लडाई

 लडाई सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

पात्र 47

अखबार बेचते बच्चे/ गायक/सत्यव्रत/ स्त्री/ बच्चा(अतुल शर्मा) रोटीवाला/ आदमी-1/ आदमी 2/ आदमी 3/ आदमी 4/ बुजुर्ग/ प्रिन्सिपल/ कंडक्टर / वह आदमी/ यात्री 1/ इस्पेक्टर / यात्री 2 / और लोग/ चपरासी / अधिकारी/ संपादक/ ग्रामीण-1/ ग्रामीण 2/ ग्रामीण-3/ औरत/ डॉक्टर / नर्स/ पत्नी/ मिनिस्टर का आदमी पुलिस/ दरोगा/ बदमाश/ भिखारी-1 / भिखारी-2 / सेठ/ नौकर/ चाटवाला/ लडका- 1/ लडका- 2/ लडका- 3/ लडका- 4/ लडकी 1/ लडकी 2/ लडकी- 3/ गरीब आदमी/ बुद्धिजीवी / महेश्वरानंद 

भूमिका दृश्य

उद्धोषक: - बत्तीस  साल... आजादी के बत्तीस साल ...लडाई, उदासीनता से लडाई, जहालत से लडाई, गंदगी, बदनीयती, बेईमानी से लडाई... लडाई खत्म नहीं हुई, जारी है| गरीबी से लडाई, मानसिक गुलामी से लडाई, औपानिवेशिक संस्कार से लडाई, सामंती स्वभाव से लडाई... लडाई खत्म नहीं हुई जारी है| भाषावाद से लडाई, जातिवाद से लडाई, धर्मांधता से लडाई, क्षेत्रीयता से लडाई, लडाई खत्म नहीं हुई, जारी है| और, इस लडाई में हर आदमी अकेला, आस्था और विश्वास से टूटा हुआ| झूठ के विराट रेगिस्तान में अकेला, अकेला...अकेला! सत्य की ईश्वर है’, महात्मा गांधी ने कहा था, लेकिन कहां है सत्य? कहां है ईश्वर?

 कुछ अखबार बेचनेवाले गरीब बच्चों का मंच पर प्रवेश

बच्चे  - पढिए, पढिए, आज की ताजा खबर- गांव के गांव सूखे की चपेट में| भीषण अकाल... आदमी पेड की छाल खा-खाकर जिंदा...सांप्रदायिक दंगे, लाखों की संपत्ति स्वाहा, बर्बरतापूर्ण कत्लेआम ...तस्करी में लाखों सोना पकडा गया... पढिए, पढिए आज की ताजा खबर! हरिजन जिंदा जलाए गए, दलबदल की राजनीति, सरकार बदली, सरकार गिरी, राष्ट्रपति शासन लागू, नक्सलवादियों और पुलिसों में टकराव, बम विस्फोट, गुप्त अड्डे पकडे गए, विद्यर्थियों पर आंसू गैस, पुलिस पथराव, विश्वविद्यालय में पुलिस, स्कूल-कालेज बंद व परीक्षाएं स्थगित, बसें जलाई गयी, संसद और विधानसभा में हंगामा ...

हिंसा, हंगामा, झगडे-फसाद, झूठ और फरेब, बेईमानी, धोखाधडी, मस्करी- आखिर कब तक? वही खबरें, सडता हुआ समाज|कोई तो लडे, कोई  भी...
           (गायक का प्रवेश वह एकतारे पर गाता है
|)
इसी फरेबी दुनिया में है /एक सत्यव्रत का भी नाम,
जिसने सोचा
,नहीं आज से /गलत करुंगा कोई काम|
खुद भी नहीं करुंगा
, औरों / को न गलत करने दूंगा|
शुरू लडाई हुई अभी से
,
हो
, जो होना हो अंजाम|”

