| अंतिम पर्चा करके श्याम को अर्जुन आचार्य के पास आया| आचार्य मुंह लटकाए हुये बैठे थे| अर्जुन का उत्साह ठंडा पड  गया| वह आचार्य के मुंह के तरफ देखता रहा| आचार्य ने ठंडी सांसे खींचकर कहा मैं अधम हूं| मैं अपना वचन पूरा नहीं कर सकुंगा| भविष्य में कोई शिष्य गुरु की  सेवा नहीं करेगा और आगामी गुरुओं की पीढीयां मुझे धित्कारेगी| क्योंकि मैं जो चाहा था वह नहीं कर सका| अर्जुन ने पूछा पर क्या हुआ गुरुदेव?आचर्य बोले धोका हुआ| पेपर जांचने न मुझे मिला न देवदत्त शर्मा को | उपकुपति ने अपने हाथ से किन्ही अज्ञात व्यक्तियों को पेपर दे दिया है|अर्जुन ने कहा पर ऐसा हो कैसे गया? पेपर किसे जाना है यह आपने ही तय कराया था| आचार्य बोले पर एकलव्य ने मेरी रिपोर्ट कर दी थी | गुरु शिष्य दोनों सर झुकाये बडी देर तक बैठे रहे| अर्जुन ने कहा गुरुदेव प्राचीन काल में भी एक एकलव्य हो गया है न? आचार्य बोले हां, पर उसमें और इसमें बडा अंतर है| वह पुण्य का युग था, यह पाप का युग है| उस एकलव्य ने बिना तर्क किए अंगुठा गुरु को दे दिया था, इस एकलव्य ने गुरु को अंगुठा दिखला दिया है|


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