नागफनी आत्मकथा - रूपनारायण सोनकर

 नागफनी  आत्मकथा - रूपनारायण सोनकर 

            नागफनी  रूपनारायण सोनकर लिखित आत्मकथा है| यह दलितों के संघर्ष की कथा है, परंतु सबसे ज्यादा उनमें हो रहे वैचारिक परिवर्तन की कथा है| इस आत्मकथा का नायक तथा उसका समाज सवर्णो द्वारा किए गये प्रत्येक अत्याचार का उत्तर देते नजर आते है| केवल उत्तर नहीं देते तो उसमें वे जितते भी है| अर्थात यह आत्मकथा यह व्यक्त करती है कि प्रत्येक व्यक्ति में स्वाभिमान होता है, इसके लिए वह विशिष्ट जाती का होना आवश्यक नहीं| उसे अपनी गरिमा, इज्जत को सुरक्षित रखने का अधिकार है  परंतु कुछ ऐसे धार्मिक पाखंडी है जो धर्म के नाम पर मनुष्य - मनुष्य के बीच अंतर निर्माण करते है| ऐसे विचारों वाले लोग जब तक समाज में है तब तक समाज में उच्च-नीचता को लेकर अत्याचार होते रहेंगे| इसीलिए प्रस्तुत आत्मकथा में ऐसे लोगों को उनके कुकर्म की सजा देनेवाले दलित समाज का चित्रण कर  यह दिखाने का प्रयास  किया है कि  जिस दिन इस समाज से धार्मिक व्यवस्था तहस-नहस हो जायेगी उस दिन दलित समाज को मुक्ति का रास्ता मिल जायेगा| अत: यह  आत्मकथा दलित समाज को अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड से बाहर निकालनेवाली क्रांति  है|  जिसकी कहानी मुख्य घटना के साथ 58 प्रसंगों में चित्रित है| 

मुख्य प्रसंग:- आत्मकथा का प्रारंभ नसेनिया गांव की तीस वर्ष पहले की  प्रथा से किया है| एक प्रथा  है जौ उगाना और उसे  घडों में रख सर पर लेकर गांव भर चक्कर लगाना, जौ को सर पर लेने का अधिकार विशेषत:  ब्राह्मण  औरतों को था  और दूसरी प्रथा है गालों  में छेद करना, सांग छेदना भी कहते है |  जो गांव के कुडहा माई के ज्वारों के मेले के वक्त निभाई जाती है |  इसमें पहली प्रथा निभाने का अधिकार केवल ब्राह्मण, ठाकुर और यादवों है | गालों में छेद दलितों ने करना है| अपवाद स्वरूप कोई ब्राह्मण और यादव गालों में छेद करते है| छेद करने के लिए लोहे की छडी सुक्खी चमार करता है, जिसे सुक्खी बाबा कहा जाता है| गांवमें परिक्रमा करने के बाद सभी कोग 'कुडहा माई' के प्रांगण में इकठ्ठे होते है थे| फिर वहां सुक्खी बाबा गालों स सांग निकालते थे| उसके पहले भी कुछ करतब दिखाते थे| स्वयं लेखक ने अपनी गाल में  सांग आर-पार छेद ली थी | तब वे छठवीं कक्षा में पढते थे| गाल में छेद करने स बहुत दर्द होता है इसका एहसास तब उन्हें हुआ था| दर्द कम हो इसीलिए तो लोहे के नोक पर लिंबू का रस लगाया जाता था| उससे भी दर्द हो तो सुक्खी बाबा झाडफूंक करते थे| 

    इस मेले में एक ही बात आनंद पूर्णथी की साल में एक बार दलित औरतों को घर से बाहर निकलने का मौका मिलता था|वह मेले में जलेबी खाना पसंद करती थी| इस प्रसंग से यह पता चलता है कि समाज में जो प्रथा - परंपराएं है उनमें भी ब्राह्मणों को मान-सम्मान है और दलितों को संघर्ष और अपमान है| 

घटना एक : चाची द्वारा कलश सर पर रखने से ब्राह्मण द्वारा पिटाई: -

        चाची का कलश सर पर रखने से ब्राह्मण द्वारा चाची की पिटाई हुई, पर यह बदलाव की घटना थी|प्रथा के अनुसार ब्राह्मण औरतें जौ के पौधे का कलश सर पर लेकर जा रही थी कि सडक के पातली गली के मोड पर एक सवर्ण महिला गिर पडी | चाची औरतों के पीछे चल रही थी, उसने कलश को थाम लिया और अपने सर पर रखा| यह देख एक ब्राह्मण भीड को चिरते हुए आगे आया और गर्जते हुए बोला, ससुरी खटिकिन तेरी यह हिम्मत! देवी के कलश को अपने सर पर रख भ्रष्ट किया| इतना ही नहीं तो उसने चाची को डॉ-तीन लात भी मार दी| इससे चाची बहुत आहत हुई | उसके अपमान को देख सभी दलित मंदिर के प्रांगण में इकठ्ठा हुए| उस वक्त दलितों की तुलना में गैर दलितों संख्या कम थी | दलितों ने अपने अपमान का बदला लेने का ठान लिया था| मारपीट को रोकने के कुछ पढे-लिखे बुजुर्गों ने पंडित को समझाया| तब चाची को सर पर कलश रखने का अधिकार मिला था| सालों बाद दलित औरतों को समता का अधिकार मिला था| 