दूसरा दृश्य सडक पर घटित होता है कारण सत्यव्रत ने झूठ के खिलाफ लडने का बिडा उठाया है| हर जो झूठ बोलता है, उसके खिलाफ वह लडने वाला है| पत्नी से झगडा कर वह घर से  बाहर निकल आता है और सडक पर साइकिल पर सवार एक रोटीवाले से टकरा जाता है|
          सत्यव्रत चिल्ला उठता है और रोटीवाले को ही रास्ते पर चलने का तरीका सिखाता है
| रोटीवाला उसे अपना रास्ता नापने की बात करता है| सत्य व्रत उसे पहचान लेता है| कल रात मेरे घर में  ताजी रोटी कहकर बासी रोटी देनेवाला यही है|सत्यव्रत उसे बेईमान कहने लगता है| रोटीवाला कहता है अगर आपको रोटी बासी लगती है, तो मत लो पर बेईमान-मेईमान कहने की कोई जरुरत नहीं| मैं बेईमान को बेईमान ही कहुंगा|
          इसपर दोनो में झगडा सुरु होता है
| भीड जमा होती है| भीड में से आदमी 1 कहता है| आपको को नापसंद हो तो मत लो, पर किसी को बेईमान कहना ठीक नहीं है| इसपर सत्यव्रत चीडकर कहता है| यह आप सबको भी ठग रहा है| आदमी 2 कहता है कोई इसे ठग रहा होगा , हिसाब बराबर|ऐसे हिसाब बराबर नहीं हो सकता| कोई भी किसी को न ठगे तभी हिसाब बराबर हो सकता है| बीच में आदमी 3 कहता है , हां है तो, पर जिधर हवा वहां पीठ करते है| ज्यादा तिसमारखां बनेगे तो तुम्हारे जैसी हालत हो जायेगी|
          सत्यव्रत कहता है मेरी क्या हालत है
| आदमी 3 कहता है भाई लोग बताओ इनकी क्या हालत है| लोग हंसने लगते है| आदमी 4 कहता है थोडे में बच गए नहीं तो हाथ पैर तुडवा लेते|  बीच में एक बुजुर्ग आदमी पडते है और सत्यव्रत को समझाते है कि आप शरीफ आदमी है ? कहां उलझते है? इस तरह लडाई करते रहेंगे तो कैसे चलेगा| किस-किस के साथ आप लडेंगे| बेहतर यह है कि आप आंख, कान और मुंह बंद करके रहो| मतलब अन्याय को स्वीकारना|
          लडाई से बेहतर यही है
| और यही हम कर सकते है| हम कुछ नहीं कर सकते| बीच में रोटीवाला बोलता है , कर सकते है न आप ? दूसरो को झूठा और बेईमान बताने का काम! इस पर भी लोग हंसते है| बुजुर्ग आदमी सत्यव्रत को चुप रहने के लिए कहते है|रोटीवाला उसपर गुस्सा होता है और ताजी रोटी कहके आगे निकल जाता है|

