लिपि विकास का सामान्य परिचय :
प्रस्तावना :
लिपि, भाषा के अध्ययन का आधार है, क्योंकि ध्वनियों को रेखाओं में व्यक्त करने की कला ही लिपि कहलाती है। ध्वनियाँ अस्थायी होती हैं, तथा वक्ता और श्रोता के बीच सम्प्रेषण करती हैं। अतः इनके प्रसार की या सम्प्रेषण की एक सीमा होती है। लेकिन लिपि भाषा का वह स्थायी रूप है जो सदियों तक अक्षुण्ण रह सकता है तथा मानव की सभ्यता के विकास में भाषा के इसी लिखित रूप का महत्त्व सर्वोपरी है। इसका प्रसार अति व्यापक है तथा इसके संप्रेषण की कोई सीमा नहीं। लिपि द्वारा संसार में कहीं भी कभी भी संप्रेषण किया जा सकता है।
आदिमानव के पास पहले भाषा ही बनी होगी। एक दूसरे से अपनी वस्तुओं को अलग करने के लिए मनुष्य ने कुछ लिखित चिह्न बनाए होंगे। धोबियों के चित्र संभवतः उसी के अवशेष हैं।
लिपि शब्द का अर्थ :
'लिपि' शब्द संस्कृत के 'लिप' धातु से बना है। जिसका अर्थ है, 'लपेटना'। मानव भाषा को अंकित करने का साधन लिपि है। 'लिपि' का कोशगत अर्थ है 'लिखावट' भाषा का आधार ध्वनियां है, जो कानों से सूनी जाती है| इन कर्णगोचर ध्वनियों को दृष्टिगोचर बनाने के लिए जिन प्रतिक चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उन्हीं को लिपि या 'लिपि' चिन्ह कहते है|
जब मनुष्य की शाब्दिक अभिव्यक्ति को सांकेतिक चिह्नों के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए उन चिन्हों में उसका अर्थलीपन किया जाता है, तब लिपि का जन्म होता है। कि 88/166 समृद्धि में लिपि का योग सर्वाधिक होता है।
लिपि की उत्पत्ति :
लिपि की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न विचारधाराएँ प्रचलित हैं। अधिकांश विद्वान यही मानते हैं कि लिपि ईश्वर प्रदत्त होती है। देवनागरी लिपि का विकास ब्राहमी से माना जाता है। इसका तर्क यह दिया जाता है कि इस लिपि को भगवान ब्रह्मा ने बनाया है, इसीलिए यह ब्राह्मी कहलाती है। इसी प्रकार मिस्त्री लोग अपनी लिपि का कर्ता थाथ या आइसिस को, बेबोलोनिया के लोग नेबो को, पुराने ज्यू लोग मोजेज को तथा युनानी लोह हर्मेस या पैलीमीडस, प्रामे थ्युस, आर्फ्यूस तथा लिनोज आदि अन्य पौराणिक व्यक्तियों को मानते है| पर भाषा के भान्ति ही लिपि के संबंध में भी इस प्रकार के मत अंधविश्वास मात्र है| तथा यह सिर्फ एक कल्पना मात्र है। वस्तुतः लिपियों का विकास चित्रों, चिह्नों व आडी-तिरछी आकृतियों से हुआ है। ये चित्र या रेखाएँ मनुष्य ने अपनी तत्कालीन समझ एवं समस्याओं के अनुसार खींची थी, तथा समय-समय पर इसमें सुधार होते रहें और आज उसे यह रूप प्राप्त है।
लिपि का इतिहास :