घटना दो - सुअर-गाय का अद्भुत युद्ध:-

        यह घटना  दलितों के खिलाफ षडयंत्र करनेवाले ब्राह्मणों से सजग रहने की प्रेरणा देती है | गांव में कुडहा माई मेला दो बार लगता है | दूसरी बार  मेला होली के त्यौहार के दूसरे दिन होता है | इस वक्त भी सुअर-गाय के बीच युद्ध होता है | वास्तव में यह एक धार्मिक युद्ध है, परंतु यह अधार्मिक बन जाता है कारण गाय यहां ब्राह्मण सेना की महानायिका तो सुअर दलित सेना का महानायक है | इस युद्ध में सुअर गाय को हराता है| इससे सवर्ण क्रोधित होते है| उन्हें ऐसे लगता है की सुअर की जीत यानी ग्राम प्रधान मंगली की जीत हैं | जैसे उसने ग्राम प्रधानी चुनाव में पद्मिनी पंडिताइन को हराया था | इसीलिए यहां दो धर्मो के बीच युद्ध सुरु होता है| इसमें दलित भी पीछे नहीं हटते| इसमें भी दलितों की ही जीत होती नजर आ रही थी तब पंडिताइन के पति ने यह कहकर युद्ध रोक दिया कि हमने जानवरों के युध्द को आदमियों का युद्ध बना दिया| जो हमारे विचारों ए बिल्कुल गलत है| मंगली भी यह नहीं चाहता था, इसीलिए उसने अपने आदमियों को हत्यार फेंकने के लिए कहा | तब सवर्णो ने धूर्तता से सुअर को मारा इस प्रकार दलितों को जीतता देख षडयंत्र से उन्हें हराया| सबके आंखो में आंसू आ गये| सुअर की समाधी इसीलिए बनवायी गयी कि इसके आगे ब्राह्मणों के षडयंत्र से सजग रहना| 

घटना तीन  - कुश्ती में दूसरे गांव के पहलवान को पछाडना:-

            यह घटना  दलितों के कामयाबी पर गुस्सा होनेवाले सवर्णो के नीति बताती है| आत्मकथा का नायक हीरा को कुश्ती को बहुत शौक था| वह बाहर गांव में जाकर भी कुश्ती खेलता था और जीत भी जाता था| इसपर वाल्मीकि ढोल बजाता, ब्राह्मण उस गुस्सा होते| उन्हें गर्व नहीं होता था कारण हीरा खटिक जाती का था अत: खटिकों बहादुरी उन्हें रास नहीं आती थी| परंतु खटिक बहुत ही बहादुर कौम के होते है| स्वाभिमानी होते है | हीरा ने जितनी भी कुश्तियां जीती है वह चमार जाति के व्यक्ति हराकर जीती है| वह गैर दलित से कुश्ती खेलना चाहता था | यह मौका उसे गुडिया के त्यौहार में होनेवाले दंगल में मिला| ब्राह्मण हीरा को हाराना चाहते थे इसीलिए पासवाले गांव के  श्रवण नामक तगडे  ब्राह्मण  लडके से हीरा की कुश्ती लगवाई | यह कुश्ती हीरा ही जीत जाता है| तब मैदान में आकर पांच - छह ब्राह्मण लडके हीरा को मारने लगे| इसपर भी हीरा ने हार नहीं मानी श्रवण को रगड-रगड को मारा| 

घटना चार  - हमको सडी लाश मानकर घर में गंगाजल छिडकना:- 

        यह घटना जाती मनुष्य को एक दूसरे से दूर करती है इस बात का एहसास दिलाया है| यह घटना 1970 की है| जब हीरा गांव नसेनियां से 15 कि.मी. दूरी पर स्थित बिंदकी गांव में दसवी  में छात्रावास में रह कर पढ रहे थे|  तब उन्हें बडे भाई डॉ. बद्री प्रसाद लेने आए थे| जो सहायक विटरनी ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे| दोनों साइकील से अपने गांव जा रहे थे| जुलाई का महिना था| बीच में ही जोरों की बारीश शुरू हुई| तब वे देवरी गांव में रुकते है| यहां वे रुकते वह मिश्रा नामक ब्राह्मण का घर था| जो एक अध्यापक थे | जब  तक उन्हें इनकी जाती का पता नहीं था तब उनका बहुतसम्मान करते है| उन्हें कपडे बदलने के लिए देते है | खाना देते है| पर जाब उन्हें उनकी जाती पता चलती है उन्हें घर से निकाल देते हैं, इतनाही नहीं तो कपडे के 600 रुपये मांगते है|  वे उनको इसतरह देख रहे थे जैसे किसी आदमी की लाश बहुत दिनों ए रखी हुई सड रही हो| 

घटना पांच  - मैंने एक लोटा पानी पिया ब्राह्मणों ने मेरा दो लोटा खून बहाया:-


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