तीसरा दृश्य सत्यव्रत के बेटे के स्कूल में घटित होता है| सडक पर रोटीवाले से लढकर सत्यव्रत स्कूल में पहुंच जाता है | कारण उनका बेटा अतुल शर्मा, जो दूसरी कक्षा में पढता है, उसकी किताबें चोरी हो गयी थी| परंतु प्रिन्सिपल ने उसकी शिकायत सुनने से इन्कार किया था| कारण वह अपनी भाषा में पूछ रहा था| अपनी भाषा में पूछने क्या फर्क पडता है यह पूछने के लिए वे स्कूल पहुंच गये थे| तब प्रिन्सिपल वहां  बैठे थे|आपने मेरे बेटे की शिकायत क्यों नहीं सून ली| अपनी भाषा में भी शिकायत की जा सकती है और आप सून भी सकते है| फिर यह कैसे जबरदस्ती है कि वह अपनी शिकायत अंग्रेजी में ही करें|
प्रिन्सिपल इस कहते है
, याह स्कूल के डीसिप्लिन का मामला है, आप इसमें इंटरफियर न करें | आप गार्जियन लोग ही डीसिप्लिन बिगाडते है|
अपनी भाषा में कहने से डीसिप्लिन  बिगडता है
| तब प्रिन्सिपल यह समझाने का प्रयास करते है| खाली भाषा की बात नहीं और भी बहुत बातें है|परंतु सत्यव्रत एक बात सून नहीं लेते उल्टा प्रिन्सिपल पर ही भडक उठते है| “मैं यहां खाली भाषा की ही बात करने आया हुं| आपका का स्कूल इंग्लैंड में नहीं है, हिंदुस्तान में है| आप भी इंग्लैंड से नहीं आए , यही के है अपनी भाषा में शिकायत नहीं सून सकते है| या आप उसे अंग्रेजी न आने की तकलीफ देना चाहते है| अपनी भाषा में अपनी बात कहकर अपना काम कर लेना यह संतोष उसमें आप जगाना नहीं चाहते|             
इस पर प्रिन्सिपल  कहते है कि यह शिक्षा की बात है आप नहीं समझेंगे इस पर सत्यव्रत कहता यह शिक्षा नहीं नई पीढी को नपुंसक बनाने की जालसाजी है
| चंद पैसे वाले बच्चों को आप ऊपर उठाना चाहते हैं| उन्हीं को बढावा देना चाहते हैं| काम आमदनी वाले गरीब घरों जे बच्चों को, जिंके मत-पिता न मंत्री है, न पैसे वे है, न बडे-बडे ओहदों पर हैं, उन्हें आप नीचे दबाना चाहते हैं| और हर तरह से दबाते है| जब वे निराश होते है, घबराते है, बैचेन होते है क्योकि अपना भविष्य अंधकारमय देखते हैं, तो आप उसे अनुशासनहीनता, विद्रोह, जाने क्या-क्या कहते हैं| मैं इतना समझता हुं| अगर आप इतना समझते है , तो खुद का स्कूल क्यों खोल नहीं लेते प्रिन्सिपल कहते है| यह स्कूल हमारा ही है| सरकार और जनता के पैसे पर चलता है|  सत्यव्रत ने कहा | पर इसे चलाने के हमें नियुक्त किया है | शिक्षा के कुछ नियम, कानून होते है उसके तहत ही हम काम करते है|
          इसका मतलब आपके के कानून में अंग्रेजी में ही शिकायत सुनने की बात है
| हां,  यही नियम है| आपको यह पसंद  नहीं तो आप अपने बच्चे को अलग स्कूल डाल सकते है | जहां आपके हिसाब से आपका बच्च्चा ज्यादा तरक्की करेगा|   वैसे तो आपका बच्चा बहुत कमजोर है| आप कल अपने को स्कूल से निकाल के ले जा सकते है| अब आप जा सकते है, मुझे बहुत काम है| प्रिन्सिपल उठकर जाने लगते है|
          ले जाऊंगा जरूर ले जाऊंगा
| आप जैसी शिक्षा देते है, उससे अनपढ बच्चे भले| | आप सब अच्छे स्कूलइसीलिए कहे जाते हैं कि विदेशी भाषा के गुलाम हैं, और यही गुलामी सिखाते है|
          अपने ही देश में अपनी भाषा के लिए लढना पड रहा है वास्तव में यह सत्य है पर यह सत्य को किसी को मंजूर नहीं
|