लिपि का काल एवं स्वरूप विवादास्पद है। निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कब मानव ने लिपि के रूप में भाव-प्रकाशन का कार्य आरंभ किया। प्राचीनतम उपलब्ध सामग्नी के आधार पर कहा जा सकता है कि, 4000 ई. पू. के मध्य तक लेखन की किसी भी अभिव्यक्ति पद्धति का कहीं भी विकास नहीं हुआ था और इस प्रकार के प्राचीनतम अव्यवस्थित प्रयास 10,000 ई. पू. से भी कुछ पूर्व किए गये थे। इसका मतलब इन दोनों के बीच अर्थात, 10,000 ई. पू. से 4,000 ई. पू तक लिपि का विकास धीरे-धीरे होता रहा होगा। उपलब्ध विकास से यही तथ्य सामने आता हैं कि चित्रलिपि ही मनुष्य की आरंभिक लिपि रही होगी। प्राचीन मनुष्य द्वारा गुफांओं में अंकित चित्र ही इस तथ्य का आधार है।
लिपियों का विकास :
अ.क्र. काल लिपि
1. आरंभिक काल चित्र लिपि
2.विकास काल सूत्र लिपि
3.मध्यकाल प्रतीकात्मक लिपि
4.उत्तर मध्य काल भावमूलक लिपि
5.आधुनिक काल ध्वनिमूलक लिपि
6.अतिआधुनिक काल इलेक्ट्रॉनिक लिपि, कंप्यूटर भाषाएँ।
आरंभ में लिपियाँ चित्रमूलक थी, वे धीरे-धीरे चित्र से धागे के रूप में बदली और प्रतीक एवं भाव से होते हुए ध्वनिमूलक में पहुँची। इसका विकासक्रम उपरोक्त रूप से हैं।
चित्र लिपि :
लिपि का प्राचीनतम रूप इसमें मिलता है, लेखन के इतिहास की यह प्रथम सीढी है| चित्रों के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति चित्र लिपि के नाम से अभिहित होती है। यह भाव व्यक्त करने का आदिम तरीका है। प्राचीन काल में मानव गुफाओं की दीवारों पर या अन्य किसी वस्तु पर, पेड की छाल, लकडी, हड्डी या सींग जैसे कठोर सतहों पर आडी-तिरछी रेखाओं को उकेरकर लिखा करता था। ऐसे पुराने चित्र दक्षिणी फ्रांस, स्पेन, क्रीट, मेसोपोटामिया, ब्रिटेन, युनान, सीरिया, स्पेन, पुर्तगाल, ब्राजील, कैलिफोर्निया, आस्ट्रेलिया आदि जगहों पर मिलते हैं। जैसे
चित्र लिपि में किसी वस्तु को उसके चित्र द्वारा दिखाया जाता था। प्राचीन काल की यह लिपि, एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय लिपि थी। सर्वत्र लोग इसे समझ लेते थे। चित्र लिपि में स्थूल वस्तुओं का चित्रण तो हो सकता था। किंतु विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति इसमें संभव नहीं थी। आदमी का चित्र बनना सरल था पर किसी विशिष्ट व्यक्ति को चित्र के माध्यम से अंकित करना कठिन था। साथ ही साथ समाज में ऐसे कुछ व्यक्ति भी रहे होंगे जिन्हें चित्र निकालना संभव न था। वैसे लोगों को अपने विचार व्यक्त करना अत्यंत कठिन था।
चित्रलिपि की सिमाएं:-
इस लिपि में अनेक सिमाएं है वह इस प्रकार -
1) चित्रों की अनंतता इसकी सबसे बडी त्रुटी हैं| जितनी वस्तुएं अंकित करनी होती थी, उतने ही चित्र बनाने होते थे| साथ ही एक चित्र से एक ही वस्तु का भाव व्यक्त होता था|
2) व्यक्तिवाचक संज्ञा को व्यक्त करने का कोई साधन इसमें नहीं था, आदमी का चित्र बनाना सरल था किंतु यह कैसे समझ सकता है कि उनमें राम, मोहन, सोहन कौन है?
