मारवाड़ी

 मारवाड़ी

        राजस्थानी बोलियों में से पश्चिमी राजस्थानी की एक प्रमुख बोली है| जिसका विकास शौरसेनी के नागर अपभ्रंश से हुआ है| 

मारवाड़ी राजस्थानी की सर्वप्रमुख बोली है। इस बोली का उल्लेख 'कुवलयमाला' (778 ई.) में 'मरूभाषा' नाम से हुआ है। मारवाड़ी बोली की लिपि महाजनी रही है किंतु वह प्रायः नागरी लिपि में लिखी जाती है। जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या लगभग 65 लाख थी। सन् 1971 ई. की जनगणना के अनुसार यह संख्या 6242449 है। साहित्यिक दृष्टि से यह बोली समृद्ध है।

अन्य नाम :

मुख्य रूप से मारवाड़ की बोली होने के कारण यह मारवाड़ी कहलाती है। इसे 'अगरवाला' भी कहा गया है। साहित्यिक मारवाड़ी को प्रायः 'डिंगल' नाम से जाना जाता है। इसे 'मरू'भाषा' के रूप में भी संबोधित किया जाता है।

क्षेत्र :

मारवाड़ी बोली मारवाड़, जोधपुर, मेवाड, सिरोही, पूर्वी सिन्ध बीकानेर, जैसलमेर, दक्षिणी पंजाब तथा उत्तर-पश्चिमी जयपुर में बोली जाती है। इसका परिनिष्ठित रूप जोधपुर के आसपास का है।

साहित्य :

राजस्थान का लगभग सम्पूर्ण साहित्य मारवाड़ी के साहित्यिक रूप 'डिंगल' में लिखा गया है। वस्तुतः 'डिंगल' मारवाड़ी की साहित्यिक शैली है जिसमें यहाँ के चारण कवियों ने काफी साहित्य लिखा है। पृथ्वीराज रासो जैसा विशाल महाकाव्य इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। मीराबाई की रचनाएँ भी मारवाड़ी बोली में ही रचित हैं।अत: मारवाडी में साहित्य और लोक साहित्य दोनों है| 

विशेषताएँ :

मारवाड़ी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1. मारवाड़ी बोली में ऐ और औ का उच्चारण तत्सम शब्दों में अइ, अए और अउ, अओ जैसे होता है।

2. मारवाड़ी में अनेक स्थानों पर 'च्' और 'छ' का उच्चरण 'स्' हो जाता है, जैसे चक्की सक्की, छाछ > सास आदि।

3. मारवाड़ी बोली में 'ल' के स्थान पर 'ळ' का उच्चारण होता है, जैसे बाल बाळ, जल > जळ, काला > काळा आदि।

4. मारवाड़ी में 'न' के स्थान पर 'ण' का उच्चारण होता है, जैसे पानी पाणी, नानी नाणी आदि।

5. मारवाड़ी बोली में शब्द के प्रारम्भ में 'स्' ध्वनि की जगह 'ह' का उच्चारण होता है, जैसे सड़क > हड़क, साथ हाथ आदि।

6. मारवाड़ी में हकार (ह) का लोप होता है रहणो रैणो, कहयो > कयो आदि।

7. मारवाड़ी बोली में अल्पप्राणीकरण पाया जाता है, जैसे भूख भूक, हाथ > हात

8. मारवाड़ी बोली में संज्ञा के निम्न रूप मिलते हैं, जैसे घोड़ा, घोड़ो, घोड़े, घोड़ौ, घोड्या आदि।

9. मारवाड़ी में प्रयुक्त कुछ सर्वनाम दृष्टव्य हैं म्हूं, म्हे, अयाँ, तू, थू, थे, ताथे, तायां, ऊ, वा, उण, उणी, जिको, कुण आदि।

10. मारवाड़ी बोली के विशेषण भी विशिष्ट हैं, जैसे दोय, दोयाँ, चिथार, च्यार, छव, पैलो, दुजो, चोथो, छट्ट्ठो आदि।

11. मारवाड़ी की कुछ क्रिया निम्नलिखित हैं चलूँ, चळियो, चळतो, चळहूँ, चळहाँ आदि।

12. मारवाड़ी में निम्न क्रियाविशेषण प्रयुक्त होते हैं अबै, अमै, जदी, जदै, अठी, अठै, ईठै, ऊँठें, कठै, कैंठे आदि।

13. मारवाड़ी बोली के पर्सों में कर्म-सम्प्रदाय के स्थान पर नै, ने, कने, रै, करण-अपादान के स्थान पर- सूँ, ऊँ, संबंध में रो, रा, री, नौ को और अधिकरण में में, माँ, माई का चलन है। मारवाडी में देशज शब्दों की बहुलता है| जैसे- गंडक (कुत्ता) डीकरो(पुत्र), जीमण (भोजन) 

बोऊ नमूना - एक मिनख रै बे/दोय दिकरा ता/हा। ... उन बिरियाँ बड़ो दिकरो खेत में तो/हो। हमें हूँ उठर आपरे बाप कने जाऊ अरे/नै उणने कइस ।

14) मारवाडी में दो क्लिक ध्वनियां है - ध और स | ध का उच्चारण ध-द के बीच और स का उच्चारण स-ह के बीच होता है| 

15) मारवाडी में स का उच्चारण कुछ-कुछ 'श' के समान होता है| जैसे- सर्फ-शर्फ, समुद्र-शमुद्र, सडक-शडक 

16) मारवाडी में विशेषण की तुलना बताने के लिए 'सूं' के अतिरिक्त 'करतां' का प्रयोग किया जाता है| जैसे- सोअग करतां मोअन  भलेरो है| (सोहन से मोहन भला है|)

17) सर्वनामों मारवाडी में रूप विविधता अधिक है| जैसे मैं के लिए मूं , हूं, म्हैं, म्हं और यह के लिए यो ओ इ.|

18) मारवाडी में भविष्यकाल के लिये ग स ल अतिरिक्त इसमें 'ह' रूप भी प्रयुक्त होता है|  

19) सहायक क्रिया ह्व  रूप भी मारवाडी की मुख्य विशेषता है| जैसे - ह्वमं (हम हों), ह्वती (होती), ह्वऊला (हूंगा) 

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