   चौथा दृश्य बस  में घटित हुआ है| कारण सत्यव्रत स्कूल से राशन दफ्तर की ओर निकल पडा है| तब वह बस से प्रवास करता है| बस में वह देखता है कि कंडक्टर पैसे तो लेते पर टिकट नहीं देते है| इस सत्य व्रत देखता है कंडक्टर ने पैसे तो लिए पर उस आदमी को टिकट नहीं दिया | कंडक्टर को उसे टिकट देने के लिए कहा जाता है| पर कंडक्टर कहते कि मैंने तो टिकट दिया है| इसपर सत्यव्रत कहता है मैंने देखा है आपने केवल पैसे लिए टिकट नहीं दिया| कंडक्टर क्रोधित होकर बात करता है, जरा जबान संभालकर बात कीजिए| आपके सामने वह आदमी है , आप पुछिए इसे|
          वह आदमी मुस्कुराकर कहता है टिकट तो मैं सालभर पहले ही ले चुका हुं और उतर जाता है
| झूठ के खिलाफ वह कंडक्टर से लडने लगता है| परंतु यहां भी सत्यव्रत ही हार जाता है| कारण वह सत्य बोल रहा है इसका कोई सबूत नहीं था| अर्थात सत्य को सबूत की जरुरत होती है , इसे बताने के प्रयास इस दृश्य में किया है| बिना सबूत के कोई बात सत्य नंही मानी जाती|     
          फिर सत्यव्रत चुप नहीं रहता कहता कि मैं आगे तेरी जांच करुंगा| कंडक्टर कहता कि बडा आया जांच करवानेवाला, तेरे जैसे बहुत देखे है| तेरी जैसे यहां चोर नहीं बसते| सत्यव्रत कहता है कि तुम चोर हो|
          तब कंडक्टर उसकी गर्दन पकड लेता है और कहता है कि जबान खींच लूंगा
|
          बीच में यात्री 1 सत्यव्रत को कहते है अगर वह आदमी कह रहा है कि उसने टिकट लिया है
,  तो आप क्या कर सकते हो?   इतने वहां इन्स्पेक्टर आते है| सत्यव्रत उन्हें शिकायत करता है कि यह कंडक्टर गडबड आदमी है| पैसे जेब के हवाले करता है, टिकट नहीं देता| इन्स्पेक्टर पुछते क्या आपको टिकट नहीं दिया है| मुझे दिया  है पर पिछले बस स्टाफ पर एक आदमी के पैसे खा गए है| मैंने देखा है|
          बीच में कंडक्टर बोलता है अपनी आंखों का इलाज करवा लेना वरना कोई आंखे निकाल लेगा
| इन्स्पेक्टर सत्यव्रत को ही समझाते सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालना और उनसे लडना भी जुर्म है क्या आप यह जानते नहीं|    पर उसके गलत काम की शिकायत करना भी फर्ज है यह भी जानता हुं| पर आपके पास इसका कोई सबूत है, ऐसा इन्स्पेक्टर पुछते है| तब भी सत्यव्रत कहता है कि मैंने देखा है| परंतु अन्य लोगों ने इससे उल्टा देखा है| बीच में दूसरा आदमी तैश में आकर कहता है| क्या सबूत है आपके पास?
          सत्यव्रत चुप हो जाता है
|
सबूत तो दूसरा आदमी ही था पर वह भी कंडक्टर की पक्ष में बोल रहा था
|  तब कंडक्टर पास में आकर कहता है शरीफ आदमी हो शरीफ आदमियों की तरह रहो| इसका मतलब यह है गलत काम को देखूं, तो भी चुप रहूं और यदि बोलने को कहा जाए तो झूठ बोलूं...
गायक
राशन दफ्तर पहुंचे वह/जो है सबसे ज्यादा बिमार,
चोरी
, घूस, निक्म्मेपन का /जहां लगा रहता है दरबार|
भूखा और लाचार आदमी / उससे नित टकराता है
, अन्न दूसरे ले जाते हैं,
और वह कंकड खाता है
|