3) चित्र के लिए अधिक स्थान लगता है|
4) स्थूल वस्तुओं का चित्र बनाना संभव था, किंतु विचारों और भावों का चित्र नहीं बनाया जा सकते थे|
5) समय अथवा काल की अभिव्यक्ति इस लिपि के द्वारा संभव नहीं थी|
6) समाज में ऐसे कुछ लोग रहें होंगे, जो चित्र बनाने में समर्थ नहीं होंगे, ऐसे लोगों को अपने भाव या विचार प्रस्तुत करने में अत्यंत क्ठीनाई रही होगी|
7) शीघ्रता में ये चित्र नहीं बनाये जा सकते थे|
अत: यह कहा जाता है कि चित्र लिपि विकसित होते-होते प्रतीकात्मक हो गई। अत्यंत शीघ्रता की स्थिति में किसी व्यक्ति अथवा वस्तु का चित्रण पूर्ण न होने पर उसके स्थान पर प्रतीक मात्र ऐसी स्थिति में प्रतीकात्मक या रूढि-चिहनों को याद रखने की आवश्यकता महसूस होने लगी|
सूत्र लिपि :
यह लिपि विश्व के अनेक देशों में प्रचलित थी। इस लिपि को आज भी भारत सहित अनेक देशों में देखा जा सकता है। स्मरण के लिए आज भी लोग रूमाल, पल्लू आदि में गांठ देते हैं। प्राचीन काल में सूत्र, रस्सी, पेड की खाल आदि में गांठ लगाई जाती थी। धार्मिक कृत्यों में गांठ बांधना, पिपल के वृक्ष पर धागे के चक्कर आदि इसी के उदाहरण हैं। सूत्र लिपि को निम्न प्रकारों से व्यक्त किया जाता था-
रस्सी में रंग-बिरंगे सूत्र बांध कर।
रस्सी को रंग-बिरंगे रंग से रंगा कर ।
रस्सी या जानवरों की खाल आदि में विभिन्न रंगों के मोती, घोंघे, मूंगे या मनके इत्यादि बांध कर।
रस्सियों की विभिन्न लंबाईयाँ बनाकर।रस्सियों की विभिन्न मोटाईयाँ बनाकर ।
रस्सियों में भाँति-भाँति की विभिन्न दूरियों पर गांठ लगाकर।
डंडे के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न मोटाईयों या रंगों की रस्सियाँ बाँधकर ।
इस तरह के लेखन का उल्लेख 5 वीं सदी के ग्रंथकार रेहोडोटस् ने किया। पेरू, चीन, तिब्बत, बंगाल, जपान के द्विप, टंजानियाँ आदि जगह सूत्र लिपि मिलती है।
रंजानियाँ की सूत्रलिपि :
प्रतीकात्मक लिपि :
इस लिपि में संकेतों के माध्यम से संदेश संप्रेषण होता था। भावाभिव्यक्ति प्रतिकात्मक थी। इसे शुद्ध रूप से लिपि नहीं कह सकते, पर दूरस्थ व्यक्ति के लिए भावाभिव्यक्ति का एक साधन था। कई देशों और कबीलों में इसका प्रचार उस काल में प्रचलित था। तिब्बती चीनी सीमा पर मुर्गे के बच्चे का कलेजा, उसकी चर्बी के तीन टूकडे तथा एक मिर्च लाल कागज में लपेटकर भेजने का अर्थ होता था युद्ध के लिए तैय्यार हो जाओ। इसका नमुना भारत में भी देखा जा सकता है। जब किसी की मृत्यु का संदेश कार्ड पर भेजा जाता है तो कार्ड के एक कोने को काट दिया जाता है। कहीं खतरा हो तो लाल कपडा लहराते हैं। नए मकान और वाहन पर निंबू और मिर्च लटकाई जाती है। या काली हंडी में राक्षस का चित्र बना देते हैं। युद्ध में सफेद झंडा फहराना, स्काउटों का हाथ से बात-चीत करना इसी लिपि के अंतर्गत आता है।
निंबू के ऊपर 7 हरी मिर्च
शोक संदेश के लिए कोना कटा पोस्ट कार्ड
हंडी पर जीभ लपलपाता राक्षस
भावमूलक लिपि :