दृश्य पांचवा राशन की दफ्तर में घटित होता है| सत्यव्रत लगभग एक घंटा हुआ अधिकारी को मिलने के लिए बाहर बैठा है| कारण अधिकारी की किसी के साथ मिटिंग चल रही है| उसे लगता है चपरासी झूठ बोल रहा है| वे चपरासी से कहता है कि भीतर जाकर कह दे पहले जनता का काम करें, फिर से बातें करें, कारण उनका समय भी फालतू नहीं है| 
          चपरासी कहता है थोडा धीरे बोले और कायदे से बोले
| कायदा क्या केवल मेरे ही है? दूसरों के लिए नहीं ? सत्यव्रत कहता है |कायदा सबके लिए है, पर बडे साहब आए है, मीटिंग हो रही है, साहब काम में है| हम क्या बेकार यहां बैठे है? मीटिंग नहीं हो रही गप्पे लढा रहे है| मैं सब जानता हुं मीटिंग नहीं तो चीटिंग हो रही|
          चपरासी गुस्से से कहता है
, उल्टी-सीधी बातें मत करो यह सरकारी दफ्तर है हंसी-खेल नहीं| आप लोगों इसे हंसी-खेल ही तो बना रखा जनता की परेशानी आप कभी समझते ही नहीं|
         
चपरासी कहता है कि चुप करते हो या नहीं? बडे आए जनता वाले? महत्मा गांधी बने हैं| खूब जानता हूं तुम लोगों को|इसपर सत्यव्रत जोरों से बोलने लगता है क्या जानते हो तुम, तुम तो उतना ही जानते हो जितना तुम्हें दिखाया जाता है|
तब अधिकारी शोर  सुनकर बाहर आता है
|
          चपरासी कहता है यह आदमी ... अधिकारी पुछते हैं क्या चाहते हो आप
? आपसे कुछ बात करना चाहता हूं| पिछले एक महिने से मेरा राशन कार्ड पडा है| दफ्तर के लोग घूस चाहते हैं| नहीं बना रहें|
अधिकारी इसका सबूत मांगते है
|सत्यव्रत कहता है महिने से ऊपर हो गये है बन नहीं रहा इसका मतलब के घूस चाहते है| और कोई बात हो सकती है| आप अपनी शिकायत लिखकर शिकायत पेटी में डाल दीजिए, अधिकारी कहता है|
          कई बार डाल चुका हूं
| शिकायत पेटी धोखे की टट्टी है| फरेब है| काम न करने , टालने का बहाना है| सत्यव्रत कहता है| तब अधिकारी यह बताते है शिकायत लिख लो | उस पर भी हंगामा करें तो दफ्तर के बाहर निकाल दो| और चले जाते है|  तब सत्यव्रत चिल्लाने लगता है कि शिकायत पेटी वह ताबूत है जिसमें हर चीज जाकर द्फनाने के लिए लाश में बदल दी जाती हैं... लेकिन मैं कुछ दफन होने नहीं दूंगा| तब चपरासी खींचकर उसे दफ्तर से बाहर निकलता है|
गायक :-
सोचा लोकतंत्र है यह/जिसका प्रहरी अखबार है|
उस पर उस भोली जनता का / जो भी एतबार है
|
यही सोच सत्यव्रत पहुंचता है /दफ्तर अखबार के
,
जहां उसे पडते हैं कोडे/और झूठ की मार के
|” 

संपादक कहता है कि इतना नाराज क्यों होते हो मैं तुम्हारा काम मिनटों में कर दूंगा, बस एक लेख लिख ले| खाली मेरा काम होने से क्या होगा, हजारों आदमी यहां परेशान हैं, मैं तुम्हारे पास सिफारिश के लिए नहीं आया हूं, शिकायत लेकर आया हूं| अखबार लोकतंत्र का पहेदार हैं | तुम्हें जगाना चाहता हूं|दृश्य छठा दैनिक अखबार सत्यपथ  में घटित होता है| संपादक कुरसी-मेज लगाए बैठे है| सत्यव्रत पहुंचता है और कहता है कि मुझे राशन दफ्तर के खिलाफ अखबार में चिठ्ठी छपवानी है|
          संपादक कहते है कि अच्छा हुआ तुम आए मेरे दोस्त
| ‘सत्यपथका विशेषांक निकलने जा रहा है| स्वतंत्रता के बाद के भारतीय समाज की प्रगति पर तुम्हारा एक लेख चाहिए| मैं तुम्हारी यारों की सूची जानता हूं, सत्यव्रत कहता है|पर मैं यहां राशन अधिकारी के खिलाफ पत्र छपवाना  चाहता हूं | मैं तुम्हारा काम करुंगा बस एक लेख लिख दो| बस मेरा काम होने से नहीं चलेगा| हजारों आदमी यहां परेशान होते है| इसीलिए मैं यहां शिकायत लेकर आया हूं | इतना क्रोधित होने की जरुरत नहीं कल तुम्हारा काम हो जायेगा| बस तुम स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाज की प्रगति पर एक अच्छा सा लेख लिखना व्यवस्था पर ज्यादा कडवी आलोचना न करना कारण विज्ञापनों का सिलसिला शुरू होनेवाला है|इस पर सत्यव्रत क्रोधित होकर कहता है तुम अपने पत्रिका नाम बदलकर कर असत्यपथरख लो| तुम नाराज मत हो जाओ हमें पत्रिका की आर्थिक स्थिति भी सुधारनी है | व्यवस्था के खिलाफ लिखकर कैसे चलेगा | कुछ तो देश की प्रगति हुई होगी न? इस पर सत्यव्रत कहता है ,/’हां जरूर हुई है | लेकिन इतनी कि लोग खुद को और दूसरों को और अधिक ठगना सीख गये है| चोरी, मक्कारी, फरेब सब के भाव चढे हैं और लोग उन पर आदर्शों का अच्छे से अच्छे लेबिल लगाना सीख गये है| यही सही लिखना पर व्यवस्था पर सिद्ध आक्रमण न करना|इस पर सत्यव्रत कहता है मैं लिखूंगा कि आपकी पत्रिका भी बिकी हुई है| संपादक कहता है यहां बिका कौन नहीं है?  सब के सब बीके हुए है| इसके खिलाफ ही हमें आवाज उठानी है सत्यव्रत कहता है| यह हमारा फर्ज है | इस संपादक उसे समझाता है पर यहां सूननेवाला कोई नहीं तुम किस दुनिया में रहते हो? यहां झूठ की लडाई के लिए लोग सत्य की ढाल बना रहे है| यही सिखाया है आझादी ने हमें! लोग जल्दी मंजिल पाने के लिए किस कदर गिर रहे यह देख सत्यव्रत उदास होता है | जिसमें लोकतंत्र के पहारेदार भी शालिम है अर्थात अखबार भी शामिल यह देख वह वहां से तिलमिलाकर निकलता है|
         

 बारहवां :-

    सत्यव्रत गरीब आदमी के साथ परलोक आश्रम में पहुंचता है , जहां स्वामी महेश्व रानंद गद्दी पर बैठे है| सत्यव्रत उन्हें देख कहता है कि आप ही महेश्वरानंद है? क्या आप शांति के लिए साठ लाख रुपये खर्च कर रहे हो?  धर्म के नाम आप जो धन का जो दुरुपयोग कर रहे हो इससे मुझे आपत्ती है| आप कितना घी और अन्न जला रहे हो उतने में स्कूल और अस्पताल खोले जा सकते है| देश में गरीबी, अशिक्षा ,हिंसा  न जाने कितनी समस्या है| पर आपकी अध्यात्मिकता अफिम का काम कर रही है| आप दूसरों की खून- पसीने की कमाई पर मौज उडा रहे यह पाप है| तुम पापी हो तुम्हारा ढोंग मैं समझता हूं| स्वामी उसे समझाने का प्रयास करते है कि तुम अपने कर्मों से दुखी हो गये हो| मन का शांत रखना सिखो,  जमाना बदल जायेगा पर सत्यव्रत कहता है की आप जैसे लोग यहां है तब तक जमाना नहीं बदल सकता| आपकी तानशाही इतनी बढी है कि अब यह शोषण का चक्र खत्म करना होगा | अब आपकी पोल खोलनी होगी| तब महेश्वरानंद चीखकर  कहते है कि यह आदमी नास्तिक है| धर्म का शत्रु ई इसे यहां से निकालो| तब स्वयं सेवक उसे घसीटकर बाहर कर देते है| 