ऐसी लिपि जो भावों, विचारों तथा वस्तुओं को प्रकट करती है। यह चित्रों पर आधारित रेखात्मक लिपि होती है। यह चित्रलिपि का ही विकसित रूप है। दोनों में अंतर इतना है कि चित्र लिपि में पैर का चित्र पैर की अभिव्यक्ति करता है, किंतु भावमूलक लिपि में वह चलने की क्रिया का द्योतक है। आँखों के साथ ही आँसू चित्रित करने का भाव या दुःखी होना। इस लिपि के अनेक उदाहरण अमेरिका, चीन, उत्तरी अफ्रिका में मिले हैं। इस लिपि के द्वारा बडे-बडे पत्र भी लिखे जाते हैं। इस लिपि के बहुत से चिह्न चीनी लिपि में मौजूद हैं। चित्र लिपि की तुलना भाव-लिपि में अधिक सरल, कम समय लेनेवाली तथा अल्प श्रमसाध्य थी। फिर भी उसकी त्रुटियों से मानव परिचित था। इन्ही त्रुटियों को दूर करने के लिए मनुष्य ने ध्वनिमूलक लिपि का आविष्कार किया।
आजकल बुद्धि परीक्षा के लिए चित्र देकर उस पर कहानी या घटना का विश्लेषण कराना या चित्र कथा लिखना इस प्राचीन लिपी का आधुनिक रूप है। आजकल फोटोग्राफ या रेखाचित्र देकर बच्चों से कहानी लिखवाना इसी लिपि परंपरा का अवशेष है।
भाव-ध्वनिमूलक लिपि :
ऐसी लिपी कुछ बातों में प्रतीकात्मक होती है और कुछ बातों में ध्वनिमूलक। इसमें कुछ चिह्न चित्रात्मक होते हैं। कुछ भावमूलक और कुछ ध्वनिमूलक होते हैं अर्थात् इनमें इन सबका यथासंभव उपयोग होता है। मेसोपोटैमियन, मिस्त्री तथा हिंदी आदि लिपियाँ इसी लिपि के अंतर्गत आती हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार सिंधु घाटी की लिपि भी इसी श्रेणी की है।
ध्वनिमूलक लिपि :
इस लिपि में प्रत्येक ध्वनि के लिए एक अक्षर का या चिहन का संकेत निर्धारित कर लिया जाता है, तथा उसे उसी रूप में उच्चारित करना पड़ता है। इन अक्षरों को क्रम से लगाकर शब्द बनते हैं। शब्दों को व्याकरण के सहयोग से वाक्यों में परिवर्तित किया जाता है। तथा वाक्यों से अर्थ निकले जाते हैं। इस प्रकार की लिपि आधुनिक लिपि है। ध्वनिमूलक लिपि के दो भेद हैं-
अ) अक्षरात्मक लिपि :
इसमें चिहन किसी अक्षर को व्यक्त करता है, वर्ण को नहीं। नागरी लिपि इसका उदाहरण है। इसके व्यंजनों में जो ध्वनियाँ होती हैं; यथा, 'क' वर्ण में क्+अ दो वर्ण हैं। इसमें 'क' व्यंजन है और 'अ' स्वर है। यही कारण है कि व्यवहार में उचित होते हुए भी इस लिपि के वैज्ञानिक विश्लेषण में कठिनाई होती है। अरबी, फारसी, बांगला, गुजराती, उडिया, तेलुगू आदि लिपियाँ अक्षरात्मक ही हैं।
ब) वर्णनात्मक :
इसमें ध्वनि की प्रत्येक इकाई के लिए अलग चिह्न होते हैं और उनके आधार पर सरलता से किसी भी भाषा का कोई भी शब्द लिखा जा सकता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह आदर्श लिपि है। रोमन लिपि इसी प्रकार की है। इसमें 'K' में केवल 'क' ही होता है। इस लिपि का वैज्ञानिक विश्लेषण सरलता से किया जाता है।
इस प्रकार लिपि के विकास क्रम में चित्र लिपि प्रथम अवस्था की लिपि है और वर्णनात्मक ध्वनिमूलक लिपि अंतिम अवस्था की। चित्रात्मक लिपि का विकसित रूप भावमूलक लिपि है और भावमूलक लिपि का विकसित एवं श्रेष्ठ रूप ध्वनिमूलक लिपि है।
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