तेरहवां अंक :-

    सत्यव्रत थका, हारा, बुखार में तपता हुआ एक पार्क में आंख बंद किए हुए पडा है| इतने  आदमी छुरा लिए आता है और दूसरे आदमी को मारता है| इतने पुलिस वहां आती है और सत्यव्रत को चश्मदीद गवाह मानकर उसे पकडकर ले जाती है| दरोगा तो यहां तक कहता है कि यह उनकी गिरोह का ही होगा| परंतु सत्यव्रत बेहोश हो जाता है| फिर उसकी गवाही लेने केबारे में दरोगा कहते है| यह गांधीवादी और वह लक्स नक्सलवादी उन्हें मरवा दिया यह अपने आप मर जायेगा|  इस तरह गलत बात से लडते लडते सत्यव्रत उसी अस्पताल में  पहुंच जाता है जहां उसे सुबह झगडा किया था| |

चौदहवां अंक 

    सत्यव्रत अस्पताल पहुंचा है और साथ में पत्नी खडी है| पत्नी उसे बताती है कि तुम दिन भर घर नहीं आए इसीलिये थाने में रपट लिखाने गई तब आप थाने के बाहर पडे मिले| बुखार में बेहोश पडे थे और शरीर पर मार के निशान थे|  इसीलिये यहां अस्पताल में लेकर आई| सत्यव्रत कहता है इस अस्पताल मुझे नहीं रहना यहां हत्याएं होती है| इस पर सत्यव्रत कहता है मेरा कोई घर नहीं है | मैं अपनी जिम्मेदारी पर कहीं भी जाऊंगा पर सत्य जरूर कहूंगा| डॉक्टर उसके पत्नी को कहते है इन्हें कोई गहरा धक्का लगा है| इनका दिमाग ठीक नहीं है| क्या अक्सर इन्हें ऐसा होता है| पत्नी कहती है कि पहले कभी ऐसा नहीं हुआ | हां झूठ और बेईमानी से वे चिढते थे| गरीबी में भी गुजरा कर लेते थे पर आज लडने लगे थे | डॉक्टर उसे पागल कह कहते है| ठीक कहते हो डॉक्टर जो गलत है उसेगलत कहुंगा उसके लिए लडूंगा| मुझे जीवन नहीं चाहिये झूठ ए धीरा हुआ जीवन| 

इसतरह सत्यव्रत को पागल करार कर अस्पताल में कैद किया जाता है| दो दिन के बाद वह पूरी तरह पागल हो जाता है चीखता है चील्लता है| 

गलत बातों के खिलाफ अकेले आदमी की लडाई अर्थहीन हो सकती है  पर सत्यव्रत की लडाई अर्थहीन नहीं थी इसीलिये यह लडाई अभी तक जारी है | यह लडाई जात, भ्रष्टाचार, साहूकार चोरबाजार, यम सां नेता, लाचार मतदाता झूठी चुनाव बाजी के खिलाफ है | उसे मिठाने की तैयारी करनी चाहिये| पर यह अकेले आदमी के बस की बात नहीं है| उसे साथ की जरुरत है ? कोन है जो साथ देगा ? इस सवाल से नाटक यहां समाप्त होता है|  जब तक यह साथ नहीं मिलेगा तब तक यह लडाई जारी रहेगी |

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